75 हजार के स्टेंट के फोर्टिस एस्कॉट्स ने वसूले ने 1 लाख 27 हजार

हृदय रोगियों के इलाज के नाम पर स्टेंट (धमनियों में इंप्लांट किया जाने वाला स्टेनलेस स्टील का खास ट्यूब) का काला कारोबार देश में धड़ल्ले से चल रहा है। जरूरी न होने के बावजूद हृदय रोगियों की धमनियों में बेहद मंहगे स्टेंट स्थापित कर करोड़ो की काली कमाई की जा रही है। इस पर कोई सरकारी अंकुश न होने की वजह से एक ओर जहां मरीज और उनके परिजन जबरदस्त लूट के शिकार हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर नामी-गिरामी चिकित्सक और उनकी सेवाएं लेने वाले बड़े-बड़े कॉरपोरेट अस्पताल मालामाल हो रहे हैं। यही वजह है कि देश में स्टेंट का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। इस बात का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत में एक साल में कम से कम 600 करोड़ रुपये के स्टेंट्स की खपत हो रही है और इसका कारोबार 25 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के साथ बढ़ता जा रहा है। कम समय में बहुत पैसा कमा लेने का जरिया बन गया है स्टेंट। इसके चक्कर में दर्जनों प्रख्यात चिकित्सक या तो जेल की हवा खा चुके हैं या फिर बड़े-बड़े अस्पताल की नौकरियां गवां चुके हैं।
 
चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त इस भ्रष्टाचार की एक बानगी क्लाउन टाइम्स की निगाह में भी आयी। इस भ्रष्टाचार को परत दर परत उजागर करने का माध्यम बना बनारस का एक मरीज। कहानी की शुरुआत हुई बनारस से और अंत देश की राजधानी दिल्ली में। दिल के इस मरीज को एन्जाइना (सीने में दर्द) होने पर हाल ही में बनारस के शुभम अस्पताल की सीसीयू में भर्ती कराया गया था। यहां के एक डॉक्टर ने यह कहते हुए मरीज की एंजियोग्राफी कराने की सलाह दी कि उन्हें सीवियर हार्ट अटैक हो सकता है। इसके साथ ही परिचारकों को यह बताया गया कि इस जांच से यह पता चलेगा कि मरीज की धमनियों में कितना अवरोध (ब्लॉकेज) है। किसी अनहोनी की आशंका से मरीज के परिचारकों ने बीमारी की गंभीरता को समझने का प्रयास किया लेकिन उनको यह शक भी होने लगा कि एंजियोग्राफी के बाद ब्लॉकेज बताकर एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया शुरू करने का दबाव बनाया जायेगा। इस शक का एक कारण यह था कि हॉस्पिटल में शुरुआती जांच ‘कलर डॉप्लर’ नहीं की गई। लिहाजा मरीज और उसके परिचारक एंजियोग्राफी के लिए तैयार नहीं हुए। शुभम हॉस्पिटल के निदेशक डॉक्टर प्रशांत ने भी एंजियोग्राफी के लिए लगातार दबाव बनाया। शुभम हॉस्पिटल का प्रबंधन सीधे एंजियोग्राफी कराकर आगे की चिकित्सा सेवा प्रदान करने को आतुर था। भले ही यहां के चिकित्सकों के मन में रोगी की सेंवा करने का भाव रहा हो लेकिन स्टेंट के करोड़ो के कारोबार के बारे में आ रहीं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय खबरों ने मरीज और उसके परिजनों को सशंकित किये रखा। ऐसे में शुभम हॉस्पिटल के प्रबंधन को अंतत: मरीज को डिस्चार्ज करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद मरीज ने हेरिटेज हॉस्पिटल के प्रख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अजय पाण्डेय से अपनी जांच कराई। यहां एन्जाइना पेन की पुष्टि हुई। डॉ. पाण्डेय के सामने मरीज तथा उसके परिजनों ने बेहतर चिकित्सा के लिए दिल्ली के 'फोर्टिस एस्कॉट्स हॉस्पिटल' जाने की बात कही। इस पर डॉ. पाण्डेय ने मरीज को तात्कालिक तौर पर सीसीयू में भर्ती कराने की सलाह दी और परिचारकों से यह भी कहा कि चूंकि हेरिटेज में जगह नहीं है लिहाजा आप लोग मरीज को शहर के किसी और अस्पताल में ले जायं। मरीज का किसी डॉक्टर की देखरेख में 24 से 48 घंटे रहना जरूरी है। इसके बाद मरीज को उसके परिचारक डॉ. विनीत अग्रवाल के अस्पताल राजापुरिया हॉस्पिटल ले गये और वहां उसे सीसीयू में भर्ती कराया। 
 
