जागरण में बंपर छंटनी (10) : चंदौली व आजमगढ़ में प्रबंधन ने किया दो पत्रकारों का शिकार

दैनिक जागरण, वाराणसी में छंटनी का दौर लगातार जारी है. अब तक कई लोग इस छंटनी के शिकार हो चुके हैं. इस बार दो और लोगों को बाहर किया गया है. संवेदनहीन मालिक खुद शीशे के महलों में रहते हुए रुट लेबल के काम करने वाले पत्रकारों को बाहर का रास्‍ता दिखा रहा है, जबकि जमीन सहित तमाम दलालियों में हाथ आजमाने वाले प्रबंधन के चहेते बने हुए हैं. खबर है कि चंदौली में कार्यरत रहे दिलीप सिंह से इस्‍तीफा ले लिया गया है. दिलीप पिछले डेढ़ दशक से दैनिक जागरण को चंदौली जिले में अपनी सेवाएं दे रहे थे. प्रबंधन ने उनका पक्ष जाने-सुने बिना उनसे इस्‍तीफा ले लिया.

चंदौली में अखबार को मजबूती देने वाले दिलीप सिंह को प्रबंधन ने एक ही झटके में इस्‍तीफा देने का फरमान सुना दिया, जबकि कई बीमारियों से पीडि़त दिलीप सिंह को जागरण और उसकी नौकरी की सख्‍त जरूरत थी. जबकि इसी चंदौली में जमीन की दलाली करने वाला पत्रकार वीरेंद्र कुमार तथा प्रबंधन का चहेता बना हुआ है. दिलीप सिंह की जगह भदोही में कार्यरत रहे जितेंद्र उपाध्‍याय को चंदौली भेजा गया है. भदोही में जितेंद्र की जगह किसी को एप्‍वाइंट नहीं किया गया है. आजमगढ़ में भी प्रबंधन अनिल मिश्रा से इस्‍तीफा ले लिया है, जबकि अनिल मिश्रा भी जागरण से लम्‍बे समय से जुड़े हुए थे.

खबर है कि प्रबंधन जल्‍द ही पहले पेज पर काम देखने वाले एक अन्‍य वरिष्‍ठ पत्रकार को भी अपना शिकार बनाने की तैयारी कर रहा है. इसके अलावा इस छंटनी में मैनेजमेंट के वरिष्‍ठ साथी अपने दुश्‍मनों को भी ठिकाने लगाने का बेहतर मौका मान रहे हैं. आखिर जब अखबार का डाइरेक्‍टर खुद सूद-ब्‍याज का धंधा करता हो तो उसे काम करने वाले पत्रकार कैसे रास आ सकते हैं. उसे रास भी वैसे ही लोग आएंगे जो उसकी दलाली तथा सूद-ब्‍याज के धंधे को आगे बढ़ा सकें.

बनारस का जागरण प्रबंधन अंधा-बहरा है. यह ना तो कुछ देखता है और ना ही कुछ सुनता है. सामने वाले को अपना पक्ष रखने का भी मौका नहीं देता है. यहां काम करने वालों की नहीं डाइरेक्‍टर व वरिष्‍ठों के तीन-पांच को प्रश्रय देने वाले पत्रकारों की पूछ होती है. बनारस तथा इस यूनिट से जुड़े उन पत्रकारों की लिस्‍ट जल्‍द ही जारी की जाएगी, जो जमीन की दलाली समेत पत्रकारिता की आड़ में सूद-ब्‍याज व अन्‍य दूसरे धंधों को अंजाम दे रहे हैं. कुछ दिन पहले ही एनएचआरएम घोटाले मामले में खुद संपादक वीरेंद्र कुमार के पुत्र के चिकित्‍सालय में भी सीबीआई की टीम पहुंच चुकी है.   


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