हिन्दुस्तान, कानपुर नित नये नये तरीके से अपने कर्मचारियों का शोषण जारी रखे हुए है. इसके लिए उसे किसी कानून का पालन करने की भी परवाह नहीं है. जो हिन्दुस्तान ने अपने कर्मियों को कह दिया वही कानून हो गया. हिन्दुस्तान, कानपुर ने अपने चार कर्मचारियों पारस नाथ शाह, नवीन प्रसाद, अंजनी कुमार और संजय दूबे को श्रम मंत्रालय के रूल्स और रेगुलेशन की धज्जियां उड़ाते हुए नौकरी से निकाल दिया था. अब उसने इन पीड़ितों के खिलाफ ही जांच बिठा दी और इन चारों को जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे दिया.
हिन्दुस्तान प्रबन्धन को इतना भी ख्याल नहीं आया कि कानूनी प्रक्रिया के तहत किसी भी कर्मचारी को आरोप पत्र देने के बाद कम से कम 72 घंटे का समय दिया जाता है उसके बाद ही जांच अधिकारी की नियुक्ति की जाती है. पीड़ितों को यह भी नहीं बताया गया कि प्रबंधन उनके खिलाफ किन्हें गवाह के तौर पर पेश करेगा जबकि ये उनका कानूनी हक है. लेकिन जो हिन्दुस्तान प्रबंधन खुद श्रम विभाग के नियमों की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता तो वह कर्मचारियों के कानूनी अधिकारों का क्या ध्यान रखेगा. ज्ञात हो कि इसके पहले श्रम आयुक्त के द्वारा स्टैंडिंग आर्डर के साथ पेश होने का आदेश दिये जाने के बावजूद हिन्दुस्तान का कोई भी मैनेजर उपस्थित नहीं हुआ था.
इस गैरकानूनी प्रक्रिया के खिलाफ संजय दूबे ने लेबर कमिश्नर के द्वारा रिसीव अपने जवाब की प्रति हिन्दुस्तान, कानपुर को भेजा है. नीचे जो चार पत्र अटैच किये गये हैं उनमें पहला पत्र हिन्दुस्तान प्रबंधन की तरफ से जारी किया गया है तथा नीचे संजय दूबे के द्वारा हिन्दुस्तान, कानपुर प्रबंधन को भेजे गये जवाब की स्कैन कापी है.
इन चारों कर्मचारियों ने भी हिन्दुस्तान के खिलाफ पूरी लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है. भड़ास से बातचीत में संजय दूबे ने कहा कि हिन्दुस्तान, कानपुर की आँख पर परदा पड़ा हुआ है और कोई काम लीगल तरीके से नहीं कर रहा है, सब अपने घर का कानून बना रखा है लेकिन उसे नहीं पता कि कानून के चक्कर में ही ए राजा, रशीद मसूद, लालू यादव और कितने ही लोग जेल की हवा खा रहे हैं. हम लोग इन्हें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा कर ही दम लेंगे और चाहे जो भी मुसीबत आये इस लड़ाई को मुकाम तक पहुंचाकर ही रहेंगे.
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