यहां मरीज की स्थिति सामान्य होने पर परिचारकों ने देश के बड़े अस्पतालों में शुमार ‘फोर्टिस एस्कॉट्र्स हॉस्पिटल’ के प्रख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. उपेंद्र कौल से टेलीफोन पर संपर्क साधा और अपॉइंटमेंट लिया। तिथि का निर्धारण डॉ. कौल की सेक्रेटरी सुनीता ने किया। इसके बाद मरीज को 'फोर्टिस एस्कॉट्स' ले जाया गया। और फिर शुरू हुआ इस अस्पताल में अच्छे इलाज के नाम पर चिकित्सा सेवा का सिलसिला। डॉ. कौल के सहयोगी डॉ. अरविंद सेठी ने केस हिस्ट्री तैयार की। फिर डॉ. कौल ने अगले दिन एंजियोग्राफी कराने की सलाह दी। फोर्टिस एस्कॉट्स का जैसा नाम और काम दिख रहा था उससे मरीज और उसके परिजनों में भरोसा जागा। क्लाउन टाइम्स की तफ्तीश टीम भी इस दौरान तारांकित होटल जैसे दिखने वाले इस अस्पताल में थी। शुरू में सब कुछ ठीक-ठाक दिख रहा था। अगले दिन निर्धारित समय पर मरीज ने अपने परिचारकों के साथ डॉ. सेठी के पास जाकर अपनी एंजियोग्राफी कराई। इसके बाद बताया गया कि तीन धमनियों में 95 प्रतिशत ब्लॉकेज है और एक में 65 प्रतिशत ब्लॉकेज। आगे की चिकित्सा के लिए डॉ. कौल की सेक्रेटरी सुनीता ने तीन स्टेंट लगाने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर डॉक्टर के कहने पर. चौथा स्टेंट भी लग सकता है। डॉ. कौल के न रहने के बावजूद इस हॉस्पिटल के नाम, इसकी दो दशक से ज्यादा की उपलब्धियों और यहां नामी-गिरामी चिकित्सकों की भारी फौज को ध्यान में रखते हुए मरीज के परिचारकों का सेक्रेटरी की बातों पर भरोसा करना लाजमी था। परिचारकों ने 7 लाख 44 हजार 513 रुपये जमा कर मरीज की धमनियों में चार स्टेंट और चार बैलून इंप्लांट करा दिये। सेक्रेटरी ने बार-बार पूछने के बाद बड़ी मुश्किल से बताया कि अमेरिकी कंपनी 'एबॉट लैब' स्टेंट्स की सप्लाई करती है। लेकिन हॉस्पिटल प्रबंधन ने स्टेंट्स की खरीद के बिल दिखाने में असमर्थता जताई। इससे कहीं न कहीं संशय की स्थिति उत्पन्न हुई और फिर शुरू हुआ क्लाउन टाइम्स की टीम द्वारा तफ्तीश का सिलसिला। एक ओर जहां दिल्ली में 'एबॉट लैब' के सप्लायर मनीष से तफ्तीश हुई तो वहीं दूसरी ओर वाराणसी में क्लाउन टाइम्स की टीम ने वहां 'एबॉट लैब' के प्रतिनिधि प्रदीप सिंह से बेतार फोन से संपर्क कर सवाल किये स्टेंट के वास्तविक मूल्य के बारे में। इसी बीच यह पता चला कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. ओम शंकर पहले फोर्टिस एस्कॉटर्स में नौकरी करते थे लेकिन बाद में उन्होंने यहां का काम छोड़ दिया और बनारस आकर स्टेंट इंप्लांटेशन का काम करने लगे। वाराणसी में एबॉट के प्रतिनिधि प्रदीप सिंह ने भले ही खुलकर कुछ नहीं बताया लेकिन तफ्तीश में यह पता चला कि एबॉट लैब के जिस स्टेंट की कीमत फोर्टिस एस्कॉट्स में एक लाख 27 हजार रुपये वसूली गई वही स्टेंट 75 हजार रुपये या उससे भी कम कीमत पर मिल जाता है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली में एबॉट लैब के प्रतिनिधि मनीष ने क्लाउन टाइम्स की तफ्तीश में यहां तक कहा कि जो दाम आपको पता है उसके बारे में नो कमेंट लेकिन इस बात पर ज्यादा केंद्रित रहे कि इलाज कहां हो रहा है। उनका कहना था कि कॉरपोरेट हॉस्पिटल्स में एबॉट लैब का एक स्टेंट एक लाख 27 हजार नहीं बल्कि डेढ़ से दो लाख रुपये में मिलता है। कहा कि ये सारी बातें मैंने मानवीय आधार पर कहीं, छापने के लिए नहीं। आगे की बात एबॉट के रीजनल हेड नितिन बाधवा से कर सकते हैं। हमारी कंपनी का स्टेंट सस्ते में लगवाना हो तो कॉरपोरेट हॉस्पिटल छोड़कर किसी और हॉस्पिटल में चले जाइये। स्टेंट के कारोबारियों और चिकित्सकों के इस गठजोड़ में कौन किस पर भारी है यह तो कहना मु्श्किल है पर देश स्तर पर चल रहा स्टेंट्स का करोड़ों का कारोबार खुली किताब के समान है। स्टेंट के वास्तविक मूल्य की जानकारी होने पर फोर्टिस एस्कॉट्स के डॉ. उपेंद्र कौल, उनकी सेक्रटरी सुनीता, सीनियर मैनेजर रेनू त्यागी, वाइस प्रेसिडेंट डॉ. राजीव सिंघल और एडमिनिस्ट्रेशन हेड संगीता दुआ को इ मेल कर कड़ा ऐतराज जताया गया। इसके बाद तो फोर्टिस एस्कॉट्र्स के प्रबंधन से लेकर डॉ. कौल सहित तमाम चिकित्सकों में खलबली मच गई और किसी तरह मामले को रफा-दफा करने का प्रयास शुरू कर दिया गया। इससे इस बात का स्पष्ट आभास होने लगा कि स्टेंट बनाने वाली कंपनियों, चिकित्सकों और बड़े अस्पतालों के बीच जबरदस्त खेल चल रहा है। इस खेल के जरिये बेहिसाब कमाई की जा रही है।
 
