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हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर का ढोंगी लेख और उनके प्रोफेशनलिज्म का सच

पिछले रविवार को हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर का लेख उनके अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर पढ़ा। सम्पादकीय इस हेडिंग से शुरू होता है "खुद आईना देखें, उसे दिखाने वाले". पर सवाल यह है कि  क्या खुद शशि शेखर ने भी वह आइना देखा है जिसकी बात वह अपने लेख में कर रहे हैं। अपने लेख में चार चाँद लगाने के लिए शशि ने मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक से लेकर सत्यता, निष्ठता और निर्भीकता की बात की। शशि जी को लगता होगा बड़े-बड़े शब्द पढ़ कर पाठकों को अच्छा लगेगा। पाठकों को लगेगा कि देखिए  सम्पादक जी कितने अच्छे हैं कितने निर्भीक हैं कितने निष्पक्ष हैं। 

पिछले रविवार को हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर का लेख उनके अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर पढ़ा। सम्पादकीय इस हेडिंग से शुरू होता है "खुद आईना देखें, उसे दिखाने वाले". पर सवाल यह है कि  क्या खुद शशि शेखर ने भी वह आइना देखा है जिसकी बात वह अपने लेख में कर रहे हैं। अपने लेख में चार चाँद लगाने के लिए शशि ने मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक से लेकर सत्यता, निष्ठता और निर्भीकता की बात की। शशि जी को लगता होगा बड़े-बड़े शब्द पढ़ कर पाठकों को अच्छा लगेगा। पाठकों को लगेगा कि देखिए  सम्पादक जी कितने अच्छे हैं कितने निर्भीक हैं कितने निष्पक्ष हैं। 

शशि जी ने अपने लेख में एक बात बहुत ढंग से समझाई कि …"अगर समाज को पेशेवर डॉक्टर, शिक्षक या वकील की जरूरत है, तो प्रोफेशनल पत्रकार की क्यों नहीं? फिर यह कहने में संकोच क्यों कि हम पेशेवर तौर पर सच बोलने और लिखने वाले हैं। पर इसके लिए सच बोलने-लिखने वालों को सत्य की राह पर ही चलना होगा।" … पर सवाल यह है कि जब तक शशि जी जैसे लोग सम्पादक रहेंगे तब तक कोई भी प्रोफेशनल पत्रकार कैसे हो सकता है।

शशि जी, कोई भी व्यक्ति प्रोफेशनल तभी बन पाता है जब उसे उसका भविष्य सुरक्षित नजर आता हो। आप जैसे नान-प्रोफेशनल संपादकों के साथ कोई प्रोफेशनल पत्रकार बन पाएगा, यह समझ से परे है।  किसी की नियुक्ति के समय  प्रोफेशनलिज्म  के बजाय क्षेत्रीयता, जाति  और धर्म को सेलेक्शन का क्राइटेरिया बनाने वाले सम्पादक ऐसी बड़ी-बड़ी बातें लिखें तो समझ से दूर की बात है। शशि को बड़ी-बड़ी बातें लिखने से पहले अपने गिरेबान में झांकना होगा। तब सच लिखना होगा। 

वैसे तो हिंदुस्तान हिंदी हमेशा से ही क्षेत्रीय गुटबाजी का बड़ा अड्डा रहा है। कभी बिहारी कभी पहाड़ी तो आजकल बनारसी बाबू और कनपुरियों का सिक्का खूब चल रहा है। हिन्दुस्तान में आजकल जो लोग सत्ता में बैठे हुए हैं उनका सम्बन्ध कानपुर से ज्यादा है। दिल्ली ब्यूरो प्रमुख से लेकर दिल्ली के स्थानीय सम्पादक तक सभी बनारस से कानपुर के बीच के लोग हैं। यहाँ तक कि जिन लोगों की नियुक्ति सब एडिटर लेवल पर हुई उनका सम्बन्ध भी यूपी की इसी बैल्ट से है। 

हिन्दुस्तान के अन्दर काम करने वाले लोग भी दबी जुबान कहने लगे हैं कि हिन्दुस्तान में काम करने की कुछ विशिष्ट अनकही शर्तें हैं जिनमें सबसे बड़ी शर्त है आपका बनारसी या कानपुरी कनेक्शन होना। चाहे वह किसी भी रूम में क्यों न हो। यही कारण है कि  हिंदुस्तान में ऐसे लोगों को अहम जिम्मेदारी दी जा रही है जिनका कनेक्शन यूपी के इन शहरों से है। पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्म की बात करने वाले हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर से एक ही सवाल है कि नौकरी देते समय उनका ये प्रोफेशनलिज्म कहां चला जाता है।

उपरोक्त विचार किन्हीं shail का है, जिन्होंने मेल आईडी [email protected] के जरिए भड़ास4मीडिया को भेजा है.


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