जब पूरी दिल्ली दीपावली के मौके पर पटाखों, मिठाइयों, तोहफों के दायरे में असली-नकली खुशियों को पाने के लिए करोड़ों रुपए बरबाद कर रही थी, ठीक उसी समय एक बूढ़ी मां पुष्पा, जिसकी उम्र 62 साल है और जो हिंदुस्तान की धार्मिक नगरी वाराणसी की रहने वाली हैं, अपने बेटों की तलाश में दिल्ली में कदम रखती है. और कदम रखते ही दर्द की एक ऐसी कहानी शुरू होती है, जो देश के राजधानी की व्यवस्था पर सवाल तो खड़े करती ही है साथ ही साथ मानवता और इंसानियत के शिखर पर पहुंचने का दावा करने वाले हम हिंदुस्तानियों के उपर एक ऐसा कलंक लगाती है, जिसके अंधकार को धाने के लिए पावन दीप पर्व और करोड़ों रुपए के पटाखों की रोशनी भी शायद कम पड़ जाए.
दीपावली से ठीक कुछ दिन पहले ही पुष्पा अपने बेटों की तलाश में वाराणसी से दिल्ली पहुंचती हैं. उनके चेहरे पर बेटों को पाने की उम्मीद और पास में कुछ रुपए के साथ-साथ एक कागज के टुकड़े पर बेटों का पता लिखा था. पुष्पा दिल्ली पहुंच कर बेटों की तलाश शुरू करती उससे पहले ही उसके उम्मीदों की रोशनी कम होने लगती है, क्योंकि पुष्पा सड़क पार करते वक्त एक तेज गाड़ी की चपेट में आ जाती हैं और उसका बांया पैर पूरी तरह जख्मी हो जाता है. दुर्घटना के दिन से ही चोटों की जगह से खून का रिसाव लगातार जारी है, जिसके कारण पुष्पा के जख्म अब बड़े घावों का रूप अख्तियार कर चुके हैं.
पुष्पा के दर्द के बाद दिल्ली की व्यवस्था की विडंबना शुरू होती है और हरदम आप के साथ का दावा करने वाली पीसीआर की गाड़ी आनन-फानन में आती है और अपने कार्यों को अंजाम देकर पुष्पा को दिल्ली के सबसे बड़े नगर निगम के अस्पताल हिंदूराव में ले जा कर छोड़ देती है. लेकिन अस्पताल प्रशासन उनको भर्ती करने की बजाय उनके हाल पर उसे छोड़ देता है. और पिछले आठ दिनों से पुष्पा अस्पताल के ओपीडी परिसर में ही पड़ी हुई हैं. और लगातार जख्मों में तेज दर्द होने के कारण कराह रही हैं. जब भी कोई आदमी उनका हाल जानने की कोशिश करता है तो पुष्पा सिर्फ हाथ जोड़ कर कहती हैं कि जल्द से जल्द मेरा इलाज करवा दो, मुझे अपने बेटों को ढूंढना है. पुष्पा ने कई बार लोगों की मदद से अस्पताल में भर्ती होने की कोशिश की लेकिन आज एक सप्ताह बाद भी दिवाली के दिन अपने हाल पर जीने के लिए पुष्पा मजबूर हैं. ये उनकी मजबूरी हो सकती है लेकिन आज दीयों के त्योहार के मौके पर काश दिल्ली के लोग या दिल्ली के व्यवस्था में लगे लोग पुष्पा के दर्द को समझ पाते तो दिवाली हमारी और आप की तरह उसकी भी रोशन होती.
जय प्रकाश पाल
पत्रकार
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