2जी घोटाले को लेकर विवादों में फंसे गृहमंत्री पी चिदंबरम के एक और कारनामे को सामने लाया है. सनएयर होटल के ऊपर तीन मुकदमे थे. चिदंबरम सनएयर की तरफ से वकील के तौर पर दिल्ली हाईकोर्ट में पेश हुए थे. आईबीएन7 द्वारा इसी मामले में पूछे गए कुछ सवालों का गृहमंत्री ने जवाब भी नहीं दिया. इसी मामले को लेकर आईबीएन7 ने एक कार्यक्रम 'फिर विवाद में चिदंबरम' चलाया.
इस खबर को देखकर वरिष्ठ पत्रकार एवं नईदुनिया, मुंबई के रीजनल एडिटर पंकज शुक्ला ने अपने फेसबुक पर आईबीएन7 के इस खोजी खबर को सराहा है. आप देखिए पंकज शुक्ला का स्टेटमेंट और नीचे आईबीएन7 की खबर.



नीचे आईबीएन7 की खबर : इस खबर के लिए के लिए इस लिंक पर क्लिक भी कर सकते हैं – फिर विवादों में पी चिदंबरम
नई दिल्ली। पी चिदंबरम के गृहमंत्री रहते उनकी मुवक्किल रही कंपनी को गृह मंत्रालय से मिली राहत की खबर पर IBN7 ने खुद गृहमंत्री से उनका पक्ष जानना चाहा। आईबीएन 7 ने चिदंबरम से कई सवाल पूछे। जिसका सिलसिलेवार तरीके से गृहमंत्रालय ने जवाब दिया। गृह मंत्रालय के मुताबिक चिदंबरम को ये याद नहीं कि कभी भी वो इस कंपनी के वकील रहे हैं। आईबीएन7 ने 12 दिसंबर को केंद्रीय गृहमंत्री से ईमेल और फैक्स के जरिए ये सवाल पूछे। अगले ही दिन यानी 13 दिसंबर को गृह मंत्रालय की तरफ से ज्वाइंट सेक्रेटरी (यूटी) एम. गोपाल रेड्डी ने फैक्स के जरिए अपने जवाब भेज दिए।
आईबीएन7 का पहला सवाल था कि क्या चिदंबरम 1999 से 2003 के बीच कभी सनएयर होटल्स प्राइवेट लिमिटेड के वकील के तौर पर दिल्ली हाईकोर्ट में पेश हुए हुए थे? गृह मंत्रालय का जवाब मिला कि काफी समय बीत जाने के कारण गृहमंत्री ये याद करने में असमर्थ हैं कि वो कभी वकील के तौर पर अदालत में पेश हुए। गृह मंत्रालय के समक्ष विचाराधीन मामले का इससे कोई लेना-देना नहीं था।
आईबीएन7 का दूसरा सवाल था कि क्या गृह मंत्रालय को इस बात की जानकारी है कि दिल्ली के अलग-अलग थानों में सनएयर होटल्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ तीन मामले दर्ज हैं। तीसरा सवाल था कि क्या ये सत्य है कि सनएयर होटल्स प्राइवेट लिमिटेड ने आपके यानी पी. चिदंबरम के मंत्री बनने के ठीक एक दिन बाद गृह मंत्रालय में अपने खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने के लिए रिप्रेजेंटेशन किया था।
इन सवालों के सीधे जवाब तो नहीं दिए गए, लेकिन कहा गया कि सनएयर होटल्स प्राइवेट लिमिटेड के रिप्रेजेंटेशन पर गृह सचिव ने 17 फरवरी 2011 को कानून मंत्रालय से सलाह करने का निर्देश दिया था। मार्च 2011 को ये मामला कानून मंत्रालय के पास भेज दिया गया। कानून मंत्रालय ने 18 मार्च 2011 और 20 अप्रैल 2011 को अपनी सलाह दे दी थी। कानून मंत्रालय ने सलाह दी थी कि इस मामले में सीआरपीसी की धारा 173 (8) के तहत कदम उठाना उचित नहीं होगा। लेकिन अगर ये सीआरपीसी की धारा 321 के तहत आता है, तो इस पर विचार किया जा सकता है।
