वाह रे! तद्भव : न तो आरएनआई, ना ही आईएनएनएस फिर भी मुनाफा 20 लाख का

Shashi Bhooshan Dwivedi : कोई मुझे बताएगा कि तद्भव पत्रिका का न तो RNI नंबर है और न ही INNS नंबर. फिर इस पत्रिका को इतने सरकारी विज्ञापन कैसे मिल जाते हैं खासकर DAVP के विज्ञापन. एक पत्रिका निकालने में लोग बिक जाते हैं लेकिन इसने तो सबको खरीद लिया है. इस बार के अंक में पत्रिका को सात लाख के विज्ञापन मिले हैं, और इसके प्रकाशन का पूरा खर्चा विचार न्यास उठता है, हर अंक में ४-५ लाख के विज्ञापन होते हैं. साल में चार अंक यानी साल में २० लाख का शुद्ध मुनाफा.

Vineet Kumar : बताया जाता है कि संपादकजी का अधिकारियों (विचारधारा से परे) से बहुत अच्छी बनती है, पूरा नेटवर्क काम करता है. कुछ ऐसे भी विज्ञापन छप जाते हैं ताकि आकर्षित होकर दूसरे लोग भी दें.. एक बार इसी एफबी पर लिखा था कि जब इतने विज्ञापन मिलते हैं तो फिर लेखक को एक रुपया तक क्यों नहीं मिलता, किसी ने न कमेंट किया, न लाइक.

Mohan Shrotriya : भाई, खूब खोज कर लाए/तद्भव के सिवा कौन बताए?

  Vineet Kumar : निर्मल बाबा की इस आंधी में इस पर भी खोज कर ली जाए, वैसे अभी खाता-पत्तर के बारे में सबसे ज्यादा खोजपरक रिपोर्टिंग प्रभात खबर में हो रही है, मदद ले सकते हैं.

Arbind Jha : prabhat khabar?

Shashi Bhooshan Dwivedi : ये हाल तब है जब पत्रिका की मुश्किल से ४००-५०० प्रतियाँ छपती हैं.

  Vineet Kumar : शशिजी, इसके खिलाफ झंड़ा उठाने का मतलब है- फ्रस्ट्रेशन में बात कर रहे हैं, लेख नहीं छपा तो खुन्नस में ऐसा कह रहे हैं लेकिन आज से एक साल पहले देशभर की पत्रिकाओं को लेकर सीएसडीएस-सराय में दो दिन का सेमिनार हुआ था, दिग्गज लोग मौजूद थे और मैंने यही सवाल उठाया था जो आज आप उठा रहे हैं. उसमें संपादकजी भी आमंत्रित थे पर आए नहीं थे.

Shashi Bhooshan Dwivedi : फोर्ड faundation से भी मोटा पैसा मिला है.

Shashi Bhooshan Dwivedi : विनीत जी ऐसे मामले उठाएंगे तो यही आरोप लगाने को रह जाते हैं.

Vineet Kumar : लेकिन कभी भी यहां छपनेवाले किसी भी लेखक को दिक्कत नहीं हुई. अखबार पैसा न दे तो जमकर बदनाम करते हैं लोग लेकिन यहां सरोकार का मामला है न, पैसे के बारे में सोचना भी पाप है. लिहाजा सुनने में ये भी आता है कि संपादकजी लेखकों की नौकरी और ट्रांसफर की बराबर चिंता करते हैं.

Shashi Bhooshan Dwivedi : कई लोगो को वर्धा में लगवा दिया है. पूरी चेला मंडली है. विरोध करना या असहमत होना कुफ्र है उनके यहाँ.

Shashi Bhooshan Dwivedi : उदारीकरण की सारी मलाई चाटेंगे और उसी के खिलाफ लिखेंगे और भाषण देंगे.

