सन् 2025 : कुछ लोक भाषाएं भी हुआ करती थीं

बाजार के दबाव में तिल-तिल कर मरती हुई भोजपुरी भाषा की दुर्दशा को लेकर मैं ने कुछ समय पहले एक उपन्यास लिखा – लोक कवि अब गाते नहीं। इंडिया टुडे में इस उपन्यास की समीक्षा लिखते हुए प्रसिद्ध भाषाविद अरविंद कुमार ने तारीफों के पुल बाँधते हुए एक सवाल भी लिख दिया कि अगर लेखक को भोजपुरी से इतना ही लगाव है और भोजपुरी कि उसे इतनी ही चिंता है तो यह उपन्यास भोजपुरी में ही क्यों नहीं लिखा? हिंदी में क्यों लिखा?

यह मुझ पर सवाल नहीं तमाचा था। पर सवाल यह था कि अगर मैं यह उपन्यास भोजपुरी में लिखता तो उसे पढ़ता भी भला कौन? इससे भी बड़ा प्रश्न था कि उसे छापता भी भला कौन और क्यों? मैं ने उन्हें यह बात बताते हुए बड़ी तकलीफ से लिखा कि घबराइए नहीं, शायद वह दिन भी ज्यादा दूर नही् है जब हिंदी की दुर्दशा को लेकर कोई उपन्यास अंगरेजी में लिखा जाए। तो फिर आप पूछेंगे कि यह हिंदी में क्यों नहीं लिखा गया? अरविंदजी ने मेरी तकलीफ को समझा और माना कि ये तो है!

ऐसे में सवाल बड़ा गूढ़ है कि वर्ष २०२५ में भारतीय लोक भाषाओं की स्थिति क्या होगी? लेकिन शायद यह दूसरा सवाल है। पहला सवाल तो यह है कि वर्ष २०२५ में हिंदी की स्थिति क्या होगी? और फिर उसकी हैसियत क्या होगी? अभी तो आलम यह है कि हर छठवें मिनट में एक हिंदी भाषी अंगरेजी बोलने लगता है। यह चौंकाने वाली बात एंथ्रोपोलिजकल सर्वे आफ इंडिया ने अपनी ताजी रिपोर्ट में बताई है। संतोष की बात है कि इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर पांचवे सेकेंड में हिंदी बोलने वाला एक बच्चा पैदा हो जाता है। गरज यह कि हिंदी बची रहेगी। पर सवाल यह है कि उसकी हैसियत क्या होगी? क्योंकि यह रिपोर्ट इस बात की तसल्ली तो देती है कि हिंदी भाषियों की आबादी हर पांच सेकेंड में बढ़ रही है। लेकिन साथ ही यह भी चुगली खाती है कि हिंदी भाषियों की आबादी बेतहाशा बढ़ रही है। और जिस परिवार की जनसंख्या ज्यादा होती है, उसकी दुर्दशा कैसे और कितनी होती है यह भी हम सभी जानते हैं। आज की तारीख में दावा है कि २० करोड़ से अधिक लोग भोजपुरी बोलते हैं। लेकिन यह आंकड़ा है। जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। हकीकत यह है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में तमाम माँग के बावजूद भोजपुरी नहीं आ सकी है। जब कि दो-ढाई लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली डोगरी या कुछ लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली नेपाली भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में हैं।