वेबसाइट हेल्थबीटब्लॉग डॉट कॉम पर सनसनीखेज जानकारी : अमेरिका की नामी कंपनी एबॉट लैबोरेटरी, जिसके स्टेंट लगाने की बात फोर्टिस एस्कॉट्स हॉस्पिटल के डॉ. कौल और उनकी सेक्रेटरी सुनीता कर रहे हैं, के बारे में वेबसाइट www.healthbeatblog.com पर विस्तार से चौंकाने वाली जानकारी मिली। इस बेबसाइट पर नौ पेज की जो रिपार्ट प्रकाशित हुई है उसके अनुसार अमेरिका के मैरीलैंड स्थित सेंट जोसेफ मेडिकल सेंटर में कार्यरत ‘डॉ. मार्क मीडी’ ने कम समय में बहुत ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में दो साल के अंदर 585 ऐसे मरीजों की धमनियों में एबॉट लैब के स्टेंट्स इंप्लांट कर दिये जिनको इसकी जरूरत ही नहीं थी। इस काम के लिए मेडिकल सेंटर द्वारा उक्त मरीजों से 6.6 मिलियन डॉलर वसूले गये। इस धनराशि में से 3.8 मिलियन डॉलर का भुगतान डॉ. मीडी को किया गया। इसके अलावा एबॉट लैब की ओर से डॉ. मीडी को अलग से लाभान्वित किया गया। जिन हृदय रोगियों की धमनियों में स्टेंट लगाया गया उनको यह बताया गया था कि उनकी धमनियों में 90 प्रतिशत तक ब्लॉकेज है जो झूठ था। सच्चाई यह थी कि ब्लॉकेज 10 प्रतिशत के आसपास था। अमेरिका में क्लिनिकल गाइडलाइंस कहती हैं कि किसी मरीज की धमनियों कम से कम 70 प्रतिशत ब्लॉकेज पाये जाने पर ही स्टेंट इंप्लान्टेशन होना चाहिये। लेकिन इन गाइडलाइंस की परवाह किये बगैर स्टेंट इंप्लांटेशन धड़ाधड़ किये जा रहे हैं। अमेरिका में यह धंधा पिछले करीब डेढ़ दशक से चल रहा है। हालांकि बेबसाइट में सेंटर फॉर मेडिकल कंज्यूमर्स की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि स्टेंट इंप्लांटेशन मरीजों की पसंद भी है क्योंकि यह क्विक फिक्स की तरह काम करता है और मरीज को एन्जाइना पेन से तुरंत राहत मिलती है।
 