Banshilal Parmar : sahityik patrikaye or laghupatrikaye ak or shasan se vigyapan leti he, dusri or rachanakaro ko kuch nhi deti logo ki chapas ki bhukh ka labh uthati! i Indor se prakasit ak patrika ne mujhase cover or rekhchitr magavaye chape, sath hi patrika ki ajivan sassyata ke sulak ki rasid rs.1000/- bhej di logo ne ese dhandha bana liya.fir ak or… sampadak avetanik… taki rachanakar nishulk seva de dhany he…. p

  Vineet Kumar : ये बाजार का विरोध इसलिए नहीं करते क्योकि वैचारिक रुप से ये गलत है बल्कि इसलिए क्योंकि बाजार प्रतिस्पर्धा पैदा करता है, मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि जिन विज्ञापनों का विरोध अखबार और टीवी में आने पर किए जाते हैं,अगर इन्हें मिलने लगे तो कोई विरोध नहीं करेंगे. कभी साहित्यिक पत्रिकाओं को मिलनेवाले विज्ञापनों पर अध्ययन कीजिए, आप समझ जाएंगे कि आधे से ज्यादा बैंक और राजनीतिक पार्टियों से जुड़े लोगों के होते हैं.

Shashi Bhooshan Dwivedi : इस पर अध्ययन होना चाहिए कि लघुपत्रिकाओं की कमाई के स्रोत क्या हैं? यहाँ पारदर्शिता क्यों नहीं है. जाहिर है कुछ घपला है.

  Vineet Kumar : इन सबके वाबजूद मुझे इन पत्रिकाओं का छपना अच्छा लगता है, बहुत पढ़ तो नहीं पाता लेकिन लगता है कि बैंकों और राजनीतिक दलालों के शुभकामना संदेशों को छापकर पैसे आते हैं, उससे कुछ नहीं तो कुछ शोधपरक लेख तो सामने आ जाते हैं, नहीं तो ये पैसे भी पता नहीं किस धत्तकर्म में लग जाएं. कौन करेगा ? आपको क्या लगता है,यहां हम और आप कोई नई बात बता रहे हैं,लोगों और नामचीन साहित्यकारों को इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है ?

Suresh Neerav Jai Ho : वाह शशि भाई, बड़ी कसक रही है कमाई.. ये अंदर की बात है। पत्रिका निकालो तो जानो। अरे दीवानो थोड़े फंडे पहचानो

Vineet Kumar : सुरेश सर, इसका मतलब तो यही है कि जो जिस चीज के बारे में जानना चाहे, उसे वो करने कहा जाए. कभी किसी पत्रकार को कहा है हॉस्पीटल की आलोचना करने से पहले डॉक्टर बनो?

Banshilal Parmar : achcha to hame bhi lagata, shodhpark lekha keval sampadak ke to nhi hote! sahitykaro ke hote he. hamare desh me keval rachana dramita se gujara nhi hota! mene to yaha tak dekha he chote mote rachna karo ko pata bhi nhi chal pata ki koi chij chapi he

Vineet Kumar : बंशीलालजी, पूरी तरह सहमत.

Shashi Bhooshan Dwivedi : नीरव जी ये मजाक की बात नहीं है. और मामला सिर्फ तद्भव का ही नहीं है. हंस और दूसरी लघुपत्रिकाओं को भी इसमें शामिल कर लीजिये. साम्प्रदायिकता का विरोध करेंगे और उन्ही पार्टियों का विज्ञापन लेंगे. कई मामले तो ऐसे हैं की अफसर लेखक की कहानी और विज्ञापन साथ साथ छपते हैं. कम से कम मुख्यधारा की मिडिया में ऐसे गोरख धंधे तो नहीं होते, लघुपत्रिका आन्दोलन जिस उद्देश्य के लिए शुरू हुआ था, अब वह उससे भटककर शुद्ध धंधा हो गया है. अब अगर धंधा है तो धंधे के न्यूनतम मानको का भी पालन तो होना ही चाहिए.

Isht Deo Sankrityaayan : अब छोड़िए भी भाई! ये सब अन्दर की बातें हैं. सब बाहर क्यों लाना चाहते हैं.

  Banshilal Parmar : Dhanyvad Vineet ji!

