बिहार में हिंदुस्तान के बाद अब दैनिक जागरण के फर्जीवाड़े का भी पर्दाफाश होने लगा है. हिंदुस्तान के फर्जी एडिशनों के खुलासे के बाद अब जागरण के घोटाले का भी पोल खुलने लगा है. इस बात की तस्दीक खुद जागरण का प्रिंट लाइन कर रहा है. इससे जाहिर हो रहा है कि जागरण पिछले बारह सालों से अवैध तरीके से बिहार में अखबार का प्रकाशन कर रहा है. श्रीकृष्ण प्रसाद द्वारा हिंदुस्तान की गड़बड़ी उजागर करने के बाद जागरण, मुजफ्फरपुर के पूर्व कर्मचारी रमण कुमार यादव भी जागरण के गोरखधंधे को उजागर करने में जी जान से जुट गए हैं.
जाहिर है, जिस तरह पिछले दिनों रमण कुमार द्वारा पीसीआई जांच टीम के सदस्यों के सामने जागरण का पोल खोला गया है, उससे जागरण प्रबंधन बदहवास तथा परेशान है. इसी का परिणाम है कि अब मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्ट्रेशन नम्बर नहीं जा रहा है. उसकी जगह आवेदित प्रकाशित किया जा रहा है. जागरण ने 23 जून को नए रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया है. यानी साफ है कि दैनिक जागरण भी पूरे बिहार में गलत तरीके से सरकारी तथा गैर सरकारी विज्ञापन वसूल रहा था. एक ही एडिशन के लिए अलग अलग रेट पर अब तक करोड़ों रुपये के घोटाला किए जाने का अनुमान लगाया जाने लगा है.
गौरतलब है कि अब तक दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्ट्रेशन नम्बर BIHHIN/2000/3097 प्रकाशित किया जाता था तथा ईमेल में [email protected] का प्रकाशन किया जाता था. इसके अलावा पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर तथा सिलीगुडी से प्रकाशित और पटना से मुद्रित लिखा जाता था. परन्तु 29 जून से मुजफ्फरपुर में अखबार का प्रिंट लाइन चेंज हो गया है. रजिस्ट्रेशन नम्बर की जगह आवेदित, memo no- 101 dated 23/6/2012 लिखा जा रहा है. ईमेल भी बदल कर [email protected] कर दिया गया है. साथ ही अखबार का मुद्रण एवं प्रकाशन भी मुजफ्फरपुर ही लिखा जा रहा है. पहले सभी विवाद पटना कोर्ट में सुलझाए जाने की बात लिखी जा रही थी, अब इसे मुजफ्फरपुर कर दिया गया है.
साफ है कि हिंदुस्तान की तरह जागरण ने भी गलत तरीके से अखबार का अवैध केंद्रों से प्रकाशन कर करोड़ों रुपये के सरकार विज्ञापन की हेराफेरी की है. समझा जा रहा है कि जल्द ही जागरण के भी फर्जीवाड़े का खुलासा होगा. रमण कुमार कहते हैं कि वे जागरण के इस फर्जीवाड़े को अंजाम तक पहुंचा कर रहेंगे. जागरण भले ही रजिस्ट्रेशन के लिए अभी आवेदन कर अपने बचने की कोशिश शुरू कर दी हो, पर उसे पिछले बारह सालों का हिसाब तो देना ही होगा.








