तो अब नामवर सिंह को कोई भी अगवा कर सकता है

इन दिनों पप्पू यादव की किताब द्रोहकाल के पथिक का विमोचन करके नामवर सिंह विवाद के बोफ़ोर्स पर सवार हैं। यह वही नामवर सिंह हैं जिन के ७५ वर्ष के होने पर देश भर में घूम-घूम कर समारोह करवाए थे प्रभाष जोशी ने। जीते जी इतना बड़ा सार्वजनिक सम्मान ७५ का होने पर किसी और हिंदी लेखक का देश भर में हुआ हो, यह मेरी जानकारी में नहीं है। हालांकि नामवर के यह सम्मान समरोह भी हलके विवाद में आए थे तब। लेकिन नामवर को तो जैसे ऐसे विवादों का शगल है। लोग लाख विरोध करें उन को फ़र्क नहीं पड़ता। क्यों कि वह सचमुच के नामवर हैं और रहेंगे भी।
 
फ़ेसबुक पर भी इसको लेकर घमासान जारी है। नामवर सिंह द्वारा इस लोकार्पण की जितनी निंदा की जाए कम है। माना कि वाद, विवाद, संवाद उनका प्रिय विषय है लेकिन पतन की भी एक सीमा होती है। पतन के नित नए प्रतिमान गढ़ते नामवर अपनी नामवरी का इस कदर दुरुपयोग करेंगे, यह बात लोग शुरु से जानते रहे हैं। किसी के लिए यह आश्चर्य का विषय नहीं है। विवाद और नामवर का चोली-दामन का साथ है। एक समय राज्य सभा में जाने के फेर में वह भ्रष्टाचार के प्रतिमान और भारतीय राजनीति में सामंती लहज़े को ठसके के साथ उपस्थित करने के लिए जाने जाने वाले लालू प्रसाद यादव फ़ेज़ में अपनी फ़ज़ीहत करवा चुके हैं। अब दूसरी बार वह हत्यारे पप्पू यादव फ़ेज़ में फंस गए हैं। पप्पू की किताब का लोकार्पण कर खुद पप्पू बन गए हैं। हालांकि भाजपाई नेता जसवंत सिंह की किताब का जब उन्होंने लोकार्पण किया तो उन्हें ठाकुरवाद से जोड़ा गया था। फिर यही पुनरावृत्ति आनंद मोहन सिंह के साथ हुई। ज्योति कुमारी के कथा-संग्रह के लोकार्पण में उन्होंने उस किताब में छपी अपनी ही भूमिका पर सवाल खड़ा कर दिया और कहा कि दस्तखत पर मेरे दस्तखत नहीं हैं। फिर कुछ दिन बाद उनका बयान आया कि मुझसे बातचीत के आधार पर भूमिका लिखी गई। फिर कुछ दिन बाद उन्होंने लिख कर बयान जारी किया कि तब मेरे हाथ जाड़े के मारे कांप रहे थे, इसलिए बोल कर लिखवाया। 
 
ऐसे और भी बहुतेरे विवाद हैं जो नामवर के साथ नत्थी हैं। कुछ व्यक्तिगत तो कुछ साहित्यिक विमर्श के। बहुत दिन नहीं बीते हैं जब परमानंद श्रीवास्तव ने उन्हें तानाशाह आलोचक घोषित किया था। यह वही परमानंद थे जो नामवर के सेकेंड लाइनर कहलाते थे। बहुत लोग उन्हें नामवर का मुंशी भी कहते थे। आलोचना पत्रिका में नामवर ने परमानंद श्रीवास्तव को ही अपने साथ संपादक बनाया था। और वही परमानंद श्रीवास्तव उन्हें तानाशाह आलोचक कह गए तो बहुत आसानी से तो नहीं कहा होगा। अब परमानंद जी नहीं हैं तो भी सच यही है कि हिंदी जगत ने नामवर की तानाशाही खूब भुगती है और उन की तानाशाही के विवाद भी। अब यह ताज़ा विवाद पप्पू यादव की किताब का न सिर्फ़ उनके द्वारा लोकार्पण है बल्कि उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा भी की है। 
 
