पिछले कुछ वर्षों से पत्रकारिता की रेल भटक हुई सी नज़र आ रही है, जो आश्चर्य की बात इसलिए है कि रेल का निश्चित मार्ग होता है, फिर भी भटक जाये, तो बड़ी बात होनी ही चाहिए। अधिकांश तौर पर पत्रकारों के बीच इस बात का कंपटीशन होने लगा है कि अमुक तीन वर्ष में करोड़पति हो गया है, तो मैं दो वर्ष में ही बन कर दिखाऊँगा। अमुक को शराब फ्री मिलती है, पर मैं इतनी दहशत बैठाऊंगा कि मेरे घर पहुंचाने आयेगा। अमुक को पुलिस गाड़ी मुहैया करा रही है, तो मुझे तेल भर कर देनी होगी, ऐसे कंपटीशन पिछले कुछ दिनों से आम तौर पर दिख रहे हैं, लेकिन बहुत दिनों बाद बदायूं में हिंदुस्तान और अमर उजाला के बीच जनहित में कंपटीशन होता नज़र आ रहा है।
पिछले दिनों हिंदुस्तान ने ओवर ब्रिज को लेकर अभियान चलाया, जिससे सांसद धर्मेंद्र यादव पर इतना दबाव बना कि सार्वजनिक सभा में हिंदुस्तान का नाम लेकर उन्हें ओवर ब्रिज के निर्माण कराने की घोषणा करनी पड़ी। मंजूरी के बाद धन भी आ गया है, जिससे जनता को बड़ा लाभ होगा। इस मुद्दे से हिंदुस्तान की पाठकों के बीच गिरी साख भी सुधरी है। सर्कुलेशन भी बढ़ा है, तो अमर उजाला को भी यह आइडिया पसंद आ गया।
अब अमर उजाला बदायूं में सालिड बेस्ट प्लांट की स्थापना के लिए अभियान चला रहा है। अगर, वह सफल रहा, तो निश्चित ही जनता को लाभ होगा, इसी तरह अधिकारियों और कांग्रेसियों की चमचागीरी छोड़ दैनिक जागरण भी सीवर लाइन का मुद्दा पकड़ ले, तो जनता को एक बड़ी समस्या से निजात मिल सकती है। लोकसभा चुनाव को लेकर सांसद पर दबाव है, जिसका लाभ जनता को दिलाया जा सकता है, पर डर है कि मुद्दों को बेच न दिया जाये।
बीपी गौतम की रिपोर्ट.






