नेशनल काउन्सिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू मीडिया में एक संगोष्ठी के दौरान सहारा उर्दू अखबार के संपादक, अजीज बर्नी ने जो कुछ भी कहा वह एक सफेद झूठ है. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उनकी माफी जो सहारा उर्दू और हिन्दी अखबार में प्रकाशित किया गया था, वह उनके द्वारा नहीं लिखा गया था बल्कि यह सहारा के बड़े अधिकारी ने लिखा था. ऐसा कह कर वह मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी खोई छवि हासिल करने की कोशिश कर रहे, साथ ही सहारा को बदनाम करने की कोशिश भी.
वह किस तरह के जर्नलिस्ट हैं लोग अच्छी तरह से पहचान गए, अब कोई भी उनकी लेखनी पर भरोसा नहीं करता. वह पहले लिखते हैं और फिर खुद ही उसका खंडन करते हुए माफ़ी मांगते हैं. इस तरह वह उर्दू पाठकों को गुमराह भी करते रहे हैं, परन्तु अब किसी की भी रूचि उनकी लेखनी में नहीं रह गयी. और यही कारण है कि वह मुसलमानों को फिर से रिझाने के लिए झूठे बयान दे रहे हैं.
अगर अज़ीज़ बर्नी को मुंबई हमले की साजिश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तो उन्हें उस मुद्दे पर किताब नहीं लिखनी चाहिए थी, और अगर उनके पास अपनी लेखनी का कोई आधार था तो फिर उन्हें माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए थी, तथा अपने लेखों पर कायम रहना चाहिए था. परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और अपनी लेखनी की वजह से सहारा मीडिया के लिए भी विचित्र स्थिति पैदा कर दी थी, जिसके कारण बर्नी को एक महीने तक फोर्स्ड लीव पर भेज दिया गया था. अगर माफी उनकी नहीं थी, तो वो जब अपने काम पर वापस लौटे थे तो उन्होंने तब क्यों नहीं इसका स्पष्टीकरण अपने अखबार में छापा?
अब, उन्हें एहसास हुआ की लोगों की विशेषकर मुसलमानों की रूचि उनकी लेखनी में नहीं रह गयी तथा लोगों का उनपर एवं उनकी लेखनी पर से विश्वास उठ गया है तो उन्होंने दुबारा से लोगों को गुमराह करने के लिए झूठे दावे करना शुरू कर दिया. उन्हें यह सोचना चाहिए की वो आज जो कुछ भी हैं वो सिर्फ सहारा मीडिया की वजह से ही हैं, और उनकी निराधार लेखनी एवं बेतुके बयानों से सहारा की छवि पर भी दाग़ लगता है.
आये दिन बर्नी अपनी लेखनी से मुसलमानों के साथ-साथ सहारा समूह के लिए भी बदनामी मोल लेते रहते हैं. हाल के दिनों में भी अज़ीज़ बर्नी ने हैदराबाद की एक घटना को अपने अखबार के पहले पन्ने की सुर्खियाँ बना कर पेश किया एवं कुरान के फटे हुए पृष्ठ को अपने अख़बार के पहले पन्ने पर छाप कर उसका अपमान भी किया था, जिसे शुक्र है लोगों ने नज़र अंदाज़ कर दिया, वरना उनकी यह ग़लती तो माफ़ी के लायक भी नहीं है. इस तरह की पत्रकारिता देश और समाज को तोड़ने का प्रयास ही माना जाएगा, जो किसी भी हाल में भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश एवं सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. अज़ीज़ बर्नी को अब यह बात मान लेना चाहिए की देश का मुसलमान अब उन्हें पूरी तरह पहचान चुका है, अतः वे अब उनके बहकावे में नहीं आएगा, चाहे वो लाख झूठे दावे कर लें या उन्हें बरगलाने की जितनी भी कोशिश कर लें.
सैयद असदर अली
वरिष्ट पत्रकार
नयी दिल्ली





