क्‍यों भूल गई नोएडा पुलिस 14 अगस्‍त 2005 की बहादुरी!

लगता है सरकार और खासतौर से सरकारी मशीनरी ने मीडिया को जलील करने और हर रोज नीचा दिखाने के लिए नित नये हथकंडे अपनाने की ठान ही ली है। मीडिया की सही तस्वीर दिखाने और मीडिया हाउसों में पत्रकारों के शोषण को उजागर करने वाले यशवंत को जेल भेजने वाली बहादुर नोएडा पुलिस भले ही 14 अगस्त 2005 की रात बहादुरी भूल गई हो, मगर जिन्हें वो घटना याद है वो आज भी बता सकते हैं कि किस तरह से इंडिया टीवी के पत्रकारों ने शराब के नशे में धुत होकर ना सिर्फ एक होटल के स्टाफ और वहां पर मौजूद बाउंसरों को जमकर धुना था, बल्कि जब सेक्टर बीस की पुलिस वहां पहुंची तो कई पुलिस वालों को भी शराब की बोतलों से ज़ख्म मिला था।

ये सब बहुतों को याद हैं। ये अलग बात है कि शुरुआत में सेक्टर बीस थाने से और पुलिस बल पहुंच कर इंडिया टीवी के अनुरंजन झा, भूपिंदर सिहं भूपी, सुधीर चौधरी समेत कई दिग्गजों को जमकर लठियाया और थाने के सड़ांध भरे हवालात में ठूंस दिया। मगर जैसे ही एसएसपी पीयूष मोर्डिया के पास लखनऊ से किसी सत्ताधारी यादव बंधु का फोन आया नोएडा पुलिस अपनी बेइज्जती से लेकर बहादुरी तक भूल चुकी थी, और सुधीर चौधरी समेत अनुरंजन झा वगैरह निजी मुचलके पर लड़खड़ाते हुए हवालात से बाहर निकाल दिये गये थे। क्योंकि इंडिया टीवी की ओर से मुलायम सरकार से मदद की गुहार और कथिततौर पर आगे ख़बरों में तालमेल बनाने का वादा किया गया था।

आज वही बहादुर पुलिस यशंवत को एक ऐसी शिकायत पर जेल में भेज चुकी है जिसका उजागर होना भी लाजमी है। क्योंकि आखिर विनोद कापड़ी और उनकी बेटी की उम्र की दूसरी पत्नी साक्षी का ऐसा कौन सा राज था, जिसके बदले यशवंत उनसे किसी प्रकार की रकम की मांग कर रहा था। हालांकि एक्सटार्शन या उगाही की परिभाष नोएडा पुलिस भी जानती है और हर क्राइम रिपोर्टर भी। मगर विनोद कापड़ी से कथिततौर पर बीस हजार रुपय मांगने वाले यशवंत पर लगे आरोप अदालत में विनोद कापड़ी और साक्षी समेत पुलिस तक को बेनकाब कर सकते हैं। लेकिन आनन फानन में यशवंत को आंतकवादी की तरह गिरफ्तार करने वाली उत्तर प्रदेश पुलिस की ताजा कार्रवाई ने लगभग एक साल पहले गाजियाबाद पुलिस द्वारा वरिष्ठ पत्रकार आजाद खालिद के खिलाफ चंद मिनट के दौरान ही कई थानों में कई एफआईआर दर्ज करने और उनके घर पर पांच-छह जीपों में भर कर तीस-पैंतीस पुलिस वालों की छापेमारी के तुगलगी कार्रवाई की यादें ताजा कर दी है।

