अंतर्राष्ट्रीय गरीबी दिवस (17 अक्टूबर) पर विशेष : आयें तो कभी गांवों में भूख मेजबां होगी…

आमतौर पर अखबारों-चैनलों में किसी पर्व के नजदीक आते ही महंगाई बनाम गरीबी का राग शुरू हो जाता है। पिछले साल वस्तुओं का ये दाम था और इस साल ये हो गया.. कोटे से चीनी, तेल और राशन नहीं मिला… सड़कें नहीं बनी… साफ-सफाई नहीं हुई, बताओ कैसे मनायें पर्व-त्योहार। दशहरा-बकरीद के पर्व पर भी यह सब हुआ और आगे दीपावली के त्योहार को लेकर भी यही होगा।

यहां एक सवाल उठता है कि क्या भूख पर्वों-त्योहारों पर ही दिखती है और आम दिनों में आदमी का पेट भरा रहता है। सही मायने में देखें तो सौ में सत्तर फीसदी लोगों  की यही स्थिति हर दिन रहती है। (सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पर रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है- अदम गोंडवी)। कहने की जरूरत नहीं कि मीडिया को अपना दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है और इसमें कोई शक नहीं कि देश व प्रदेश की सरकार पर इससे दबाव भी बनता है।

सवाल अभी भी जिंदा है- तो फिर आखिर गरीबी है क्या? विश्व बैंक की नजर में किसी को उसके कल्याण से महरूम रखना ही गरीबी है। यही नहीं, स्तरहीन शिक्षा और स्वास्थ्य, स्वच्छ जल और साफ-सफाई की अनुपलब्धता, तमाम अव्यवस्था भी गरीबी में शामिल है। वहीं संयुक्त राष्ट्र की राय में विकल्पों और मौकों का अभाव ही गरीबी है। अगर किसी के पास संसाधनों का इतना अभाव है कि वह न तो परिवार भरपेट भोजन करा सकता है और न उनका तन ढक सकता है तो वह है गरीबी। हिंसा के प्रति लोगों का अतिसंवेदनशील होना, एकाकी जीवन जीने या नाजुक माहौल में जीने को अभिशप्त होना भी गरीबी का ही परिचायक है। वहीं इससे इतर अपने देश की सरकारें व्यक्ति द्वारा कमाने-पेट भरने के न्यूनतम मानक (33 रुपये- शहर, 27 रुपये- गांव) को गरीबी से जोड़ कर देखती हैं। चिंता की बात यह है कि हमारी मीडिया और पब्लिक भी इसी मानक के फेर में चक्कर काट रही है। एक पल के लिये जरा यह विचार करें कि अगर आय का न्यूनतम मानक दूना कर दिया जाये तो इससे गरीबी कम हो जायेगी। सरकारों से ज्यादा आज हमें जरूरत है अपना नजरिया बदलने की और उसी तरह से आवाज उठाने और सरकार पर दबाव बनाने की।

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट पर गौर करें तो दुनिया की आबादी का पांचवां हिस्सा (करीब 1.2 अरब लोग) गरीबी में जी रहा है जबकि भारत में दुनिया के एक तिहाई गरीब बसर करते हैं। अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा का पैमाना देखें तो प्रतिदिन 1.२५ डॉलर (करीब 70-75 रुपये) पर गुजर करने वाले लोग गरीब हैं। वहीं 2 डॉलर (करीब 125 रुपये) से कम पर आश्रित लोग मध्यम गरीब हैं। विश्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक देश की 80 फीसदी आबादी 2 डालर से कम पर बसर करती है। अब देखिये अपनी देश की रिपोर्टों का कमाल। बीते दिनों योजना आयोग द्वारा जब गरीबी के नये मानक तय किये गये तो खूब हो-हल्ला हुआ। दूसरी तरफ जब नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन की ओर से 2011-12 वर्ष के उपभोग खपत के आंकड़े जारी हुये तो सरकार की किरकिरी और बढ़ गई। रिपोर्ट के अनुसार गांव में 2886 रुपये और शहरों में 6383 रुपये प्रतिमाह खर्च करने वाला व्यक्ति देश के शीर्ष पांच प्रतिशत लोगों की श्रेणी में आता है।

