इस आदमी का कोई इलाज नहीं… (4 Years of Bhadas)

भड़ास के चार साल पूरे होने पर मैं बहुत कुछ लिखना चाहता था, पर जितना कुछ लिख के छपवा दिया गया है, कमोबेश उन्हीं बातों को दोहराना थोड़ा नीरस हो जाएगा। हां, ये ज़रूर जोड़ूंगा कि भड़ास ने दो बेहद अहम काम किए हैं। पहला ये कि हमारी एक पूरी पीढ़ी को ताकतवर, भ्रष्ट, अराजक और ढोंगी पिछली पीढ़ी के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत दे दी (भले ही इसके कुछ साइड इफेक्ट्स हों) और दूसरा कि एक वैकल्पिक मॉडल खड़ा किया जो न केवल रेवेन्यू मॉडल है (साईं इतना दीजिए टाइप्स…) बल्कि मुख्यधारा के मीडिया को कड़ी चुनौती देता है।

अब बात कि 4 साल पर मैं क्या लिखूं, तो ये बड़ा मुश्किल था और इसे आसान करते हुए लिख रहा हूं, उस आदमी से समय समय पर हुए संवाद से निकले कुछ अंश, जिसे मैं दुनिया का सबसे मूडी लेकिन स्टैंड लेने वाला शख्स मानता हूं…

यशवंत अपने अज़ीज़ लोगों को कभी भी फोन कर सकते हैं, दिन के किसी भी प्रहर (बशर्ते वो आपको इस लायक मानते हों…) और आपसे कुछ भी कह सकते हैं। मसलन ये कि आप वाकई बहुत घटिया आदमी हैं या फिर ये कि यार तुम्हें सलाम करने का मन है, अभी फलां जगह मिलो…या बताओ कहां हो, मैं आ रहा हूं…(सिर्फ सलाम करने के लिए). किसी रोज़ आपसे यशवंत कह सकते हैं कि मुझे चोंगे जैसा कुछ कपड़ा सिलवाना है, चलो कुछ कपड़े के थान ले आते हैं। बाद में बताते हैं कि वो नियमित रूप से सार्वजनिक जीवन में वैसे ही फकीरों जैसा चोंगा पहनना चाहते हैं, बाज़ार जाते हैं आपके साथ लेकिन कपड़े देखते देखते अचानक से ध्यान चला जाता है एक फिल्म की ओर और फिर दरवेश वो फिल्म देखने आपको थिएटर के अंदर ले जाता है। बाहर निकल कर कहता है कि बीयर पीनी है और फिर चोंगे का आईडिया ड्रॉप होता है और शाम को पहाड़ों पर तीन-चार महीने के लिए निकल जाने का नया विचार रात तक मूर्त रूप ले चुका होता है।

पहली बार हवाई जहाज़ में बैठने को बिना शर्मिंदगी या संकोच के ऐसे बांटना, जैसे किसी बच्चे को मनचाहा खिलौना मिला हो। एक देहाती, जो शहर में आकर फंस गया है। इस इंतज़ार में है कि कैसे बस वापस गांव पहुंच जाया जाए और साथ में संचार तकनीक का कुछ ऐसा जोड़ बैठे कि सब कुछ वहीं से चलता रहे। कभी देश भ्रमण का इरादा करना और कभी सड़क किनारे बैठ भीख मांगने का मज़ा।

किसी रोज़ गुस्सा आने पर फोन पर ही, नशे में न जाने क्या क्या कह डालना…और फिर फोन कर के रो पड़ना, बार बार माफी मांगना और मनाना। दरअसल कई बार तो समझना भी मुश्किल होता है कि इस अच्छे खासे शरीर में कहां से ये बच्चा आ बसा है। जो भयंकर बिगड़ा हुआ है लेकिन दिल से अच्छा है, सुधरना चाहता है लेकिन फिर सोचता है कि ऐसे ही मज़ा है तो शराफत का लबादा क्यों ओढ़ना।

किसी रोज़ आप देर रात थके हारे लौटे हों और गहरी नींद में सोए हों, अचानक आपका फोन बजे और उधर से आवाज़ आए कि भाई, गाना सुनाने का मन है…और फिर आप के हां या न करने से पहले उधर से कबीर का कोई निर्गुण भजन शुरू हो जाए और फिर सूफी होता हुआ, ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे पर आ कर खत्म हो। पौन घंटे बाद फोन रखते वक्त आपसे पूछा जाए कि भाई परेशान तो नहीं हुए और आपके नहीं नहीं कहने से पहले कहा जाए कि हुए भी हों तो कोई बात नहीं, अब सो जाइए…बहुत देर हो गई है।

