नेता ने कहा – इस महिला पत्रकार का रेप करो, किस करो

अपने ओहदे की लाज न रखते हुए एक नेता सारी मर्यादाओं को लांघ गया। इस नेता ने पत्रकार सभा के दौरान अपने समर्थकों से एक गर्भवती महिला पत्रकार का रेप करने के लिए कहा। उसे जरा भी शर्म नहीं आई कि वो कहां है और क्या कह रहा है। हद तो तब हो गई जब नेता के कहने पर उसका एक समर्थक महिला पत्रकार को चूमने का प्रयास भी किया।

नेता की यह घिनौनी तस्वीर रूस में सामने आई है। दरअसल यह रसियन नेता पत्रकारों को यूक्रेन में बढ़ी हिंसा पर संबोधित कर रहा था। यूक्रेन में रविवार को हिंसा भड़की थी। हिंसा में पांच लोग मारे गए थे। इस संबंध में महिला पत्रकार ने नेता/सांसद से यूक्रेन के खिलाफ लगे प्रतिबंध पर तगड़ा सवाल पूछ दिया। महिला पत्रकार के सवाल का असर यह हुआ कि नेता उसके ऊपर भड़क उठा। नेता ने वहां खड़े अपने दो समर्थकों से कहा कि इस महिला पत्रकार का बलात्कार करो। नेता के इतना बोलते ही पत्रकार सभा में सनसनी फैल गई। नेता की इस घिनौनी हरकत पर सभी चौंक गए।

सभी पत्रकार एक नेता के खिलाफ हो गए। सभी पत्रकार नेता के खिलाफ मुखर हो गए। इन सब के बीच यह नेता हिंसक रवैया ही अपनाया रखा। उसने आदेश देते हुए अपने समर्थकों से कहा कि उस महिला पत्रकार को पकड़ लो.. उसे किस करो.. रेप करो उसका। नेता के इतना कहते पर उसका एक समर्थक महिला पत्रकार की ओर बढ़ने लगा। समर्थक ने महिला पत्रकार को चूमने की भी कोशिश की।

वहां मौजूद सभी पत्रकार महिला पत्रकार के बचाव में आ गए। इस पर नेता ने महिला पत्रकार को लेसबियन कहा। नेता ने कहा कि यहां स्वस्थ लोगों की जरूरत है। तुम प्रेगनेंट हो तो घर जाओ, अपने बच्चे की हिफाजत करो। नेता वहां मौजूद सभी पत्रकारों से बुरी तरह पेश आया। महिला पत्रकार के बचाव में उसके न्यूज चैनल के सभी स्टॉफ लामबंद हो गए हैं। न्यूज चैनल ने कहा है कि नेता के खिलाफ कार्रवाई के लिए हर सफल प्रयास किया जाएगा। नेता की इस हरकत पर उसे कानून के कटघरे में जरूर खड़ा किया जाएगा। (रा.पत्रिका)

अलगाववादियों ने किया महिला पत्रकार का अपहरण

कीव। यूक्रेन के स्लेवियांस्क शहर में रूस समर्थक अलगाववादियों ने ..युद्ध अपराध.. का आरोप लगाकर एक यूक्रेनी महिला पत्रकार का अपहरण कर लिया है। पत्रकार के वकील ओलेग वेरेमिएंको ने बताया कि उग्रवादियों ने उनकी मुवक्किल इरमा क्रात का कल अपहरण कर लिया।

उन्होंने बताया कि सुश्री करात को एक फ्रीलांसर सर्ही लेटर (22 वर्ष) के साथ रखा गया है, जिसे गत बुधवार को ही अगवा किया गया था। अलगाववादियों के कब्जे में कुछ और पत्रकारों के भी होने की आशंका है। रूसी इंटरनेट चैनल ..लाइफ न्यूज..ने सुश्री क्रात के अपहरण की वीडियो पोस्ट की है, जिसमें कुछ नकाबपोश लोग हथियार के बल पर उन्हें साथ ले जा रहे थे। हालांकि इस वीडियो में महिला पत्रकार का चेहरा भी स्कार्फ से ढंका हुआ नजर आ रहा है।  

मुरली मनोहर जोशी ने जी न्‍यूज के सुमित अवस्‍थी को धमकाया

नई दिल्ली। भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के एक इंटरव्यू ने पार्टी को एक नई मुश्किल में डाल दिया है। अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर सवाल पूछे जाने पर बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी इस कदर भड़क गए कि उन्होंने जी न्यूज के रिपोर्टर सुमित अवस्‍थी को इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग डिलीट करने को कहा और धमकी तक दी।

जी न्यूज चैनल का दावा है कि बीच इंटरव्यू में जोशी ने रिपोर्टर से कहा कि मोदी से जुड़े सवाल न पूछें। बनारस से सांसद और कानपुर से बीजेपी उम्मीदवार जोशी ने न सिर्फ फुटेज देखी बल्कि उसे डिलीट करने को भी कहा। जब रिपोर्टर ने ऐसा करने से इनकार किया तो कथित रूप से जोशी ने उन्हें धमकाया और कहा कि डिलीट नहीं किया तो घर से बाहर नहीं जा पाएंगे।

गौरतलब है कि जी न्यूज से खास बातचीत के दौरान जोशी से जब मोदी के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब देने से इन्कार कर दिया। मोदी पर सवाल पूछने से भी मना कर दिया। बार-बार मोदी के बारे में सवाल पूछे जाने पर जोशी इतना क्रोधित हो गए कि उन्होंने इंटरव्यू का फुटेज डिलीट करने को कहा। परंतु पत्रकार ने ऐसा करने से मना कर दिया। इसपर जोशी ने पत्रकार को धमकी देते हुए कहा कि रिकार्डिग डिलीट नहीं की तो घर से बाहर नहीं निकल पाओगे।

उल्‍लेखनीय है कि कि वाराणसी से सांसद मुरली मनोहर जोशी को नरेंद्र मोदी के लिए अपना निर्वाचन क्षेत्र बदलना पड़ा। जोशी इस बार लोस चुनाव में कानपुर सीट से मैदान में हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि अपनी संसदीय सीट छोड़ने के लिए मजबूत हुए जोशी इसी वजह से मोदी से नाराज हैं।

‘फुटेज डिलीट करो, नहीं तो बाहर नहीं जा पाओगे’

लखनऊ : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी का ज़ी न्यूज को दिया गए एक अधूरा साक्षात्कार उनके और उनकी पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है तो दूसरी ओर लोकसभा चुनाव में भाजपा को घरेने के लिए नए मुद्दे की तलाश कर रही कांग्रेस को यह अधूरा साक्षात्कार एक नया हथियार दे सकता है। इस साक्षात्कार में जोशी भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर सवाल न पूछने के लिए ज़ी मीडिया के रिपोर्टर को धमकी दे रहे हैं लेकिन उनकी यह धमकी कैमरे में कैद हो गई।

सोमवार को ज़ी मीडिया के साथ साक्षात्कार के बीच में जोशी ने रिपोर्टर से कहा कि वह उनसे राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े प्रश्न पूछें न कि मोदी के बारे में। भाजपा के वरिष्ठ नेता ने ज़ी मीडिया के रिपोर्टर और कैमरामैन से साक्षात्कार का पूरा फुटेज दिखाने और किसी तरह के विवाद से खुद को बचाने के लिए फुटेज डिलीट करने के लिए कहा। ज़ी मीडिया के रिपोर्टर ने फुटेज डिलीट किए जाने का विरोध किया और कहा कि वह साक्षात्कार को फिक्स न करें। इस पर जोशी ने धमकाते हुए कहा कि वे उनके घर से बाहर नहीं जा पाएंगे। जोशी ने न केवल साक्षात्कार का पूरा फुटेज देखा बल्कि किसी तरह के विवाद से बचने के लिए फुटेज डिलीट भी किया।

गौरतलब है कि अभी कुछ दिनों पहले जोशी ने कहा था कि देश में मोदी की लहर नहीं बल्कि भाजपा की लहर है। एक मलयालम समाचार चैनल से बातचीत में जोशी ने कहा था, `यह लहर हो या वह लहर, मोदी एक पीएम उम्मीदवार के रूप में पार्टी के प्रतिनिधि हैं। यह उनके व्यक्तित्व की लहर नहीं है, यह नुमाइंदगी की लहर है। मोदी को देश के अलग-अलग भागों, समाज के विभिन्न वर्गों और भाजपा के सभी नेताओं से समर्थन मिल रहा है।`

मोदी के वाराणसी सीट से चुनाव लड़े जाने पर कानपुर से चुनाव मैदान में उतरे जोशी ने भाजपा से जसवंत सिंह के निकाले जाने पर भी अपनी आवाज बुलंद की थी। वहीं, इस पूरे प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश सिंह ने कहा, `मेरी पार्टी इस तरह के कृत्यों में कभी शामिल नहीं रही। मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जाना चाहिए।` जबकि भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, `यह पत्रकारिता की आजादी के खिलाफ है। ऐसा करना गलत है और ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था।` (जी न्‍यूज)

कथा सेबी के काले दूध और सोनिया-मन मोहन-चिदंबरम के रचे लाक्षागृह की!

स्कूल के दिनों में कहीं पढ़ा था कि किसी देश के लिए सेना से भी ज़्यादा ज़रुरी होती है न्यायपालिका। सच जिस देश और समाज में न्या्य न हो उस के पतन को कोई रोक नहीं सकता। इसी लिए न्याय व्यवस्था किसी भी सभ्य समाज की अनिवार्य ज़रुरत है, अनिवार्य पहचान है। लेकिन क्या यह न्याय व्यवस्था? जो अपने विवेक से काम करने के बजाय कुछ राजनीतिक स्वार्थ में न्यस्त लोगों का खिलौना बन जाए? यह न्याय व्यवस्था?

सेबी और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही देश की प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्था हैं। समाज में इन दोनों ही संस्थाओं की खासी साख है। लेकिन कभी-कभी कुछ व्यक्ति आ जाते हैं ऐसी संस्थाओं में भी जो इस की साख पर यदा-कदा बट्टा लगाते दिख जाते हैं। अपवाद के तौर पर ही सही। और कि बात बिगड़ जाती है। किसी निरपराध की इज़्ज़त सरे-आम नीलाम हो जाती है। वसीम बरेलवी के दो शेर याद आ रहे हैं इसी बात के मद्दे नज़र :

हर शख्स दौड़ता हैं यहां भीड़ की तरफ़
और चाहता है कि उसे रास्ता मिले

इस दौरे मुंसिफ़ी में ज़रुरी नहीं वसीम कि
जिस शख्स की खता हो उसी को सज़ा मिले

सहारा इंडिया परिवार और सहाराश्री को आज की तारीख में वसीम बरेलवी के इस शेर की रोशनी में देखा जाना बहुत ज़रुरी है। कारण यह है कि सेबी हालिया कुछ सालों से सहारा और उस के व्यवसाय के पीछे नहा-धो कर पड़ गया है। तो सिर्फ़ इस लिए कि वर्तमान केंद्र सरकार की आका श्रीमती सोनिया गांधी की सहारा पर तिरछी नज़र है। सो सेबी सोनिया गांधी के इशारे पर कठपुतली बना नाच रहा है। और कहते हैं ना कि राजा का बाजा बजा। सो सेबी और उस के चेयरमैन  राजा का बाजा बजा रहे हैं। सेबी की सहारा के बाबत मुसलसल कारगुज़ारियों को देख कर एक पुराना लतीफ़ा याद आता है। आप भी इस लतीफ़े का लुत्फ़ लीजिए :

एक लड़का था। एक शाम स्कूल से लौटा तो अपनी मम्मी से पूछने लगा कि, 'मम्मी, मम्मी ! दूध का रंग काला होता है कि सफ़ेद?

'ऐसा क्यों पूछ रहे हो ?' मम्मी ने उत्सुकता वश पूछा।

'कुछ नहीं मम्मी, तुम बस मुझे बता दो !'

'लेकिन बात क्या है बेटा !'

'बात यह है मम्मी कि आज एक लड़के से स्कूल में शर्त लग गई है।' वह मम्मी से बोला कि,  'वह लड़का कह रहा था कि दूध सफ़ेद होता है और मैं ने कहा कि दूध काला होता है !' वह मारे खुशी के बोला, 'बस शर्त लग गई है !'

'तब तो बेटा, तुम शर्त हार गए हो!' मम्मी ने उदास होते हुए बेटे से कहा, 'क्यों कि दूध तो सफ़ेद ही होता है!'

यह सुन कर वह लड़का भी उदास हो गया। लेकिन थोड़ी देर बाद जब वह खेल कर लौटा तो बोला, 'मम्मी, मम्मी! मैं शर्त फिर भी नहीं हारुंगा।'

'वो कैसे भला ?' मम्मी ने उत्सुकता वश बेटे से मार दुलार में पूछा।'

'वो ऐसे मम्मी कि जब मैं मानूंगा कि दूध सफ़ेद होता है, तब ना हारुंगा !' वह उछलते हुए बोला कि, ' मैं तो कहता ही रहूंगा कि दूध काला ही होता है और लगातार कहता रहूंगा कि दूध काला होता है। मानूंगा ही नहीं कि दूध सफ़ेद होता है। सो मम्मी मैं शर्त नहीं हारुंगा !'

'क्या बात है बेटा ! मान गई तुम को !' मम्मी ने बेटे को पुचकारते हुए कहा, 'फिर तो तुम सचमुच शर्त नहीं हारोगे।'

यह तो खैर लतीफ़ा है। पर देखिए न कि कैसे तो समूचे देश को सोनिया और उन के नवरत्नों ने लतीफ़े में बदल दिया है। घोटालों और सिर्फ़ घोटालों में पूरे देश को रंग दिया है। खैर यह कहानी बहुत लंबी है। इस का विस्तार अभी यहां प्रासंगिक नहीं है।

असल मुद्दे पर आइए। और अब एक क्षण के लिए मान लीजिए कि वह मम्मी सोनिया गांधी हैं और उन का वह दुलरुआ बेटा सेबी है, बल्कि सेबी के चेयरमैन यू के सिनहा हैं। और कि वह दूध को सफ़ेद बताने वाला लड़का सहारा है बल्कि सहाराश्री हैं। तो बात समझने में ज़रा नहीं पूरी आसानी हो जाएगी। बस थोड़ी सी तब्दीली यहां इस कहानी में यह और है कि उस लतीफ़े में तो सिर्फ़ लड़का कुतर्की और मनबढ़ था और उस कि उस की मम्मी उस को शह दे रही थी। पर यहां तो मम्मी खुद बेटे को न सिर्फ़ कुतर्क सिखा रही हैं बल्कि बेटे को तोते की तरह निरंतर रटाती जा रही हैं कि बेटा जान लो दूध तो काला ही होता है और कि तुम्हें यह हरगिज-हरगिज नहीं मानना है कि दूध सफ़ेद होता है। सहारा वाले या सहाराश्री को कहते रहने दो कि दूध सफ़ेद होता है। तुम को हर हाल में यह शर्त जीतनी है सो मन में पक्की तरह गांठ बांध लो कि दूध तो काला ही होता है। क्यों कि तुम्हें तो जीतना ही, जीतना है। बतर्ज़ इस दूध के सहारा और सहाराश्री कहते रहें कि हम ने अपनि निवेशकों को पैसा दे दिया है पर तुम तो मानो ही न कि सहारा ने पैसे दे दिया है। कोई निवेशक पैसा मांगने भी नहीं आता है तो न आए, अपनी बला से ! तुम तो बेटा बस लगे रहो और अड़े रहो कि दूध काला ही होता है। और हां, इस बेटे को एक्स्ट्रा कोचिंग देने वाले एक और अध्यापक भी हैं, वित्त मंत्री पी चिदंबरम।

बस आप को सारी कहानी समझ में आ जाएगी।

अब पूछेंगे आप कि श्रीमती सोनिया गांधी को आखिर इतनी कसरत क्यों करनी पड़ रही है? और कि वह सहारा या सहाराश्री के कारोबार के पी्छे न सिर्फ़ खुद बल्कि सेबी के चेयरमैन को भी क्यों लगाए पड़ी है? अभी तो सब के सामने सेबी ही दिखाई पड़ रही है। पर सच यह है कि किसी भी कारोबार को नियंत्रित करने वाली रिजर्व बैंक से लगायत जितनी भी वित्तीय एजेंसियां, संस्थाएं हैं हर किसी एजेंसी को सहारा के पीछे बीते एक दशक से पागल सांड़ की तरह दौड़ा लेने का निर्देश दे रखा है श्रीमती सोनिया गांधी और उन के प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह तथा वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने। इन सब की फ़ेहरिश्त बहुत लंबी है। जिन के व्यौरे जल्दी ही आप मित्रों को विस्तार से पढवाऊंगा।

वह तो सहाराश्री  और सहारा  का एक दर्शन है सामूहिक भौतिकवाद का जो उसे हिमालय की तरह माथा ऊंचा कर के खड़ा रखे है। यह सहारा की नीतिगत, नैतिक और व्यावहारिक ताकत है कि बीते दस सालों से निरंतर आंधी-तूफ़ान के बीच भी पूरी ताकत से वह अपने व्यवसाय में न सिर्फ़ खड़ा है बल्कि निरंतर प्रगति के नित नए आंकड़े भी दर्ज करता जा रहा है। अपने को देश में ही नहीं वरन दूसरे देशों में भी फैला रहा है। गरज यह कि सहारा अब ग्लोबलाइज हो चुका है। उस की तरक्की किसी सोनिया, मनमोहन, चिदंबरम या सिनहा के रोके रुकने वाली है नहीं। तो इस लिए भी कि सहारा के लिए व्यवसाय से ज़्यादा बड़ा देश है। सहारा के लिए धन बल से बड़ा श्रम बल है। ढेर सारे उस के सामाजिक सरोकार हैं। यही उस की बड़ी ताकत है। नहीं ध्यान दीजिए कि देश और दुनिया से तमाम पैराबैंकिंग कंपनियां लोगों के पैसे ले कर चंपत हो गईं, करोड़ो लोगों की मेहनत की कमाई पानी में डूब गई और यह हमारी तमाम वित्तीय एजेंसियां कान में तेल डाले, आंख पर पट्टी बांधे सोती रहीं। इन भगोड़ी कंपनियों और उन के कर्ता-धर्ताओं का राई-रत्ती भी कुछ नहीं बिगाड़ सकीं। असंख्य लोग रोते रहे, मरते रहे अपनी गाढ़ी कमाई इन भगोड़ी कंपनियों में लगा कर। पर किसी एजेंसी के कान पर जूं नहीं रेंगा। न श्रीमती सोनिया गांधी और उन के लेफ़्टिनेंट पी चिदंबरम के कान पर। लेकिन  आज की तारीख में सहारा इन सब की आंखों की किरकिरी बन गया है। इस लिए भी कि सहारा कोई भगोड़ी कंपनी नहीं है।

