झा जी कहिन (5) : ये पत्रकार हैं और इनकी अपने प्रदेश में बहुत चलती है

कल शाम एक पुराने दोस्त के घर बैठा था. एक लम्बे अरसे के बाद उनसे ताबदलाए-ख्याल का मौका था. कई मसलों पर हमारी गुफ्तगू हुई. चाय पानी का दौर चला और उसके बाद एक बड़े ही लम्बे-चौड़े डील डौल वाले जनाब से मेरा तार्रुफ़ कराया गया कि ये भी पत्रकार हैं और अपने प्रदेश में इनकी बहुत ही "चलती है". मेरे दोस्त का अंदाज़े-बयां कि "भाई, ये नए दौर के सहाफी है. साथ में तमंचा लिए चलते हैं. गाडी हैं, ड्राईवर हैं और कभी कभार एक गार्ड भी साथ होता है." और भी हैरान कर गया.

उन साहब ने हाथ मिलाते हुए खीसे-निपोरते हुए कहा : ''अरे भाई साहब, क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं. कुछ खास नहीं है. सिर्फ दौर की बात है. आप लोगों के ज़माने में कलम से ही शिकार हो जाता था. हमारे ज़माने में हर औज़ार और हर हथियार लेकर चलता पड़ता है क्यों कि मामला कभी-कभी संगीन और रिस्की हो जाता है" मैं अपनी आँखें फाड़ कर उनको देखता रहा और कुछ मिनटों तक यही सोचता रहा कि "सहाफी है तो इसकी क्या चलती है और ये कमबख्त चलाता है क्या? सफाहत में तो लॉन्ग रिपोर्ट लिखते हैं, ख़बरों का मजमून लिखते हैं, सम्पादकीय लिखते हैं. ये चलने-चलाने का सवाल कहाँ से आता है? मेरे दोस्त शायद मेरी परेशानी भांप गए और बोले : ''अमां मियां, मतलब ये है कि जैसे कुछ नेता लोग अपना मंत्रालय चलाते है, अफसर महकमा चलाते हैं, उसी तरह ये जनाब भी अपने इलाके में हर महकमा और अफसर को ऊँगली पर नचाते है और चलाते हैं.''

मैं फिर भी हैरान था कि हर औज़ार और हथियार का क्या मतलब है. एक सहाफी को तो नोटबुक और कलम ही काफी है. फिर ये तमंचा और गार्ड किसलिए? वो मोहतरम शायद मेरी कशमकश झमाझ गए और बड़े ही अदब से बोले, "सर, आप उस ज़माने के पत्रकार हैं जब ये सब कुछ नहीं होता था. आज आपको ये सब अटपटा लग रहा है क्यों कि आप को महीने की पहली या दूसरी तारीख को तनख्वाह मिल जाती थी. आप भी उच्‍च क्लास की तरह अपने काम चलाते थे और और ईमानदारी, उसूल और नैतिकता का गुण गाते थे और मस्त हो को सो जाते थे. बेटा-बेटी के दाखिले के लिए एक अफसर या मंत्री से फोन करवा लिया और काम हो गया.''

मौजूदा हाल में ये सब कुछ नहीं चलता है. दबंग बन के जीना पड़ता है. अपने मालिक को कभी डरना-धमकाना तो कभी उल्लू भी बनाना पड़ता है. कभी विज्ञापन लाना पड़ता है तो कभी अलग किस्म के पापड़ बेलने पड़ते हैं. एक लफ्ज़ में कहूँ तो मैं "भयादोहन'' पत्रकारिता करता हूँ और यही करूँगा. कभी मालिक मेरा दोहन करता है और कभी मैं उसका. आज के दौर में यही पत्रकारिता है. मैं नहीं तो कोई और करेगा. मेरा माल वो खा जायेगा. फिर मैं ही क्यों न करूँ. आप को क्या प्रॉब्लम है और वैसे भी कौन मुझे उम्र भर मालिक का साथ देना है. एक शगूफा छोड़ दिया. एक अखबार और चैनल शुरू कर दिया. एक या दो साल तक यहाँ रहूँगा, जितना वो मुझे चूसेगा उसका डबल मैं चूसूंगा और फिर कि नया शिकार मिल जायेगा. मैं तो यही अर्ज़ करने आया था कि आप जैसे लोग अगर मेरा कंटेंट  देख लें तो फिर मैं क्या धमाल करता हूँ. मुझे लिखना और ख़बरों को समझना, सेंकना और छीलना नहीं आता. ये काम आप कर दीजिये. बाकी मैं देख लूँगा."