किसी रोज बात करते करते आपसे पूछा जाए कि मेरे साथ स्ट्रीट थिएटर करोगे और फिर बिना जवाब का इंतज़ार किए कहा जाए कि चलो ठीक है तुम लिखो नाटक, अपने साथ कई लड़के हैं…और अगले ही दिन कहा जाए कि यार स्ट्रीट थिएटर से बेहतर होगा कि एक बैंड बनाते हैं। दरअसल ये कोई मनोविकार नहीं है, न ही अस्थिरता का निशान है। ये सब लक्षण हैं एक ऐसे मन के जो लगातार इस दुनिया से परेशान है, जो देखता है और चाहता है कि कुछ बदले और हम सिर्फ पैसे कमाने की जद्दोजहद से आज़ाद हों। यशवंत ने एक सपना देखा और उसे पूरा किया है, बाकी सपने पूरे हों या न हों, उनको देखना नहीं छोड़ा है।

किसी ने कहा कि भड़ास सार्वजनिक शौचालय है, मैं बताऊं साहब सार्वजनिक शौचालय नहीं होगा तो सड़क पर पांव धरना मुश्किल हो जाएगा। क्या आप काम के आधार पर मयार आंकते हैं, भड़ास हममें से बहुतों का मैला ढो रहा है, और यशवंत का इसीलिए सम्मान करना चाहिए। इसलिए कि वो आज भी उतने ही मूडी हैं, वो संस्कारों-समाजों-सभ्यताओं के ढोंग से आगे आ गए हैं, और हां मन से रहते हैं, मन से चलते हैं…कई बार डिस्टर्ब तो करते हैं पर सच कहूं उतना चलता है भाई…बच्चे हैं थोड़ा तो उधम मचाएंगे ही…

यशवंत के कुछ टेक्स्ट और चैट के हिस्से

कभी देर रात ऑनलाइन दिखने पर

23:22 Yashwant: अरे का हो राजा
जनवा मार देबा का
आधी रतिया में
🙂

किसी दिन गाने की फरमाइश

23:57 Yashwant: yaar, koyi badhiya bhajan semi claasical kuchh achchha sa link bhejiye ya gaana mail kar dijiye mp3 type
bahut din se kuchh naya adbhut sa nahi mila

me: bilkul

23:59 Yashwant: sahi hai.. bilkul…

ye kya laga rakha hai… bhari jawaani mei bidhwa ho gaye kya??

me: hahahahaha

hamko laga ki aap kuch logon se batiya rahe hain…. to ham sankshipt uttar de rahe the

00:00 Yashwant: हां, हम बतिया तो रहे हैं लेकिन कूपमंडूक थोड़े हैं कि एक से बतिया रहे हैं तो उसी से बतियाते रहेंगे…. एक साथ कई लोगों का हस्तमैथुन करने का तरीका सीख रहा हूं मैं 🙂

यार ये गजब लाइन इजाद किया

एक साथ कई लोगों का हस्तमैथुन करना सीख रहा हूं.

अदभुत है यार.

me: adbhut

Yashwant: इसका अर्थ क्या क्या हो सकता है.

me: http://www.youtube.com/watch?v=7jeWcbTC4m4

Yashwant: और, इस नए मुहावरे का प्रयोग किस संदर्भ में कर सकते हैं हम लोग. जरा व्याख्यायित करो बुद्धिजीवी.

तब तक मैं आपका दिया गाना चढ़ाता हूं.

00:04 अदभुत है यार. अभी साउंड आफ कर दिया है ताकि बफरिंग कंप्लीट हो जाए. क्या देसीपना है बंधु.

 
फिर एक रोज़ अचानक…

मेरे साथ स्ट्रीट थिएटर करोगे.

अमां यार सुनो

me: बिलकुल….

00:18 Yashwant: guru, ab ja raha hun khaan khaane. gud ngt. kal batiyaate hain.

me: good n ight

Yashwant: khaana khaane. daru 3 pag pee chuka hun. bhookh lag rahi hai bahut tez, suuuuuuuuuusuuuuu bhi lagi hai…… 🙂

और कभी बहुत पहले…

अमां यार, नई चीजों को हमेशा इंज्वाय करना चाहिए. गुजरी चीजें लौटती नहीं और जो आती हैं उसमें बहुत कुछ करने का संदेश छिपा होता है, तलाशो, पहचानो ओर आगे बढ़ो भइया…


लेखक मयंक सक्सेना युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. लखनऊ के रहने वाले हैं. कई न्यूज चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं. मयंक ने माखनलाल से पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद कुछ दिनों तक यायावरी की. जी न्यूज से जुड़कर करियर की शुरुआत की. वहां से सीएनईबी पहुंचे और फिर नौकरी छोड़कर कई महीने विचरण करते रहे. सीवीबी न्‍यूज (पूर्व में यूएनआई टीवी) में काम किया और वहां से भी इस्तीफा देने के बाद कई महीने तक भटकते रहे. इन दिनों 'न्यूज24' चैनल के साथ जुड़े हुए हैं. जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए सक्रिय रहने वाले मयंक विभिन्न मसलों पर अपने बेबाक बयान और लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क 09310797184 या mailmayanksaxena@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


इसी टापिक पर दूसरों का लिखा पढ़ें- b4m 4 year

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