कमीशन के चक्कर में प्रख्यात चिकित्सक जा चुके हैं जेल : टाइम्स ऑफ इंडिया, हैदराबाद की एक खबर के मुताबिक आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में हृदय रोगी स्टेंट बनाने वाली कंपनियों और चिकित्सकों के गठजोड़ के शिकार हो रहे हैं। यह खबर वेबसाइट articles.timesofindia.indiatimes.com पर उपलब्ध है। इस खबर में बताया गया है कि आंध्र प्रदेश में हर महीने लगभग 3500 इंप्लांट्स होते हैं जिनमें से 30 प्रतिशत गैरजरूरी होते हैं। लेकिन कंपनियों से मिलने वाली भारी कमीशन के चक्कर में चिकित्सक जरूरी न होने के बावजूद दिल के मरीजों की धमनियों में स्टेंट इंप्लांट करते रहते है। इसी कमीशनखोरी के चक्कर में निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद के कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. शेशागिरी राव जेल की हवा खा चुके हैं। खबर के अनुसार देश भर के स्वास्थ्य अधिकारी और नामी हृदय रोग विशेषज्ञ यह मानते हैं कि देश में स्टेंट इंप्लांट बेतहाशा किया जा रहा है। इसे देखते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) चिकित्सकों के लिए नई नैतिक गाइडलाइन जारी करने जा रही है। एमसीआई के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के वरिष्ठ सदस्य डॉ. पुरुषोत्तम लाल ने कहा कि स्टेंट उत्पादक कंपनियों के व्यापार को बढ़ाने के लिए जो डॉक्टर इस प्रकार का इंप्लांट कर रहे हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिये। उन्होंने कहा कि हमारी उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा पर आने वाले खर्च को कम करना होना चाहिये लेकिन इसके उलट कमीशनखोरी के कारण यह खर्च बढ़ता जा रहा है। दिल्ली के सर ‘गंगा राम हॉस्पिटल’ की कैथ लैब के निदेशक ‘डॉ. आरआर मंत्री’ भी मानते हैं कि देश में बेतहाशा हो रहे स्टेंट इंप्लांट के पीछे डॉक्टरों की कमीशनखोरी हो सकती है। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि इस प्रैक्टिस को रोकने के लिए कोई सरकारी नियंत्रक नहीं है। अमेरिका के समान भारत में भी ऐसी नियंत्रक संस्था होनी चाहिये।
 
पांच से दस गुना दाम में बेचे जाते हैं स्टेंट्स : धमनियों में अवरोध (ब्लॉकेज) को समाप्त करने के लिए इंप्लांट किये जाने वाले स्टेंट आजकल अनेक बड़े अस्पतालों के लिए तेजी से पैसा बनाने का जरिया बन गये हैं। स्टेंट्स की बिक्री और उपयोग पर नियंत्रण के लिए कोई सरकारी एजेंसी न होने के कारण अस्पतालों ने हृदय रोग के चिकित्सकों और स्टेंट बनाने वाली कंपनियों के साथ साठगांठ कर बेतहाशा कमाई के लिए एक कमीशन सिस्टम बना लिया है। यह बात दक्षिण भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह सब कुछ मरीजों की कीमत पर किया जाता रहा है। अखबार की वेबसाइट www.thehindu.com/news पर उपलब्ध इस रिपोर्ट के अनुसार दिल के मरीजों को ज्यादातर विदेशी स्टेंट लगने के कारण बड़े-बड़े अस्पतालों को मरीजों से बेहिसाब दाम वसूलने का मौका मिल जाता है। स्टेंट की कीमत को नियंत्रित करने का कोई सरकारी तंत्र न होने के कारण मरीज बहुत ज्यादा दाम देने को मजबूर कर दिये जाते हैं। जो कंपनी सबसे कम दाम में आयातित स्टेंट सप्लाई करने की बात करती है उसी के माल की संस्तुति हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) द्वारा की जाती है और वही माल अस्पताल स्वीकार करता है। स्टेंट बनाने वाली कंपनी पहले चिकित्सक और बाद में अस्पताल प्रबंधन से बात कर दोनों के लिए कमीशन फिक्स कर देती है। इस कमीशनखोरी के चलते मरीज में कम दाम वाले लो क्वॉलिटी के स्टेंट्स इंप्लांट किये जाते है जबकि उनसे पांच से दस गुना दाम वसूला जाता है। इतना ही मरीजों के परिचारकों से स्टेंट्स की हैडलिंग के खर्च के रूप में 15-20 प्रतिशत राशि वसूली जाती है।
 
स्टेंट इंप्लांट के बाद फिर से हो सकता है ब्लॉकेज : किसी मरीज की धमनियों में स्टेंट स्थापित किये जाने के बाद उस समय तो ब्लॉकेज खत्म हो जाता और रक्त का प्रवाह सामान्य ढंग से शुरू हो जाने के कारण मरीज को राहत मिलती है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं रहती है कि धमनियों में फिर अवरोध या ब्लॉकेज नहीं होगा। अमूमन स्टेंट इंप्लांट के एक साल के भीतर फिर से धमनियों में ब्लॉकेज हो सकता है। यह जानकारी दक्षिण भारत की प्रमुख मैगजीन ‘हंस इंडिया’ की एक रिपोर्ट में दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार मेडिकेटेड स्टेंट स्थापित होने पर फिर से ब्लॉकेज होने का जोखिम थोड़ा कम हो जाता है। 
 
साभार- क्लाउन टाइम्स

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