बरेली हिंदुस्तान प्रबंधन के लिए मुश्किलों का सबब बन गया है. चर्चाओं तथा अफवाहों से जूझ रहे इस यूनिट की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है. प्रबंधन इस तरह की डाइलेमा की स्थिति में है कि उसे समझ नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए. पुख्ता खबर है कि स्थानीय संपादक आशीष व्यास जा चुके हैं. इसके बाद भी प्रबंधन इस महत्वपूर्ण यूनिट में किसी संपादक की नियुक्ति नहीं कर सकता है. रोज नए नए नाम के संपादक की चर्चा बरेली में हो रही है. ऐसी खबरों का असर अखबार के सर्कुलेशन के साथ टीम पर भी पड़ रहा है.
बताया जा रहा है कि कुछ समय पहले अलीगढ़ के संपादक मनोज पमार को अलीगढ़ का स्थानीय संपादक बनाए जाने की पूरी तैयारी कर ली गई थी. इसके लिए आगरा से रामकुमार शर्मा को अलीगढ़ भेजा गया ताकि उन्हें संपादक की जिम्मेदारी सौंपी जा सके. रामकुमार शर्मा भी आगरा से अलीगढ़ में जम चुके हैं. यानी अलीगढ़ में इस समय दो दो संपादक काम कर रहे हैं और बरेली में प्रबंधन को खोजे संपादक नहीं मिल रहा है.
इस बीच अमर उजाला तथा दैनिक जागरण के पत्रकारों के संपादक बनने की खबरें भी चर्चा में आईं पर कोई चर्चा पुख्ता खबर नहीं बन सकी. बरेली के इस माहौल से अखबार पर भी असर पड़ रहा है. कभी संजीव द्विवेदी के समय में लगभग डेढ़ दर्जन रिपोर्टरों की बैठक और प्लानिंग होती थी, अब वह मुश्किल से आधा दर्जन के आसपास रह गई है. पूरा यूनिट मनमौजी हो गया है. समाचार संपादक योगेंद्र रावत के बारे में भी कहा जा रहा है कि वे यहां घुटन महसूस कर रहे हैं. मौका मिलते ही वे हिंदुस्तान को नमस्कार भी कर सकते हैं.
बरेली का संपादक बनाए जाने की सबसे मजबूत दावेदारी मनोज पमार की मानी जा रही थी और रामकुमार शर्मा को आगरा से अलीगढ़ भेजकर प्रबंधन ने लगभग इस फैसले पर मुहर भी लगा दी थी, परन्तु बीच में कुछ और नामों की चर्चा होने तथा लंबे समय से अलीगढ़ में दो संपादकों की तैनाती ने अनिश्चय की स्थिति पैदा कर दी है. सूचना है कि किसी का दबाव ना होने से पत्रकार भी मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं. बुधवार की मीटिंग में मात्र आधा दर्जन रिपोर्टर पहुंचे. चर्चा है कि केके उपाध्याय द्वारा तैयार किए गए हिंदुस्तान, बरेली को बरबाद करने की तैयारी चल रही है. सर्कुलेशन भी लगातार कम होता जा रहा है.