मन बड़ा भारी सा हो गया और मैं उनकी इजाज़त लेकर अपने घर चला आया. पर नींद नहीं आई. काफी देर तक यही सोचता रहा कि जो पेशा इतना अज़ीम और नामचीन हुआ करता था. उसका ये हश्र!! अब तो अल्लाह ही मालिक है. मगर क्या करें? दौर बदला है, हालात बदले हैं. कलम का सिपाही अपने मालिक के लिए हर कुछ करने का सामान बन कर रह गया है. अपना वक़ार, अपना ज़मीर बेचकर कामो-बेश हर सहाफी अपने मालिक के लिए, ताक़त और पैसा इकठ्ठा करने का मुन्तजिम बन गया है. मजमून और तहरीरें महज़ दिखावे की तरह रह गयी हैं. मुसब्बिरी मजाक बन गया है. और हर मसले-मरहले पर तनकीद करने वाला मुसब्बीर आज खुद ही अपनी कलम का कीमत का सरे-राह मुनादी कर रहा है. अमीरी-गरीबी के बीच कड़वा इम्तिआज़ का इन्सिदाद का सपने देखने वाले आज खुद ही फाके की ज़िन्दगी जीने पर मजबूर और माजुर हो चले हैं. और जिसने शराफत की दहलीज़ लांघ ली वो ही सिपहसलार और शहंशाह हो गया और आज सहफियत भी मण्डी में, सब से ऊँची बोली उसी की लगती है. ख़बरों और खबरखोरी की आड़ में उसका कभी इस्तेमाल शमशीर की तरह होता है तो कभी महकमे और हुकूमत के इबादतगार की तरह भी. यही वजह है कि आज के दौर का सहाफी कभी गालियों का हक़दार बन जाता है तो कभी तमक्खुर का पैकर भी.

एक पुराने सफाही दोस्त शायद इसलिए कहा था कि मजबूरी मुलाजमत का नाम है. हर किसी शख्स की ख्वाहिश कुछ बेहतर करने या पाने की होती हैं मगर उसे मजबूरन ज़िन्दगी के नाहमवार और बेसलीके रास्ते पर चलना पड़ता है और ये सिलसिला मुसलसल जारी है. जिनमें हौसला होता है वो बदलते दौर में भी अपनी मंजिल, अपना मुकाम ढूंढ लेते हैं और जो नहीं कर सके वो उजलत अख्तियार करते हैं. आज ऐसे ही लोगों की इजारदारी है कमज़र्फी और कमीनापन की बदौलत ही अपनी कुर्सी, रुतबा और वगैरह-वगैरह पा जाते हैं. है मुबाहिस-मजलिस में उन्हीं की कामयाबी के किस्से बयां होते हैं. लियाकत और दानाई गयी तेल लेने, वो किस परिंदे का नाम है हुज़ूर? मालिक की खिदमत और फर्माबदारी ही उनके मुस्ताहिके-करम होने का नुस्खा है और ख़बरों की अहमियत और सलाहियत के बदले उनकी नज़र अपने आका के मूड पर हमेशा मुर्तकिज़ रहती है.

पत्रकारिता की पहचान और किरदार में सबसे पहले १९६० के  दशक में बबाल मचा था जब कि अखबार और पत्रिकाओं में सनसनीखेज खबरे बड़े ही फ़िल्मी अन्दाज में पेश की जाने लगी थी. उनमें ख़बरों की बुनियाद आधी से ज्यादा सुनी सुनाई बातों पर होती थी और ऐसी कहानी गढ़ दी जाती थी कि बड़े-बड़े फन्ने खान की बोलती बंद. अमेरिका के एक अखबार ने तो हालीवुड की मशहूर अदाकारा मर्लिन मुनरो की अर्ध नंगी तस्वीर लेने के लिये लाखों रुपये का कैमरा तक मुहैया करा लिया था. क्यों कि तब एक आधी नंगी तस्वीर पर लाखों अखबार बिक जाया करते थे. उसके बाद शुरू हुआ पीत पत्रकारिता का दौर जिसमें उपनाम या छद्म-नाम से बड़े लोगों, नेताओं और औद्यगिक घराने की अन्दर की खबरें छापी जाती थीं.

