हिंदुस्तान, देहरादून में बवाल मचा हुआ है. यहाँ कैबिनेट बैठक का खर्चा पूरे 500 करोड़ छप गया और गलती पता लगने पर हाथ पाँव फूल गए. करीब 30 हज़ार छापी कापियां रद्दी करानी पड़ी. गढ़वाल और कुमायूं का अखबार छप गया था. इस कारण इतनी कापियां रद्दी हुईं. समाचार संपादक पूरण सिंह बिष्ट और संपादक गिरीश गुरूरानी ने गल्ती के लिए गाज दो ऐसे लोगों पर गिरा दी जो इस गल्ती के लिए जिम्मेदार नहीं थे.
एक दूसरे को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है. ये दोनों आजकल ऑफिस नहीं आ रहे हैं. कई दिन से घर पर बैठे हुए हैं. सम्पादक असल दोषी को बचा रहे हैं जिसके कारण पूरे स्टाफ में गुस्से का आलम है. फिलहाल 500 करोड़ की गलती का मुद्दा दिल्ली स्थित हिंदुस्तान प्रबंधन तक भी पहुंचा हुआ है. अखबार की साख पिछले दिनों तब और ज्यादा गिरी थी जब टिहरी और सितारगंज चुनाव में यह अखबार बहुगुणा का भोंपू बन गया था. इस कारण हिंदुस्तान की पाठकों के बीच खूब दुर्गति हुई.
गैरसैंण के मामले में भी उजाला ने हिंदुस्तान को पटखनी दी और राज्य की वर्षगांठ पर भी हिंदुस्तान कुछ नहीं कर पाया. उजाला, जागरण , सहारा ने कई विशेषांक छाप कर नाम कमाया. हिंदुस्तान के सूत्रों का कहना है कि यहां पर कमजोर और निकम्मे लोगों को संरक्षण दिया जाता है और काम करने वालों को प्रताड़ित.
हाल ही में हिंदुस्तान के सीनियर पत्रकार प्रेम पुनेठा ने संपादक की तानाशाही से दुखी होकर एक महीन का अवकाश ले लिया है. एक और गंभीर पत्रकार भास्कर उप्रेती को भी ठन्डे बस्ते में डाला हुआ है. फिलहाल समाचार संपादक पूरण सिंह बिष्ट ही अखबार में अंदर बाहर छाये हुए हैं. इन्होंने रुड़की में सीमा श्रीवास्तव को हटाकर अमर और सुनी डोभाल को बैठा दिया. संपादक के लोगों पर आरोप लगते रहते हैं पर उन्हें बचा लिया जाता है और बलि का बकरा निर्दोषों का बनाया जाता है.
उपरोक्त बातें कई लोगों से बातचीत पर आधारित है. अगर किसी को तथ्यों में कोई कमी-बेसी लगे तो अपनी बात [email protected] पर मेल कर सकते हैं या नीचे कमेंट बाक्स में लिख सकते हैं.