तो क्यों बन गया है इन के आंख की किरकिरी सहारा ? यह एक ज़रुरी सवाल है।

कारण कई एक हैं। पर यहां कुछ मुख्य कारणों को बताना बहुत ज़रुरी है। यह कथा दरसल वर्ष १९९१ से शुरु होती है। देश के दुर्भाग्य से पी वी नरसिंहा राव देश के प्रधान मंत्री बने। और कि मन मोहन सिंह उन के वित्त मंत्री। इसी बीच बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा।, मुंबई दंगे हुए। हर्षद मेहता कांड हुआ। देश की अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिर गई। देश कई साल पीछे चला गया। तिस पर तुर्रा यह कि आर्थिक उदारीकरण और डंकल प्रस्ताव जैसे तमाम डंक देश को लगने शुरु हो गए। देश की अर्थव्यवस्था वर्ल्ड बैंक के पास गिरवी रखने की नीं व रखी जाने लगी। जो कि अब देश को जर्जर करते हुए एक बड़ी मीनार के रुप में हमारे सामने उपस्थित है। देश का बाज़ार विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की बात होने लगी। देसी कंपनियों के मुंह पर जूता मारते हुए विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए सारे  दरवाज़े खोल दिए गए। विदेशी निवेश की आरती उतारी जाने लगी। एक घटना और घटी इस बीच। कि सहारा ग्रुप ने मीडिया जगत में पूरी ताकत से कदम रखा। राष्ट्रीय सहारा नाम से हेंदी और उर्दू में अखबार निकाल कर। वर्ष १९९१ में ही। बाद में अंगरेजी में भी और तमाम चैनल भी। खैर, अब हुआ यह कि सहाराश्री के नेतृत्व में न सिर्फ़ अखबार निकला सहारा का बल्कि राष्ट्रीय सहारा ने पूरे दम-खम से मनमोहन सिंह के इस आर्थिक उदारीकरण, डंकल प्रस्ताव, विदेशी निवेश आदि का न सिर्फ़ विरोध किया बल्कि अखबार के माध्यम से एक जोरदार मुहिम बल्कि एक बड़ा आंदोलन भी चलाया। लंबे समय तक। मनमोहन सिंह बोलते कम हैं। पर बिन बोले भी लोगों से बदला ले लेते हैं। सहारा उन के निशाने पर आ गया। तभी से वह साइलेंट आपरेटर बन गए सहारा के खिलाफ़, सहारा के व्यवसाय के खिलाफ़। लेकिन बाद के दिनों में गैर कांग्रेस सरकारें आईं। बदला लेने की स्थितियां थम सी गईं। सहारा को नेस्तनाबूद करने की उन की मंशा पर पानी फिर गया।

पर वो कहते हैं न कि करेला और नीम चढ़ा। वही हो गया।

क्यों कि वह समय भी आया जब यू पी ए की सरकार सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनने की बात होने लगी। तमाम और लोगों की तरह सहाराश्री ने भी सोनिया के विदेशी मूल के होने का सवाल खड़ा करते हुए उन के प्रधान मंत्री न बनने के लिए मुहिम छेड़ दिया। सोनिया प्रधान मंत्री नहीं बन पाईं। पर अपनी एक कठपुतली मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री बनाने में वह कामयाब हो गईं। अब क्या था करेला और नीम एक साथ हो गए। करेले और नीम के इस संयोग में एक तड़का और लग गया अमिताभ बच्चन और सहाराश्री की गहरी दोस्ती का। अमिताभ बच्चन और सोनिया गांधी के छत्तीस का आंकड़ा अब किसी से छुपा नहीं है। तो देश प्रेम, विदेशी निवेश और विदेशी मूल का विरोध और अमिताभ बच्चन से गहरी दोस्ती की कीमत सहारा और सहाराश्री को इस तरह जेल जा कर, अपमानित हो कर चुकानी पड़ेगी यह तो बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित, कानून के जानकार और व्यवसाय जगत  के लोग भी नहीं सोच सके थे। पर सोनिया, मनमोहन और चिदंबरम के बनाए लाक्षागृह में सहारा और सहाराश्री तात्कालिक रुप से फंस गए। पर सहाराश्री बतौर सूत्र एक बात अकसर कहते रहते हैं कि सत्य परेशान हो सकता है, पर पराजित नहीं हो सकता।

और सहारा इंडिया परिवार के लाखो कार्यकर्ता और करोड़ो सम्मानित जमाकर्ता जानते हैं कि सहाराश्री आज की तारीख में भले परेशान हों और कि सोनिया-मन मोहन-चिदंबरम के बनाए लाक्षागृह यानी कारागार में हों पर वह पराजित नहीं होंगे यह तय है। एक दिन उन का सत्य सोने की तरह तप कर सब के सामने उपस्थित होगा। और बहुत संभव है सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्याय मूर्ति लोग कल अपने विवेक का इस्तेमाल करें और कि सेबी के लोग भी अपनी ज़िद तोड़ें और सहाराश्री को सोनिया-मन मोहन के लाक्षागृह से रिहा कर दें। बहुत मुमकिन है कि ऐसा ही कल हो जाए। क्यों कि किसी भी चीज़ की अति बहुत अच्छी नहीं होती। कबीर कह ही गए हैं कि :

अति की भली न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

वहीं रमानाथ अवस्थी अपने एक गीत में लिखते हैं कि:

किसी से कुछ कहना क्या
किसी से कुछ कहना क्या
अभी तो और चलना है !

तो सहारा और सहाराश्री को इन तमाम बाधाओं को पार करते हुए अभी बहुत सारे काम करने हैं, बहुर सारी मंज़िलें पानी हैं, बहुत सारे व्यवसायिक और सामाजिक कीर्तिमान गढ़ने हैं। यह सब तो मामूली बाधाएं हैं। एक सच यह भी है कि जाने सहारा के साथ क्या है कि जब भी कभी सहारा इंडिया परिवार संकट में पड़ता है, जल्दी ही न सिर्फ़ संकट से उबर जाता है बल्कि और मजबूती से खड़ा हो कर व्यवसाय के ढेर सारे नए कीर्तिमान भी गढ़ता है। सहारा  कोई पहली बार संकट में नहीं फंसा है। बहुत लंबी फ़ेहरिश्त है बीते कुछ सालों में सहा्रा के संकट में फंसने और उबरने की। इस संकट से भी सहारा न सिर्फ़ बाहर आएगा बल्कि और मजबूती से पूरे देश के सामने उपस्थित दिखेगा। यह एक अकाट्य सत्य है।

हाल-फ़िलहाल तो सहाराश्री के व्यक्तित्व के बखान में मशहूर और अजीम शायर मुनव्वर राना को यहां पढ़िए और सहाराश्री के व्यक्तित्व के ताप को महसूस कीजिए। १० जून को सहाराश्री का जन्म-दिन होता है जिसे सहारा इंडिया परिवार समारोह पूर्वक हर साल मनाता है। ऐसे ही एक जन्म-दिन पर देश के अजीम शायर मुनव्वर राना सहारा शहर आए थे सहाराश्री को बधाई देने। तभी उन्हों ने यह नज़्म पढ़ कर सहाराश्री को बधाई दी थी। तो सहाराश्री के बाबत यह नज़्म पढ़िए पूरे इत्मीनान से और उन में जहांगीर सी खुशबू को आत्मसात कीजिए और कि सोनिया-मनमोहन के दुष्चक्र और उन के बनाए लाक्षागृह को तार-तार कीजिए।

सहाराश्री की सालगिरह के ख़ुशगवार मौक़े पर

मुनव्वर राना

दिल में खिलते हों जहां सिर्फ़ मोहब्बत के कमल
सोचता रहता हो दिन रात गरीबी का जो हल

अपने लहजे में समेटे हुए उर्दू की ग़ज़ल
जिस ने आंखों मे बसा रक्खे हों सौ ताज महल

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

सर फिरी मौजों को अपने लिए साहिल कर ले
अपने दुश्मन को भी चाहत से जो हासिल कर ले

अपनी खुशियों में जो औरों को भी शामिल कर ले
हर ज़मीं फूल खिला देने के क़ाबिल कर ले

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

भूले बिसरे हुओं को याद भी जो करता हो
कै़द से चिड़ियों को आज़ाद भी जो करता हो

दिल दुखे लोगों की इमदाद भी जो करता हो
शहर, वीराने में आबाद भी जो करता हो

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

जिस के हर ख़्वाब में शामिल हो वतन की अज़मत
जिस के  अलक़ाब  शामिल हो वतन की अज़मत

जिस के हर बाब में शामिल हो वतन की अज़मत
जिस के  आदाब में शामिल हो वतन की अज़मत

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

चांदनी,धूप को, रातों को जो काजल कर ले
ग़ैर के ग़म में भी आंखों को जो जल-थल कर ले

ख़्वाब में देखे महल और मुकम्मल कर ले
मुश्किलें राह में आएं तो उन्हें हल कर ले

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

देश से, देश के लोगों से मोहब्बत भी करे
खेल से प्यार करे और सख़ावत भी करे

जां लुटाते हुए हर फ़ौजी की इज़्ज़त भी करे
जिस के हर काम की तारीफ़ हुकूमत भी करे

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

जिस की तसवीर से तक़दीर की खु़शबू आए
ईंट रख दे जहां तामीर की ख़ुशबू आए

ख़्वाब के साथ ही ताबीर की खुशबू आए
उस से मिलिए तो जहांगीर की ख़ुशबू आए

आमीन !

दनपा
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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एक औरत का अकेले हनीमून पर जाना !

: पुरुष सत्ता को चुनौती देती और हिंदी सिनेमा में बदलती घर की औरत की दास्तान! : क्या कोई औरत अकेले हनीमून पर जा सकती है? बिना पुरुष साथी के? जिस को कि पति कहते हैं? हमारे भारतीय समाज में, हिंदी समाज में? हिदी सिनेमा में ? अभी-अभी।  बिलकुल अभी गई है एक औरत अकेली हनीमून पर। और इस औरत का अकेले हनीमून पर जाना न सिर्फ़ दिलचस्प है बल्कि इस बहाने बदलती हुई एक भारतीय स्त्री का एक मानीखेज दर्पण और उस की दुनिया भी हमारे सामने उपस्थित है। उस की यह हनीमून यात्रा एक जोरदार तमाचा है पुरुष सत्ता के चेहरे पर जिस की गूंज बहुत देर तक सुनाई देती है। और कि सुनाई देती रहेगी।

हिंदी सिनेमा में भी घर की औरत अब बदल रही है। जैसे समाज में। जैसे जीवन में। उस की देवी, मां, प्रेमिका, बहन,पुजारिन या पेड़ों के इर्द-गिर्द हीरो के आगे पीछे घूम-घूम गाना गाने, पुरुषों को रिझाने, उन की सेवा करने, पति को परमेश्वर मानने आदि की उस की छवि अब खंडित है। खंडित क्या अब पूरी तरह ध्वस्त है। अब वह इस कैद से जैसे निकल आई है। हालिया कुछ फ़िल्मों में घर की औरतों की इस बदलती तसवीर को और इस तसवीर में उस की बदलती इबारत को साफ पढ़ा जा सकता है। एक है हाईवे और दूसरी है क्वीन। बल्कि दो और फ़िल्मों को भी इस फ़ेहरिस्त में शुमार कर लेते हैं। शुद्ध देसी रोमांस और हंसी तो फंसी में भी इस घर की औरत की बदलती तसवीर की गूंज साफ सुनाई देती है।

इन चारो ही फ़िल्मों की कथा और कलेवर अलग है, ट्रीटमेंट और फ़ोकस अलग है पर  ध्वनि सब की एक है। स्त्री के हिस्से का सांघातिक तनाव एक है। गुलाब गैंग और डेढ़ इश्किया और इश्किया जैसी कुछ फ़िल्मों को भी आप इस में जोड़ सकते हैं। इस लिए भी कि इन सभी फ़िल्मों में उन के तनाव और बदलाव के तार एक हैं। पर पुरुषों को चुनौती देती हुई। पितृसत्ता को मटियामेट करती हुई। हाईवे कहीं-कहीं मसाला फ़िल्मों की बुनावट को छूती है पर छू कर ही निकल आती है। लेकिन क्वीन इस मसालेबाजी में नहीं फंसती। बल्कि क्वीन तो न सिर्फ़ हिंदी फ़िल्मों की बल्कि हिंदी समाज की चौहद्दी को भी बदलने की इबारत को पढ़ती और पढ़वाती है।

बताइए भला कि कोई औरत अकेले भी हनीमून पर जा सकती है? और वह भी बिना शादी के? क्वीन की नायिका तो जाती है। न सिर्फ़ जाती है बल्कि पितृ-सत्ता पर ज़बर्दस्त चोट करती है। पुरुष मानसिकता की इस सोच कि हम ही श्रेष्ठ हैं पर इस कदर जूता मारती है क्वीन कि कोई दूसरा उदाहरण समाज में कहीं हो तो हो, हिंदी सिनेमा में तो बिलकुल नहीं है। विकास बहल निर्देशित और लिखित अनुराग कश्यप की इस फ़िल्म में चमत्कारी जैसा कुछ नहीं है। इसी लिए यह फ़िल्म चौंकाती नहीं, बल्कि एक गहरी सोच और एक बड़े संदेश में हमे लपेट लेती है। बिना किसी बड़बोलेपन या किसी बौद्धिक जुगाली के। दिखने में एक सरल सी फ़िल्म, एक बहुत बड़ी फ़िल्म बन जाती है। शमशेर की उस कविता के अर्थ में कि बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी आप ही। हिंदी में या किसी भारतीय भाषा में मेरी जानकारी में ऐसी पृष्ठभूमि पर मेरी जानकारी में कोई दूसरी कहानी भी नहीं है।

विकास बहल की यह क्वीन कहानी एक मध्यवर्गीय परिवार की है। दिल्ली की एक लड़की जिस का नाम रानी है की शादी तय होती है उस के ही प्रेमी विजय से। शादी की सारी तैयारियां पूरी हैं। दो दिन बाद शादी है। रानी की मेहदी की रस्मे चल रही हैं, नाच-गाना हो रहा है, नात-रिश्तेदार सब इकट्ठे हैं। गहमागहमी है। और इसी सब में विजय का फ़ोन बार-बार रानी को आता है। वह रानी से मिलना चाहता है। रानी अपने छोटे भाई के साथ एक रेस्टोरेंट में जाती है मिलने। विजय मिलता है। बिलकुल तना हुआ। जैसे कि कलफ़ लगा कर आया हो पूरी देह में। विदेश में नौकरी करने और रहने की यह अकड़ है। रानी शादी की तयारियों के छोटे-छोटे डिटेल्स बताती है। अ्पना और उस का नाम लिखा बोर्ड याद करती है। रानी वीड्स विजय। और खुश हो जाती है। बात-बात में दो मिनट में ही विजय अपनी शादी को रद्द करने का ऐलान कर देता है। रानी के साथ ही दर्शक भी अवाक है।

रानी मनुहार पर मनुहार करती है, गिड़गिड़ाती है। पर विजय की अकड़ पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और वह बता देता है कि अब वह उस के लायक नहीं रही। रानी सारी तैयारियों के पूरी हो जाने की दुहाई देती है। अपने पुराने प्यार के दिन याद दिलाती है, अपने प्यार का वास्ता देती है। कहती है आप जैसे कहोगे मैं वैसे ही रहूंगी। पर विजय है कि टस से मस नहीं होता। फिर रानी कह देती है कि आप मेरे पेरेंटस से बात करो इस बारे में। रानी लुटी-पिटी रेस्टोरेंट से बाहर आ जाती है। बाहर खड़ा छोटा भाई पूछता है कि क्या हुआ? रानी अफना जाती है भाई के इस सवाल से। वापस फिर रेस्टोरेंट में जाती है। विजय से फिर मनुहार करती है। पर विजय अपनी अकड़ में तर-बतर है। रानी लौट आती है भाई के साथ आटो में अपने घर। घर पर भी मुर्दनी छा गई है। विजय का फ़ोन आ चुका है। रानी घर में आती है, सामान्य दिखने की कोशिश करती है।

पर लुटे-पिटे घर में सब की आंखों का कैमरा उस एक रानी पर ही एक साथ टिक जाता है। सब की लाचार नज़रें उस पर सहानुभूति के अंदाज़ में टिक गई हैं। वह अचानक दौड़ लगा देती है अपने कमरे की ओर। तनाव भरी दौड़। माता-पिता सब दौड़ पड़ते हैं उस के पीछे। लेकिन वह फटाक से कमरा बंद कर लेती है। पिता आवाज़ देते हैं, मां आवाज़ देती हैं, परिजन, रिश्तेदार सब के सब आवाज़ देते हैं एक सुर में। पर रानी खामोश है। दरवाज़ा नहीं खोलती। दादी आती हैं। बाहर से ही बताती हैं कि पाकिस्तान में उन का भी एक ब्वाय फ्रेंड था। बंटवारे के साथ सब छूट गया। यहां तेरे दादा जी मिल गए। सब ठीक हो गया। ज़िंदगी ऐसे ही चलती है। तेरा भी सब ठीक हो जाएगा। पर रानी चुप है। टेंट वाले अपना सामान समेट रहे हैं। रिश्तेदार विदा हो रहे हैं। अजब मुर्दनी छा गई है समूचे घर में। कि कलेजा मुंह को आता है। लेकिन रानी है कि चुप है। बेसुध और बदहवास।

लेकिन वह रह-रह कर अपने प्रेम केफ़्लैशबैक में भी जाती जा रही है।

कि कैसे तो विजय उस का पीछा करते-करते उस के स्कूल, लाइब्रेरी पहुंचता रहता है। प्रेम के कई दृष्य उस की यादों और आंखों में तिरते रहते हैं। दिन-रात बीत चुके हैं। सब रिश्तेदार लोग जा चुके हैं। रानी नीम बेहोशी में कमरे से बाहर निकलती है। डायनिंग टेबल पर कुछ खाती हुई सी बैठी है। घर के लोग उस की मिजाजपुर्सी में हैं। कि वह अचानक कहती है, ' मैं हनीमून पर जाऊंगी !' घर के लोग अवाक ! पूछते हैं अकेले? वह कहती है कि, ' हां ! अकेले !' फ़्रांस की टिकट वगैरह उस की पहले ही से बुक है। सो वह घर से निकल पड़ती है अकेले हनीमून पर। घर वाले एयरपोर्ट तक छोड़ने आते हैं।

अब रानी फ़्रांस की यात्रा पर है। हनीमून यात्रा पर। अकेले। अनजान देश, अकेला सफ़र जो यातना देता है, दे सकता है, दे रहा है। लेकिन वह अब चुप नहीं है, बोल रही है। बोल रही है पर भाषाई दिक्कत रह-रह सामने खड़ी हो जाती है। दिल्ली की यह रानी अंग्रेजी भी जानती है पर भाषाई बीहड़ में खो जाती है। क्यों कि वह फ़्रेंच नहीं जानती। पुरुष फ़्रांस के भी अलग नहीं हैं। भारत के जैसे ही हैं। कम से कम औरतों के मामले में। पर औरत वहां की भारतीय औरतों जैसी तो नही हैं। यह उस की पड़ोस में ठहरी औरत को देख कर पता चलता है। वह अविवाहित है और मां भी है। अपने किसी भी पुरुष मित्र से संबंध बना सकती है, संभोग कर सकती है मन मर्जी से। और उस के साथ मार पीट भी कर सकती है। गुलाम बन कर नहीं रहती वह। एक क्लब में डांसर है वह। पर अपनी मां को अपना पता नहीं देती। किसी और के पते के मार्फ़त वह मां से खतो-किताबत करती है और उसे पैसे भेजती रहती है। आदि-आदि कई सारे संत्रास हैं उस के भी। लेकिन वह अपने को आज़ाद महसूस करती है। और कि आज़ादी से रहती भी है। धीरे-धीरे वह रानी की दोस्त हो जाती है। रानी अब क्वीन बन चुकी है। वह सब को रानी नाम बताती है तो लोग नहीं समझते तो वह उस का अंगरेजी बताती है क्वीन ! फिर वह क्वीन की पहचान लिए घूमती है। रानी अपने उस पड़ोसन के साथ जीवन के नए-नए शेडस सीखती और जीती है। उस के साथ क्लब भी जाने लगती है।

वहां अचानक हिंदी गाने सुनाई पड़ते हैं तो वह विह्वल हो जाती है। हिंदी-हिंदी उच्चारती हुई वह विभोर हो कर नाचने लगती है। इस क्लब में उस को कुछ पुरुष मित्र भी मिलते हैं। रास्तों में चोर-उचक्के भी। पुलिस भी पकड़ती है। तरह-तरह के शेडस भी मिलते हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग उसे अपना लेते हैं और वह भी। पर एक भारतीय परिवार में भी वह जाती है एक दिन। जो उस का परिचित परिवार है। मां के कहने से वह जाती है मिलने। उस परिवार तक भी उस की शादी टूटने की खबर पहुंच चुकी है। और वह लोग उसे देखते ही अनमने हो जाते हैं। पर चलते वक्त उस को विदाई देते वक्त जो परंपरा है कुछ व्यवहार देने की उस में उस परिवार की दकियानूसी भी देखते बनती है। रानी वीडियो चैट से भारत में अपनी मां-पिता और भाई से भी बात करती रहती है। कई बार साथ में उस की पड़ोसन दोस्त भी होती है। उसे देख कर उस के पिता और भाई खुश हो जाते हैं। खास कर उस के उभरे वक्ष और उस के कम कपड़ों के मद्देनज़र। दादी अचानक देखती हैं तो हट जाती हैं यह कहते हुए किे एडल्ट मूवी चल रही है। और जब कभी किसी चैट में पिता और भाई उस औरत को नहीं देखते तो उदास होते हुए विकल हो जाते हैं और पूछते हैं उत्सुकता में कि वह कहां है?