बहरहाल, पिछले दस सालों में टेलीविजन और खबरिया चैनलों की भरमार ने सहाफत की मैयार की ऐसी की तैसी कर दी. विगत ५ सालों में एक ऐसा नया तबका भी पैदा हुआ जिसको भी चस्का लग गया कि भैया आज कल वही मशहूर है जो दिखता है और उसके लिए टीवी बे बड़ा जरिया और क्या हो सकता है. अंजाम देखिये. आज की तारीख में हमारे मिल्क में ८२  खबरिया चैनेल हर घंटे कुछ ना कुछ फोड़ रहे हैं. और अगले एक साल में शायद १०९ तक ये आंकड़ा पहुँच जाए. ऐसे कम से कम २० खबरिया चैनलों के मालिक वो लोग हैं जिनका सम्बन्ध रियल इस्टेट से है और उनके लिये मीडिया चैनेल एक शमशीर की तरह इस्तेमाल होता है. अगर किसी प्लाट का ठेका पास नहीं हुआ तो फ़ौरन धमकी पहुँच जाती है कि "आपका या फिर आपकी बेटी का स्टिंग आपरेशन हमारे पास है" उसके बाद स्ट्रिंगर्स की फौज इसी काम के लिए लगा दी जाती है कि कुछ खेल या फिर धकापेल तो हो.

ज़ाहिर सी बात है, हर छोटे शहरों में दसवीं क्लास फेल हुआ आदमी किसी भी चैनल का संवाददाता बन जाता है, अपने भी खूब कमाता है और मालिक को भी मज़ा देता है. जो खाभी ठेला चलता था वो आज कैमरामैन है और उसकी शेखी तो देखिए हुज़ूर. वो कोई भी विजुअल तब शूट करेगा जब तक आप उसको खुश न करें. कि शहरों में किसी पत्रकार के रुतबे की पहचान इस बात से होती है कि उसके खिलाफ कितने केस दर्ज है. कितने अपराधिक मुकदमे दर्ज है और उसका किस नेता और ठेकेदार से टांका भिड़ा है. लब्बो-लुबाब ये कि अब आम तौर पर ये बात स्वीकार करने लगे हैं कि जो बुरा है, सनसनीखेज है और मालिक की स्वार्थ सिद्धि में सहायक है वहीं खबर है वरना बे-असर है. याद कीजिये वो ज़माना जब कहा जाता था कि "आजतक" में जो आ गया वो खबर है वरना बे असर है. आज का मूल मन्त्र ये कि जो जितना घटिया, हैवानियत से भरा है वो खबर है, क्योंकि उसी से तो अवाम में खौफ या भय पैदा होता है. आज सहाफत का मतलब सरोकार नहीं सनसनी है.

इसका एक और मतलब ये है कि ऐसी खबरें परोसने या दिखने में ज्यादा माथा-पच्ची नहीं करनी पड़ती है. विजुअल पर खेल जाओ, यही मूल मन्त्र होता है न्यूजरूम के चंडू खाने के चकला दारों का. बड़ी खबर पर लम्बा ज्ञान देने के लिया कुछ लिखना-पढ़ना भी तो पड़ेगा. वो जहमत कौन उठाये क्यों कि उसमें गुड-गोबड़ होने के आसार ज्यादा होते हैं. भयादोहन पत्रकारिता का एक और पहलू ये है कि रिपोर्टर को चवन्नी पकड़ा दिया जाता है मगर संपादक जी सब कुछ अकेले डकार जाते हैं. ऐसी सूरते हाल में, पत्रकारों के सामने उनके रोल माडल अब ऐसे लोग बनते जा रहे हैं, जिन्होंने पत्रकारिता का भरपूर दुरुपयोग कर ज़ल्द से ज़ल्द पैसे और रुतबा हासिल करने में कामयाबी हासिल कर ली. आज आलम ये है कि जिसने कभी एक म्‍युनिसिपल कारपोरेशन की रिपोर्टिंग नहीं की वो ही संपादक बन गया. जो कभी तार तम्बूरा ढोता था वो टेक्‍नीकल हेड बन गया, जिसको एक पैराग्राफ ठीक से लिखना नहीं आता वो ब्‍यूरो प्रमुख बन गया. विगत पांच सालों से कुछ ऐसे भी गिरोह हैं जिनको इस बात की गंध बहुत ही ज़ल्द मिल जाती है कि किस मालिक को नया चैनल लाने की खुजली मची हुई है. और कौन सा मालिक या धन पशु अपने काला धन गाय के थन की तरह पाक और सफ़ेद करने की सोच रहा है.  