  Awanish Mishra : तद्भव में ना छपने की पीड़ा है या तद्भव जैसा कोई काम खुद क्यों नहीं कर रहे जिससे २० लाख का शुद्ध मुनाफ़ा हो… इसकी कसक …लघु पत्रिका हैं इसलिए शशिभूषण जी साहित्यकार हैं..और सब लेखक…अब आपको इनकी कमाई के स्रोत की जानकारी चाहिए .. लूट मची हुई है तद्भव में. इनकम टैक्स की रेड डलवा दीजिये. तद्भव में जो लिख रहे जैसे उनसे बंधुआ मजदूरी करवाई जा रही है जैसे … मेहनताना का वादा करके दिया नहीं जा रहा. आपके कहने का मतलब ये भी है की तद्भव में पैसे और विज्ञापन के बदले लेख- कहानियाँ छापी जा रही हैं. ..जाहिर है सामग्री घटिया होगी, तब आप जाकर खरीदते क्यों हैं…अरे भाई .. बढ़िया पत्रिका है..अच्छे से चल रही है तो तकलीफ, कल धनाभाव में बंद हो जाए तो दूसरा आन्दोलन.. आपलोग आखिर चाहते क्या हैं… भड़ास निकालने का कोई और तरीका निकालें… नामवर चोर..नीलाक्षी को लिखना नहीं आता..महुआ माजी के लिए कोई और लिखता है..अलका सरावगी को एक पन्ना लिखने को कहा जाए लिख नहीं सकती..राजू शर्मा को कलम चलने नही आती.. लगता है आजकल आप मनोहर कहानियाँ के लिए जासूसी वासूसी टैप का कुछ लिख और वही ज्यादा पढ़ भी रहे हैं..इस लिए ऐसी तमाम ब्रेकिंग न्यूज आपके वाल पर होती है.

Saroj Mishra : is this magzine available online pls. provide me link to tadav just want to read magzine!!!

Arun Singh : sahi baat shashi bhai!aap ki baat bilkul sahi hai;kuchh sahity ki patrikao me to विज्ञापन kishart par hi kuchh chapataa hai.kuch naukarshah to isi boote par sahitykaaar banaa diye gaye,managery ki kalaa bhi to kuchh hoti hai??? jinke paas yah hunar hai we aur vhi kamaa lenge.ab ankh ke andho aur ganthh ke pooro ki kami to hai nahi.

Awanish Mishra : सही बात सही बात…आप सब लोग क्रांतिकारी हैं. …नौकरी छोड़ रखी है…अपनी जेब से पत्रिका निकलते हैं… सार्त्र और काफ्का मार्का लेखकों को छापते हैं..उन्हें मेहनताना देते हैं… विज्ञापन नहीं लेते कही से भी. पैसे आते हैं तो इन्कलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते हैं… ये बेहद अनर्गल प्रलाप है.. खासकर ऐसे लोग जिनकी उपलब्धि शून्य है… पक्षधरता जिनके लिए अभी तक दूर से देखा गया शब्द मात्र है..वे सब को खारिज कर रहे हैं…अखिलेश पैसा कमा रहे हैं…क्या खराब है..आपको हिस्सा चाहिए? मान लीजिये पैसा उनके काम का मोटिवेशन है ..आपके काम का मोटिवेशन क्या है? तद्भव के साथ मामला सीधा है… हम तुमको मंच देंगे तुम हमको लेख सामग्री दो… .हम पत्रिका ठीक ठिकाने की निकालेंगे और ठीक ठाक पैसे कमाएंगे…इतना सीधा सपाट है सबकुछ..इसमें अखिलेश पतित हो गए. तब तो आप और हम सब कोई ऐसे ही हैं…बढ़िया है की कोई अपनी और अपनी पत्रिका की मार्केटिंग कर रहा है… आप भी कीजिये.. तद्भव के मुकाबले कोई दूसरी पत्रिका निकालिए… पैसे लेकर छापिये… कौन रोक रहा है?