इसी बीच रानी यह शहर छोड़ कर दूसरे शहर जाने लगती है तो वह पड़ोसन दोस्त स्टेशन पर उसे सी आफ़ करने आती है। तो रानी उस से कहती है कि और सब तो ठीक है पर यह जिस-तिस के साथ सेक्स ठीक नहीं है। यह छोड़ दो। खैर अब वह दूसरे शहर आती है तो पता चलता है कि जिस कमरे में उसे ठहरना है उस में तीन पुरुष भी हैं। उन के साथ उसे कमरा शेयर करना है। पहले तो वह बिदकती है पर बजट के मद्देनज़र चुप हो जाती है। तीनो पुरुष तीन देश के। तीनों के मिजाज अलग। और इन के बीच एक अकेली भारतीय मध्यवर्ग की लड़की। शुरुआती हिच और संकट के बाद चारो न सिर्फ़ अच्छे दोस्त बन जाते हैं, दुख-सुख के साथी भी। तमाम भाषाई झमेले और परंपरा आदि के बैरियर के बावजूद। एक दृष्य नहीं भूलता। बाथरुम में अचानक आए एक चूहे से सब के सब न सिर्फ़ एक साथ चीख पड़ते हैं बल्कि एक साथ उस से बचने के लिए शरण भी लेते हैं। चारो साथ-साथ घूमने भी लगते हैं।

अब विजय को पता चलता है कि रानी फ़्रांस में है। वह उसे लगातार फ़ोन पर फ़ोन करता है। वह कभी उठाती है कभी नहीं। वह मिलना चाहता है रानी से। रानी टालती रहती है। और एक दिन अपने रुम मेट्स के साथ घूम कर आती है होटल तो पाती है कि विजय बाहर ही उस की प्रती्क्षा में खड़ा है। वह साथ ले जाना चाहता है। मिलना चाहता है, बतियाना चाहता है। वह अपने फ़ैसले पर पछताता है। माफ़ी मांगता है। रानी सिरे से सब कुछ से इंकार कर देती है। पूरी दृढ़ता से। कहती है इंडिया में ही मिलेंगे। वहीं बात करेंगे। लेकिन बात-बात में विजय उग्र हो जाता है तो उस के रुम मेट विजय पर एक साथ आक्रामक हो जाते हैं। टूट पड़ते हैं। रानी उन्हें रोकती है, समझाती है। तीनो मान जाते हैं। अदभुत दृष्य है। फिर जब विजय पूछता है कि यह सब कौन हैं? तो वह बताती है कि यह सब हमारे साथ रहते हैं। रुम मेट्स हैं। वह बिदकता है और उन सब को हिकारत से देखते हुए पूछता है कि इन सब के साथ रहती हो? वह कहती है हां। विजय असहाय हो कर लौट जाता है।

रानी लौटती है इंडिया। एयरपोर्ट पर मां-पिता. भाई उसे लेने आए हैं। सभी बहुत उत्साहित हैं। खैर रानी को एयरपोर्ट से ले कर चलते हैं माता-पिता। रास्ते में विजय का घर पड़ता है। वह कार चला रहे पिता से कहती है कि वह विजय के घर जाएगी। थोड़ी ना नुकर के बाद वह मान जाते हैं। और उसे विजय के घर छोड़ कर चले जाते हैं। रानी अब विजय के घर में है। अकेली पहुंची है। विजय की मां दरवाज़ा खोलती है। उसे देख कर नकली चहक उस के चेहरे पर आ जाती है। वह रानी से चिकनी-चुपड़ी बातें करने लगती है। कहती आ जाओ, हम लोग मां-बेटी की तरह रहेंगे। रानी कहती है विजय से मिलना है। वह विजय को बुलाती है। विजय आता है तो रानी से गले मिलता है। रानी ऐतराज नहीं करती। पर गले मिलने के बाद सगाई की अंगूठी चुपचाप उस की हथेली पर रख देती है। मां-बेटे अवाक देखते ही रह जाते हैं। नि:शब्द ! उन के चेहरे पर इतने जूते हैं कि गिने नहीं जा सकते। और रानी चुपचाप उन के घर से सड़क पर निकल आती है। और कदम बढ़ाते हुए ऐसे चलती है खुश-खुश कि उस के चेहरे पर रानी होने, क्वीन होने का एहसास, इस की इबारत साफ-साफ पढ़ने में आ जाती है। बिना किसी संवाद के। क्वीन फ़िल्म की सारी कामयाबी इसी एक अंदाज़ में है। बस एक कमी रह गई जो कई बार दर्शक को भी भाषाई बैरियर पर ला खड़ी कर देती है। अगर फ़्रेंच और अंगरेजी में बोले गए संवाद को वायस ओवर कर क्र हिंदी में कर दिया गया होता तो ज़्यादा बेहतर होता। क्यों कि कई चीज़ें सर से ऊपर निकल जाती हैं, भाषाई बैरियर के नाते। और कि अगर इस का गीत-संगीत भी मीठा और कर्णप्रिय होता तो क्या बात होती !

एक समय वंस अपान ए टाइम इन मुंबई में कंगना रानावत को देख कर लगा था कि हिंदी सिनेमा में वह एक नई संभावना हैं। क्वीन में रानी की भूमिका में उन्हें देख कर लगा कि अब वह अभिनय के और भी कई प्रतिमान गढ़ेंगी। रानी को जिस तरह अपने अभिनय में कंगना रानावत ने जिया है, जिस सादगी और सरलता से रानी की तड़प, उस के अपमान, उस के जीवन, उस के तनाव, संत्रास और बदलती स्त्री के मानस को बिना चीखे-चिल्लाए परदे पर परोसा है वह अविरल ही नहीं, दुर्लभ भी है। कहूं कि अप्रतिम है। जाहिर है अनुराग कश्यप की इस फ़िल्म में विकास बहल की कहानी, उन का निर्देशन और उन की पूरी टीम का काम भी इसी लय में है और कि सैल्यूटिंग भी। काश कि इस फ़िल्म के संवाद, गीत और संगीत पर भी यही ध्यान गया होता तो क्या बात होती। और तकलीफ़देह यह कि स्त्री विमर्श वाली इन सभी फ़िल्मों का गीत और संगीत पक्ष बहुत ही रद्दी और बेसुरा है।

खैर साजिद नाडियावाला की इम्तयाज अली लिखित और निर्देशित हाईवे भी स्त्री मुक्ति की ही कहानी है। पर इस का ट्रीटमेंट और कथ्य बिलकुल अलग है। महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट ने इस फ़िल्म में वीरा त्रिपाठी नाम की लड़की के चरित्र को जिस मासूमियत और तल्खी से  परदे पर परोसा है और जिस तरह अभिनय की चादर को पूरी मासूमियत के साथ बुना है, वह भी देखने लायक है। हालां कि यह फ़िल्म उतनी कसी हुई नहीं है, जितनी कि इसे होनी चाहिए थी और कि इस में बहुत सारे उबाऊ प्रसंग भी हैं, बावजूद इस के यह फ़िल्म उल्लेखनीेय है। और कि इस के कई सारे दृष्य भाऊकता में सराबोर हैं। बताइए कि खुली हवा में सांस लेने निकली एक लड़की अपने एक दोस्त के साथ हाइवे पर है। घर में  किसी शादी की तैयारियां हैं और वह घर से ऊब कर हवाखोरी के लिए बाहर निकली है। रास्ते में वह अपने दोस्त से कहती है कि कहीं पहाड़ पर चलना। तुम भेड़ बकरियां चराना, मैं तुम्हारे लिए खाना पकाऊंगी ! वह ऐसे बोलती है जैसे कि यह कितना अमूल्य सपना हो उस का। वह अचानक एक पेट्रोल पंप पर कार से बाहर निकल कर खड़ी है और कह रही है कि ऐसी खुली हवा ही तो चाहती हूं। उस का दोस्त कहता भी है कि अंदर आओ! बाहर मत इस तरह खड़ी रहो! पर वह है कि अपनी ही धुन में है। कि अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच उस का अपहरण हो जाता है। उस का कायर दोस्त खामोश यह सब देखता रहता है। हलका प्रतिवाद तो छोड़िए वह कार से बाहर भी नहीं निकलता।

अब उस का अपहरण करने वाला अपने गैंग के बास के पास ले कर उसे जाता है। तमाम रास्ते और कारें बदलता हुआ। लेकिन गैंग का बास लड़की की शिनाख्त होते ही भड़क जाता है। कहता है त्रिपाठी की लड़की लाए हो ! जानते हो उस को? हम सब को बरबाद कर देगा। बहुत बड़ा आदमी है। कितना बड़ा नेता है। लेकिन महावीर भाटी हार नहीं मानता और कि गैंग के बास की ऐसी-तैसी करते हुए वीरा त्रिपाठी को अपने साथियों के साथ ले कर निकल जाता है। हर कोई महावीर भाटी को आगाह करता है लेकिन वह मानता नहीं। अड्डे पर अड्डा बदलता भागता फिरता है। तरह-तरह की जगहें, तरह-तरह के लोग ! जीवन जैसे हाईवे पर ही गुज़रने लगता है। उस का एक साथी वीरा त्रिपाठी की मदद के बहाने उस लाइन मारते हुए उसे जब-तब छूता रहता है। एक दिन उस से बलात्कार की कोशिश पर आमादा हो जाता है तो महावीर भाटी न सिर्फ़ वीरा को बचाता है बल्कि साथी को पीटता भी है और आगाह करता है कि आइंदा यह नहीं हो। वीरा लगातार भागने की फ़िराक में होती है पर भाग नहीं पाती। एक दिन असफल कोशिश में पकड़ जाती है। आजिज आ कर महावीर भाटी उसे मुक्त कर देता है कि जा भाग जा। पर वह भागते=भागते भी भाग नहीं पाती। लौट आती है। अपहरणकर्ता के पास। फिर ऐसा भी समय आता है कि वह् भागना नहीं चाहती। अतिशय सुविधाओं में जीने वाली यह लड़की अब असुविधा में जीने की कायल हो जाती है। क्यों कि उसे खुली हवा मिल गई है। घर के घुटन से मुक्ति मिल गई है। अपने अपहरणकर्ता के साथ ही वह घूमते रहना चाहती है। घर से ऊबी हुई यह लड़की टुकड़ों-टुकड़ों में अपनी यातना-कथा बांचने लगती है महेंद्र भाटी से।

वह बताती है कि कैसे बचपन ही से घर में ही उस का यौन शोषण निरंतर होता आ रहा है। मां से बताया तो वह भी चुप रहने की सलाह देने लगीं। क्यों कि वीरा का बचपन से ही यौन शोषण करने वाला आदमी शुक्ला उस के घर आता-जाता रहता है और कि काफी रसूखदार आदमी है। कई सारे मोड़ और व्यौरे में जाती यह फ़िल्म और भी कई सारे  व्यौरे बांचती है। पर मूल यातना घरेलू यौन शोषण ही है। जिस से घबरा कर वह घर नहीं लौटना चाहती। भाटी के साथ ही घूमते रहना चाहती है। ट्रक की सवारी है और हाइवे है। एक जगह पुलिस चेकिंग में वह खुद छुप जाती है ट्रक में। यह दृष्य बहुत सुंदर बन पड़ा है। एक और दृष्य है जिस में वह एक सुनसान जगह नेचुरल काल के फेर में किसी ओट में चली जाती है। भाटी परेशान है। और जहां वह है उधर उस के जाते ही वह डांट देती है, पीछे मुड़ जाओ ! भाटी के बचपन की याद और उस की मां का हिस्सा भी बेहद सुंदर है। पर फ़िल्म को जिस तरह संभालना चाहिए था निर्देशक इम्तयाज अली को, वह संभाल नहीं पाए है। खास कर फ़िल्म के अंतिम हिस्से में जब पुलिस भाटी को मार कर वीरा को छुड़ा लेती है और वह घर आ कर समूचे परिवार की उपस्थिति में शुक्ला के बलात्कारी चेहरे से नकाब उतार देती है सार्वजनिक रुप से। यह पूरा दृष्य इतना हलका हो गया है कि फ़िल्म भहरा जाती है। हालां कि फ़िल्म जिस नोट पर खत्म होती है वह ज़रुर फ़िल्म को संभालती है। वीरा सब कुछ के बाद फिर से घर से निकल कर हाईवे पर आती है उसी जगह जिधर से उसे भाटी ले कर गया था। वह उस हाईवे पर उतर कर महावीर, महावीर गुहारते हुए उस की याद में रो पड़ती है। नहीं वीरा यहां महावीर भाटी के प्रेम में नहीं है, उस के साथ के सुरक्षाबोध में है।  वह सुरक्षा जो वह घर में नहीं पा सकी कभी। यही कहानी का मुख्य प्रस्थान बिंदु भी है।

वीरा त्रिपाठी की भूमिका में आलिया भट्ट तो आपने अभिनय की आंच देती ही हैं, महावीर भाटी की भूमिका में रणदीप हुड्डा भी आलिया के मुकाबले अभिनय में बीस हैं। बिना लाऊड हुए ही वह अपने अभिनय का जो पाग इस फ़िल्म में पग-पग बांचते हैं, वह उन की बलैया लेने के लिए काफी है। बस काश कि पटकथा और निर्देशन ने भी इन दोनों का अगर साथ दिया होता तो फ़िल्म भी उन्नीस नहीं, बीस हो गई होती जो कि होते-होते रह गई। फिर भी समूची फ़िल्म हिंदी सिनेमा में बदलती हुई स्त्री की आहट की भरपूर दस्तक तो दे ही देती है।

करन जौहर की विनील मैथ्यू निर्देशित हंसी तो फंसी फ़िल्म एक नज़र में न तो उतनी कसी हुई है न ही वह धार है, न कोई दिशा। पर हिंदी सिनेमा में, घर में बदलती स्त्री और उस के विद्रोह की दस्तक और उस के विद्रोह की गूंज इस फ़िल्म में भी साफ सुनाई देती है। परिणिति चोपड़ा मीता की भूमिका में घर की एक विद्रोहिणी बेटी की भूमिका में हैं। मीता विद्रोह करते-करते एक गहरे अवसाद में कैसे तो घिर जाती है पर अपने कैरियर का लक्ष्य वह फिर भी नहीं भूलती। यह फ़िल्म अपनी फ़िल्मोग्राफ़ी में है तो बहुत औसत दर्जे की और कई बार वह बोझिल और बोर करने की हद तक चली जाती है। इतना कि कई-कई बार लगता है कि हाय , यह फ़िल्म क्यों देख रहा हूं। कई सारे बेतुके प्रसंग, बेहूदे दृष्य इस फ़िल्म को पूरी तरह चाटू बना देते हैं तो इस लिए कि हर्षवर्धन कुलकर्णी की कहानी ही बेसिर पर की है। निर्देशन और लचर। बस तुक्के में ही यह फ़िल्म फिसलती जाती है तो फिसलती ही जाती है। और दर्शक की हालत भी फ़िल्म के नाम अनुरुप हंसी तो फंसी के सलीब पर फंसने वाले जैसी हो जाती है। बावजूद इस सब के हिंदी सिनेमा में औरत की बदलती इबारत को इस फ़िल्म में भी साफ पढ़ा जा सकता है।

आदित्य चोपड़ा की महेश शर्मा निर्देशित फ़िल्म शुद्ध देसी रोमांस भी हिंदी सिनेमा में बदलती औरत का मिजाज बताती है। एक खिलंदड़ भाव फ़िल्म के हर फ़्रेम में उपस्थित है। पर पूरी फ़िल्म अगर टिकी है तो ऋषि कपूर के कंधे पर। बाकी फ़िल्म तो लिव-इन- रिलेशनशिप की डोर में बंधी पतंग की तरह है। जो जब मन करता है उड़ने लगती है, जब मन करता है कट कर ज़मीन पर आ गिरती है। इस फ़िल्म में ऋषि कपूर अगर न हों तो किसी कच्ची दीवार की तरह भरभरा कर सेकेंड भर में गिर जाए। फिर भी इस फ़िल्म में औरत करवट बदल रही है। और बहुत ही दिलचस्प ढंग से। इसी लिए यह फ़िल्म भी मानीखेज हो जाती है। न सिर्फ़ मानीखेज बल्कि स्त्री के विद्रोह, उस की बगावत के इबारत तो दर्ज करती ही है, पुरुष सत्ता पर एक गहरी चोट भी करती है यह फ़िल्म।  ऋषि कपूर इस फ़िल्म में गोयल की भूमिका में हैं। जो हैं तो पान के दुकानदार पर शादी व्याह के तमाम इंतज़ाम भी करने का ठेका लेते रहते हैं। न सिर्फ़ तमाम इंतजाम बल्कि रिश्तेदारों तक का प्रबंध वह सुविधा के हिसाब से करवाते रहते हैं। वह रघुराम की शादी की व्यवस्था तो करवाते ही हैं, उस के लिए किराए की बहन की व्यवस्था भी करवाते हैं। इस बहन गायत्री की ही भूमिका यहां परिणिति चोपणा ने की है। वह बारात वाली बस में दुल्हे के साथ बैठती भी हैं। बारात पहुंचती है और व्याह के ऐन समय पर दुल्हा रघुराम जिस की भूमिका सुशांत सिंह राजपूत ने की है, बाथरूम जाने के बहाने शादी छोड़ कर भाग लेता है। गायत्री के फेर में। वापस आ कर उस से गायत्री टकरा भी जाती है। वह गायत्री के ही साथ रहने लगता है। लिव-इन में।

खुल्लमखुल्ला। चर्चा का केंद्र है अब वह मुहल्ले में। खैर, बाद में जिस दुल्हन को वह छोड़ कर भागा होता है तारा यानी वानी कपूर को , वह मिल जाती है जयपुर में उसे। अब वह फिर उस के फेरे में पड़ जाता है। कहानी उलटते-पलटती फिर उस की शादी तक पहुंचती है। अब की बार भी सारा इंतजाम ऋषि कपूर के भरोसे है। पर अब की ऋषि कपूर चौकन्ने हैं पूरी तरह और पूरी चाक-चौबंद व्यवस्था किए हुए हैं कि दुल्हा भागने न पाए। बाथरुम पर खास चौकसी है। पर अब की बाथरुम के बहाने दुल्हन गायत्री भाग जाती है। हासिल यह कि अगर दुल्हा भाग सकता है तो दुल्हन भी कोई कम नहीं है। वह भी नहले पर दहला दे सकती है इस पुरुष सत्ता को। वह भी अपनी मनमानी का जूता मार सकती है पुरुष को और कि अपना जीवन अपने ढंग से जी सकती है। अगर कोई पुरुष उस की ज़िंदगी से खेल सकता है, उस का अपमान कर सकता है तो वह भी उसे हरगिज-हरगिज छोड़ने वाली है नहीं। ईंट का जवाब पत्थर से देना वह भी सीख रही है। भले सिनेमा के रुपहले परदे पर ही सही।