नामवर ने अपनी नामवरी में बता दिया है कि पप्पू और उनका लेखन हाथी है, बाकी सब चींटी हैं। किताब एक सांस में पढ़ जाने की कवायद आदि-आदि भी वह कर गए हैं। जो भी हो अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि नामवर अब एक छोटे बच्चे सरीखे हैं, जिनको कोई भी अगवा कर सकता है, अपनी सुविधा से। उन को चाकलेट खिला कर या कुछ भी लालच दे कर, दिखा कर उन से कुछ भी बुलवा और लिखवा सकता है। ८७ साल के नामवर अब बालसुलभ अदाओं के मारे हुए हैं। तो क्या इस सब को उस मनोविज्ञान के आलोक में भी देखा जाना चाहिए कि बच्चे और वृद्ध एक जैसे होते हैं। एक समय था कि नामवर जल्दी किसी को पहचानते नहीं थे, अब सब को पहचानते हैं। यह उनके 'मौखिक ही मौलिक' का विस्तार है। यह होना ही था। विष्णु खरे ने नामवर की इस प्रतिभा को बहुत पहले ही से पहचान लिया था, बतर्ज़ फ़िराक बहुत पहले से तेरे कदमों की आहट जान लेते हैं, पर तब विष्णु खरे को लोगों ने नहीं सुना। उन्हें उनकी कुंठा में ढकेल कर सो गए लोग। लेकिन नामवर तो निरंतर जाग रहे हैं। अपने अध्ययन, अपनी विद्वता और अपने व्यक्तित्व का निरंतर दुरुपयोग करते हुए। 
 
प्रकाशकों के बंधक बन चुके नामवर एक बार तब और विवाद में आए थे जब राजा राममोहन ट्रस्ट की खरीद समिति के सर्वेसर्वा थे और करोड़ों की खरीद एक ही प्रकाशक को थमा दी। तब वह सीबीआई जांच के भंवर में आए थे। लेकिन तब अशोक वाजपेयी ताकतवर प्रशासक थे दिल्ली के सत्ता गलियारे में। नामवर अशोक वाजपेयी की शरण में गए। अशोक वाजपेयी ने सहिष्णुता दिखाई और नामवर बच गए। तो जीवन भर अशोक वाजपेयी को कोसने वाले नामवर ने भी अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादमी दिलवाने में पूरी ताकत लगा दी और दे दिया। नामवर की नामवरी का अंदाज़ा इसी एक बात से लगा लीजिए कि नामवर को साहित्य अकादमी पुरस्कार पहले मिला और उनके गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी को उन से दो साल बाद। वह भी आलोचना पर नहीं, उपन्यास पर। अनामदास का पोथा पर। खैर अभी तो आन रिकार्ड, आफ़ रिकार्ड हर जगह पप्पू यादव के रंग में नामवर रंगे मिल रहे हैं। अब जाने नामवर नाम के इस बच्चे को प्रकाशक ने टाफी दे कर फुसलाया है कि माफ़िया और हत्यारे पप्पू यादव ने। कहना कठिन है। पर यह जानना भी दिलचस्प है कि नामवर न सिर्फ़ कम्युनिस्ट हैं बल्कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर बनारस से चुनाव लड़ चुके हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार जनयुग के संपादक भी रह चुके हैं। और यह पप्पू यादव बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के ही एक विधायक अजित सरकार का भी हत्यारा है। उस हत्या को ले कर सज़ा काट रहा है। अभी वह पेरोल पर है। फ़ेसबुक पर यह घमासान भी अलग-अलग रंगों में जारी है। मैंने खुद अपनी वाल पर लिखा है : 
 
पतन के नए प्रतिमान 
बरास्ता द्रोहकाल का पथिक, पप्पू यादव
-नामवर सिंह
और फिर एक दूसरी टिप्पणी भी है:
 
यह भी क्या स्वर्णिम समय है? प्रणाम कीजिए इस समय को भी। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर, पत्रकार शिरोमणि तरुण तेजपाल और अब महान लेखक राजेश रंजन ऊर्फ़ पप्पू यादव। वो गाना है न आ जा तुझे भी सैर करा दूं, तमंचे पे डिस्को! तमंचे पे डिस्को! अब देखिए न कि एक से एक भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, सब के सब नत हैं इस डिस्को के आगे और नाच रहे हैं। दुर्योधन, दुशासन समेत। आमीन बुलेट राजा, आमीन!
 
