: कानाफूसी : बनारस में हिंदुस्तान की स्थिति को लेकर टॉप मैनेजमेंट किचकिचाया हुआ है. जगतगंज स्थित कार्यालय के भीतर भी स्थितियां सामान्य नहीं हैं. काम करने वालों के चेहरों पर तनाव किसी भी वक्त देखा जा सकता है. अखबार की आए दिन हो रही तियां-पांचा से मैनेजमेंट तो परेशान है ही यहां काम करने वाले भी परेशान हैं. जनसंदेश टाइम्स की लांचिंग ने हिंदुस्तान को अंदर से और अधिक हिला दिया है.
अखबार में भगदड़ मचने जैसी स्थिति बन गई है. वरिष्ठों की राजनीति कनिष्ठों पर भारी पड़ने लगी है. लांचिंग से लेकर अब तक सभी संपादकों पर मजबूत तथा बराबर पकड़ रखने वाले भी अब मीटिंग से भगाए जाने लगे हैं. खबर 31 दिसम्बर की है. हमेशा की तरह इस दिन मासिक बैठक आयोजित की गई थी. यह बैठक हमेशा बारह बजे ही होती है. इस दिन भी बारह बजे से ही मीटिंग शुरू होनी थी. संपादकीय एवं कुछ अन्य विभागों से जुड़े कर्मचारी इस मीटिंग में भाग ले रहे थे. मीटिंग हमेशा की तरह चल रही थी कि डेस्क पर काम करने वाले एक बंधु कुछ देर से मीटिंग में पहुंचे. अखबार के हाल से नाराज चल रहे संपादक ने इन को देर से आने के चलते बाहर रहने का फरमान सुना दिया.
बताया जा रहा है कि इसके ही कुछ देर बाद ज्वाइंट न्यूज एडिटर (हालांकि लिखा-पढ़ी में पद डीएनई का है) भी मीटिंग में पहुंचे. देर से पहुंचने के चलते संपादक ने इन्हें भी मीटिंग से बाहर कर दिया. यह वहां काम करने वालों के लिए चौंकाने वाला रहा. क्योंकि इन महोदय की गिनती संपादक जी के खास लोगों में की जाती है. इसके बाद भी उन्हें निकाले जाने को लेकर दो तरह की चर्चाएं रहीं. पहली चर्चा यह रही कि देर से आने के चलते पहले संपादकीय कर्मी को बाहर निकाल दिया गया इसलिए संपादक ने मजबूरी में ज्वाइंट साहब को भी बाहर निकाल दिया. दूसरी चर्चा यह भी रही कि अब संपादक जी को भी समझ में आने लगा है कि कार्यालय में गड़बड़ी किसके चलते हो रही है. हालांकि सच तो संपादक महोदय ही जानते होंगे, पर जाने अनजाने में उन्होंने तमाम हिंदुस्तानियों को खुश कर दिया है.
अब इन खबरों में किसी की मजबूरी छिपी हो या सच सामने आने की सच्चाई पर हिंदुस्तान, बनारस में अंदरखाने सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. अब तक जितने भी संपादक आए सभी इस अखबार को प्रतिद्वंद्वी अखबारों से आगे ले जाने की हर संभव कोशिश की पर सफल नहीं हुए. इसके पीछे कारण बताया गया एक खास गैंग का. हालांकि बनारस में हिंदुस्तानी भाषा में इस गैंग को नाम दिया गया है भूअरा गैंग. अब इस गैंग में कौन लोग शामिल हैं ये तो हिंदुस्तानी ही बता सकते हैं, पर इस गैंग ने अखबार तथा प्रबंधन को अपने तरीके से चलाकर इसको कभी सीधी लड़ाई में आने ही नहीं दिया. जितने भी संपादक आए इस गैंग ने अपना कब्जा जमा लिया या दूसरे शब्दों में कहे तो संपादकों को हाईजैक कर लिया.
आने वाले हर संपादक के सुख-दुख का पूरा ख्याल रखने वाले इस गैंग से सभी एडिटर खुश रहते हैं, संपादक ने छींका नहीं की दवाई हाजिर. इस तरह का दबदबा है इस गैंग का. इसी का परिणाम था कि अखबार का पत्ता उतना ही हिलता था, जितना यह गैंग हिलाता था. इससे हिंदुस्तान के साथ जुड़े तमाम पुराने लोग असंतुष्टों की श्रेणी में जाने लगे. जिन्हें मौका मिला निकल लिया, जिन्हें मौका नहीं मिला वो मजबूरी में पड़ा रहा. जिसे मौका लगा इस गैंग ने निकलवा दिया, जिस पर मौका नहीं जमा उसे लूप लाइन में डलवा दिया. अब जब जनसंदेश टाइम्स के रूप में यहां के असंतुष्टों के सामने एक विकल्प आ गया है तो वो भागने लगे हैं और इसका असर हिंदुस्तान के उच्चाधिकारियों पर पड़ने लगा है. अखबार में कर्मचारियों की कमी के चलते भी मामला भी मैनेमजमेंट के हाथों से बाहर होता जा रहा है, इसी किचकिचाहट में ई सब हो गया.