इस बीच एक फ़िल्म और आई है इसी स्त्री के बदलते रुप रंग को ले कर। अनुभव सिनहा की गुलाब गैंग। सौमिक सेन द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म हालां कि समूची मसाला फ़िल्म है और कि माधुरी दीक्षित और जूही चावला जैसी अभिनेत्रियां आमने-सामने हैं। पर है यह फ़िल्म भी हिंदी फ़िल्मों में बदलती औरतों की दास्तान लिए ही। यह फ़िल्म यह भी बताती है कि माफ़ियागिरी और दबंगई में भी स्त्रियां पुरुषों से किसी भी मायने में पीछे नहीं हैं। जूही चावला का शेड इस फ़िल्म में बिलकुल अलग शेड लिए हुए हैं। एक महिला राजनितिज्ञ-माफ़िया का चरित्र उन्हों न सिर्फ़ पूरी ताकत से जिया है बल्कि कुछ बोल्ड संवाद भी उन के हिस्से हैं। जूही चावला और उन की सरल मुसकुराहट किसी खलनायिका की भी हो सकती है यह वह बता देती हैं अपने अभिनय को उस के अंगार में लपेट कर। माधुरी दीक्षित भी गुलाब की भूमिका में किसी दबंग महिला को इस तरह जीती हुई यह इबारत लिख देती हैं कि दबंगई और हिंसा पर पुरुषों का कोई एकाधिकार नहीं है। डेढ इश्किया में भी माधुरी ने लगभग यही इबारत बांचते हुए पुरुष सत्ता को चुनौती भरा अभिनय परोसा था।

गरज यह कि हिंदी सिनेमा में औरत न सिर्फ़ बदल रही है, अपनी भूमिका बदल रही है बल्कि पुरुष सत्ता को जहां-तहां चुनौती देती हुई अपनी उपस्थिति निरंतर दर्ज कर रही है। तो क्या हिंदी सिनेमा में औरतों की इस बदलती तसवीर को क्या समाज का सच भी नहीं मान लिया जाना चाहिए? एक समय कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है। पर जाने-अनजाने साहित्य आज की तारीख में समाज में अपनी उपयोगिता और आवाज़ दोनों ही को बुरी तरह खोता जा रहा है। अब इस नए अर्थ में अगर मुझे यह कहने की इजाजत दी जाए तो मैं कहना चाहता हूं कि सिनेमा भी समाज का दर्पण है। और जो इस दर्पण को हम ठीक से देखें तो पाते हैं कि स्त्री हमारे सिनेमा ही नहीं, समाज में भी बदल रही है। लगातार बदल रही है और कि पुरुष सत्ता को निरंतर चुनौती दे रही है। यह सिलसिला थमने वाला है नहीं। तब तक जब तक पुरुष सत्ता को यह स्त्री मटियामेट कर ध्वस्त नहीं कर देती।

मुझे लगता है यह कहीं अब बहुत ज़रुरी भी हो गया है। स्त्री के इस बदलाव की पदचाप सिर्फ़ हिंदी सिनेमा में ही नहीं, समाज और घर में ही नहीं, फ़ेसबुक आदि तमाम अन्य माध्यमों पर भी निरंतर दर्ज की जा सकती है और कि इस की गूंज भी साफ-साफ सुनी जा सकती है। यकीन न हो तो फ़ेसबुक पर ही दर्ज तमाम-तमाम कविताएं, टिप्पणियां देखी जा सकती हैं। जहां स्त्रियां अपने पंख खोल कर न सिर्फ़ उड़ पड़ी हैं बल्कि अपनी बात भी खुल कर ऐसे कह रही हैं गोया उन्हें पहली ही बार खुली हवा और खुली सांस मिली है, इस का एहसास भी वह न सिर्फ़ कर रही हैं बल्कि खुल कर करवा रही हैं। इन्हीं तमाम कविताओं और टिप्पणियों में से  अर्चना राज़ की एक कविता पर गौर कीजिए और जानिए कि स्त्री क्या चाहती है? और यह भी कि अब बहुत दिनों तक उस की इस आवाज़ को अनसुना कर पाना पुरुष सत्ता के लिए मुश्किल ही नहीं असंभव है। स्त्री अब सिर्फ़ संभावना ही नहीं, सुलगता संसार भी है। अभी वह अकेले हनीमून मनाने जा रही है। आने वाले दिनों में वह संतान भी अकेले पैदा कर लेगी। विज्ञान यह सुविधा अगर अन्य जीवों को दे चुका है तो स्त्री भी कब तक इस सुविधा को नज़रंदाज़ करेगी? पुरुषवादी सोच नहीं बदलती तो न बदले, अपनी बला से, स्त्रियां तो बदल रही हैं। स्त्री अब सिर्फ़ स्त्री नहीं, व्यक्ति और व्यक्तित्व बनना चाहती है। इस अर्थ में अर्चना राज़ की यह कविता यहां गौरतलब है, जो उन के फ़ेसबुक की वाल पर दर्ज है:

आ गया है वक्त अब ऐलान का
कि मै नहीं स्त्री हूँ केवल
व्यक्ति भी हूँ
व्यक्ति ही हूँ,

अब जिउंगी श्वांस भर
तृप्तता के छोर तक
भीग जाए जब मेरा मन
और तन,

मै नहीं मोहताज़ अब ज़र्रे बराबर
मै हवा हूँ
मै खुशी हूँ
मै ही हूँ संतोष भी,

है मुझे खुद ही बहकना और संभलना
मै ही कोठा
मै ही मंदिर
मै ही हूँ अब धर्म भी,

मै करूंगी अब नियत खुद को खुदी से
मै अभय हूँ
मै ही जय हूँ
मै ही हूँ उद्घोष भी,

अब करो स्वीकार तुम कि वक्त है ऐलान का
मै नहीं स्त्री हूँ केवल
व्यक्ति हूँ
व्यक्तित्व हूँ !!

दनपा
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

आखिर कौन है वह जो सहारा के लाखों साथियों की रोटी से खेल रहा है?

'न्याय को अंधा कहा गया है। मैं समझता हूँ न्याय अंधा नहीं, काना है, एक ही तरफ देखता है' -हरिशंकर परसाई।…….. सहारा और सेबी के मामले में सहाराश्री की गिरफ़्तारी के बाबत हरिशंकर परसाई की यह बात कई बार मान लेने को जी करता है। क्यों कि सुप्रीम कोर्ट सारी बातें, सारी दलीलें सिर्फ़ सेबी की ही सुन पा रहा है, देख पा रहा है।

सहारा की दलीलों, फ़रियादों और तथ्यों को सुनने का अवकाश कहिए, समय कहिए, मन कहिए, आंख कहिए वह फ़िलहाल अनुपस्थित है सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में। सब कुछ और सारा कुछ एकतरफा और एकांगी है। एक ज़िद है जिसे जेन्विन बना कर न्याय की कुछ मूर्तियों ने हरिशंकर परसाई की बात को बेबात प्रमाणित करने की कसम खा ली है।

हालां कि सुप्रीम कोर्ट ने ही एक फ़ैसले में कहा था कि कानून दयाहीन या हृदयहीन नहीं होता। यह बात जस्टिस तरुण चटर्जी जस्टिस एच.एल दयालु ने कर्नाटक के एक प्राइमरी स्कूल की एक अध्यापिका डी एम प्रेम कुमारी के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था। तो यही कानून और सुप्रीम कोर्ट सहारा के मामले में इस कदर दयाहीन और हृदयहीन क्यों हो गया है? बताइए कि सेबी जिस पैसे को सहारा पर देने का निरंतर दबाव डाल रही है बरास्ता सुप्रीम कोर्ट वह पैसा सहारा आलरेडी दे चुका है। सहारा के सारे खाते सीज हैं, सारी संपत्तियों के कागजात सेबी ने जमा करवा लिए हैं और दलील है कि सहारा सारा पैसा फिर से दे दे। अजब है यह भी। आप किसी पक्षी के पंख काट कर उसे थमा दें और कहें कि उड़ो ! और न उड़ पाएं तो कहें कि अरे, पहले तो खूब उड़ते थे। अब क्या हो गया? उड़ो और खूब उड़ो ! रमानाथ अवस्थी का एक गीत याद आता है :

मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता ।

सेबी और सुप्रीम कोर्ट की बिसात पर सहारा को यह गाना पड़ रहा है। और इन तमाम मुश्किलों के बावजूद सहारा उड़ने को तैयार होता है। लेकिन उसे तो जगह-जगह से रोक लिया जाता है। बुद्धिनाथ मिश्र लिखते हैं :

कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हों।

तो सहारा और सहाराश्री की परछाई भी जैसे सेबी बांध लेना चाहती है। एक सत्ता की इतनी बंदिश भी होती है भला? जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ए के गांगुली एक मामले की सुनवाई कर रहे थे। दोनों की राय जुदा-जुदा हो गई थी उस मामले में। जस्टिस काटजू ने कहा कि कानून को सत्ता के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का कड़ाई से पालन करना चाहिए। जब कि जस्टिस गांगुली की राय थी कि सत्ता का पूरी तरह विकेंद्रीकरण कानून के लिए न व्यावहारिक है, न ही न्याय पालिका बनाने वालों की मंशा के मुताबिक। लेकिन एक दूसरे मामले में जस्टिस गांगुली की राय थी कि उच्च न्यायलय कोई आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र तो है पर यह आदेश या उस का कोई क्लाज किसी कानून के खिलाफ़ नहीं होना चाहिए।

लेकिन सहारा के मामले में क्या हो रहा है? और निरंतर हो रहा है।

सहारा के वकील लगातार दलील दे रहे हैं कि सहाराश्री की गिरफ़्तारी अवैध है। सुप्रीम कोर्ट यह बात निरंतर स्वीकार भी कर रहा है पर उसी सांस में यह भी गुहरा रहा है कि हम ने तो सिर्फ़ हिरासत में ले रखा है। सज़ा कहां दी है? कैद कहां किया है? बताइए कि भला ऐसे भी हिरासत होती है? बिना किस सज़ा के? ज़िक ज़रुरी है कि सुप्रीम कोर्ट यह बात भी लगातार दुहराता जा रहा है कि सज़ा तो अभी हमने कोई दी भी नहीं है। और कि इस बिंदु पर बाद में सुनवाई होगी।

यह क्या है?

इस चुनावी शोर में आखिर कौन सुनेगा इस बिंदु पर भी?

आखिर सत्ता की वह कौन सी धुरी है जो न्याय की नैसर्गिकता पर भी फन काढ़े बैठी है? क्या धूमिल ने इ्न्हीं स्थितियों के मद्देनज़र लिखा है :

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

आखिर कौन है वह जो सहारा के लाखों साथियों की रोटी से खेल रहा है? इस की शिनाख्त क्या बाकी है? सब लोग जानते हैं। जाने क्यों सुप्रीम कोर्ट इस का संज्ञान लेने से निरंतर परहेज बरत रहा है।

और जो कोई सहारा के लाखो साथियों की रोटी से खेल रहा है तो यह क्या न्यायिक व्यवस्था कहिए, कानून का राज कहिए का सीधा-सीधा मखौल नहीं कहा जाएगा?

संविधान के अनुच्छेद संख्या 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की ही यह व्यवस्था है कि उच्च न्याय तंत्र अपने अधिकारों का उपयोग केवल उन ही स्थितियों में कर सकता है जहां मौजूदा कानून व्यवस्था असफल हो जाए। इस अनुच्छेद में साफ तौर पर दर्ज है कि न्यायालय को सिर्फ़ मौजूदा कानून के तहत ही काम करना है, न कि नया कानून बना कर कोई आदेश या नया रास्ता खोलना। इस बात को एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस आफ़ताब आलम और जस्टिस बी एस चौहान ने दर्ज भी किया था और कहा था कि न्यायालय यह काम सिर्फ़ मौलिक अधिकार के अंतर्गत ही कर सकती है।

हमारे देश में ही क्या दुनिया भर में नैसर्गिक न्याय का एक तकाज़ा यह भी होता ही है कि किसी निरपराध को सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। सहारा के मामले में यह चूक भी निरंतर हो रही है कि सहारा का पक्ष सुने बिना ही सब कुछ एकतरफा ही तय होता जा रहा है। तब जब कि न तो सहारा कंपनी भगोड़ी है, न सहाराश्री भगोड़े हैं। और कि यह सारा कुछ नैसर्गिक न्याय की भावना के विपरीत है। उस का हनन है। शायद ऐसे ही मामले देखते हुए कैलाश गौतम लिखते हैं :

कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है।

बल्कि कैलाश गौतम तो कचहरी को ले कर बहुत ही तल्ख हैं। उन की यह पूरी कविता यहां पढ़ें और फिर जानें कि हमारी अदालतें कैसे काम करती हैं? निचली-ऊपरी सारी अदालतें अब एक जैसी हैं। सहारा और सहाराश्री का जब यह हाल है तो बिचारा आम आदमी कैसे तो पिस जाता है इस न्याय तंत्र में और कुछ कह भी नहीं पाता। क्या यह न्याय व्यवस्था प्रासंगिक रह गई है? खैर यह एक बड़ा और बहस-तलब विषय है। इस विषय पर फिर कभी। अभी तो कैलाश गौतम की कचहरी पर यह मार्मिक कविता पढ़ें और इस की चक्की में एक आदमी कैसे तो पिस जाता है कचहरी के जाल में उस यातना और उस यातना के ताप को महसूस कीजिए :

कचहरी न जाना / कैलाश गौतम

भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना

कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है

कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे

कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चुमतें है

कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे

कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे

लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है

कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुहं घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी

मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है

मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया -बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया

धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा

कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना

कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी

दनपा
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

नए जमाने का एनबीटी सपा का मुखपत्र बनने की राह पर!

युवाओं की बातें कहने और सुनने का लक्ष्‍य लेकर लखनऊ की सरजमीं पर दूसरी बार उतरा नवभारत टाइम्‍स अपना पुराना इतिहास दोहराने की राह पर बढ़ चला है. युवाओं की टीम और युवा संपादक के बीच 'जागरण सोच' नए जमाने के नए अखबार पर भारी पड़ रहा है. फैंटेसी के साथ लखनऊ की में कदम रखने वाला एनबीटी अब पुराने सनातनी अखबार की तरफ बढ़ चला है. अब इसमें ना तो नयापन नजर आ रहा है और ना ही तेवर. स्‍कीम खतम होने के बाद सर्कुलेशन भी बुरी तरह गिर चुका है.

सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि इस अखबार में 'मिश्रित' टीम खड़ा करने वाले संपादक सुधीर मिश्रा की दिलचस्‍पी कम हो गई है. वो ऑफिस में भी कम समय दे रहे हैं. उनकी दिलचस्‍पी कम होने से अखबार की विस्‍तारित समुद्री सोच सूखी 'नदी' में सिमटती चली जा रही है. सुधीर की कम दिलचस्‍पी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चुनावी माहौल में वो एक सप्‍ताह की छुट्टी पर घूमने के लिए राजस्‍थान चले गए. मीटिंग में भी अब उनकी बहुत चलती नहीं दिख रही है. हालांकि इसके कारणों को लेकर अखबार में अंदरखाने दो तरह की चर्चा हो रही है. चर्चा का एक छोर सुधीर के किसी दूसरे राह पर जाने की तरफ इशारा करता है तो दूसरा छोर नदीम को प्रमुखता मिलने की चुगली करता है.

मीटिंग के दौरान भी सुधीर बहुत इंटरेस्‍ट नहीं ले रहे हैं. प्रेम शंकर मिश्र, सूर्य कुमार शुक्‍ला समेत तमाम तेजतर्रार रिपोर्टर जब मीटिंग में खबरों को लेकर नई सोच और विजन प्रस्‍तुत करते हैं तो सुधीर की मौजूदगी में ही नदीम सभी को खारिज कर देते हैं. इन जैसे तमाम रिपोर्टर निराश हैं. वे खुद ना तो नया विजन रिपोर्टरों को बताते हैं और ना ही खुद करते हैं. उनकी सोच वहीं दैनिक जागरण की बंधु‍आगिरी कार्यप्रणाली की तरह ही कुंठित सी लगती है. पुराने अंदाज में खबरों का प्रजेंटशन एनबीटी की नई और कारपोरेट सोच से मेल नहीं खा रहा है, अखबार का कंटेंट लगातार पिट रहा है. सर्कुलेशन भी लगातार कम हो रहा है. हां, कार्यालय की पार्टियों के दौरान नदीम मुलायम सिंह यादव और सपा से अपनी नजदीकियों की जिक्र करना नहीं भूलते. यहां तक कि मुलायम सिंह यादव की नकल करते हुए खूब मिमिक्री भी करते हैं.

सूत्रों का कहना है कि इतना ही नहीं नदीम यह भी बताते हैं कि वे समाजवादी छात्र सभा के पहले प्रदेश अध्‍यक्ष रहे हैं तथा जूनियर लाइब्रेरियन के चुनाव के लिए मुलायम सिंह ने उन्‍हें दस हजार रुपए दिए थे. इतना ही नहीं संपादक भले ही सुधीर मिश्र हों, लेकिन सपा और सीएम ऑफिस से सारा कनवरसेशन नदीम से ही होता है. सरकार के लिए एनबीटी मतलब नदीम हो चुका है. कहा जा रहा है कि नदीम ने इसी एहसान का बदला चुकाने के लिए एनबीटी को सपा का मुख पत्र बताने पर तुल गए हैं. सरकार या सपा विरोधी खबरें रोक ली जाती हैं या फिर कांट-छांट कर प्रकाशित की जाती है. नदीम के इस रवैये से रिपोर्टर भी नाराज हैं. उनके अंदर कुंठा लगातार बनी हुई है. सूत्र बताते हैं कि अखबार के शुरुआत में जो खुला माहौल था, अब उस पर तनाव तारी हो चुका है. (कानाफूसी)

पत्रकार सरताज से लूट के मामले में पांच के खिलाफ मुकदमा

गाजियाबाद ज़िले में एक पत्रकार के साथ अभद्रता व बदतमीजी करने और कैमरा छीनने के मामले में पुलिस ने पांच आरोपियों के विरुद्ध लूट का मुकदमा दर्ज़ किया है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. अभी तक कोई भी आरोपी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया है. पत्रकार के साथ यह घटना बीते 16 अप्रैल को घटित हुई थी.

16 अप्रैल को एक युवक ने विधायक जाकिर अली के ऑफ़िस का शीशा तोड़ दिया था, जिसमें युवक घायल हो गया था. एक दैनिक अख़बार का पत्रकार सरताज मौके पर घायल युवक की फ़ोटो खींच रहा था. आरोप है कि तभी विधायक के सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकार के साथ बदतमीज़ी की और कैमरा छीन लिया. पत्रकार ने पांच आरोपियों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कराने के लिए थाने में तहरीर दी थी.

पुलिस कई दिन जांच के नाम पर मामला टालती रही, लेकिन शनिवार को उसे मुकदमा दर्ज करना पड़ा. थाना प्रभारी गोरखनाथ यादव का कहना है कि पांच अज्ञात हमलावरों के ख़िलाफ़ लूट का मामला दर्ज किया गया है. जांच के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी.

सीरिया में अपहृत चारों फ्रांसिसी पत्रकार आजाद

सीरिया में एक साल से क़ैद फ़्रांस के चार पत्रकारों को आज़ाद कर दिया गया है. फ़्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने शनिवार को यह जानकारी दी. एक बयान में ओलांद ने कहा, "आज सुबह बहुत राहत के साथ यह पता चला कि चारों फ़्रांसिसी पत्रकारों को आज़ाद कर दिया गया है." बयान के मुताबिक़ रिहा किए गए पत्रकार एडवर्ड एलियास, डिडियर फ्रांसुआ, निकोलस हेनिन और पिएरे टोर्रेस की सेहत अच्छी है. चारों पत्रकारों को जून 2013 में सीरिया में अपहृत किया गया था.

