शुक्रवार दिनांक 3 जनवरी को सोसाइटी फॉर सोशल रिजेनेरेशन ऐंड इक्यूटी नामक ग़ैर सरकारी संगठन ने कल्याणपुर, लखनऊ स्थित अपने कार्यालय में एक समारोह में हिन्दी भाषा की एक मात्र यहूदी उपन्यासकार, शीला रोहेकर, को सम्मानित किया। पिछले ही वर्ष, 2013 में भारतीय ज्ञानपीठ ने शीला रोहेकर का तीसरा उपन्यास मिस सैमुएल: एक यहूदी गाथा प्रकाशित किया।
शीला रोहेकर के इस उपन्यास के सिवा हिन्दी में केवल एक ही और ऐसा उपन्यास है जो भारतीय यहूदी जीवन का चित्रण करता है। मगर वह उपन्यास आज से बावन वर्ष पूर्व 1961 में प्रकाशित हुआ था जिसे मीरा महादेवन ने लिखा था। मीरा महादेवन एक भारतीय यहूदी परिवार में जन्मी थीं तथा उनके माता पिता ने उन्हें मिरियम जेकब मेंद्रेकर नाम दिया था। मेंद्रेकर की मृत्यु के पश्चात अब शीला रोहेकर ही हिन्दी की एक मात्र यहूदी उपन्यासकार हैं।
सम्मान समारोह में सोसाइटी फॉर सोशल रिजेनेरेशन ऐंड इक्यूटी की अध्यक्षा शुमा तालुकदार ने शीला रोहेकर को एक मेमेंटो पेश किया। इस अवसर पर एक परिचर्चा और काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। परिचर्चा का विषय था “हिन्दी उपन्यास में धार्मिक अल्पसंख्यकों का चित्रण”। परिचर्चा में सबसे पहले ग्रेटर नोएडा में स्थित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नवरस जाट आफरीदी ने हिन्दी उपन्यासों में यहूदियों के चित्रण पर एक व्याख्यान दिया, जिसके उपरांत परिचर्चा का संचालन करते हुए उन्होने शीला रोहेकर को बोलने के लिए आमंत्रित किया। रोहेकर ने अपने भारतीय यहूदी समुदाय का परिचय देते हुए उसके इतिहास और सामाजिक ताने बाने पर प्रकाश डाला। यहूदी समुदाय भारत का सबसे छोटा अल्पसंख्यक संप्रदाय है। परिचर्चा में लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के सेवानिवृत प्रवक्ता डॉ तुकाराम वर्मा ने हिन्दी उपन्यासों में ईसाइयों और बौद्ध बुद्धजीवी तथा हास्य कवि डॉ डंडा लखनवी ने बौद्धों के चित्रण पर ध्यान आकर्षित किया।
परिचर्चा के उपरांत होने वाली काव्य गोष्ठी में देवकी नन्दन शांत, अनवर नदीम, डॉ पद्मिनी नातू, डॉ तुकाराम वर्मा और डॉ डंडा लखनवी ने अपने काव्य पाठ से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। गोष्ठी का संचालन किया उर्दू शायर अनवर नदीम ने। इस अवसर पर हिन्दी उपन्यासकर रवीन्द्र वर्मा तथा नारी शिक्षा निकेतन स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अरब संस्कृति विभाग की सेवा निवृत अध्यक्षा डॉ मंजु सिकरवार भी उपस्थित थीं।






