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हिंदुस्तान आगरा में खूब बंटी अपनों को रेवड़ियां, पुराने ठगे गए

दैनिक हिंदुस्तान के आगरा यूनिट के संपादकीय विभाग में प्रमोशन की विधिवत घोषणा कर दी गई है। पहले की तरह इस बार भी अपनों के बीच ही रेवड़ियां बांट ली गई, जो अपने थे उन्हें मनमाफिक प्रमोशन दिलवाए गए और जो अखबार के पुराने वफादार थे वे बांट जोहते रह गए। लगातार कई सालों से प्रमोशन को तरस रहे कर्मचारी इस चमचागिरी की सियासत को लेकर काफी असंतुष्ट हैं। कइयों ने अपने मुखालफत भी दर्ज करा दी है।

दैनिक हिंदुस्तान के आगरा यूनिट के संपादकीय विभाग में प्रमोशन की विधिवत घोषणा कर दी गई है। पहले की तरह इस बार भी अपनों के बीच ही रेवड़ियां बांट ली गई, जो अपने थे उन्हें मनमाफिक प्रमोशन दिलवाए गए और जो अखबार के पुराने वफादार थे वे बांट जोहते रह गए। लगातार कई सालों से प्रमोशन को तरस रहे कर्मचारी इस चमचागिरी की सियासत को लेकर काफी असंतुष्ट हैं। कइयों ने अपने मुखालफत भी दर्ज करा दी है।

कुछ दिन पूर्व एचआर विभाग से संपादकीय विभाग के 15 से अधिक कर्मचारियों को प्रमोशन की संस्तुति की गई थी। इतनी बड़ी संख्या में संस्तुति देख एचआर ने अपना विरोध दर्ज कराया। इसके बाद लिस्ट पर पेन चला और जो नाम कटे वे उन लोगों के थे, जो चुपचाप मेहनत के साथ काम करते हैं, जो इंचार्ज या अन्य वरिष्ठों के पिछलग्गू हैं उनका नाम ही दोबारा एचआर तक पहुंच पाया। जिन लोगों के प्रमोशन हुए हैं उनमें सिटी डेस्क के अरुण त्रिपाठी और राजकुमार को सीनियर से चीफ कापी एडिटर बना दिया गया। अरुण त्रिपाठी को संपादक पुष्पेंद्र शर्मा का खास माना जाता है। इसी प्रकार रिपोर्टिंग में मीतेन रघुवंशी को सीनियर से प्रिंसिपल कारस्पोडेंट बनाया गया है। अमित पाठक और नासिर हुसैन सीनियर रिपोर्टर बन गए हैं। विष्णु को सीनियर कापी एडिटर बनाया गया है। ये सभी किसी न किसी वरिष्ठ के खास माने जाते हैं।

हिंदुस्तान में निष्ठा से काम करने वाले जिन संपादकीय सहयोगियों को प्रमोशन के लिए मना किया गया है, उनमें अखिलेश तिवारी, संदीप जैन, देवेंद्र, गौरव, अनुज, राघवेंद्र शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर को जब भी हिंदुस्तान संकट में फंसता है तो सबसे पहले बुलाया जाता है। देर रात तक रुकने की बात हो या सुबह जल्दी आने की, इन्हीं को सबसे पहले आदेश दिया जाता है। रात को आठ बजे बाद प्रमोशन पाने वाली टीम गायब हो जाती है और यही चुनिंदा चेहरे अखबार निकालने के लिए मशक्कत करते नजर आते हैं, फिर भी इन्हें कुछ नहीं मिल पाया। इस चापलूसी और भइयागिरी की सियासत से तंग आए संपादकीय कर्मचारी अब पुष्पेंद्र शर्मा या शशि शेखर की बजाय शोभना भरतिया तक अपनी बात पहुंचाने जा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि जब धारा ऊपर से ही गलत बह रही है तो बात कहने का कोई फायदा नहीं है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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