तुर्की के सैनिकों ने सीरियाई सीमा के नज़दीक चारों पत्रकारों को आँखों पर पट्टी और हाथ बंधी हालत में पाया. ओलांद के मुताबिक़ चारों पत्रकार जल्द ही फ्रांस पहुँच जाएंगे. सीरिया में गृहयुद्ध चल रहा है और यह पत्रकारों के लिए सबसे ख़तरनाक जगह बन गया है. तीन साल पहले राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू होने के बाद से अब तक 60 से ज़्यादा पत्रकार सीरिया में अपनी जान गँवा चुके हैं. (बीबीसी)

लखनऊ में चुनावी और दल्‍ले पत्रकारों ने बढ़ाई पत्रकारिता की हरियाली

लखनऊ में तमाम राजनीतिक दलों के मीडिया सेल देखने वाले परेशान हैं. परेशानी का कारण खबरों का छपना या खिलाफ खबरें छपना नहीं बल्कि चुनावी पत्रकारों की भरमार है. दूसरे दल्‍ले पत्रकार इन लोगों के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं. लखनऊ में आजकल अचानक पत्रकारों की भारी बाढ़ आ गई है. ऐसा लगने लगा है जैसे पत्रकारों का सैलाब ही लखनऊ की सरजमीं पर बह कर आ गया हो.

चुनाव आने के बाद से ही लखनऊ के पत्रकारिता के मौसम में कोपलें फूटने लगी थीं, लेकिन पहले चरण का नामांकन शुरु होने के बाद तो बस पत्रकारिता की हरियाली छा गई है. जिधर देखो उधर पत्रकार. सपा में अगर किसी की प्रेस कांफ्रेंस होती हैं तो पहली लाइन में दल्‍ले टाइप के पत्रकारों का कब्‍जा होता है, जो लिखते पढ़ते तो कहीं नहीं हैं, लेकिन सवाल पूछकर नेताजी, सीएम, शिवपाल की नजर में जरूर आ जाते हैं. और भगवान कसम, सबसे ज्‍यादा सवाल यही पूछते हैं. नेता भी समझता है कि बड़ा सवाली पत्रकार है. बाद में ये लोग उनसे दो-चार ट्रांसफर-पोस्टिंग कराकर साल भर की आमदनी पूरी कर लेते हैं.

लखनऊ में भोजन के लिए जूझते चुनावी पत्रकार

दल्‍लों के बाद नंबर आता है चुनावी पत्रकारों का. चुनाव के मौसम में अवतरित होने वाले ये पत्रकार साल भर मेढकों की तरह कहीं सुसुप्‍ता अवस्‍था में पड़े होते हैं, लेकिन चुनावी बरसात का मौसम देख अचानक टर्राने लगते हैं. जहां देखो वहीं इनकी भीड़ नजर आती है. सपा-बसपा वाले इनको ज्‍यादा भाव नहीं देते लिहाजा ये औकात में बने रहे हैं, लेकिन कांग्रेस और भाजपा में इन पत्रकारों की तूती बोलती है. मजाल है कि इन दोनों दलों का मीडिया सेल देखने वाले प्रभारी किसी दल्‍ले या चुनावी पत्रकार को कुछ बोल सके. सबसे ज्‍यादा बवाल यही काटते हैं.

हां, इन सब के बीच सबसे बुरी स्थिति उन पत्रकारों की होती है, जो सच में कहीं लिखते पढ़ते हैं. ये बेचारे दल्‍लों और चुनावी पत्रकारों की भीड़ से पिछड़कर चुपचाप बैठे रहते हैं. ताजा वाकया भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह के पत्रकार वार्ता का है. पत्रकार वार्ता के अलावा लंच का भी कार्यक्रम था. मीडिया सेल के लोगों ने चुनिंदा पत्रकारों को इसकी सूचना दी कि 'पीसी फालोड बाई लंच'. बस क्‍या था सूचना लिक हो गई और चुनावी पत्रकार 'बाई के झोंक' में 'फालोड बाई लंच' करने आ पहुंचे. दल्‍ले भी पहली कतार में, कुर्सी उठाकर सबसे आगे बैठे ताकि राजनाथ चेहरा तो देख लें. उनका तथा भाजपा का भविष्‍य ठीक लग रहा है तो पहचान बनी रहेगी तो काम आ जाएंगे.

राजनाथ की पीसी में अराजक स्थिति

खैर, पत्रकारों की अराजकता के बीच किसी तरह राजनाथ सिंह की पीसी खत्‍म हुई तो चुनावी पत्रकार लंच पर टूट पड़े. आयोजकों का चेहरा भक्‍क हो गया कि खाना कम पड़ जाएगा. उन्‍हें उम्‍मीद नहीं कि इस तरह खाने के लिए लूट मार मचेगी. पर मची और बहुत जानदार और शानदार तरीके से मची. तमाम वरिष्‍ठ पत्रकार माहौल को अपने हिसाब का न देख मौका-ए-वारदात से निकल लिए. हालांकि इसमें खास बात यह रही कि चुनावी पत्रकारों में केवल पुरुषों का ही नहीं बल्कि महिलाओं की भी जमकर भागीदारी रही. चिंता की बात नहीं है, लखनऊ में पत्रकारिता फल-फूल रही है.   

वो इंडिया टीवी छोड़ देंगे मुझे करीब एक महीने पहले पता था

जनाब कमर वाहिद नकवी साहब ने इंडिया टीवी को छोड़ दिया, या इंडिया टीवी ने नकवी साहब को छोड़ा। इस वक्त भारत के मीडिया (खासकर इलेट्रॉनिक मीडिया) में यह दो सवाल तबियत से उछल-कूद/ धमा-चौकड़ी मचा रहे हैं।

सवाल-
1- नकवी जी ने इंडिया टीवी क्यों छोड़ा?
2- अगर इंडिया टीवी ने नकवी जी को नमस्ते किया, तो क्यों?
3- आजतक से नकवी जी के बलबूते इंडिया टीवी पहुंचे बंधु-बांधवों का भविष्य क्या होगा?
4- वो कौन सी शर्त थी नकवी जी की, जिसे इंडिया टीवी पूरी कर पाने में असमर्थ हो गया
5- इंडिया टीवी की नकवी जी से क्या-क्या अपेक्षायें थीं, जिन पर नकवी जी खरे उतरने को राजी नहीं हुए?
6- नकवी जी का स्वभाव, काम-काज का तरीका रजत शर्मा को हजम नहीं हुआ?
7- क्या रजत शर्मा की कुटिल मुस्कराहट के पीछे का सच नकवी जी को जल्दी ही समझ आ गया?
8- क्या नकवी जी के जाने से पहले रजत शर्मा ने उनके स्थान पर चिपकाने के लिए किसी और महाराजा की तलाश पूरी कर ली थी और नकवी जी से इस रहस्य को रजत शर्मा छिपा पाने में नाकाम रहे?
9- नकवी जी ने महाभारत के संजय की मानिंद दूरदृष्टि से सब कुछ पहले ही देख लिया, कि आईंदा इंडिया टीवी में क्या घमासान होने वाला है, और दुर्गति के दिन देखकर खुद को धृतराष्ट्र बनाने से नकवी साहब खुद को वक्त रहते इत्तिमनान से बे-द़ाग बचा ले गये?
10- क्या नकवी जी का कोई नया प्रोजेक्ट लाने का सपना पूरा होने के काफी करीब आ चुका था, इसलिए उन्होंने इंडिया टीवी की किसी छीछालेदर में फंसने से पहले ही खुद को पाक-दामन निकाल लिया?

यह तमाम सवाल अगर मेरे जेहन में चहलकदमी कर रहे हैं, तो इनमें से या फिर इनसे मिलते-जुलते कुछ सवालात, बाकी मीडिया जगत से जुड़े लोगों के जेहन में भी उठा-पटक मचा रहे होंगे।
इंडिया टीवी से अलग नकवी साहब हुए…मगर बयानबाजी न इंडिया टीवी ने करना मुनासिब समझा न नकवी जी ने। हां हमारे जैसों जरुर इस प्रकरण पर "शोध-पत्र" तैयार कर लिए।

मेरा इससे कोई सरोकार नहीं है, कि इस प्रकरण में के पीछे की सच्चाई क्या है। हां इतना जरुर है, कि नकवी जी इलेक्शन के बाद इंडिया टीवी से चले जायेंगे या वे इंडिया टीवी छोड़ देंगे। इसका चर्चा लोकसभा चुनाव की घोषणा होने से चंद दिन पहले ही शुरु हो गयी थी। मेरे साथ यह चर्चा भी किसी एक पत्रकार बंधु ने ही की थी। यह चर्चा हुई थी जनसत्ता अपार्टमेंट (वसुंधरा) के एक फ्लैट में। चरचा इस कदर सही साबित हो जायेगी, इसका उस वक्त मुझे गुमान भी नहीं था।

वरिष्‍ठ पत्रकार संजीव चौहान के एफबी वॉल से साभार.

लांच होगा या डिब्‍बा बंद चैनल बन जाएगा न्‍यूज30!

आम चुनाव के पहले कई चैनल कुकुरमुत्‍तों की तरह उगे और चुनाव खतम होने से पहले ही धराशायी हो गए. कुछ चैनल तो लंबे समय से लांच होने की तैयारी में हैं. इन चैनलों की मंशा थी कि चुनाव में पेड न्‍यूज और विज्ञापन के रूप में मोटी रकम पीट लेंगे, लेकिन इनकी सारी योजना चुनाव आयोग की कड़ाई और कमजोर टीमों के चलते धराशायी हो गई. मौसमी बुखार की तरह बाजार में आने वाले ये चैनल अब तक लांच नहीं हो पाएं हैं, जबकि इनको लेकर ढिंढोरा बहुत पीटा गया. ऐसा ही एक चैनल है न्‍यूज30.

नाम बड़े और दर्शन छोटे की तर्ज पर यह चैनल पिछले चार-पांच महीनों से लखनऊ और देहरादून में चर्चा का विषय बना हुआ है. अपने को बड़े तीरंदाज मानने वाले रिपोर्टर और कैमरामैन भी इस टीम से जुड़े लेकिन यह चैनल टेकऑफ ही नहीं कर पाया. राजकुमार सिंह चैनल के यूपी हेड हैं.

चैनल से जुड़े लोग रोजना चैनन लांच होने की बता कह रहे हैं, लेकिन चैनल प्रबंधन है कि चैनल लांच ही नहीं कर पा रहा है. चैनल को चुनाव से पहले लांच करके रकम वसूलने और जुटाने की योजना थी, जो खटाई में पड़ गई है. यूपी में पहले चरण का चुनाव भी निपट गया है. ऐसे में अब प्रबंधन भी इस चैनल को लांच करने की जल्‍दबाजी नहीं कर रहा है. चैनल के लांच ना होने से परेशान वे लोग हैं जो ठीक ठाक चैनल छोड़कर न्‍यज30 से जुड़ गए हैं. हालां‍कि चैनल से कुछ लाइजनर टाइप पत्रकारों को भी जोड़ा गया, परंतु चैनल लांच नहीं होने के चलते इन लोगों की सारी योजनाएं टांय-टांय फिस्‍स हो गई.

न्‍यूज30 मैनेजमेंट से जुड़े लोगों का कहना है कि चैनल को चुनाव के पहले ही लांच करने की योजना थी, लेकिन कुछ दिक्‍कतों के कारण यह ऑन एयर नहीं हो पाया. चुनाव शुरू हो जाने के चलते अब प्रबंधन इतनी जल्‍दी में नहीं है. चैनल अब चुनाव के बाद ही लांच किए जाने की संभावना है.

पहले जागरण के पत्रकार को पीटा, फिर माफी मांग ली

भिवानी में दैनिक जागरण के संवाददाता अशोक ढिकाव व इलेक्ट्रोनिक मीडिया कर्मी व पुरस्‍कृत साहित्‍यकार जगजीत लौहट पर 9 अप्रैल की देर शाम कृष्‍णा चौक पर हुए हमले मामले में बॉक्सिंग कोच के माफी मांग लेने के बाद मामला सुलट गया है. थाना शहर पुलिस की मौजूदगी में लगभग दो घंटे तक चली वार्ता के बाद बॉक्सिंग कोच भूपेंद्र उर्फ भूप्‍पी माफी मांगने को तैयार हुआ. पुलिस आरोपी कोच एवं उसके साथियों पर कार्रवाई करने की बजाय माफी दिलाकर मामला रफा दफा कर दिया.

गौरतलब है कि दैनिक जागरण संवाददाता अशोक ढिकाव व उनके साढू जगजीत लौहट 9 अप्रैल की शाम करीब साढ़े सात बजे बाइक पर सवार होकर भिवानी रेलवे स्टेशन से अपने घर हालू मोहल्ला वाल्मीकि कालोनी जा रहे थे. इसी दौरान कृष्णा कालोनी चौक पर सड़क किनारे फल लेने के लिए बाइक रोकी. पीछे से आए कोच भूपेंद्र उर्फ भूप्पी ने बाइक रोक कहा कि ये तुम्हारे बाप की सड़क है, जो यहा खड़े हो. दोनों ने इस तरह से बोलने का विरोध किया तो उसने जेब से रिवाल्वर निकाल कर दोनों पर तानते हुए जान से मारने की धमकी दी और मारपीट शुरू कर दी. भूप्‍पी ने दोनों को जातिसूचक गालियां भी दी. दोनों पत्रकारों को चोटें आई.

इस घटना के विरोध में मीडियाकर्मियों ने एसपी सत्‍येंद्र कुमार गुप्‍ता से मुलाकात कर आरोपियों के गिरफ्तारी की मांग की थी, लेकिन पुलिस ने आरोपी से माफी मंगवाकर मामले को रफा दफा कर दिया. इस दौरान काफी संख्‍या में पत्रकार तथा वाल्‍मीकि समाज के लोग भी मौजूद थे. पुलिस के सामने कोच भूपेंद्र उर्फ भूप्पी ने इस घटना पर दुख जाहिर करते हुए माफी मांगी. जिसके बाद मामला का निपटारा हो पाया. शहर थाना प्रभारी संदीप सिंह ने भी भविष्य में पत्रकारों या आमजन के साथ ही तरह की घटना होने पर कड़ी कार्रवाई किए जाने का भरोसा दिलाया. कोच के साथ आए वैश्य कालेज लेक्चरर ने भी इस पर दुख प्रकट किया दोनों के बीच सौहार्द व प्रेम की अपील की.

सुधीर चौधरी को एक और झटका, अदालत ने याचिका खारिज की

नई दिल्ली : दिल्ली की एक अदालत ने जी न्‍यूज के संपादक सुधीर चौधरी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कंपनी द्वारा उनके खिलाफ दायर मानहानि याचिका और 100 करोड़ रुपए वसूली करने के प्रयास के मामले को एक साथ करने का अनुरोध किया गया है।

मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट संजय खनगवाल ने आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि यह स्वीकार करने योग्य नहीं है। अदालत ने कहा, मौजूदा मामले में, स्थिति भिन्न है क्योंकि इस चरण में अपराध और आरोपी के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। अदालत ने कहा कि अभी इस नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। इस पहलू पर विचार करने के लिए अध्याय 17 के संदर्भ में आरोप तय होने के बाद का चरण उचित होगा।

संपादक ने इस आधार पर वसूली मामले और मानहानि मामले को एक साथ करने का अनुरोध किया था कि दोनों मामलों में आरोपों का विषय एक ही है और एक समान आरोपों के आधार पर कथित अपराध को अंजाम देने की अवधि भी टकरा रही हैं। दिल्ली पुलिस ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि इसका मकसद शिकायत के मामले की कार्यवाही में देर करना है और चौधरी गुप्त अभिप्रायों के लिए देर करने की रणनीति अपना रहे हैं।

इससे पहले कोयला घोटाले में जिंदल की कंपनी के खिलाफ मानहानिकारक खबरें प्रसारित कर कथित रूप से धन ऐंठने के लिए जी समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्र, जी के संपादकों सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के खिलाफ पुलिस ने आरोप लगाए थे।अदालत ने पुलिस को मामले में आगे जांच करने का निर्देश दिया था। (पंके)

अमर उजाला के पत्रकार को पीटने वाला दारोगा लाइन हाजिर

: आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज : सोनभद्र : सपा नेताओं की दलाल बन चुकी पुलिस अपने काले कारनामों के छपने से पत्रकारों पर नाराज होती रहती है. सोनभद्र में अमर उजाला के पत्रकार जुल्‍फेकार हैदर खान पर हुआ हमला भी इसी तरह की घटनाओं की अगली कड़ी है. जुल्‍फेकार पर हमला करने वाले चुर्क चौकी इंचार्ज को लाइन हाजिर कर दिया गया है. साथ ही आरोपी दारोगा समेत तीनों कांस्‍टेबलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है. बताया जा रहा है कि एसपी ने इस मामले में चुनाव आयोग को पत्र लिखने की बात भी कही है.

अस्‍पताल में भर्ती पत्रकार के पुलिसिया उत्‍पीड़न की घटना की जानकारी मिलने पर तमाम पत्रकार उन्‍हें देखने पहुंचे. पत्रकारों में इस घटना को लेकर आक्रोश है. पत्रकारों ने कहा है कि अगर आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कठोर दंडात्‍मक कार्रवाई नहीं हुई तो वे चुप नहीं बैठेंगे. घटना की जानकारी मिलने पर प्रभारी निरीक्षक डीपी शुक्‍ला भी जुल्‍फेकार से मिलें तथा पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली. उन्‍होंने चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की जानकारी भी दी.

जुल्‍फेकार अमर उजाला के पत्रकार हैं, लेकिन अखबार ने पत्रकार पर हमले की खबर तो प्रकाशित की है, लेकिन उसमें कहीं लिखा नहीं है कि वे अमर उजाला के पत्रकार हैं. पत्रकारों के साथ हादसा होने के बाद इस तरह की शर्मनाक घटना आम है. स्‍थानीय स्‍तर पर काम करने वाले पत्रकारों से काम तो पूरा लिया जाता है, लेकिन परेशानी के दौरान उन्‍हें अपना बताने में प्रबंधन को हिचक होती है.

ज्ञानेंद्र शुक्‍ला ने फोकस टीवी ज्‍वाइन किया, बने स्‍टेट हेड

पी7 न्‍यूज, लखनऊ से खबर है कि ज्ञानेंद्र शुक्‍ला ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे चैनल के यूपी में स्‍टेट हेड के पद पर कार्यरत थे. ज्ञानेंद्र ने अपनी नई पारी नवीन जिंदल के चैनल फोकस टीवी से करने जा रहे हैं. उन्‍हें चैनल में यूपी का स्‍टेट हेड बनाया गया है. खबर है कि उन्‍हें यूपी में ब्‍यूरो को नए सिरे से बनाने की जिम्‍मेदारी भी दी गई है.

ज्ञानेंद्र ने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की थी. इसके बाद वे आउटलुक से जुड़े. दैनिक जागरण को दिल्‍ली में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं. जागरण से इस्‍तीफा देने के बाद ईटीवी यूपी की टीम का हिस्‍सा बन गए. उन्‍होंने ईटीवी के लिए कई बड़ी खबरें ब्रेक कीं. कई बड़े घोटालों के खुलासे करने वाली खबरों से ज्ञानेंद्र की एक अलग पहचान मिली. इसी का परिणाम रहा कि पी7 न्‍यूज यूपी में उन्‍हें स्‍टेट हेड बना दिया. यूपी की पूरी टीम ज्ञानेंद्र शुक्‍ला ने खड़ी. पी7 न्‍यूज में इन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍यूरो का खिताब दिया था.

क्‍या जिंदल ने जी समूह को याद दिलाया है पत्रकारिता का इतिहास?

