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1860 की दंड प्रणाली वकीलों-जजों के लिए लाभदायक है, मुजरिमों-मजलूमों के लिए नहीं

“निर्दोष हंस को बचाना है नृशंस शिकारी को नहीं”- यह बात लखनऊ से मुंबई पुस्तक मेले में 18 अप्रैल 2013 को आईं श्री शालिनी माथुर ने अपने आलेख “ज़ुर्म और सज़ा” के द्वारा कही और स्त्री के प्रति हर तरह की हिंसा और उससे जुड़े हुए सभी न्यायिक मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। शालिनी ने कहा कि हमें वह समाज बनाना है जहाँ निर्दोष निरपराध लोग भी चैन से जी सकें, जहाँ बच्चियाँ स्कूल जा सकें, पार्कों में खेल सकें, जहाँ माँ-बाप और बच्चों को हर समय बलात्कार और हत्या के ख़ौफ़ के साए में न जीना पड़े।

“निर्दोष हंस को बचाना है नृशंस शिकारी को नहीं”- यह बात लखनऊ से मुंबई पुस्तक मेले में 18 अप्रैल 2013 को आईं श्री शालिनी माथुर ने अपने आलेख “ज़ुर्म और सज़ा” के द्वारा कही और स्त्री के प्रति हर तरह की हिंसा और उससे जुड़े हुए सभी न्यायिक मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। शालिनी ने कहा कि हमें वह समाज बनाना है जहाँ निर्दोष निरपराध लोग भी चैन से जी सकें, जहाँ बच्चियाँ स्कूल जा सकें, पार्कों में खेल सकें, जहाँ माँ-बाप और बच्चों को हर समय बलात्कार और हत्या के ख़ौफ़ के साए में न जीना पड़े।

उन्‍होंने कहा कि जहाँ न्याय प्रणाली का एक मात्र ध्येय केवल 99 अपराधियों को इसलिए बचाना न हो कि कहीं एक निरपराध को सज़ा न हो जाए, बल्कि जन सामान्य को सहज, सुरक्षित जीवन जीने में मदद करना हो। उन्होंने आगे कहा कि 1860 से चली आ रही क्रूर तथा रूढ़िवादी दंड प्रणाली आज भी लागू है जो वकीलों तथा जजों के लिए लाभदायक है, मुज़रिमों और मजलूमों के लिए नहीं।

इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार सुधा अरोड़ा ने कहा कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को न्याय मिलना लगभग असंभव है। कमज़ोर स्त्री अपने अधिकारों के प्रति न तो जागरूक है, न उसे अपने अधिकारों की जानकारी है। इस चर्चा में मलयालम की प्रसिद्ध लेखिका मानसी ने कहा कि हमारे युवा वर्ग के पास कोई सपने नहीं हैं, कोई लक्ष्य नहीं है इसलिए वो दिशाहारा सा है और पोर्नोग्राफ़िक सामग्री देखकर उसका प्रेक्टिकल करने के लिए स्त्री के प्रति यौन हिंसा करता है।

मराठी लेखिका सुषमा सोनक ने कहा कि व्यवस्था स्त्री को कभी भी सशक्त नहीं बनाना चाहती। अपराधियों को न सज़ा का भय है न समाज का। कथाकार रामजी यादव ने कहा शासन अब ऐसे लोगों के हाथ में है जो स्त्री को इतना सॉफ्ट शिकार समझते हैं कि उसके साथ हुए दुर्व्यवहार का संज्ञान भी नहीं लेते। डॉ. रवीन्द्र कात्यायन ने कहा स्त्री के प्रति बढ़ते अपराधों के प्रति समाज की असंवेदनशीलता और पुलिस तथा न्याय व्यवस्था की लचर स्थिति ने हमारे समय को बहुत बेबस बना दिया है जहाँ स्त्री के लिए सुरक्षित रहते हुए सम्मान से जीना आज सबसे बड़ी चुनौती है। और अपने समय की इस बेबसी पर हमारा समाज शर्मिंदा भी नहीं होता!

शालिनी माथुर ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अपराधी के प्रति अतिरिक्‍त  कन्‍सर्न पर तंज करते हुए  कहा – हमारी दण्ड प्रक्रिया अपराधी पर केन्द्रित है – उसके कृत्य, उसके अधिकार और उसका सुधार। ऐसे अपराधियों के पास सर्वोच्च न्यायालय तक जाने और अपराधी पाए जाने के बाद भी दया पाने का हक है। जो अपराध का शिकार हुए, उस पीडि़त व्यक्ति की पीड़ा न हमारे कानून की जिज्ञासा का विषय है, न हमारी। पीड़ितों के पास शीघ्र इंसाफ़ पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं। भारत का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम क्या कभी जस्टिस फॉर द विक्टिम भी बन पाएगा?

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