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3 साल में 2600 पत्रकार फायर : बाजारवादी नीतियों का 20 साल बाद मीडिया पर कहर

Sachin Kumar Jain : पिछले ३ सालों में २६०० पत्रकारों की नौकरी छीन ली गयी है. आखिर २० साल बाद मीडिया पर बाजारवाद की नीतियों का आघात शुरू हो गया. हम जानते हैं नौकरी के नाम पर इनमे से ज्यादातर समाज से दूर हो गए. इन्होने समाज को मूल प्रश्नों को जम के खारिज किया और अपने दायित्व का बलिदान करके आवारा-आतंकी पूँजी की खूब सेवा की. इस सबके बावजूद हम सबको इनके साथ खड़े होना चाहिए. इनके संघर्ष को बल देना चाहिए. ये हमेशा से हमारी एक ताकत थे, फिर भले ही वे हमारे साथ खड़े होकर हमें मज़बूत करने के बजाये कारपोरेट के पाले में जाकर हमें कमज़ोर कर रहे थे, हमें उनकी ताकत वापस लाने और उस ताकत को जिम्मेदार बनाने में उनकी मदद करना चाहिए…..

'विकास संवाद' से जुड़े सचिन कुमार जैन के फेसबुक वॉल से.

Sachin Kumar Jain : पिछले ३ सालों में २६०० पत्रकारों की नौकरी छीन ली गयी है. आखिर २० साल बाद मीडिया पर बाजारवाद की नीतियों का आघात शुरू हो गया. हम जानते हैं नौकरी के नाम पर इनमे से ज्यादातर समाज से दूर हो गए. इन्होने समाज को मूल प्रश्नों को जम के खारिज किया और अपने दायित्व का बलिदान करके आवारा-आतंकी पूँजी की खूब सेवा की. इस सबके बावजूद हम सबको इनके साथ खड़े होना चाहिए. इनके संघर्ष को बल देना चाहिए. ये हमेशा से हमारी एक ताकत थे, फिर भले ही वे हमारे साथ खड़े होकर हमें मज़बूत करने के बजाये कारपोरेट के पाले में जाकर हमें कमज़ोर कर रहे थे, हमें उनकी ताकत वापस लाने और उस ताकत को जिम्मेदार बनाने में उनकी मदद करना चाहिए…..

'विकास संवाद' से जुड़े सचिन कुमार जैन के फेसबुक वॉल से.

पंकज कुमार झा : दुनिया भर की झूठी-सच्ची खबर देने वाले सैकड़ों मीडियाकर्मी आज खुद अपनी खबर चलाये जाने के मुहताज हैं. खबरें हृदयविदारक है. बाते चाहे सैकड़ों ऐसे लोगों को झटके से निकाले जाने की बात हो या कभी महिलाओं की एक प्रसिद्ध पत्रिका की संपादक रही एक विदुषी महिला का सड़क पर अन्न-अन्न को मुहताज होने की. कभी मैंने भी पत्रकारिता की अच्छी माने जाने वाली डिग्री लेकर दिल्ली की सड़कों का ठोकर खूब खाया है. अतः वेदना निश्चित ही हमें भी है. कई मित्र भी होंगे इन निकाले जाने वाले लोगों ने. इस संबंध में अभी तक कहे गए हर हर शब्द से शत-प्रतिशत सहमत हूँ. लेकिन कुछ अलग बात भी कहना है मुझे, रोक नहीं पा रहा हूँ खुद को.

आखिर जब 'बैनर' इतना ही अनिश्चितता भरा है तो युवकों को चाहिए की उसके अहंकार से खुद को दूर रखें. हाल में ही एक बड़े बैनर के छोटे रिपोर्टर से संपर्क करने की ज़रुरत आन पडी थी. अपने से कई साल जूनियर रहा होगा होगा वो. लेकिन उसकी बदतमीजी, असभ्यता, विश्वासघात और अहंकार ने मन पर ऐसा छाप छोड़ा की अब तक उससे उबर नहीं पाया हूँ. सोच कर ही नफरत हो रही है की आखिर थोड़ी सी भी सफलता मिल जाने पर किस तरह कोई युवा घमंडी और बदजुबानी को अपनी विशेषता बना लेता है. इसीलिए पत्रकार मित्रों से इस बहाने ये ज़रूर निवेदन करना चाहूँगा सफलता-असफ़लता आनी-जानी है. अनिश्चितता से भरे इस पेशे में आपकी विनम्रता और भला आदमी बने रहना ही आपको दूर तक ले जा सकता है. कभी 'बैनर' का अहंकार आपको जानवर न बना दे इस बात का ख़याल विशेष तौर पर रखें. बड़ा निष्ठुर है आपका मालिक और यह ज़माना भी. सचेत रहिये मित्र.

भाजपा नेता और पत्रकार पंकज झा के फेसबुक वॉल से.

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