कुछ समय पहले कोयले की खान से 100 करोड़ का हीरा निकालने की कोशिश में जुटा रहा जी समूह जब खुद ही नवीन जिंदल के चंगुल में फंस गया और स्टिंग में सारा मामला सामने आ गया तो उसे पत्रकारिता याद आने लगी. शुरुआत में जिंदल समूह को हिलाकर रख देने का सपना देखने वाले जी समूह के दो संपादक ब्‍लैकमेलिंग में क्‍या फंसे समूह को पत्रकारिता का इतिहास याद आने लगा है. कोर्ट ने भी इस समूह की गलत दलीलों-अपीलों को कई बार खारिज कर चुका है.

अब जी समूह को अपनी गलती के परिमार्जन का कोई रास्‍ता नहीं सूझ रहा है, लिहाजा पत्रकारिता का इतिहास लिखकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं. सुभाष चंद्रा अब भाजपा और मोदी से नजदीकी बढ़ा रहे हैं ताकि संभावित सरकार में कुछ राहत मिल सके. खैर, ये तो बाद की बात है. कुछ रोज पहले वासिंद्र मिश्र ने सुभाष चंद्रा को रामनाथ गोयनका बनाने की कोशिश की, अब उनके चिंटू-पिंटू पत्रकारिता का इतिहास लिखकर उस पर होने वाले हमलों के बारे में लगातार लिख रहे हैं. किसी को समझ नहीं आ रहा है कि खबरों के बदले पैसे वसूलने की कोशिश करने वाले समूह को अचानक बिना मौसम के बरसात की तरह पत्रकारिता का इतिहास क्‍यों याद आने लगा है. नीचे जी न्‍यूज की वेबसाइट पर लिखी गई समूह के पत्रकार कर्मचारी अम्‍बुजेश कुमार शुक्‍ला की पत्रकारिता की मुश्किलों की रामकहानी…


मीडिया पर अंकुश आखिर क्यों?

मीडिया की आवाज को दबाने और उस पर लगाम कसने की कोशिशें तब तब हुई हैं जब सरकारी प्रतिष्ठान के भ्रष्टाचार और उसके गैरलोकतांत्रिक आचरण को मीडिया ने जनता के सामने रखा है। इस बात का एक लम्बा इतिहास रहा है कि ज्यादातर मीडिया को शिकंजे में लेने की कवायद तभी हुई है जब सत्तानशीनों से जुड़े मामले में उजागर किए गए हैं और उनके जरिए सत्तापक्ष की किरकिरी हुई है। अब सवाल बड़ा ये कि अपने गिरेबान में झांकने की बजाय आखिर मीडिया को निशाना बनाने की प्रवृत्ति कहां तक सही है क्या मीडिया का मतलब सिर्फ सरकारों की तारीफ करना है। अगर मीडिया सरकार और सत्तापक्ष पर सवाल उठाता है तो उसे स्वस्थ आलोचना मानकर उसका स्वागत क्यों नहीं होता।

खबर दिखाना, खबरों का विश्लेषण करना और खबरों के जरिए वो सच सामने लाना जो जनता के लिए जरूरी है। लोकतंत्र में मीडिया का ये सबसे पहला कर्तव्य माना जाता है लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब भी मीडिया अपने इस ethics पर ईमानदारी से आगे बढ़ने की कोशिश करता है। उसे दुश्मन मान लिया जाता है। अतीत में ऐसे कितने ही मौके आए हैं जब मीडिया की खबरों ने सरकारी तन्त्र को हिला कर रखा दिया है और बदले में सरकारी तन्त्र ने खुद की गलतियों को सुधारने की बजाय मीडिया को ही बांधने की कोशिशें की हैं ये और बात है कि ऐसी हर कोशिश वक्त के साथ नाकाम हुई है लेकिन सवाल तो है।

सवाल ये कि आखिर इस नीयत का क्या करें, क्या लोकतन्त्र में जीने रहने और उसकी कसमें खाने वालों से ऐसे आचरण की उम्मीद रखी जा सकती है।माना कि राजनीति में नैतिकता की दुहाई देने वाले और नैतिक आचरण को जीने वालों में एक बड़ा फर्क है…लेकिन कम से कम लोकतन्त्र की स्वस्थ परम्परा को जीने के लिए क्या ऐसा जरूरी नहीं है। बात अगर कोई बड़ी हो तो समझ में आती है छोटी छोटी बातें भी सरकारों की सहनशीलता के लिए कड़ी चुनौती बन जाती हैं। ज्यादा वक्त नहीं हुए जब उत्तर प्रदेश में ऐसा ही मामला सामने आया था। जब सैफई महोत्सव को लेकर मीडिया ने कुछ कड़वी हकीकत सामने लाने की कोशिश की थी तो सरकार इस आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पाई और बजाय कि ऐसी नौबत आने की वजह तलाश की जाती सरकार के अधिकारियों ने केबल ऑपरेटरों पर दबाव डालकर दो चैनलों को यूपी से ब्लैकआउट करा दिया। क्या ये आलोचना को लेकर घटती सहनशीलता को नहीं दिखाता।

वैसे ये अकेला मामला नहीं है। यूपी में मौजूदा अखिलेश सरकार से पहले भी ऐसा ही एक मामला सामने आ चुका है। जब मायाराज के कुछ अधिकारियों ने सरकार के खिलाफ खबरें दिखाने पर ज़ी मीडिया ग्रुप के एक चैनल को यूपी में बैन कर दिया था।

ये घटनाएं ये बताती हैं कि सिर्फ सत्ता की ताकत जिसके पास भी रहे वो उसका इस्तेमाल वाजिब और गैरवाजिब दोनों तरीके से करना चाहता है। स्वस्थ आलोचना के दायरे सिमटते जा रहे हैं। ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब अन्ना आंदोलन के दौरान सरकार ने बकायदा एक जीओएम तक बना डाला था ताकि मीडिया की कवरेज पर नजर रखी जा सके। दरअसल अतीत में ऐसा कई बार हो चुका है। मीडिया को रोकने और उसे पूरी तरह सरकारी भोंपू बनाने देने की सबसे बड़ी कोशिश उस वक्त हुई थी जब देश में इमरजेंसी लगी थी।

इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान लगी इमरजेंसी में कई पत्रकार जेल में डाले गए। कई अखबार बैन कर दिए गए और अखबारों में खबरें सिर्फ सरकारी होती थीं। वो वक्त था जब संपादक अखबारों में संपादकीय की जगहें खाली छोड़ दिया करते थे।

खैर ये तो इमरजेंसी का दौर था। मीडिया पर एक अघोषित आपातकाल लगाने की कोशिश दोबारा तब हुई जब बोफोर्स का घोटाला सामने आया था। इस दौरान केन्द्र में राजीव गांधी की सरकार थी। लगातार बोफोर्स घोटाले की छपती खबरों और उनमें सरकार पर उठते सवालों ने राजीव गांधी सरकार को इतना परेशान कर दिया कि आखिरकार राजीव गांधी ने जुलाई 1988 में संसद में मानहानि विधेयक रख दिया जो लोकसभा से पास भी हो गया लेकिन देश भर के पत्रकारों के कड़े विरोध ने सरकार को कदम वापस खींचने पर मजबूर कर दिए।

ये उस वक्त की बात है जब मौजूदा वक्त की 20 करोड़ से ज्यादा की आबादी पैदा भी नहीं हुई थी लिहाजा ये जानना जरूरी है कि आखिर क्या था इस विधेयक में मानहानि विधेयक में खबरों या खुलासों को फासीवादी तरीके से दबाने की कोशिश की गई थी। इसके मुताबिक पत्रकारों पर आपराधिक मामला चलाकर दो से पांच साल तक की सजा का प्रावधान किया गया था। इसके अलावा 27 अक्टूबर 1989 में सरकार ने भोपाल गैस त्रासदी पर बनी एक फिल्म को बैन कर दिया था। कहा गया कि इस फिल्म में तथ्यों को ठीक तरीके से नहीं दिखाया गया। जबकि इससे पहले ही ये फिल्म राष्ट्रीय अवॉर्ड जीत चुकी थी।

ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब मीडिया को सरकारी तन्त्र के भ्रष्टाचार के खिलाफ जाने की कीमत चुकानी पड़ी है। दक्षिण भारत में आज भी ऐसे कई चैनल हैं जो राजनीतिक शख्सियतों से ताल्लुक रखते हैं और जिनका प्रसारण सरकारें बदलने के साथ ही ऑन ऑफ होता रहता है. कुल मिलाकर मीडिया को दायरे में रखने की कोशिशों के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है उसे कम से कम एक बेहतर और मजबूत लोकतन्त्र के लिए जायज नहीं माना जा सकता। क्योंकि एक स्वस्थ लोकतन्त्र का ढांचा तभी मजबूत होता है जब आलोचक और आलोचना दोनों के लिए जगह बनी रहे।

प्रेस क्‍लब में मोदी के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने वाले अपने स्‍टैंड पर कायम रहेंगे!

Deepak Sharma : HATE MODI ..but do not under rate him. आप अपनी ही बात कहना चाहें और दूसरे की बात सुनना ना पसंद हो तो ये किसकी प्रॉब्लम है? आप खुद की सोची समझी दुनिया में जी रहे हों तो फिर संवाद की जगह कहाँ बचती है? दरअसल ये लक्षण बताते हैं कि आप तटस्थ नहीं हैं. दुर्भाग्य से आप टीवी एंकर हैं और इससे बड़ा दुर्भाग्य ये कि मैं आपको जानता हूँ.

एक टीवी एंकर मुझसे बहस करने लगे की मोदी को बनारस में छींके आ जायेंगी और शायद वो हार जायेंगे. उन्होंने कहा की मोदी की हवा निकल चुकी है और बनारस में वो मुंह की खाने वाले हैं. मित्रों हो सकता है मोदी सरकार ना बना पाएं…लेकिन वो बनारस में मुंह की खा जायेंगे ऐसा मुझे नहीं लगता. बहरहाल मैं इस एंकर की भड़ास सुनता रहा जब तक उनकी स्काच और मेरी पेप्सी खत्म नहीं हो गयी.

मैं एकतरफा बहस में नहीं पड़ता. एक ही लकीर पीटने वाले फकीर मुझे रास नहीं आते. आपको भी एक तरफ़ा बहस में नहीं पड़ना चाहिए. एकतरफा मतलब एकपक्षीय. मतलब असंतुलित. अंग्रेजी में मतलब BIASED. जो पत्रकार मोदी से नफरत करते हैं उनसे मुझे परहेज नहीं. गुजरात दंगों के लिए मोदी की आलोचना करना पत्रकार का धर्म है. लेकिन २४ घंटे मोदी को कोसना भी धर्म नहीं हो सकता. ऐसे पत्रकार जो दिल्ली के प्रेस क्लब और मीडिया सेंटर में बैठकर मोदी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला रहे हैं, उनसे मेरा कहना की अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो उस वक्त भी वो अपने स्टैंड पर कायम रहे.

धर्म निरपेक्ष पत्रकारों से मेरा अनुरोध है कि पहले तो वो मोदी की पराजय सुनिश्चित करें और अगर फिर भी मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनका बहिष्कार करें. कांग्रेस शासन में मोदी को गाली और मोदी के सत्ता में आने के बाद नमो नमो …ये दोहरा चरित्र होगा. सनद रहे कथनी और करनी में फर्क …चरित्र को तिरस्कृत कर देता है.

आजतक के वरिष्‍ठ पत्रकार दीपक शर्मा के एफबी वॉल से साभार.

दैनिक भास्‍कर, अजमेर के 18वें स्‍थापना दिवस पर कई कर्मचारी सम्‍मानित

अजमेर : दैनिक भास्कर अजमेर संस्करण का 18वां स्थापना दिवस रविवार को भास्कर परिसर में आतिशबाजी के साथ धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम में भास्कर समूह से जुड़े लोगों के साथ आमंत्रित अतिथियों ने भाग लिया। यूनिट हेड जीके पांडे ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया इस दौरान भास्कर कर्मचारियों को उनके साल भर में किए गए उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में महिलाओं और बच्चों के लिए कई प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। इसमें 5 से 10 साल के बच्चों के लिए कुर्सी रेस का आयोजन किया गया। महिलाओं के लिए भी कुर्सी रेस आयोजित की गई। समारोह में कठपुतली के खेल ने मौजूद लोगों को रोमांचित कर दिया। समारोह में रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जगदीश सिंह सिकरवाल ने स्थापना दिवस पर भास्कर के तीन वरिष्ठ कर्मियों डिप्टी न्यूज एडिटर बृजेश शर्मा, चीफ फोटो ग्राफर मुकेश परिहार और एचआर एक्जीक्यूटिव विदुषी सक्सेना को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

इनके अलावा संपादकीय विभाग से आरिफ कुरैशी, अरविंद अपूर्वा, अनिल आईनानी, प्रोडक्शन विभाग से भगवान मीणा, मोहित शर्मा, अकाउंट्स डिपार्टमेंट से दुर्गालाल, एसएमडी से हीरालाल रावत, एचआर से हिम्म्मत सिंह और मार्केटिंग से मुकेश गुप्ता और विजय सैन को शील्ड देकर सम्मानित किया।

नोएडा में महिला पत्रकार पायल शर्मा से हुई लूट, बदमाश गिरफ्त से बाहर

नोएडा में मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने एक महिला पत्रकार का हजारों रुपए और पर्स लूट लिया. लुटेरों ने सेक्टर-25 में इस घटना को उस समय अंजाम दिया जब महिला पत्रकार रिक्‍शा पर सवार होकर अपने घर जा रही थी. कोतवाली सेक्टर-20 पुलिस ने इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली है. अब तक कोई आरोपी अरेस्‍ट नहीं हुआ है. 

जानकारी के अनुसार सेक्टर-56 स्थित डी ब्लॉक की रहने वाली पायल शर्मा एक मीडिया हाउस में कार्यरत हैं. शनिवार रात वह अपनी दोस्त श्वेता सिंह के साथ सेक्टर-18 मार्केट में किसी काम से गई थीं. काम खतम करने के बाद वह लगभग साढ़े नौ बजे रिक्शे से सेक्‍टर 56 स्थिति अपने घर लौट रही थी. सेक्टर-25 में स्थि‍त बाल भारती स्कूल के सामने जैसे ही पहुंची कि मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने उनका पर्स लूट लिया. पायल जब तक मदद के लिए पुकारती या कुछ समझ पाती बदमाश फरार हो गए.  

इस घटना के बाद पायल ने तत्‍काल पुलिस कंट्रोल रूम को 100 नंबर पर कॉल किया, लेकिन बदमाश पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके. पुलिस मौके पर पहुंचकर जांच पड़ताल भी की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. पुलिस को दी गई शिकायत में पायन ने बताया है कि उनके पर्स में आठ हजार रुपये, पैन कार्ड, एटीएम कार्ड व मोबाइल सहित अन्य महत्वपूर्ण कागजात थे. पायल का कहना है कि मार्केट से ही बदमाश उनका पीछा कर रहे थे. पुलिस का कहना है कि आसपास में लगे सीसीटीवी की फुटेज मंगाई जा रही है, जल्‍द ही बदमाशों को अरेस्‍ट कर लिया जाएगा.

द इकोनोमिस्‍ट ने लिखा – क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

Om Thanvi : कल 'द इकोनोमिस्ट' के बहुचर्चित लेख पर बात हुई थी। मैंने लिखा था काश कोई इसका अनुवाद कर देता। दो मित्रों ने तुरंत कर भेजा। एक मित्र का सन्देश था कि कि वे भी भेज रहे हैं। वे कृपया मेहनत न करें, मित्रवर मनोज खरे Manoj Khare का उम्दा अनुवाद मिल गया है। समाजी सरोकार वाले तमाम मित्रों की ओर से उनका आभार।

क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

(सम्भव है वे भारत के अगले प्रधानमंत्री बन जाएं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि वे इसके योग्य हैं।)

कौन भारत में होने वाले आम चुनावों के संभावित परिणामों के बारे में नहीं सोच रहा है? सात अप्रैल से शुरू होने वाले चुनाव में मुंबई के करोड़पतियों के साथ-साथ अशिक्षित ग्रामीणों और झोपड़पट्टियों में रहने वाले गरीब-वंचित लोगों को भी अपनी सरकार चुनने का बराबर का हक होगा। नौ चरणों में पांच सप्ताह से ज्यादा चलने वाले मतदान में लगभग 81.5 करोड़ नागरिक अपने मत का प्रयोग करेंगे जो कि इतिहास में एक सबसे बड़ा सामूहिक लोकतांत्रिक कार्य होगा। लेकिन कौन भारत के राजनीतिज्ञों के दुर्बल, गैरजवाबदेह और अनैतिक चरित्र की निंदा नहीं करता? समस्याओं से आकंठ डूबा देश कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बनी गठबंधन सरकार के अधीन दस वर्षों के दौरान मझदार में पहुंच गया है, जिसका कोई खेवनहार नहीं है। वृद्धि-दर घटकर लगभग आधी- 5 प्रतिशत के आस-पास रह गई है, जो कि प्रति वर्ष नौकरी करने के लिए बाजार में उतरने वाले करोड़ों युवा भारतीयों को रोजगार देने की दृष्टि से बहुत कम है। सुधार अधूरे रह गए हैं, सड़कें और बिजली उपलब्ध नहीं है। बच्चों की पढ़ाई- लिखाई नहीं हो पाती है। जबकि विडंबना यह है कि नेताओं और अफसरों द्वारा ली जाने वाली रिश्वत का आंकड़ा कांग्रेस के शासन-काल में चार से बारह बिलियन डॉलर के बीच पहुंच गया है।

भारतीय लोगों की नजर में राजनीति का मतलब है- भ्रष्टाचार। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी को भारत का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। लेकिन वे अपने कांग्रेस पार्टी के प्रतिद्वंद्वी नेता राहुल गांधी से ज्यादा अलग नहीं हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रदौहित्र राहुल गांधी इस तरह पदग्रहण करने को तैयार बैठे हैं, मानो यह उनका दैवी अधिकार हो। जबकि मोदी पहले चाय बेचने वाले थे जो कि महज अपनी योग्यता के बलबूते ऊपर तक पहुंचे हैं। लगता है मिस्टर गांधी अपने ही मानस को नहीं समझते। यहां तक कि वे नहीं जानते कि उन्हें सत्ता चाहिए या नहीं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी का कामकाज दर्शाता है कि उन्होंने आर्थिक विकास किया है और वे विकास को धरातल पर उतार सकते हैं। राहुल गांधी के गठबंधन पर भ्रष्टाचार की कालिख पुती हुई है। जबकि तुलनात्मक रूप से मोदी साफ-सुथरे हैं। इस तरह प्रशंसा के लिए काफी कुछ है। फिर भी यह पत्रिका नरेंद्र मोदी को भारत के सर्वोच्च पद के लिए अपना समर्थन नहीं दे सकती।

मोदी की दुर्भावना

कारण शुरू होता है गुजरात में 2002 में मुसलमानों के विरूद्ध हिंदुओं के उन्मादी दंगों से, जिनमें कम से कम एक हजार लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे। अमदाबाद और आसपास के कस्बों-गांवों में चला हत्याओं और बलात्कार का दौर, एक ट्रेन में सवार 59 हिंदू तीर्थयात्रियों की मुसलमानों द्वारा की गई हत्या का बदला था। नरेंद्र मोदी ने 1990 में अयोध्या स्थित पवित्र-स्थल पर एक यात्रा का आयोजन करने में सहायता की थी, जिसके परिणामस्वरूप दो वर्ष बाद हिंदू-मुसलमान झड़पों में 2000 लोगों को जान गवांनी पड़ी थी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक आजीवन सदस्य हैं जो कि एक हिंदू राष्ट्रवादी समूह है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लक्ष्य के प्रति समर्पित होने के कारण ही उन्होंने जीवन भर के लिए ब्रह्मचर्य अपनाया और अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काने वाले शर्मनाक भाषण दिए। 2002 में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और उन पर जनसंहार होने देने या समर्थन करने तक के आरोप लगे।

