48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला (भाग तीन)

ये जानना दिलचस्प होगा कि कैसे इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया, फिर भी बरसों तक चुप्पी बनी रही. किसी को कोई खबर तक नहीं लगी. कहानी बड़ी है. थोडा पीछे चलते हैं. भारत में 1960 के दशक में जब थोरियम के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा तो देश के तटवर्ती भागों में पाए जाने वाली रेत जो न केवल थोरियम बल्कि कई और दुर्लभ मृदा तत्वों (rare earth metals) जैसे TITANIUM और SILLIMANITE जैसे अयस्कों से लैस थी, के पूरे प्रबंधन की जिम्मेवारी एक सरकारी उपक्रम IREL के हाथों में दे दी गयी ताकि निर्यात-प्रतिबन्ध प्रभावी तरीके से लागू रह सके और इन संवेदनशील तत्वों पर पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण रहे.

ये व्यवस्था पूरी मुस्तैदी के साथ करीबन 40 सालों तक बनी रही. IRELको इस बात के लिए विशेष रूप से अधिकृत किया गया कि थोरियम सम्बंधित समस्त प्रक्रियाएं सिर्फ और सिर्फ इसी के जरिये हो. 2005 तक ये व्यवस्था भी बड़ी मुस्तैदी के साथ चलती रही. इतने वर्षों तक भारत के पूरे तटवर्ती भाग में समस्त खनन क्रियाएं DAE (Department of Atomic Energy) की अनुमति और संज्ञान में इसी IREL के द्वारा ही हुई.

IRELअपना व्यवसाय रेत में उपलब्ध दूसरे दुर्लभ मृदा तत्वों एवं अयस्को (rare earth metals and ores) जैसे LEUCOXENE, GARNET, RUTILE इत्यादि को निर्यात कर चलाता था जबकि इस प्रक्रिया में निकले थोरियम को DAE (Department of Atomic Energy) या उससे जुडी एजेंसियों को बेच देता था जो कुछ समय तक तो भविष्य के लिए संरक्षित की जाती रही, फिर देश में थोरियम रिएक्टर बनने के बाद उसमे आपूर्ति कि जाने लगी.ये व्यवस्था सालों तक कायम रही.

सन 2005 तक परिस्थितियाँ बदलने लगीं. सबसे पहले भारत सरकार ने एक अधिसूचना (SO 61-E dated 20 Jan,  2005) जारी कर थ्रोरियम-बहुल मृदा को परमाणु उर्जा अधिनियम 1962 के उस "Prescribed Elements" की सूची से बाहर कर दिया जिसमें रखकर थोरियम के निर्यात को बंद करना सुनिश्चित किया जा सका था.

अधिसूचना के लिए यहां क्लिक करें…

http://www.ipindia.nic.in/ipr/patent/manual/HTML%20AND%20PDF/Manual%20of%20Patent%20Office%20Practice%20and%20Procedure%20-%20html/Other%20Statutes/S%20O%2061(E)%20under%20Atomic%20Energy%20Act,%201963.htm

फिर तुरंत परमाणु आणविक उर्जा विभाग ने भी अपनी निर्यात-नीति (http://www.dae.nic.in/?q=node/147) में उस नवीन सूची के अनुसार ऐसी तब्दीली कर दी जिससे IREL के वो सारे एकाधिकार एक प्रकार से ध्वस्त हो गए. नई निर्यात-नीति के प्रावधानों के अनुसार अब तटवर्त रेत के दोहन में IREL के अलावा अन्य व्यावसायिक उपक्रम भी आ सकते हैं और उन्हें निर्यात भी कर सकते हैं.

लगभग उसी समय भारतीय खनन ब्यूरो ने उन तटवर्ती क्षेत्रों में पाए जाने वाले rare earth metals के दोहन के लिए लाइसेंस देना शुरू किया जो परमाणु आणविक उर्जा विभाग के नए निर्यात-नीति के अनुसार अब संभव था. बड़े आश्चर्यजनक रूप से तक़रीबन सारे मेटल्स के सारे लाइसेंस एक ही कंपनी (वीवी मिनरल्स लिमिटेड) को दे दिए गए. ये कंपनी अपनी वेबसाइट (http://www.vvmineral.com/about.htm) पर इस बात की बड़े गर्व से घोषणा भी करती है कि ये भारत की पहली और एकमात्र कंपनी है जिसे ऐसे लाइसेंस मिले हैं. खनन ब्यूरो ने ऐसा क्यूँ किया, ये एक अलग गाथा है. अब इस कंपनी द्वारा बाकी पदार्थों के दोहन की प्रक्रिया में जो थोरियम निकलेगा उसका क्या होगा, इस बारे में लाइसेंस के प्रावधानों में चुप्पी साध ली गयी.

अब आते हैं इस कंपनी पर. वीवी मिनरल्स लिमिटेड. इस कंपनी का व्यावहारिक मुख्यालय है तिरूनेवेली में. २००६ में पहली बार इसे रेत-दोहन के लाईसेंस मिले. इस आलोक में ये तथ्य बड़ा रोचक है कि उसी वर्ष इस कंपनी ने अपने भारी भरकम और वर्षों से इस व्यवसाय में लगे प्रतिद्वंदी IREL को पीछे छोड़ते हुए बेस्ट एक्सपोर्टर अवार्ड हासिल कर लिया जबकि सालों से ये अवार्ड इससे पहले IREL (http://www.irel.gov.in/scripts/awards.asp)को मिलता रहा था.

