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जनसत्ता को 65000 कॉपी तक पहुंचा दिया तो मेरी कोठी खाली करा ली गई

Shambhunath Shukla : कोलकाता में तीन साल बिताए। मुझे कोलकाता दिल्ली की तुलना में सदैव पसंद आया। पर वहां जिस जनसत्ता अखबार का संपादक मैं था उसका सरकुलेशन बढ़ाने को इंडियन एक्सप्रेस का प्रबंधन राजी नहीं था और एक दिन तो वह आया जब मैंने प्रसार कोलकाता जैसे अहिंदीभाषी शहर में जनसत्ता को ६५००० कॉपी तक पहुंचा दिया। बस यही बात इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन को खल गई। और कोलकाता में मुझे रहने के लिए अलीपुर की जो कोठी दी गई थी वह तत्काल खाली करा ली गई।

Shambhunath Shukla : कोलकाता में तीन साल बिताए। मुझे कोलकाता दिल्ली की तुलना में सदैव पसंद आया। पर वहां जिस जनसत्ता अखबार का संपादक मैं था उसका सरकुलेशन बढ़ाने को इंडियन एक्सप्रेस का प्रबंधन राजी नहीं था और एक दिन तो वह आया जब मैंने प्रसार कोलकाता जैसे अहिंदीभाषी शहर में जनसत्ता को ६५००० कॉपी तक पहुंचा दिया। बस यही बात इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन को खल गई। और कोलकाता में मुझे रहने के लिए अलीपुर की जो कोठी दी गई थी वह तत्काल खाली करा ली गई।

यह कहते हुए कि बंटवारे में वह कोठी एक्सप्रेस के मदुरई ग्रुप के पास चली गई है। अचानक शाम को अपना सामान लेकर मुझे सड़क पर आ जाना पड़ा। वह तो डॉक्टर प्रभाकर श्रोत्रिय वहां भारतीय भाषा परिषद के निदेशक थे उन्होंने फौरन थियेटर रोड स्थित भाषा परिषद के अतिथि गृह में मेरे रुकने का इंतजाम कराया। रात काटने का ठीहा निश्चित हो जाने के बाद जनसत्ता की पत्रिका संबरंग के प्रभारी श्री अरविंद चतुर्वेद ने सारा सामान शिफ्ट करवाया। एक बड़ी बिपदा से निपटने के बाद राहत के कुछ पल।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

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