मोदी के बचावकर्त्ता और उनके अनेक समर्थक, खासकर वे जो कारोबारी अभिजात्य वर्ग के हैं, दो बातें कहते हैं। पहली, बार-बार की गई जांच-पड़तालों में जिसमें प्रशंसनीय स्वतंत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा कराई गई जांच भी शामिल है, ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी पर कोई आरोप लगाया जा सके। और दूसरी बात वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने अब खुद में बदलाव लाया है। उन्होंने निवेश आकर्षित करने और हिंदू-मुसलमानों को समान रूप से फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अथक कार्य किया है। वे कहते हैं कि एक सुसंचालित अर्थव्यवस्था में देश भर के गरीब मुसलमानों को मिलने वाले भारी लाभ के बारे में सोचिए।

दोनों आधार पर यह अत्यंत उदार नजरिया है। दंगों के बारे में बैठायी गई जांच निष्कर्षहीन रहने का एक कारण यह है कि ज्यादातर सबूत या तो नष्ट हो गए थे या जानबूझ कर नष्ट कर दिए गए थे। और अगर 2002 में तथ्य अस्पष्ट और धुंधले थे तो नरेंद्र मोदी के विचार भी अब भी वैसे ही हैं। जो कुछ हुआ उसका स्पष्टीकरण देते हुए माफी मांग कर वे नरसंहार को अपने से पीछे छोड़ सकते थे। पर उन्हें दंगों और नरसंहार के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देना भी गवारा नहीं है। पिछले वर्ष दी गई एक दुर्लभ टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि उन्हें मुसलमानों की पीड़ा पर उसी तरह का दुःख है, जैसा दुःख चलती कार के नीचे किसी कुत्ते के पिल्ले के आ जाने से होता है। शोर-शराबा मचने पर उन्होंने कहा कि उनका तात्पर्य सिर्फ इतना था कि हिंदू सभी प्राणियों का ध्यान रखते हैं। मुसलमानों और उग्र हिंदुओं ने इससे अलग-अलग संदेश ग्रहण किए। अन्य भाजपा नेताओं से अलग, नरेंद्र मोदी ने मुसलिम ढंग की टोपी पहनने से मना कर दिया और 2013 में उत्तर प्रदेश में हुए दंगो की निंदा नहीं की, जिसके ज्यादातर पीड़ित मुसलमान थे।

दो में कम बुरा

''डॉग-व्हिसिल पॉलिटिक्स'' हर देश में निंदनीय है, जिसमें ऐसी द्विअर्थी भाषा का प्रयोग होता है, जिसका आम जनता के लिए एक मतलब होता है तो किसी अन्य उप-समूह के लिए दूसरा। लेकिन भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा उभरती रही है। विभाजन के वक्त, जब ब्रिटिश भारत विभक्त हुआ था तब लगभग 1.2 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे और सैकड़ों मारे गए थे। 2002 के बाद में सांप्रदायिक हिंसा काफी कम हो चुकी है। लेकिन अभी भी सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं और प्रतिवर्ष दर्जनों जानें जाती हैं। कभी-कभी, जैसा कि उत्तर प्रदेश में हाल में हुआ, हिंसा खतरनाक स्तर पर होती है। चिंगारी बाहर से भी भड़क सकती है। मुंबई में 2008 में भारत आतंकवादियों के भयानक हमले का शिकार बना जो कि परमाणु-अस्त्रों से लैस पड़ोसी देश पाकिस्तान से आए थे। पाकिस्तान भारत के लिए हमेशा चिंता का कारण रहा है।

मुसलमानों के भय को समाप्त करने से इंकार करके मोदी उस भय को खुराक देते हैं। मुसलिम-विरोधी मतों को मजबूती से थाम कर वे इस भय को खाद-पानी देते हैं। भारत विभिन्न तरह के धार्मिक आस्थाओं, धर्मावलंबियों और विद्रोही लोगों का आनंदमय, लेकिन कोलाहलपूर्ण देश है। इनमें स्तंभकार दिवंगत खुशवंत सिंह जैसे श्रेष्ठ लोग भी हैं जो सांप्रदायिक घृणा से होने वाली क्षति के बारे में जानते हैं और उससे दुःखी रहते हैं।

नरेंद्र मोदी दिल्ली में अच्छी शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन देर-सबेर उन्हें सांप्रदायिक खून-खराबे या पाकिस्तान के साथ संकट की स्थिति से दो-चार होना पड़ेगा। और कोई नहीं जानता, कम से कम वे आधुनिक लोग जो आज मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं, कि मोदी क्या करेंगे या मुसलमानों की मोदी जैसे विभाजनकारी व्यक्ति के प्रति कैसी प्रतिक्रिया होगी। अगर नरेंद्र मोदी हिंसा में अपनी भूमिका स्पष्ट करते और सच्चा पश्चाताप जाहिर करते तो हम उनका समर्थन करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया। उचित नहीं होगा कि उन जैसा शख्स जो लोगों को बांटता आया है, विस्फोट के मुहाने पर बैठे भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री बने। राहुल गांधी के नेतृत्व में कोई कांग्रेस सरकार बने इसके आसार हमें आशाजनक नहीं लगते। लेकिन हमें फिर भी कम गड़बड़ी वाले विकल्प के रूप में भारतीय जनमानस को इसकी अनुशंसा करना चाहेंगे।

अगर कांग्रेस जीतती है, जिसकी संभावना न के बराबर है, तो उसे अपने आप को फिर से नया करना पड़ेगा और देश का सुधार करना होगा। राहुल गांधी को चाहिए कि वे राजनीति से पीछे हट कर आधुनिकतावादियों को आगे लाएं और अपनी आत्मविश्वासहीनता को एक गुण के रूप में स्थापित करें। ऐसे लोग वहां बहुत हैं और आधुनिकता ही वह चीज है, जिसे भारतीय मतदाता ज्यादा से ज्यादा चाहते हैं। अगर भाजपा की जीत होती है, जिस की संभावना ज्यादा है, तो उसके गठबंधन सहयोगियों को मोदी को छोड़ किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री बनाने पर जोर देना चाहिए।

फिर भी वे नरेंद्र मोदी को ही चुनें तो? हम उनके भले की कामना करेंगे और हमें खुशी होगी अगर वे भारत को आधुनिक, ईमानदार और सम्यक सुशासन प्रदान कर हमें गलत साबित कर देंगे। लेकिन अभी तो नरेंद्र मोदी को उनके रिकार्ड के आधार पर ही जांचा जा सकता है, जो अब भी सांप्रदायिक घृणा से जुड़ा हुआ है। वहाँ कुछ भी आधुनिक, ईमानदार और सम्यक नहीं है। भारत को इससे बेहतर नेतृत्व मिलना चाहिए। (समाप्त)

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं जनसत्‍ता के संपादक ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

जी ने लांच किया पंजाब-हरियाण-हिमाचल चैनल

टीआरपी में लगातार हिचकोले खाते जी मीडिया कॉरपोरेशन ने जी पंजाब हरियाणा हिमाचल चैनल की लांचिंग शुक्रवार को की. इसे कुरुक्षेत्र से शुरू किया गया है. चैनल की लांचिंग के बाद कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आलोक अग्रवाल ने कहा कि जी मीडिया समूह की शुरुआत में पंजाब की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 18 अक्टूबर 1999 में की गई थी. जी मीडिया समाचार जगत में अग्रदूत रहा है तथा इसने विभिन्न राज्यों की जरूरतों की पूर्ति के लिए कई क्षेत्रीय चैनल लांच किए हैं.

जी समूह इस चैनल के माध्‍यम से पंजाब-हरियाणा-हिमाचल की समस्‍याओं को शासन-प्रशासन के सामने लाएगा. यह चैनल हरियाणा के कंटेंट पर विशेष प्रोग्रामिंग एवं समाचार बुलेटिंस का प्रसारण करेगा. जी पंजाब-हरियाणा-हिमाचल संपादक संजय वोहरा ने कहा कि हमारा यह निरंतर प्रयास रहा है कि हम इन सभी तीन राज्यों के दर्शकों को उनकी संबद्ध भाषाओं में जरूरतों की पूर्ति करें तथा उन मुद्दों को अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करें, जिसके विषय में अभी तक कुछ भी नहीं सुना और कहा गया है.

कंपनी का कहना है कि इस चैनल का उद्देश्य क्षेत्रीय उपस्थिति को बढ़ावा देना और हरियाणा में व्यापक पहुँच सुनिश्चित करना है. इसके साथ ही स्थानीय समाचारों की प्रासंगिकता का निर्माण करना और क्षेत्रीय समाचार बाजारों के महत्व में बढ़ोतरी करना भी है.

सामना के पूर्व संपादक बाल ठाकरे के खिलाफ अपील खारिज

मुंबई : बंबई हाईकोर्ट ने 1998 में सामना के तत्‍कालीन संपादक व शिवसेना संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे को मानहानि के मुकदमे से बरी करने के खिलाफ दायर समाजवादी पार्टी नेता अबु आसिम आजमी की अपील खारिज कर दी है. कोर्ट में जब यह मामला पेश किया गया तो सपा नेता आजमी पेश नहीं हुए. इसके चलते न्‍यायमूर्ति मृदुला भटनागर ने आजमी की अपील खारिज कर दी. आजमी इसके पहले भी कई तारीखों पर कोर्ट के सामने पेश नहीं हुए थे.

शिवसेना के मुखपत्र सामना ने 1 जुलाई 1998 को एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सपा नेता 1993 बम विस्फोट मामले में आरोपी हैं और उन्होंने धन बल से सुप्रीम कोर्ट से जमानत हासिल कर ली है. इस पर आजमी ने सामना के तत्कालीन संपादक ठाकरे, कार्यकारी संपादक संजय राउत और मुद्रक सुभाष देसाई के खिलाफ मजिस्ट्रेट की अदालत में मानहानि का मामला दायर किया था.

आजमी के उपस्थित न होने पर अदालत ने कहा कि शायद अपीलकर्ता को मामला आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं है क्योंकि ठाकरे का निधन हो चुका है और इससे कोई मकसद पूरा नहीं होगा. इसलिए यह अपील खारिज की जाती है.

जी न्‍यूज का पतन जारी, इंडिया टीवी की टीआरपी में उछाल

तेरहवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. आजतक लगातार नम्‍बर वन बना हुआ है, जबकि एबीपी न्‍यूज ने भी दूसरे स्‍थान पर खूंटा गाड़ रखा है. लंबे समय से तीसरे स्‍थान पर चल रहे इंडिया टीवी ने इस बार दूसरे नंबर से नजदीकी बढ़ाई है. इस सप्‍ताह न्‍यूज नेशन की टीआरपी थोड़ी गिरी है, इसके बावजूद वो इंडिया न्‍यूज को पछाड़कर चौथे स्‍थान पर बना हुआ है. जी न्‍यूज का पतन लगातार जारी है. इसकी टीआरपी लगातार दूसरे सप्‍ताह भी गिरी है. यह चैनल छठवें स्‍थान पर है. 

न्‍यूज24 के भी नीचे जाने का सिलसिला जारी है. कभी चौथे नंबर पर रहा चैनल अब सातवें नंबर की सवारी कर रहा है. इसके बाद आईबीएन7, सहारा समय, तेज और डीडी का नंबर है. टीआरपीबाज संपादक का चैनल न्‍यूज एक्‍सप्रेस टॉप 12 में भी नहीं है. नीचे इस सप्‍ताह की टीआरपी….

WK 13 2014, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 19.1 up 0.6
ABP News 14.1 same
India TV 13.3 up 1.8
News Nation 9.0 dn 0.4
India news 8.8 up 0.3
ZN 8.4 dn 1.4
News24 7.5 dn 0.8
NDTV 6.9 same
IBN 5.1 dn 0.3
Samay 3.2 dn 0.1
Tez 2.8 up 0.1
DD 1.9 up 0.3

Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 19.0 up 0.5
ABP News 13.8 dn 0.3
India TV 13.4 up 2.4
ZN 9.1 dn 1.5
News Nation 9.0 dn 0.2
India news 8.6 up 0.5
NDTV 7.8 dn 0.4
News24 7.0 dn 0.6
IBN 5.2 dn 0.3
Samay 2.9 same
Tez 2.4 same
DD 1.7 same

विकास ने जनता टीवी एवं संजय ने जिया न्‍यूज ज्‍वाइन किया

एमएच1 न्‍यूज से खबर है कि विकास राज तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एसोसिएट प्रोडयूसर के पद पर कार्यरत थे. विकास ने अपनी नई पारी जनता टीवी के साथ शुरू किया है. उन्‍हें यहां पर प्रोडयूसर बनाया गया है. उन्‍हें चैनल में शिफ्ट इंचार्ज बनाया गया है साथ ही वे यहां हरियाणा में हो रहे लोकसभा चुनाव तथा आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव डेस्क को भी हेड करेंगे.

एमएच1 न्‍यूज से पहले वे हमार टीवी से जुड़े हुए थे. इसके पहले भी उन्‍होंने कई अखबारों को अपनी सेवाएं दी हैं. दिल्‍ली की आईपी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता करने वाले विकास पत्रकारिता की कई शिक्षण संस्‍थानों में गेस्‍ट फैकल्‍टी के तौर पर पढ़ाते भी रहे हैं. डेस्‍क और फील्‍ड की रिपोर्टिंग में समान पकड़ रखने वाले विकास एजुकेशन आधारित न्‍यूज पोर्टल करियर हेडलाइंस डॉट काम का संचालन भी करते हैं. 

जिया न्‍यूज से खबर है कि संजय सिंह ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें लखनऊ में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट बनाया गया है. संजय इसके पहले महुआ न्‍यूज लाइन से जुड़े हुए थे. महुआ न्‍यूज लाइन बंद होने के बाद वे फ्रीलांसिंग कर रहे थे. 

जिया न्‍यूज का कार्यालय बाउंसरों के हवाले!

जिया न्‍यूज की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. खबर आ रही है कि मालिकान अब इस चैनल को लंबा चलाने के मूड में नहीं है. इसको बेचने या फिर बंद किए जाने पर विचार किया जा रहा है. खबर आ रही थी कि चैनल के कार्यालय को बंद कर दिया गया है. कार्यालय में प्राइवेट बाउंसरों को लगा दिया गया है, लेकिन एडिटर इन चीफ कम सीईओ एसएन विनोद ने इस तरह की किसी भी बात को बेबुनियाद बताया है.

जितने ताम-झाम से जिया न्‍यूज को लांच किया गया था, यह चैनल उतनी ही बुरी तरह धराशायी होता नजर आ रहा है. इसके बारे में रोज नई नई खबरें मार्केट में आ रही हैं. बताया जा रहा है कि पेमेंट न होने की दशा में वीडियोकान डीटीएच ने भी सात अप्रैल से चैनल बंद होने की बात कह चुका है. आज खबर आ रही है कि प्रबंधन चैनल को बंद करने की तैयारी कर रहा है. कर्मचारियों को एक महीने का वेतन दिए जाने की बात कही गई है. कुछ कर्मचारियों ने बताया कि चैनल में बाउंसर भी लगाए गए हैं.

हालांकि इस संदर्भ में जब एसएन विनोद से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि यह बिल्‍कुल गलत जानकारी है. कहीं कोई बाउंसर नहीं लगाया गया है. चैनल अब भी रन कर रहा है. मालिकान स्‍तर पर जो चल रहा हो, वो अलग बात है, लेकिन अभी तक चैनल बंद होने की कोई संभावना नहीं है. कुछ लोग इस तरह की अफवाह फैलाकर मामले को बेवजह तूल दे रहे हैं. मेरे इस्‍तीफा देने की भी फर्जी अफवाह फैलाई जा रही है, जबकि अब भी मैं इस चैनल से जुड़ा हुआ हूं.

जिंदल के पैंतरे से परेशान जी समूह ने लिखा पत्रकारिता का इतिहास

नवीन जिंदल के खिलाफ कोर्ट में मात दर मात खा रहा जी समूह और उसके संपादक परेशान हैं. सुधीर चौधरी द्वारा नवीन जिंदल और ग्रुप के कई लोगों पर किए गए मानहानि समेत कई मुकदमों को विभिन्‍न अदालतों ने खारिज कर दिया है. इससे परेशान समूह अब अपनी वेबसाइट पर पत्रकारिता के इतिहास से लेकर भूगोल तक की चर्चा कर रहा है. आप भी पढ़े जी की वेबसाइट पर प्रकाशित कहानी नुमा दर्द….

भ्रष्‍टतंत्र और मीडिया : लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ पर ही निशाना क्‍यों?

आजादी मिलने से लेकर अभी तक मीडिया को लेकर सोच में काफी बदलाव आया है। मीडिया पहले समाज सेवा के तौर पर देखा जाता था धीरे-धीरे बिजनेस बन गया और बिजनेस होते हुए भी लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर मीडिया अहम भूमिका निभाता रहा। हालांकि कई मौके ऐसे भी आए हैं जब मीडिया पर निष्पक्ष नहीं होने के आरोप लगे हैं औऱ क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में आई है लेकिन क्या ऐसा अचानक हुआ है और क्या इसके लिए सिर्फ मीडिया ज़िम्मेदार है? मीडिया की निष्‍पक्षता पर गैरजरूरी सवाल उठाए जा रहे हैं। सच्‍चाई से बौखलाया भ्रष्‍टतंत्र हमेशा मीडिया को ही निशाना क्‍यों बनता है? मौजूदा हालात में ऐसे सवाल उठाना जरूरी हो गया है।

ये माना जाता है कि मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए ऐसे में किसी मीडिया हाउस के मालिक का किसी पार्टी विशेष के पक्ष में आने पर सवाल खड़े होना लाजिमी है लेकिन इसके साथ कुछ और सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए। ये सवाल उठने चाहिए कि आखिर इसकी वजह क्या है? आखिर क्या वजह है जिसने ऐसे हालात बनाए और ऐसा करने के लिए किन ताकतों ने मजबूर किया।

किसी आम आदमी से भी पूछकर देख लीजिए आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि देश में करप्‍शन और कुशासन (पुअर गवर्नेंस) ने संवैधानिक संस्थानों तक की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया है। ऐसा लगता है कि मीडिया भी प्रतिष्‍ठानों (एस्‍टेब्लिशमेंट) के दबाव में घुटने टेक चुका है और ऐसे में जब एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी तब उन्हें तरह तरह से परेशान करने की कोशिश की गई। अक्टूबर 2012 को एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और उनके चैनल के दो संपादकों के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में FIR दर्ज करा दी गई और इसके बाद भी उन्हें और उनके ग्रुप को परेशान करने की कोशिशें जारी रहीं।

मौजूदा सरकार की कारगुजारी ने एक बार फिर राजीव गांधी और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के बीच चले संघर्ष की याद ताजा करा दी है। रामनाथ गोयनका ने शुरुआती दौर में राजीव गांधी को एक इमानदार व्यक्ति होने के नाते खुले तौर पर समर्थन किया था लेकिन बाद में राजीव गांधी कुछ गलत लोगों के चंगुल में फंस गए और कुछ ऐसे काम शुरु कर दिए जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे जिसके बाद राम नाथ गोयनका ने राजीव गांधी की आलोचना शुरू कर दी। बताया जाता है कि रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद पैदा होने के केंद्र में रिलायंस ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन स्वर्गीय धीरु भाई अंबानी की अहम भूमिका रही। धीरु भाई अंबानी की गलत सलाहों की वजह से रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए कि राजीव गांधी ने रामनाथ गोयनका द्वारा संचालित इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली और मुंबई में स्थित टावर्स को टेकओवर करने की भी विफल कोशिश की थी।