इसी क्रम में सबसे पहले उसके कुछ उल्‍टे-सीधे दस्तावेज इकठ्ठा किया जाता है. उसकी दुखती रग का मुआयना होता है और कहा जाता है कि नया न्यूज़ चैनल आप को हर मुसीबत से बचा ले जायेगा, अफरात माल भी कमा देगा और सत्ता के गलियारों में आप की डंका भी बजती रहेगी. एक बार शिकार फंसा बस फिर क्या कहना. कम से कम चार ऐसे न्यूज़ चैनल की आबरू और अस्मत ऐसे ही लूट गयी और कुछ और भी शायद ज़मींदोज़ होने की राह पर हैं. दरअसल माजरा ये है कि न तो ऐसे मालिकों और न ही संपादकों को ये बात समझ में आती है कि आज कल पत्रकारिता पर बाज़ार का सरोकार हावी है. बाज़ार द्वारा पत्रकारिता के नए प्रतिमान, कीर्तिमान, मूल्य और मानक गढ़े और तोड़े जा रहे हैं जिनका मूल मन्त्र और सार सिर्फ मुनाफा है. ऐसे में सहाफत बकरे की माँ है जो कब तक खैर मनाएगी?

दूसरी तरफ, बड़े चैनलों की बात और है. वहां पर आज भी रीढ़ की हड्डी में थोड़ा दम ख़म है. गिरावट और ख़बरों की बाजारी से बाजारुकरण का दंश उनको भी साल रहा है. मगर उन चैनलों में जो विगत दस बारह साल से अंगद की तरह अपना पांव जमाये हुए हैं, उनको उखाड़ना मुश्किल हो रहा है. मगर वहां के सहाफी भी अपने बीट के ज्ञान और दंभ और मोदी के मलखंभ से कम नहीं मानते और जब चाहें, वो राष्ट्र के नाम सन्देश अदना से फटने पर भी देने लगते हैं. मगर अक्सरहां, ख़बरों की चौहद्दी और चौड़ाई-गोलाई के बदले "तेवर और कलेवर' की जंग में बेचारी खबर का जेवर लुट सा गया होता है और "कयास" के "प्रयास" में "भड़ास" कुछ ज्यादा ही दिखाई देने लगता है और वो मीडिया की खबर के बदले 'गड़बड़" ज्‍यादा लगने लगता है. ऐसे में अपने एक सहाफी मित्र कि ये चंद पंक्तियाँ ज्‍यादा ही मकबूलो-मारूफ लगने लगती है.

वो पूछते हैं क़ि लेखनी में इतनी धार कहाँ से पाई,
कोई बतलाये उनको क़ि ये कोई महज रोटी की तलब नहीं,
ना है ये हवस किसी मुकाम को पाने की,
बल्कि ये सबब है हालात की उन आंधियों का,
जब आपकी मासूम भावनाओं का हो सौदा और
जिस्म हो जाये मतलबपरस्ती के खंजर से छलनी,
रगों में बहता लहू भी जब आँख से छलककर सुख जाये,
तब जाके काग़ज़ पे उतरते हैं स्याही की जगह सुर्ख खून.

आखिर मैं, आज के सहाफत यानि पत्रकारिता के ऊपर यही एक शेर दिल से निकलता है कि:-

साहिल पर जितने आब-गज़ीदा थे सब के सब
दरिया का रुख बदला, तो तैराक बन गए…

लेखक अजय एन झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इससे पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- झा जी कहिन सीरिज

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