इसके बाद गृह सचिव ने कहा कि कानून मंत्रालय की राय से दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दिल्ली सरकार को अवगत करा दिया जाए। जब 4 मई 2011 को ये फाइल गृहमंत्री के पास गई तो उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय इस पर कोई निर्देश नहीं दे और कानून मंत्रालय की सलाह को आगे बता दे। इसके बाद 9 मई 2011 को कानून मंत्रालय की सलाह दिल्ली सरकार के गृह सचिव को भेज दी गई। साथ ही सुझाव दिया गया कि इस मामले में दर्ज एफआईआर को सीआरपीसी की धारा 321 के तहत स्क्रूटिनाइज किया जाए। ये भी सफाई दी गई कि ये पत्र निदेशक ने तैयार किया था, उन्हीं के हस्ताक्षर थे और उन्हीं ने भेजा था। इस पत्र का ड्राफ्ट ज्वाइंट सेक्रेटरी या फिर गृह सचिव या फिर गृहमंत्री के समक्ष नहीं रखा गया था। गृहमंत्रालय के जवाब के मुताबिक केंद्रीय गृहमंत्री ने इस फाइल को सिर्फ एक बार 4 मई 2011 को देखा था और उससे पहले या बाद में कभी भी फाइल किसी आदेश के लिए उनके पास नहीं गई थी।
जवाब में ये भी कहा गया है कि दिल्ली सरकार को प्रोसिक्यूशन वापस लेने की कोई सलाह नहीं दी गई। सिर्फ कानून मंत्रालय की सलाह ही बताई गई थी। गृह मंत्रालय के मुताबिक उन्हें समझ में आता है कि दिल्ली सरकार के गृह मंत्रालय ने इस मामले को स्क्रीनिंग कमेटी के पास रेफर किया था। खबर है कि स्क्रीनिंग कमेटी ने इन केसों को वापस लेने की सिफारिश की है और ऐसा दिल्ली के उपराज्यपाल की मंजूरी से किया गया। उसके बाद प्रोसिक्यूशन डिपार्टमेंट के निदेशक ने अदालत में केस वापस लेने की अर्जी दाखिल की है। अब इस मामले पर फैसला कोर्ट को लेना है।
आईबीएन7 ने पांचवां सवाल पूछा था कि क्या ये सत्य है कि गृह मंत्रालय ने 9 मई 2011 को दिल्ली के गृह सचिव को पत्र लिखा कि इन केसों का प्रोसिक्यूशन तुरंत वापस ले लिया जाए? और क्या ये भी सत्य है कि ये पत्र आपकी मंजूरी से भेजा गया था? इसके जवाब में कहा गया है कि गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को तुरंत प्रोसिक्यूशन वापस लेने की सलाह नहीं दी। पत्र में केवल कानून मंत्रालय की सलाह बताई गई थी। फैसला दिल्ली सरकार को ही लेना था।
आईबीएन7 ने आखिरी सवाल भी बेहद सीधा पूछा था कि रिकार्ड के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में एफआईआर और चार्जशीट दाखिल होने के बाद सम्मन जारी करने के आदेश को खारिज करने से इनकार कर दिया था। क्या आप बताना चाहेंगे कि आखिर क्यों गृहमंत्रालय ने उसके बाद भी इन केसों को वापस लेने का फैसला किया? इसके जवाब में कहा गया कि जुलाई 2011 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने उसे मिली कुछ शिकायतें गृह मंत्रालय को भेजी थीं। उन शिकायतों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट के कुछ आदेश भी संलग्न थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत और जांच एजेंसी को निर्देश दिया था कि वो केसों में जिस स्तर पर हैं, उससे आगे बढ़ें। गृह मंत्रालय के रिकार्ड में सुप्रीम कोर्ट का कोई आदेश नहीं है।






