सुब्रत राय को रिहा कराने के लिए सहारा कर्मी जुटाएंगे 5,000 करोड़ रूपये!

सेबी-सहारा विवाद में एक नया मोड़ आया है जिसमें समूह के प्रमुख सुब्रत राय सहारा को दिल्ली की तिहाड़ जेल से छुड़वाने के लिए 5,000 करोड़ रूपये की राशि जुटाने के लिए समूह के कर्मचारियों तथा शुभचिंतकों से एक एक लाख रूपये की राशि प्राप्त करने का आज एक अनूठा उपाय सुझाया गया. इस प्रस्ताव के तहत मनोरंजन से खुदरा कारोबार क्षेत्र में कार्यरत सहारा समूह के कर्मचारियों को उनके इस योगदान के लिए सहारायिन ए-मल्टीपरपज सोसायटी लि. के शेयर दिए जाने की बात है. सहारा समूह का दावा है कि उसके 11 लाख वेतनभोगी व फील्ड कर्मचारी है.

इस योगदान की अपील इस सोसाइटी के निदेशकों और समूह के ‘एसोसिएट्स’ के हस्ताक्षरों के साथ जारी एक पृष्ट के पत्र के जरिये की गई है. इसमें सहारा इंडिया परिवार के कर्मचारियों और अन्य शुभचिंतकों से अपनी इच्छा व क्षमता के अनुसार 1, 2, 3 लाख रूपये या उससे अधिक की राशि का योगदान करने का आग्रह किया गया है. इस बारे में संपर्क किए जाने पर सहारा के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह पत्र सुब्रत राय या प्रबंधन द्वारा जारी नहीं किया गया है. यह मौजूदा स्थिति के मद्देनजर लोगों की भावनात्मक पहल है.

अधिकारी ने कहा कि यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सहारा समूह या प्रबंधन अपने कर्मचारियों से योगदान के लिए कह रहा है. ‘‘सहाराश्री ने इस संगठन का निर्माण परिवार के रूप में किया है. ऐसे में देशभर में बड़ी संख्या में पत्र आ रहे हैं. उम्मीद है कि हमारे मुख्य अभिभावक के प्रति इस भावना को समझा जाएगा.’’

उच्चतम न्यायालय के आदेश पर सुब्रत राय (65) गत 4 मार्च से तिहाड़ जेल में बंद हैं. न्यायालय ने राय को अंतरिम जमानत देने के लिए समूह को पहले 10,000 करोड़ रूपये जमा कराने को कहा है. इसमें 5,000 करोड़ रूपये बैंक गारंटी के रूप में होंगे. हालांकि समूह के वकीलों ने कल अदालत को बताया कि राय और दो अन्य निदेशकांे की रिहाई के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना समूह के लिए मुश्किल हो रहा है. इन वकीलों ने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत का निवेशकांे का 20,000 करोड़ रूपये सेबी के पास नहीं जमा कराने के लिए राय को जेल भेजने का आदेश गैरकानूनी व असंवैधानिक है. राय और समूह की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की पीठ से कहा कि उसका रख पक्षपातपूर्ण है और इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई इसी पीठ को नहीं करनी चाहिए.

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