हांलाकि क्षेत्रीय जनता के दबाव और इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा अंतरिम जमानत के बाद पुलिस आजाद खालिद पर हाथ तक नहीं डाल पाई थी। बस फर्क सिर्फ इतना है कि आजाद खालिद के खिलाफ मायवती राज के करप्शन को उजागर करने पर उन को सबक सिखाने के लिए गाजियाबाद प्रशासन ने पूरा ताना बाना बुना, जबकि यशवंत के मामले में मीडिया में आजकल बड़ा नाम बन चुके विनोद कापड़ी (उनके बड़प्पन का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि शादी शुदा होने का बावजूद मीडिया में आने वाली नई लड़कियों को अपने इशारे पर नचाने की ताकत उनमें खूब है) को खुश करने के लिए नोएडा पुलिस ने टूल की तरह काम किया। हालांकि आजाद खालिद के मामले लगभग एक साल बाद गाजियाबाद पुलिस को अदालत में लिखकर देना पड़ा कि आजाद खालिद के खिलाफ आरोप गलत है और उनके खिलाफ कोई मामला बनता ही नहीं।

यानि लगभग सभी एफआईआर एक साल के भीतर ही ढेर हो गईं। साथ ही यशवंत और आजाद खालिद के मामले में एक और समानता है। तीन मई 2011 को कई एफआईआर आजाद खालिद के खिलाफ दर्ज होने के बाद जब गाजियाबाद के पत्रकारों ने लामबंद होना शुरु किया तो प्रशासन और पुलिस ने कुछ पत्रकारों के काले चिठ्ठे उनके सामने रखकर धमकाया कि अगर हमारे खिलाफ गये तो अंजाम बहुत बुरा होगा। और बेचारे कई दागी पत्रकार दुम दबा कर छिप भी गये। शायद ठीक इसी तरह यशवंत के मामले में भी पुलिस की कार्रवाई ने अब तक कई पत्रकारों की जुबान पर लगाम लगा दी है। मगर क्‍या हम पत्रकारों को यशवंत के मामले में भी साल भर का इंतजार करना होगा कि पुलिस जांच के बाद मामला खत्म हो। साथ ही क्या यशवंत वाकई कोई आंतकवादी थे कि उनको गिरफ्तार करने के लिए एसओजी समेत तेज तर्रार पुलिस टीम ने बेहद मुस्तैदी से महज दो ही घंटों के भीतर सारी कार्रवाई को अंजाम दे डाला?

क्या नोएडा पुलिस ये बता सकती है कि पिछले दो साल में नोएडा में एक्सोटर्शन या इसी तरह के कितने मामले दर्ज हुए और उनमें कुल कितनी गिरफ्तारियां हुई। कहीं ऐसा तो नहीं नोएडा पुलिस ने किसी बड़े मीडिया हाउस को खुश करने या किसी मीडिया माफिया के इशारे पर यशवंत को अपमानित किया है। कुल मिलाकर पिछले कुछ दिनों से पत्रकारों के साथ जो हो रहा है वो सरकारी मशीनरी की नीयत को बेनकाब करने के लिए काफी है। चाहे गोरखपुर में अमर उजाला के पत्रकार धर्मवीर के हलक में सरेआम डंडा चढ़ाने और थूक कर चटवाने वाली पुलिस का जुल्म और अमर उजाला की चुप्पी हो या फिर मध्य प्रदेश में हुई कई घटनाएं, इन सबसे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि पत्रकारों को उठ खड़ा होना चाहिए।

हां ये हो सकता है कि कुछ पत्रकारों जिनकी रोटी, दलाली या सूचना विभाग और सरकारी मशीनरी से मिलने वाले टुकड़े से चलती हो, वो इस मुहिम में जुड़ने की हिम्मत ना रख पाएं, मगर जिनको सम्मान, स्वाभिमान परिवार से अच्छे संस्कार मिले हैं वो इस तरह के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते। आखिर में हम नोएडा पुलिस का आभार जरूर व्यक्त करना चाहेंगे कि उन्होंने सच का झंडा उठाने वाले और बड़े कार्पोरेटों को बेनक़ाब करने वाले यशवंत जैसे खूंखार को मीडिया के बड़े माफिया के लिखित आदेश के बावजूद एनकाउंटर में ढेर नहीं किया।

लेखक तौसीफ हाशमी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. फिलहाल ग्‍लोबल न्‍यूज नेटवर्क और अपोजिशन न्‍यूज डॉट काम से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क 8800574697 के जरिए किया जा सकता है.

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