मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज 200 करोड़ रुपये के दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में आरक्षी उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर की पर्यवेक्षण रिपोर्ट में नामजद अभियुक्त मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष और एडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतीया, मुद्रक एवं प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और स्थानीय संपादक विनोद बंधु के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8 (बी), 14 और 15 के तहत लगाए गए सभी अभियोगों को प्रथम दृष्टया सत्य पाए जाने की घटना में बिहार सरकार के वित्त (अंकेक्षण) विभाग, पटना, बिहार की वित्त रिपोर्ट -195/2005 की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इस रिपोर्ट को मैं विश्व के इन्टरनेट पाठकों के समक्ष किस्तों में हू-ब-हू प्रकाशित करता आ रहा हूं। इस रिपोर्ट के आधार पर ही मुंगेर के न्यायालय ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर जांच रिपोर्ट न्यायालय को पेश करने का ऐतिहासिक आदेश दिया था। इसी रिपोर्ट को आधार मानकर पुलिस उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर ने पर्यवेक्षण रिपोर्ट में अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए अभियोगों को प्रथम दृष्टया सत्य घोषित किया है।
इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि दैनिक हिन्दुस्तान किस प्रकार जालसाजों का जालसाज है और यह अखबार सरकारी राजस्व को लूटने के लिए किस हद तक दादागिरी करता है? किस तरह बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की विभागीय संचिकाओं को नाच नचाता आ रहा है? इसके पूर्व मैंने अपनी रिपोर्ट में बिहार सरकार की वित्त अंकेक्षण रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या -0001056 प्रकाशित की थी। अंकेक्षक दल ने खुलासा किया था कि दैनिक हिन्दुस्तान पटना से एक निबंधन संख्या प्राप्त कर राज्य में क्षेत्रवार कुल ग्यारह संस्करण का प्रकाशन कर रहा है। परन्तु, हिन्दुस्तान के ग्यारहों संस्करणों के लिए एक ही पंजीयन संख्या-44348/1986 (पटना) छाप रहा है। मुजफ्फरपुर और भागलपुर के लिए दैनिक हिन्दुस्तान में कोई अलग ‘प्रिंट-लाइन‘ नहीं है।
जबतक किसी मुद्रण-केन्द्र का अलग ‘पंजीयन‘ और अलग ‘प्रिंट लाइन‘ नहीं होता है, तब तक उसे स्वतंत्र प्रकाशन नहीं समझा जा सकता है। हिन्दुस्तान, पटना के अतिरिक्त मुजफ्फरपुर और भागलपुर डेट लाइन से कोई प्रकाशन नहीं होता है। इस बात की पुष्टि दैनिक हिन्दुस्तान के प्रतिनिधियों ने अंकेक्षक दल के समक्ष की है।
जालसाजी की हद : कभी स्वतंत्र तो कभी संयुक्त प्रकाशन का दावा : वित्त अंकेक्षण प्रतिवेदन-195/2005 की पृष्ठ संख्या-0001057 में अंकेक्षण दल ने खुलासा किया है कि दैनिक हिन्दुस्तान किस प्रकार कभी भागलपुर और मुजफफरपुर को स्वतंत्र प्रकाशन बताता था, और कभी इससे मुकर भी जाता था।
विज्ञापन लौटाया, सरकार पर दवाब डाला : दैनिक हिन्दुस्तान के मुजफ्फरपुर और भागलपुर संस्करणों को स्वतंत्र प्रकाशन मानकर जब सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना ने अलग विज्ञापन दैनिक हिन्दुस्तान को जारी किया तो अखबार ने उन सरकारी विज्ञापनों को लौटा दिया और छापने से इनकार कर दिया। इस प्रकार अखबार ने सरकार के इस विभाग पर दवाब बनाया और सरकार को पटना, भागलपुर और मुजफ्फरपुर (तीनों संस्करणों) के लिए ‘संयुक्त विज्ञापन दर‘ देने को मजबूर कर दिया जो पूर्णतः ‘अवैध‘ और ‘अनियमित‘ था। अब देश और विदेश के इन्टरनेट पाठक फैसला करें कि बिहार में मीडिया हाउस को सरकार नचा रही है या मीडिया हाउस सरकार को नचा रहा है?
विभागीय परिपत्र का उल्लंघन : संयुक्त विज्ञापन दर देने से विभागीय परिपत्र -328/03-07-1981 के प्रावधानों का उल्लंघन होता है और सरकार को सरकारी राजकोष से नियमित रूप से एक करोड़ 32 हजार 272 रुपया 16 पैसा का भुगतान हिन्दुस्तान को करना पड़ा।
डीएवीपी को अंधकार में रखा, विज्ञापन-दर प्राप्त किया : दैनिक हिन्दुस्तान ने बिहार के मुजफ्फरपुर और भागलपुर के मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र और अलग बताकर ‘डीएवीपी विज्ञापन दर‘ प्राप्त कर लिया। इसमें अखबार ने डीएवीपी को भी अंधकार में रखा। परन्तु, सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना, बिहार इस बात की पुष्टि और सत्यापन करने में असमर्थ है। यह भी घोर आश्चर्य की बात है।
अंकेक्षण प्रेतिवेदन का यह हिस्सा प्रमाणित करता है कि जालसाजों के जालसाज दैनिक हिन्दुस्तान की पकड़ और दबदबा सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना, बिहार पर किस हद तक है? किस ढंग से दैनिक हिन्दुस्तान की इच्छा और मर्जी से सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना की विभागीय विज्ञापन संचिकाएं लिखी जाती हैं? किस प्रकार विभाग के वरीय अधिकारी, कुछ को छोड़कर, अखबार के प्रबंधन और संपादकीय विभाग के डिक्टेशन के आगे ‘बौना‘ और ‘लाचार‘ बने हुए हैं। इसे पढ़कर कौन कहेगा कि सरकार बिहार में मीडिया हाउस को नचा रही है? स्थिति तो ठीक उलटी है। जालसाजी और धोखाधड़ी में लिप्त बिहार के मीडिया हाउस सरकार के सरकारी विभाग को डिक्टेट कर रहे हैं और जमकर सरकारी विज्ञापन मद में लूट मचा रखा है।
कानूनी बाध्यता : ज्यों हि कोई मुद्रण-केन्द्र अलग स्वतंत्र इकाई के रूप में काम करना प्रारंभ करता है, त्यों हि प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 के तहत प्रकाशन पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष घोषण करना और भारत सरकार के प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली से पंजीयन कराना अनिवार्य है। कंपनी रजिस्ट्रार से पूर्व अनुमति प्राप्त करना भी अनिवार्य था, जो नहीं किया गया। मुद्रण केन्द्र मुजफ्फरपुर में 28-03-2001 से प्रारंभ हुआ और भागलपुर में 03-08-2001 से प्रारंभ हुआ। परन्तु घोषणा-पत्र क्रमशः मुजफ्फरपुर में जिलाधिकारी के समक्ष 29-11-2003 और भागलपुर में 11-12-2003 को समर्पित किया गया, जो प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 के प्रावधानों के प्रतिकूल है।

शेष अगले अंग में।
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट। इनसे संपर्क मोबाइल नं.- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है।
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