आज गाँवों में ही भोजपुरी और अवधी जैसी भाषाएं विलुप्त हो रहीं हैं। लोग अंगरेजी मिश्रित खड़ी बोली बोल रहे हैं। "दो साल तक टॉक टाइम फ्री" तथा "लाइफ टाइम प्रीपेड" जैसे विज्ञापन गाँवों में भी लहालोट हैं। एक साथ अंगरेजी और बाजार का दबाव इतना ज्यादा है कि लोक भाषाएं तो क्या हिंदी जैसी विशाल भाषा भी अपने आप को बचा ले जाए, यही बहुत है। हालांकि बाजार पर एक नजर डालें और अखबारी रिपोर्टों पर गौर करें तो पता चलता है कि इन दिनों मुंबई तक में भोजपुरी फिल्मों की बहार है। भोजपुरी सीडी और कैससेट से बाजार अटे पड़े हैं। लेकिन अश्लीलता, फूहड़ता और लंपटई की सारी हदें तोड़ती यह फिल्में, कैसेट और सीडी भोजपुरी को कलंकित करते हुए उसे बेमौत मार रही हें। हालांकि अमिताभ बच्चन जैसे लोग भी भोजपुरी फिल्मों में काम करेंगे यह बताया जा रहा है। अमिताभ बच्चन की कुछ फिल्में भोजपुरी में डब भी की गई है। लेकिन भोजपुरी की यह बाजारु छवि है। सच्‍चाई यह है कि भोजपुरी अवधी समेत तमाम लोक भाषाएं इस कदर उपेक्षित हैं कि अगर इनकी तुलना करनी ही हो तो कहूंगा कि ज्यादातर मध्यवर्गीय घरों में जैसे वृद्ध उपेक्षित और अपमानित एक कोने में खांसते-खंखारते बोझ बने पड़े रहते हैं, हमारी लोक भाषाएं भी उसी गति को प्राप्त हैं। जैसे अशक्त वृद्धों को अपनी मौत का हर क्षण इंतजार होता है। हमारी लोक भाषाओं का भी यही बुरा हश्र है। क्या पता २०२५ से पहले ही हमारी लोकभाषाएं एक-एक कर अपने प्राण छोड़ती जाएं। और हमारी सरकारें उन्हें बचाने के लिए परियोजनाएं बनाती दीखें। जैसे कि पाली और संस्कृत भाषाओं के साथ हुआ है।

लेकिन परियोजनाएं क्या भाषाएं बचा पाती हैं? और कि क्या सरकारी आश्रय से भाषाएं बच पाती हैं? अगर बच पातीं तो उर्दू कब की बच गई होती। सच यह है कि कोई भाषा बचती है तो सिर्फ इस लिए कि उसका बाजार क्या है? उसकी जरूरत क्या है? और कि उसकी माँग कहाँ है? वह रोजगार दे सकती है क्या? अगर नहीं तो किसी भी भाषा को हम आप क्या कोई भी नहीं बचा सकता। संस्कृत, पाली और उर्दू जैसी भाषाएं अगर बेमौत मरी हैं तो सिर्फ इसलिए कि वह रोजगार और बाजार की भाषाएं नहीं बन सकीं. चाहे उर्दू हो, संस्कृत हो या पाली जब तक वह कुछ रोजगार दे सकती थीं, चली। लेकिन पाली का तो अब कोई नामलेवा ही नहीं है। बहुतेरे लोग तो यह भी नहीं जानते कि पाली कोई भाषा भी थी। इतिहास के पन्नों की बात हो गई पाली. लेकिन संस्कृत? वह पंडितों की भाषा मान ली गई. और जन बहिष्कृत हो गई। इस लिए भी कि वह बाजार में न पहले थी और न अब कोई संभावना है। उर्दू एक समय देश की मुगलिया सल्तनत में सिर चढ़ कर बोलती थी। उसके बिना कोई नौकरी मिलनी मुश्किल थी। जैसे आज रोजगार और बाजार में अंगरेजी की धमक है तब वही धमक उर्दू की होती थी। बड़े-बड़े पंडित तक तब उर्दू पढ़ते-पढ़ाते थे। मुगलों के बाद अंगरेज आए तो उर्दू धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई। फिर जैसे संस्कृत पंडितों की भाषा मान ली गई थी, वैसे ही उर्दू मुसलमानों की भाषा मान ली गई। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में राजनीतिक कारणों से वोट बैंक के फेर में उर्दू दूसरी राजभाषा का दर्जा भले ही पाई हुई हो लेकिन रोजगार की भाषा अब वह नहीं है। और न ही बाजार की भाषा है। सो, उर्दू भी अब इतिहास में समाती जाती दिखाई देती है। उर्दू को बचाने के लिए भी राजनेता और भाषाविद योजना-परियोजना की बतकही करते रहते हैं। पुलिस थानों तथा कुछ स्कूलों में भी मूंगफली की तरह उर्दू-उर्दू हुआ। पर यह नाकाफी है और मौत से भी बदतर है।

