जागरण में बंपर छंटनी (36) : तो क्या छंटनी कर कर्मचारियों की गरीबी मिटा रहा है जागरण!

झूठ-फरेब की नींव पर प्रतिष्ठा की भव्य इमारत कैसे खड़ी की जाती है, यह कोई दैनिक जागरण से सीखे। अपने को सच्चा समाजसेवक साबित करने में जुटे दैनिक जागरण ने सात सरोकार-गरीबी उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण, सुशिक्षित समाज आदि निर्धारित किए हैं, लेकिन अपने कर्मचारियों की गरीबी वह किस कदर दूर कर रहा है, यह उसके कर्मचारियों से पूछिए। इस साल अभी तक इंक्रीमेंट नहीं लगा और न ही प्रमोशन हुए हैं। संस्थान को मुनाफा हो रहा है, लेकिन वह जा कहां रहा है, यह पता नहीं, क्योंकि संस्थान लगातार कर्मचारियों में कटौती कर रहा है। कई कर्मचारियों को तो वेतन इतना कम मिलता है कि उससे घर नहीं चलाया जा सकता, जबकि जागरण समाज को दिखाने के लिए अनेक ऐसे कार्यक्रम और कार्यशालाएं आयोजित करता है, जिन पर लाखों रुपये बहाए जाते हैं।

पिछली बार मंदी का रोना रोकर जागरण ने छंटनी की थी तो इस बार कर्मचारियों की कथित अधिकता के बहाने कई को बाहर किया जा रहा है। बताते हैं कि इंक्रीमेंट और प्रमोशन न होने से कर्मचारियों में भारी निराशा है। कर्मचारियों को जागरण में अपना भविष्य सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है। इसके चलते कई वरिष्ठ लोग अपनी दूसरी मंजिलें तलाशने लगे हैं, लेकिन ज्यादा दिक्कत और चिंता में वे लोग हैं, जो जिंदगी के ऐसे पड़ाव पर हैं, जो अब कोई नया काम शुरू नहीं कर सकते। यही नहीं, प्रिंट मीडिया के अन्य संस्थानों कम कर्मचारियों में भी जागरण के छंटनी फैसले और थूक में पकौड़े बनाने की आदत के खिलाफ गुस्सा है, क्योंकि जागरण की देखादेखी में दैनिक भास्कर ने भी छंटनी का रास्ता अपना लिया है।

प्रिंट मीडिया के अनेक पत्रकारों का मानना है कि जागरण प्रिंट मीडिया के भविष्य को चौपट करने पर तुला हुआ है, क्योंकि जिस हिसाब से सस्ते लोगों को रखने की योजना वह बना रहा है, उससे पत्रकारिता का स्तर गिरेगा, जो देश के लिए भी उचित नहीं है। गौरतलब है कि दैनिक जागरण में इन दिनों काम का दबाव काफी अधिक है, जबकि कर्मचारी निरंतर कम हो रहे हैं। एक कर्मचारी से करीब तीन लोगों का काम लिया जा रहा है, जबकि वेतन बहुत ही कम है। ऐसे में कर्मचारियों का मनोबल गिर रहा है और आगे भी उम्मीद बहुत अच्छी नजर नहीं आ रही। जागरण ने नई दुनिया, वीडियो जागरण, मोबाइल न्यूज आदि शुरू किए हैं, जबकि इनके लिए काम वही पुराने ढांचे से लिया जा रहा, जो दिनोंदिन कम होता जा रहा है। अपने को समाज सेवा का सच्चा प्रहरी साबित करने में जुटे दैनिक जागरण और उसके कर्मचारियों का भगवान ही मालिक है।


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