ये बड़ा अजीब है कि किसी व्यवसाय में सालों से लगे, सरकारी विश्वसनीयता और एकाधिकार प्राप्त, बरसों के ग्राहक-सम्बन्ध, व्यावसायिक पहचान वाले उपक्रम को एक ऐसा प्रतिद्वंदी महज़ 6 महीनों में पछाड़ दे जो व्यवसाय में बिलकुल अभी आया है और इस कारण अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार पर अभी ग्राहक ढूंढने हो और अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार की बेहद उच्च दर्जे की प्रतिद्वंदिता के बीच अपनी विश्वसनीयता भी कायम करनी हो!!!

ऐसा कैसे संभव है कि कोई कंपनी इतने कम समय में अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार में तुरंत अपने ग्राहक खोज ले. साल भर के भीतर इतनी विशाल मात्र में रेत को निर्यात कर दे. ऐसा लगता है कि वीवी मिनरल्स के अंतर-राष्ट्रीय ग्राहक पहले से इनसे रेत खरीदने को तैयार बैठे हों और लाईसेंस मिलने का बस रस्म-अदायगी के तौर पर इंतज़ार कर रहे हों. साथ ही कि इनके रेत में ऐसा क्या था कि अमेरिका, सउदी और यूरोप के लोग इनसे रेत लेने को इतने उतावले हो गए और इतनी बड़ी मात्रा में रेत का ऑर्डर दे डाला.

आरोप ये भी है कि इस कंपनी ने न केवल वहाँ थोरियम को चोरी-छिपे निकाल के बेचा जहाँ इन्हें लाईसेंस मिला है बल्कि वहाँ भी इन्होंने थोरियम के लिए रेत का अवैध खनन किया जो इनके लाईसेंस क्षेत्र के बाहर था. बल्कि इस तरह के अवैध-उत्खनन का क्षेत्र इनके लाईसेंसी क्षेत्र से ज्यादा बड़े हैं. हद तो तब हुई जब ये अपने हनक में चर्चित कदोकदन परमाणु प्लांट के नजदीक में ही इस तरह का अवैध-खनन करने लगे जो न केवल इनके लाईसेंस क्षेत्र से बाहर है बल्कि भारत सरकार द्वारा "प्रतिबंधित-खनन क्षेत्र- No Mines Land" घोषित है. चूंकी मामला परमाणु प्लांट से जुड़ा था और वहाँ उस न्यूक्लेयर प्लांट के प्रचंड विरोध के कारण पूरे देश की मीडिया और एन.जी.ओ. इकट्ठा थे तो ये मामला प्रकाश में आ गया. और अभी दो सप्ताह पहले ही मद्रास हाई कोर्ट के मदुरै बेंच ने इस कंपनी को कड़ी फटकार लगाते हुए वहाँ इनके द्वारा की जा रही माईनिंग का काम रोक दिया है. देखें लिंक…

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-09-28/madurai/34147262_1_kudankulam-nuclear-plant-quarries-idinthakarai

लेकिन अभी भी इनका ऐसा खेल कई सुदूर तट-भागों जैसे तिसैन्यविलाई, नवलादी, कोलाचेल जैसे कई भागों में बेरोक-टोक जारी है. यहाँ से न निकाले गए रेत का, न थोरियम का कोई रिकॉर्ड है.  अब जानते है इस कंपनी के मालिक के बारे में. एस. वैकुण्डराज्नम जयललिता के करीबी माने जाते हैं. जया टीवी में उनकी अच्छी खासी हिस्सेदारी है. करूणानिधि से इनके सम्बन्ध बनते-बिगड़ते रहे हैं. संबंधों के खराब रहने के ऐसे ही एक दौर में तमिलनाडु में करूणानिधि सरकार के समय तमिलनाडु पुलिस ने इसी अवैध-थोरियम-निर्यात मामले में छापेमारी भी की थी. 19 अगस्त, 2007 को ये छापे मारे गए. संबंधित खबर पढ़ें…

http://hindu.com/2007/08/20/stories/2007082057461000.htm

23 अगस्त, 2007 को इन्होने करूणानिधि की तरफ सार्वजनिक रूप से दोस्ती का हाथ बढ़ाया. संबंधित खबर पढ़ें…

http://www.hindu.com/2007/08/23/stories/2007082353620400.htm

उसके बाद तमिलनाडु पुलिस को न उन छापों की याद रही, न उस केस की. तो ये है एस वैकुण्डराज्नम का तमिलनाडु के स्थानीय राजनीति (और शायद देश के केंद्रीय राजनीति में भी) में प्रभाव.

….जारी….


अभिनव शंकर
अभिनव शंकर
इसके पहले के दो पार्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें–

48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला पार्ट दो (11 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित)

48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला पार्ट एक (05 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित)


लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और फिलहाल एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं.

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