Arun Singh : MARKETING TO WESHYAYE BHI KARTI HAI BHAI ABJNASHJI.PAISA TO KASAAI BHI KAMATA HAI,PAISA TO ANTIM SASANAKAARWALE BHI LETE HAI, PAR SABKA PLATFORM ALAG-ALAG HOTA HAI AUR UMMIDE BHI ALAG-ALAG HOTI HAI…………..

Shashi Bhooshan Dwivedi : माननीय awanish मिश्र जी आप बहस को भटका रहे हैं. मामला कमाई और पैसे का नहीं है. छपने न छपने की पीड़ा का भी नहीं है. हममे से किसी को छपने का संकट कभी नहीं रहा. ये आप अच्छी तरह जानते हैं, मैं जनता था कि ये सवाल उठाने पर ऐसे ही आरोप लगेंगे. तद्भव को और ज्यादा पैसे मिले और और भी अच्छी रचनाये छपे. लेकिन यहाँ मामला अनैतिक तरीको का है. सरकारी पैसे का गलत तरीके से दोहन का है. लघु पत्रिका के उद्देश्यों का है, अगर धंधेबाजी ही करनी है तो लघुपत्रिका का टैग क्यों. और लेखको को पैसा क्यों नहीं.

Avinash Mishra : ye awanish मिश्र kaun hai bhai…?

Awanish Mishra : यहाँ फेसबुक पर जो सब लिखा जाता है किस मकसद से? मार्केटिंग के मकसद से ही न? हाँ तद्भव को अगर विज्ञापन मिल रहा है तो उसे लेखकों को पारिश्रमिक देना चाहिए. कम से कम कहानियों और उपन्यासों के लिए. संस्मरण और आत्मकथाओं के लिए. यह बहुत अच्छा ट्रेंड होगा. अकादमिक लेख के लिए पैसे तद्भव जैसी पत्रिका नहीं दे सकती. ये तय है. लेकिन सवाल फिर भी है कि कोई जोर जबरदस्ती से तो लिखा नहीं रहा. सब अपना फायदा देख रहे हैं. जो छाप रहा है उसे भी फायदा नजर आ रहा है. क्या आप मानते हैं कि तद्भव अगर पैसे दे तो बेहतर लेख आते. बेहतर कहानियाँ आतीं? यह मामला जटिल है. क्या आपको लगता है कि हिन्दी लेखक कुछ अच्छा इसलिए नहीं लिख रहा ही क्यूकि उसे उसके पैसे नहीं मिलते? मुझे भी लगता है. लेकिन पहले आपको पैसे अच्छे मिलेंगे कि पहले आप अच्छा लिखेंगे और अच्छे पैसे मांगेंगे- भाई हमारे यहाँ अभी भी छपना ही उपलब्धि है. अगर तद्भव की ब्रांडिंग ऐसी है कि वो बिना पारिश्रमिक के ठीक ठाक सामग्री छाप रहा है तो ये उसकी अपनी ब्रांडिंग है..तद्भव में जो छप रहे हैं वे भी अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं. और अरुण सिंह जी आप खुद ये बात समझिये कि अगर मार्केटिंग वेश्याओं को भी करना पड़ता है तो लघु पत्रिका कि क्या बिसात.. (नहीं समझे तो बता समझा दूं – उसके सौ खरीदार हर जगह होते हैं)

एक बात और…शशिभूषण जी हिसाब ठीक करें.. चार महीने एक अंक.. हर महीने संपादक का मेहनताना? सहायकों का मेहनताना? औफिस का खर्च? माना ये सारा काम खुद अखिलेश करते हैं… तो सारे पैसे उन्हें ही मिलेंगे… बहुत सीधा अर्थशास्त्र है. आपको तद्भव अपनी सेवा देने को कहे तो कितना मेहनतान लेंगे? या नहीं लेंगे?? फिर अखिलेश भी लेंगे. क्यों लोगों को शहीद बनाने पे तुले हैं. घनघोर हिंदी वालों की मानसिकता से बाहर निकलिए.

शशिभूषण द्विवेदी के फेसबुक वॉल से साभार.

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