इस पर ले कर बहुतेरी टिप्पणियां हैं, लाइक हैं।
हमारे प्रिय कथाकार और मित्र उदय प्रकाश भी इसको ले कर तंज और रंज में हैं। हिंदी साहित्य की नामवरी प्रवृत्ति पर उन के 'कोडेड फार्मूला'  पर गौर कीजिए :
 
'जब लेखक और प्रकाशक के बीच विवाद हो तो प्रकाशक के साथ रहो, जब प्रशासन और स्टूडेंट के बीच विवाद हो तो प्रशासन का साथ दो, जब अफ़सर और मातहत की बात हो तो हमेशा अफ़सर के पक्ष में रहो, जब जातिवाद और उसके विरोध के बीच झगड़े हो तो सवर्णवाद का साथ दो, जब उत्कृष्टता और मीडियाकिरी के बीच चुनना हो तो दूसरे को ही चुनो… जब बंदूक और कलम के बीच बहस चले तो बंदूक के साथ रहो ….सामंतवाद और लोमड़ चतुराई यही सीख देते हैं।'
 
एक हमारे मित्र हैं चंद्रेश्वर जी। कवि हैं। बहुत सरल भी हैं। कि कोई गाली भी दे तो प्रतिवाद या विरोध नहीं करेंगे। कहेंगे क्या करना है, उसी का मुंह गंदा हो रहा है। इस हद तक सीधे हैं। लेकिन कभी कोई बात ज़्यादा हो जाती है तड़क जाते हैं। फ़ुल बिहारी अंदाज़ में। तो वह भी इस प्रसंग को ले कर बहुत आहत हैं। वह भी फ़ेसबुक पर बहस चलाए हुए हैं। लेकिन नामवर की नामवरी देखिए कि उन के विवाद को ले कर भी कई विवाद खड़े हो जाते हैं। और साहित्य में जाति के अलंबरदार लोग अपनी जाति का झंडा यहां भी अपनी सुविधा से गाड़ लेते हैं। बहस कोई भी हो, विषय कोई भी हो इन मित्रों को बस एक ही चश्मा सूझता है और एक ही राग। वह है जाति राग। इस विवाद पर चंद्रेश्वर जी की वाल पर मेरी भी कुछ फ़ेसबुकिया गुफ़्तगू का जायजा लीजिए:
 
चंद्रेश्वर जी, लाल जी निर्मल ने गलतबयानी कर दी और आप उन के दबाव में आ गए? नामवर ने ऐसा कोई बयान लखनऊ में नहीं दिया था। मैं था उस कार्यक्रम में। नामवर ने मायावती की अमीरी का ज़िक्र किया था, प्रकारांतर से और पूछा था कि इनको आरक्षण की ज़रुरत कहां है? और कहा था कि गांवों में एक से एक निर्धन ब्राह्मण और ठाकुरों के लड़के हैं उन्हें भी आरक्षण दिया जाना चाहिए। जो बात बाद के दिनों में मायावती भी वोट के चक्कर में कहने लगीं। तो यह सामाजिक न्याय के ठेकेदार जो आरक्षण की मलाई चाट रहे हैं, नामवर को घेर लिए। अपने स्वार्थ में। तब नामवर गलत थे और आज उस हत्यारे पप्पू यादव के कसीदे काढ़ने वाले नामवर अच्छे हो गए? सांप के मुंह में तो दो ही जुबान होती है लेकिन आदमी के मुंह में अनगिनत जुबान होती है। चंद्रेश्वर जी, प्रगतिशील बनने के चक्कर में गलतबयानी के दबाव में मत आया कीजिए। बल्कि इन को कस कर लताड़ दिया कीजिए। सच्चे प्रगतिशील यही करते हैं। जैसे राम विलास शर्मा।
 