हां, हिंदी ने इधर होश संभाला है और होशियारी दिखाई है1 रोजगार की भाषा आज अंगरेजी भले हो पर बाजार की भाषा तो आज हिंदी ही है। और लगता है आगे भी रहेगी क्या, दौड़ेगी भी। कारण यह है कि हिंदी ने विश्वविद्यालीय हिंदी के खूंटे से अपना पिंड छुड़ा लिया है। शास्त्रीय हदों को तोड़ते हुए हिंदी ने अपने को बाजार में उतार लिया है। और हम विज्ञापन देख रहे हैं कि दो साल तक टॉक टाइम फ्री। लाइफ टाइम प्रीपेड। दिल माँगे मोर हम कहने ही लगे हैं। इतना ही नहीं अंगरेजी अखबार अब हिंदी शब्दों को रोमन में लिख कर अपनी अंगरेजी हेडिंग बनाने लगे हैं. अरविंद कुमार जैसे भाषाविद कहने लगे हैं कि विद्वान भाषा नहीं बनाते। भाषा बाजार बनाती है। भाषा व्यापार और संपर्क से बनती है। हिन्दी ने बहुत सारे अंगरेजी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल आदि शब्दों को अपना बना लिया है। इस लिए हिंदी के बचे रहने के आसार तो दिखते हैं। लेकिन लोक भाषाओं ने यह लचीलापन अबतक तो नहीं दिखाया है। गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में अगर रामचरित मानस न लिखा होता तो मैं पूछता हूं कि अवधी आज होती कहाँ? इसी तरह अगर भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी में बिदेसिया और आरा हिले बलिया हिले छपरा हिले ला, हमरी लचके जब कमरिया सारा जिला हिले ला, जैसे कुछ लोक गीत न लिखे होते तो भोजपुरी कहाँ होती? भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेलखंडी, मैथिली, मगही, वज्जिका, अंगिका, कन्नौजी, कुमाऊंनि, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी आदि तमाम लोक भाषाएं तेजी से विलुप्ति के कगार पर हैं।

आज तो आलम यह है कि लोक भाषाओं की जो सबसे बड़ी थाती थी वह थी संस्कार गीत और श्रम गीत। आज हमसे संस्कार गीत भी बिला गए हैं। शादी ब्याह में, मुंडन निकासन में तमाम और सारे मौकों पर गाए जाने वाले संस्कार गीतों की जगह अब फिल्मी पैरोडियों ने ले ली है। लेडीज संगीत ने ले ली है। भजनों और देवी गीतों की जगह अश्लील फिल्मी पैरोडियों वाले भजन और देवी गीत सुनाई देने लगे हैं। श्रम गीत तो कब के विदा हो चुके हैं। गरज यह कि सारा लोक और लोक भाषा लोगों के ठेंगे पर आ गया हैं। तो ऐसे में अचरज क्या कि २०२५ तक लोक भाषाएं अपने संरक्षण के लिए भीख मांगने लगें! निश्चित ही यह हमारी और हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी होगी। ठीक वैसे ही जैसे कोई बहुत पढ़ा लिखा कैरियर प्रेमी लड़का अपनी माँ को माँ कहने से कतराए। क्या तो उसकी माँ पढ़ी-लिखी नहीं है, उसकी फिगर ठीक नहीं है, वह लोगों में उठने बैठने लायक नहीं है। तो जैसे अगर कोई कैरियर प्रेमी लड़का इन कारणों से अपनी माँ को माँ नहीं कहता है और शर्म खाता है। ठीक वैसे ही क्या हम सब भी अपनी मातृभाषा के साथ आज यही नहीं कर रहे? मातृभाषा जो हमारी लोक भाषाएं ही हैं। जिन्हें बोलने बरतने से हम शरमा रहे हैं। जीते जी उन्हें हम मार रहे हैं। इस पर हमें सोचना ही चाहिए कि आखिर हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? अपनी माँ के प्राण क्यों ले रहे हैं?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्‍यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

 

 
 

 

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