यह इतना हास्यास्पद था कि जैसे हम-आप लोग मुकेश अंबानी, रतन टाटा, नारायण मूर्ति जैसे उद्योगपतियों की श्रेणी में आ गये हों। आखिर एक दड़बेनुमा कमरे में रहने वाले फोर्थ क्लास कर्मचारी का देश के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों की श्रेणी में आना मजाक नहीं तो और क्या है। अगर गांवों में रोजाना 96.2 रुपये और शहरों में 212.77 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति देश के पांच प्रतिशत शीर्ष लोगों में शामिल हो रहा है तो विद्वानों को भारत की विकास गाथा के बारे में फिर से सोचना पड़ेगा। अखबारों और चैनलों की रिपोर्ट के अनुसार हम विश्व के प्रमुख देशों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली दूसरी अर्थव्यवस्था हैं। यह सिर्फ और सिर्फ आंकडे़बाजी का कमाल है।

बाकी देश में विकास की तस्वीर देख लीजिये खुद-ब-खुद पता चला जायेगा कि देश में अव्यवस्था का क्या आलम है। देश की आजादी से पूर्व गांधी ने जो आशंका जताई थी, इन दिनों वही सच साबित हो रही है। अमीर और अमीर हो रहा है और गरीब और गरीब। एनएसएसओ (जिन्होंने पिछले दस वर्षों में 25 करोड़ या इससे अधिक जमा कर लिए हैं) के आंकड़े आय में असमानता को ही दर्शाते हैं। साल दर साल आय के असमान वितरण की खाई और चौड़ी होती जा रही है। इस दर से तो भारत अमेरिका को भी शर्मसार कर देगा, जहां 400 लोगों के पास आधी अमेरिकी आबादी के बराबर सम्पत्ति है (जब-तब जारी होने वाली रिपोर्टों में हम इसी को पढ़कर खुश होते हैं)। भारत में आर्थिक वृद्धि से मतलब एचएनआइएस (अल्ट्रा हाई नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स ) से है, जिनकी संख्या 2012-13 में एक लाख से भी अधिक हो गई है और आगामी पांच साल में यह संख्या तीन लाख पार कर जायेगी। इस तरह मुट्ठीभर परिवारों में जितनी अधिक सम्पदा जमा होगी, औसत आय व सम्पन्नता और बढ़ती जायेगी लेकिन यह गर्व करने की बात नहीं होगी बल्कि इससे गरीबी की खाईं और चौड़ी होगी।

अब बात करते हैं खाद्य सुरक्षा बिल की। पिछले दिनों यह बिल दोनों सदनों में संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी की दिलचस्पी व मुख्य विपक्षी पार्टी के समर्थन से पास हो गया। हालांकि छिटपुट पार्टियों ने इसका विरोध किया। खाद्य सुरक्षा बिल के माध्यम से सरकार देश की 67 प्रतिशत आबादी को राहत देना चाहती है लेकिन यहां एक सवाल यह उठता है कि अगर देश में केवल 22 प्रतिशत आबादी ही गरीब है तो सरकार 67 प्रतिशत आबादी को सस्ती दरों पर अनाज क्यों उपलब्ध कराना चाहती है? शायद इसीलिये ही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य एनसी सक्सेना भारत में गरीबी के दो रेखाओं के पक्ष में हैं। एक भुखमरी के लिए और दूसरी गरीबी के लिए।

वर्तमान शहरी व ग्रामीण गरीबी रेखा यानी 33 व 27 रुपये को भूख रेखा घोषित कर दिया जाना चाहिए। अर्थशास्त्री अर्जुनसेन गुप्ता ने भी कई वर्षों पूर्व यही बात कही थी कि देश की 77 प्रतिशत आबादी 20 रुपये प्रतिदिन खर्च करने की स्थिति में नहीं है। गरीबी रेखा में देश के 77 प्रतिशत लोग आने चाहिए। अगर दक्षिण अफ्रीका में तीन रेखाएं हो सकती हैं- पहली खाद्य के लिए और दूसरी व तीसरी गरीबी के निर्धारण के लिए तो भारत में हकीकत वाली गरीबी का विशुद्ध आकलन क्यों संभव नहीं है? लेकिन यह तभी संभव है जब जन प्रतिनिधि या योजनाकार गांवों में स्वयं पहुंचे और हकीकत से रूबरू हों। और आम आदमी के शायर अदम गोंडवी ने यूं ही नहीं कहा था- आप आयें तो कभी गांवों के चैपालों में, मैं रहूं या न रहूं भूख मेजबां होगी।

लेखक रवि प्रकाश मौर्य से संपर्क rpmravii@gmail.com या 09026253336 के जरिए किया जा सकता है.

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