लखनऊ में नवभारत टाइम्स को लांच हुए लगभग एक महीने से ज्यादा हो चुके हैं. पर यह अखबार आम पाठकों के बीच अपनी कोई खास जगह नहीं बना पाया है. राजनीति और क्राइम की खबरों में विशेष दिलचस्पी दिखाने वाले यूपी की धरती पर दिल्ली के कूड़ेदान स्टाइल का अखबार बहुत पसंद नहीं किया जा रहा है. फिर भी इसके एक 'खास' प्रजाति के पत्रकार अपना सीना ताने घूमते दिखते हैं. वाकया विधानसभा प्रेस रूम का है. नाम के अंत में 'शुकुल' लगाने वाले सज्जन विधानसभा सत्र का पास बनवाने के लिए पहुंचे थे.
पास बनाने वाले मिश्रा जी के सामने उन्होंने बड़े ताव से अपने अखबार का पत्र रखा और कहा पास बना दीजिए. मिश्रा जी ने शुकुल जी को देखने के बाद कहा कि किस अखबार से आए हैं? उन्होंने गर्वीले भाव को छोड़े बगैर कहा कि नवभारत टाइम्स से, पत्र पर नहीं देख रहे हैं. मिश्रा जी कहा- हां, अब देखा. मिश्रा जी ने पत्र देखा और कहा कि इस पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के सचिव सिद्धार्थ कलहंस जी की संस्तुति चाहिए या फिर आप का पहले पास बन चुका तो उसकी फोटो कॉपी लगाइए. हालांकि किसी तरह उन्होंने पुराने पास की फोटो कॉपी लगाकर मामला सुलटाया.
उसके बाद मिश्रा जी शुकुल जी और उनके साथियों का पास बनाने लगे. मिश्रा जी ने तारीफ करने की गरज से कहा कि आपका अखबार तो अच्छा निकल रहा है. इसे मैं अपने दूध वाले के यहां पढ़ता हूं. वो ही मंगाता है, जब दूध लेने जाता हूं तो पढ़ लेता हूं. इतने में वहां मौजूद एक पत्रकार ने धीरे से कहा कि यह अखबार दूध वाले ही लेते हैं. पढ़े-लिखे लोग नहीं. पचास रुपए वाला स्कीम बंद हो जाएगा तो दूध वाले के यहां भी नहीं मिलेगा. कुछ अन्य लोग भी मिश्रा जी की अनजाने में कही गई बातों के दूरगामी असर को सोचकर हंसने लगे. पत्रकारों को हंसते देख शुकुल जी भी चेहरे पर मजबूरी की मुस्कान ले आए और पास बनते ही निकल लिए.