चंद्रेश्वर जी, जो बात मैंने कही आप उसे टाल गए हैं। आप की प्रगतिशीलता की बात पर कोई सवाल नहीं था, सवाल था लाल जी निर्मल द्वारा नामवर को गलत कोट करने का। कि 'चंद्रेश्वर जी जब नामवर सिंह ने लखनऊ में यह बोला था कि आरक्षण समाप्त नहीं हुआ तो बाभन ठाकुर के लड़के भीख मांगेगे ,तब नामवरजी आपको कैसे लगे थे।' नामवर ने प्रगतिशील लेखक संघ के लखनऊ सम्मेलन में ऐसा कुछ नहीं कहा था, जैसा कि लाल जी निर्मल बता रहे हैं, अगर इस मीटिंग के मिनिट्स हों तो निकलवा कर देख लें। और आप उसे स्वीकार करते हुए उसे कंडेम कर रहे हैं। यह लिख कर कि, 'तब भी नामवर जी अच्छे नहीं लगे थे ,निर्मलजी।' मेरा ऐतराज इसी बात पर है। सवाल यहां पांडेय यादव आदि का भी कहां से आ गया? यह मेरी समझ से परे है।
 
चंद्रेश्वर जी, मेरे पास टेप नहीं है। लेकिन अपने कान पर पूरा भरोसा है। और याददाश्त पर भी। रही बात आप के कुछ 'मित्रों' की तो उन 'मित्रों' ने तो नामवर सिंह को दूसरे दिन बीच बोलने में रोक कर ज्ञापन भी दिलवा दिया था। आप के यह 'मित्र' लोग डरे हुए लोग हैं। इन 'मित्रों' को अपने कुतर्क और फ़ासिज़्म से फ़ुर्सत नहीं है। यह 'मित्र' लोग साहित्य में भी आरक्षण के हामीदार हो चले हैं और कौवा कान ले गया की तर्ज़ पर बहस करते हैं। कामतानाथ तो अब नहीं हैं, नहीं आप को सही स्थिति बताते। लेकिन हां, शेखर जोशी हैं, हरिचरन प्रकाश हैं, श्रीप्रकाश शुक्ल हैं यह लोग बता सकते हैं आप को सही स्थिति। और खुद नामवर बता सकते हैं। कि उन्होंने क्या कहा। मिनिटस बता सकती है। बाकी जो 'मित्र' आप को बताए हुए हैं, गलत बताए हैं। फ़ासीवाद का विरोध करते-करते यह नए फ़ासिस्ट हैं। यह लोग साहित्य पर नहीं, जाति पर चलने वाले लोग हैं।
 
आप देखिए न कि इन 'मित्रों' में से कोई एक नामवर के इस कृत्य का विरोध नहीं कर रहे। नहीं कोस रहे, न सवाल उठा रहे कि नामवर ने एक हत्यारे की किताब का विमोचन क्यों किया? क्योंकि यह हत्यारा पप्पू यादव है और इनकी जातिगत चौहद्दी में फ़िट बैठता है। हां उनको नामवर का वह कहा याद है जिसमें उन्होंने मायावती की अमीरी का ज़िक्र करते हुए कहा था कि अब मायावती को आरक्षण की क्या ज़रुरत है? तो इसलिए कि इन्हें साहित्य में भी आरक्षण की ज़रुरत पड़ गई है। धन्य हैं आपके यह 'मित्र' लोग भी। जातिवाद की भी एक हद होती है और कि शर्म भी जो यह लोग पी गए हैं। कुतर्क पर जी रहे इन लोगों का अब कोई कुछ नहीं कर सकता। इन को इन के हाल पर छोड़ दीजिए। खुद समाप्त हो जाएंगे। पानी के बुलबुले की तरह।
 

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 औरdayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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