इसके खिलाफ प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, रामनाथ गोयनका ने भी खुले तौर पर राजीव गांधी और उनके प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सभी गैर कांग्रेसी दलों को लामबंद करके कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई। ये भी सच है कि जिस समय रामनाथ गोयनका, राजीव गांधी, उनकी पार्टी और उनकी सरकार से लड़ रहे थे उस समय भी देश की मीडिया बिरादरी (मीडिया फ्रेटरनिटी) या तो चुप थी या फिर तटस्थ थी। रामनाथ गोयनका इस लड़ाई में कई बार अलग-थलग भी पड़ते नज़र आए लेकिन उन्होंने अपने उस संघर्ष को निर्णायक अंत (लॉजिकल इण्‍ड) तक पहुंचाया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन और भारत में निजी क्षेत्र में टीवी चैनल शुरू करने के जनक सुभाष चंद्रा का दिया गया वक्तव्य एक बार फिर राम नाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच चले लंबे संघर्ष की याद को ताजा करता है।

स्वभावत: सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए अपने व्यावसायिक कारोबार को आगे बढाने के हिमायती सुभाष चंद्रा की बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की जनसभा में जाकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की अपील तमाम सवालों को जन्म देती है। यहां ये विचार करना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अराजनैतिक व्यक्तित्व वाले सुभाष चंद्रा एक राजनेता की तरह सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल करने की अपील कर रहे हैं और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल ये है कि देश की मीडिया बिरादरी क्यों मूकदर्शक बनकर महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की स्थिति को आत्मसात किए हुए है।

अक्टूबर 2012 से लेकर अब तक जेडएमसीएल ग्रुप को किसी ना किसी बहाने मौजूदा सरकार क्या इसीलिए टार्गेट करती रही कि इस ग्रुप के चैनलों ने राष्ट्रीय और प्राकृतिक संपदा की लूट को प्रमुखता और प्रभावी तरीके से देश की जनता के सामने उजागर किया? क्या मीडिया का रोल सिर्फ और सिर्फ सरकार और सत्ता में बैठे लोगों के लिए भोंपू का रह गया है। सच उजागर करना क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है और सच उजागर करने की मुहिम में शामिल मीडिया घराने के साथ मीडिया बिराददी को लामबंद नहीं हो जाना चाहिए। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब खोजना एक स्वस्थ लोकतंत्र और मीडिया की विश्वसनीयता
के लिए भी बेहद जरूरी है।

मीडिया को लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर देखा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है और देश की आज़ादी के बाद से अब तक मीडिया ये भूमिका निभाता भी रहा है। मीडिया के इतिहास में इमरजेंसी के काले अध्याय की बावजूद मीडिया ने अपनी मजबूती कभी नहीं खोई और कई मामलों मे देश और समाज के लिए अहम भूमिका भी निभाई है। देश को आजादी मिलने के बाद मीडिया के स्वरूप और इसके दायरे में एक बड़ा बदलाव आया। मीडिया के लिए हालात अब उतने मुश्किल नहीं थे जितने आज़ादी से पहले थे। समाचार-पत्रों को आजादी तो मिली ही थी साथ ही साथ साक्षरता दर भी बढ़ रही थी।

इसका नतीजा ये हुआ कि बड़ी संख्या में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। साथ ही रेडियो और टेलीविजन के विकास के लिए भी कदम उठाए गए जिनकी वजह से मीडिया जगत में बड़ा बदलाव देखा गया। अब मीडिया सच को ज्यादा ताकत और जिम्मेदारी के साथ लोगों के सामने ला रहा था। 1947 से लेकर 1975 तक का दौर मीडिया के लिए विकास का दौर था लेकिन 1975 में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बेड़ियां डाल दी गईं। इंदिरा गांधी उस वक्त प्रधानमंत्री थीं और विपक्ष भ्रष्टाचार और कमजोर आर्थिक नीतियों को लेकर उनके खिलाफ सवाल उठा रहा था। अपने खिलाफ बढ़ रहे विरोध को दबाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का एलान करके मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी। मीडिया की आजादी छीनी जा चुकी थी।
करीब 19 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया को घुटने टेकने पर मजबूर किया गया। उस समय जिन अखबारों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी वित्तीय सहायता रोक दी गई।

ये ऐसा दौर था जब पत्रकार चाहकर भी खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे थे। इमरजेंसी के दौरान अखबारों में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही ज्यादा नजर आती थी। सेंसरशिप के विरोध के तौर पर सम्पादक अखबारों में सम्पादकीय खाली छोड़ दिया करते थे। 1977 में जब चुनाव हुए तो मोरारजी देसाई की सरकार आई और उन्होंने प्रेस पर लगी सेंसरशिप को हटा दिया। इसके बाद अखबारों में आपातकाल के दौरान छिपाई गई बातों को छापा गया। बात चाहे आजादी से पहले की हो या आजादी के बाद की मीडिया अपना काम पूरी ताकत से करता रहा है। 1977 के बाद भी मीडिया लगातार चुनोतियों के बावजूद अपना काम बखूबी करता रहा है। जेसिका लाल का मामला हो या नीतीश कटारा का केस या फिर हाल में देश को झकझोर देने वाला निर्भया गैंगरेप केस इन मामलों में मीडिया ने अपनी भूमिका जिस तरीके से निभाई है वो सबके सामने है।

इसके अलावा प्रियदर्शिनी मट्टू, रिजवानुर रहमान, शिवानी भटनागर, रुचिरा गिरहोत्रा जैसे मामले या सुकना भूमि घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, आईपीएल में भ्रष्टाचार, ये सारे खुलासे मीडिया की वजह से ही संभव हो सके. ये सारे ऐसे मामले हैं, जिनमें मीडिया ने जनता की आवाज़ कार्यपालिका और न्यायपालिका तक पहुंचाई और सफलतापूर्वक कई निर्णयों को बदलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद ही क्यों, मीडिया ने आज़ादी की लड़ाई में भी अहम भूमिका निभाई। इतने साल पहले टीवी के बारे में सोचा नहीं जा सकता लेकिन उस वक्त जो अखबार निकलते थे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारी पैंफलेट, पोस्टर्स, हैंडबिल्स के जरिए सूचना फैलाने का काम किया करते थे। शायद इसके बिना इतनी बड़ी लड़ाई कामयाब ही नहीं हो पाती।

1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन शुरु हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर आलोचना की। राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता के जरिये सोशल ऱिफॉर्म को बढ़ावा दिया। ब्राह्मैनिकल मैगजीन के माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदी के जरिये उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 में कलकत्ता क्रोनिकल का संपादन करते हुए अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया।

हिन्दी में पहला अखबार लाने का क्रेडिट पंडित जुगल किशोर शुक्ला को जाता है। इन्होंने 1826 में उदन्त मार्तण्ड पत्र निकाला और अंग्रेजों की नीतियों की जमकर आलोचना की। अंग्रेजों ने इस अखबार के खिलाफ साम दाम दंड भेद सभी अपना लिए लेकिन जुगल किशोर शुक्ला ने आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए भी पत्रकारिता के जरिए देश के लिए काम करते रहे। इसके बाद अंग्रेज़ों प्रेस पर पाबंदी लगाने के लिए तमाम तरह के कानून बनाने शुरू कर दिए।

1857 की क्रांति के बाद गैगिंग एक्ट लाया गया जिसके तहत प्रेस पर ऐसा कोई भी न्यूज़ मैटीरियल छापने पर पाबंदी लगा दी गई जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हो। पूरी कोशिश की गई कि 1857 की क्रांति की खबरें ना फैलें। उस दौरान स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खां ने दिल्ली से पयामे आजादी पत्र निकाला जिसमें ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की गई। ब्रिटिश सरकार ने ना सिर्फ इस पत्र को बंद करने की कोशिश की बल्कि इस अखबार की प्रति रखने वाले को भी टॉर्चर किया।

अंग्रेज सरकार ने इसके बाद वर्नाकुलर एक्ट लाकर प्रेस की आज़ादी को छीनने की कोशिश की जिसके तहत प्रेस को सरकार के खिलाफ कुछ भी छापने की आज़ादी नहीं थी कुछ भी छापने से पहले अखबारों को ना सिर्फ सारी स्टोरीज़ दिखानी होती थीं बल्कि एक बॉन्ड भी साइन करना होता था। हालांकि इस एक्ट के खिलाफ पूरे देश की मीडिया एकजुट हो गई और तब तक इसका विरोध करती रही जब तक सरकार ने एक्ट वापस नहीं लिया। फिर धीरे धीरे दी हिन्दू, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका, द ट्रिब्यून जैसे कई समाचार पत्र सामने आए… लोकमान्य तिलक ने समाचार पत्र मराठा और केसरी के जरिए राष्ट्रवाद की भावना को और भड़काने का काम किया।

गांधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट किया और आज़ादी की लड़ाई को एक नई दिशा दी। नवभारत, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बंधु, यंग इंडिया जैसे कई अखबार गांधी के विचारों को आम लोगों तक पहुंचाने का काम करते थे। आजादी की लड़ाई के दौर में अकबर इलाहाबादी ने कहा था, “खींचों ना कमानो को, ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।“

ये वो वक्त था जब प्रेस की कलम की ताकत अंग्रेजों के तोप और तलवार पर भारी पड़ती थी। आज़ादी की लड़ाई में ये ताकत बहुत काम आई। आज भी मीडिया के पास उतनी ताकत है जो देश को और ताकतवर बना सके, कमी सिर्फ एकजुटता और जज्बे की है। साभार : जी न्‍यूज

चाटुकारिता या पत्रकारिता : वासिंद्र ने सुभाषचंद्रा की तुलना रामनाथ गोयनका से की

जी समूह के दो संपादक सुधीर चौधरी और समीर आहलुवालिया खबरों का दबाव बनाकर जिंदल ग्रुप से सौ करोड़ रुपए का विज्ञापन वसूलने की कोशिश में लगे थे, जिंदल ने स्टिंग करा दिया. मामला पुलिस के पास पहुंचा, पुलिस को आरोपों में दम दिखा, ब्‍लैकमेलिंग करने के आरोप में उसने जी समूह के दोनों संपादकों को अरेस्‍ट किया.

ब्‍लैकमेलिंग के आरोपों में बुरी तरह फंसे जी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा जोड़ तोड़ गुणा-गणित से जेल जाने से बच गए. वे मोदी के मंच पर भी दिखे. उन्‍हीं के चैनल के एक संपादक वाशिंद्र मिश्र ने उनकी तुलना अपने वेबसाइट पर रामनाथ गोयनका से कर दी है. अब आप ही तय करें इसे क्‍या कहा जाना चाहिए… नीचे वाशिंद्र का जी न्‍यूज पर प्रकाशित लेख.


भ्रष्ट तंत्र बनाम मीडिया

माना जाता है कि मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए। ऐसे में किसी मीडिया हाउस के मालिक का किसी पार्टी विशेष के पक्ष में आने पर सवाल खड़े होना लाजिमी है, लेकिन इसके साथ कुछ और सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए। ये सवाल उठने चाहिए कि आखिर इसकी वजह क्या है। आखिर क्या वजह है जिसने ऐसे हालात बनाए और ऐसा करने के लिए किन ताकतों ने मजबूर किया।

किसी आम आदमी से भी पूछकर देख लीजिए, आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि देश में CORRUPTION और POOR GOVERNANCE ने संवैधानिक संस्थानों तक की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया है। ऐसा लगता है कि मीडिया भी Establishment के दवाब में घुटने टेक चुकी है और ऐसे में जब ESSEL GROUP के चेयरमैन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी तब उन्हें तरह-तरह से परेशान करने की कोशिश की गई।

2 अक्टूबर 2012 को एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और उनके चैनल के दो संपादकों के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में FIR दर्ज करा दी गई और इसके बाद भी उन्हें और उनके ग्रुप को परेशान करने की कोशिशें जारी रही। मौजूदा सरकार की कारगुजारी ने एक बार फिर राजीव गांधी और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के बीच चले संघर्ष की याद ताजा करा दी है। रामनाथ गोयनका ने शुरुआती दौर में राजीव गांधी को एक इमानदार व्यक्ति होने के नाते खुले तौर पर समर्थन किया था लेकिन बाद में राजीव गांधी कुछ गलत लोगों के चंगुल में फंस गए और कुछ ऐसे काम शुरू कर दिए जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे। इसके बाद रामनाथ गोयनका ने राजीव गांधी की आलोचना करनी शुरू कर दी।

बताया जाता है कि रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद पैदा होने के केंद्र में रिलायंस ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन स्व. धीरु भाई अंबानी की अहम भूमिका रही। धीरु भाई अंबानी की गलत सलाहों की वजह से रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए कि राजीव गांधी ने रामनाथ गोयनका द्वारा संचालित इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली और मुंबई में स्थित टावर्स को भी टेकओवर करने की विफल कोशिश की थी। इसके खिलाफ प्रतिक्रिया स्वभाविक थी, रामनाथ गोयनका ने भी खुले तौर पर राजीव गांधी और उनके प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सभी गैर कांग्रेसी दलों को लामबंद करके कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई।

ये भी सच है कि जिस समय रामनाथ गोयनका राजीव गांधी, उनकी पार्टी और उनकी सरकार से लड़ रहे थे उस समय भी देश की media fraternity या तो चुप थी या फिर तटस्थ थी। रामनाथ गोयनका इस लड़ाई में कई बार अलग-थलग भी पड़ते नज़र आए लेकिन उन्होंने अपने उस संघर्ष को logical end तक पहुंचाया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में essel group के चेयरमैन और भारत में निजी क्षेत्र में TV चैनल शुरू करने के जनक सुभाष चंद्रा का दिया गया वक्तव्य एक बार फिर रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच चले लंबे संघर्ष की याद को ताजा करता है।

स्वाभावत: सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए अपने व्यावसायिक कारोबार को आगे बढाने के हिमायती सुभाष चंद्रा की बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की जनसभा में जाकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की अपील तमाम सवालों को जन्म देती है। यहां ये विचार करना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अराजनैतिक व्यक्तित्व वाले सुभाष चंद्रा एक राजनेता की तरह सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल करने की अपील कर रहे हैं और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल ये कि देश की media fraternity क्यों मूकदर्शक बनकर महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की स्थिति को आत्मसात किए हुए है।

अक्टूबर 2012 से लेकर अब तक ZMCL ग्रुप को किसी ना किसी बहाने मौजूदा सरकार क्या इसीलिए टार्गेट करती रही कि इस ग्रुप के चैनलों ने राष्ट्रीय और प्राकृतिक संपदा की लूट को प्रमुखता और प्रभावी तरीके से देश की जनता के सामने उजागर किया? क्या मीडिया का रोल सिर्फ और सिर्फ सरकार और सत्ता में बैठे लोगों के लिए भोंपू का रह गया है। सच उजागर करना क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है और सच उजागर करने की मुहिम में शामिल मीडिया घराने के साथ MEDIA FRATERNITY को लामबंद नहीं हो जाना चाहिए। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब खोजना एक स्वस्थ लोकतंत्र और मीडिया की विश्वसनीयता के लिए भी बेहद ज़रूरी है।

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स

आधारहीन खबरें लिखने के आरोप में वीकली का संपादक अरेस्‍ट

सिवनी। मध्यप्रदेश के सिवनी में कोतवाली थाना पुलिस ने दैनिक अखबारों के संपादकों के खिलाफ आधारहीन खबरें प्रकाशित करने के मामले में एक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक को कल गिरफ्तार किया।

पुलिस सूत्रों ने आज यहां बताया कि एक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक संजय उर्फ बंटी बघेल के विरुद्ध तीन दैनिक समाचार पत्रों के संपादकों और एक प्रादेशिक समाचार पत्र के प्रतिनिधि के द्वारा बीते माह 19 मार्च को आधारहीन खबरें प्रकाशित करके संपादकों की छवि धूमिल करने तथा अवैध रुप से राशि मांगने की शिकायत दर्ज कराई थी।

MJ— who has broken out of the most trying of personal circumstances

New entrants to the court of Mobashar Jawed Akbar are unlikely to accuse the scholar journalist of modesty. But then his achievements aren’t modest either. MJ, as he is popularly known, was in his early twenties when he became the editor of Sunday magazine.

Sure of his superiority, he wore it on his sleeve. But hours before the BJP named him national spokesperson this Tuesday, the man with the shining moustache sounded humble—perhaps like the class 11 boy who had dropped in long years ago at a well-known columnist’s office at Junior Statesman in Calcutta to submit a short story for publication and addressed him as ‘sir’. The other man who could have offered some light on that now-recessive trait of MJ died last week—Khushwant Singh, who hired the Presidency College, Calcutta, alumnus as a trainee journalist at The Illustrated Weekly of India.

In the House of Saffron, expectations are high that MJ, who no doubt has friends in high places, will play a pivotal role in hardselling Narendra Modi to the world. But the 63-year-old author of best- selling books such as Nehru: The Making of India and India: The Siege Within, says in a self-effacing tone, “That is very kind of you, but I know I am a small cog in a wheel.” Efforts are on to project Modi, the BJP’s prime ministerial aspirant, as a visionary like former Prime Minister AB Vajpayee, and the part ‘this new philosopher’ in the court of the BJP czar will play, party insiders say, is ‘crucial’.

Seated in his spartan Maharani Bagh office, MJ dwells at length on development aimed at uplifting the poor. As a new member of the party where ideas are increasingly preferred over ideology, he comes across as focused, opinionated, sometimes dismissive and yet kind and humorous. Not inclined to tolerate “empty talk”, he wouldn’t hesitate to snap at you for what he feels are perfunctory questions. What particularly irks him are stereotypical questions hurled at him over his switching sides to the BJP from being a fellow traveller of the Congress. He was a spokesperson for the Congress some 24 years ago when his friend, the late Prime Minister Rajiv Gandhi, was at the party’s helm.

So MJ, one of Indian journalism’s greatest stylists, wants to focus on tangibles, not “boring” stuff.

FIGHTING POVERTY

MJ Akbar, whose grandfather was a Hindu, was born in “a small basti near a jute mill” in West Bengal’s Hooghly district in 1951. Now, when he visits his birthplace, the impoverished and decrepit Telinipara, it hurts him deeply to see that nothing has changed for the poor. It is a forlorn locality where, they say, if a worker smiles once a fortnight he is considered lucky.

Hard-nosed and quick-witted, MJ— who has broken out of the most trying of personal circumstances and set high professional standards—puts the blame for this abject poverty of the “other India”, that of the poorest of poor, on policies pursued by a party he once represented briefly in Parliament. The Congress party of 1989, the year MJ was elected MP, is no longer the same, he notes; it has degenerated. The UPA Government of Manmohan Singh, which was in power for the past 10 years, has dashed the hopes of the poor, he declares. “All aspirations have been kicked down a dark hole. We need a national recovery mission. And somebody has to lead that mission,” he notes, referring to the BJP campaign spearhead. He vows to work towards ensuring that the rewards of development go first to the poor. “I really believe that we are going to see a development decade ahead,” he says.

For MJ, the process of writing is very important. He sees every book as self education. Then it becomes another step in an eternal enquiry, he says. In the process, over the years, the top-notch editor has also learnt to appreciate what he terms ‘visible reality’—and to understand what works and what doesn’t. Well-travelled within and outside India, he has been a regular visitor to Gujarat’s hinterland since the late 1970s. Road connectivity was poor and power supply erratic—infrastructure facilities in the state were as bad as they were in the rest of northern and eastern India. Lately though, MJ has seen some quick changes in the state.

“I hope I have some common sense,” says MJ who has faith in the ‘Gujarat model of development’ championed by Modi, which has kicked up a storm with renowned economists such as Jagdish Bhagwati and Arvind Panagariya lapping it up as a ‘role model’ and Nobel laureate Amartya Sen trashing it. While he doesn’t pass judgment on either Professor Sen or Bhagwati, he is glad that Gujarat is now a “generator-free” state. MJ asks naysayers to question why Gujarat has no market for power generators. “Why? You can [also] take a look at the infrastructure of its cities. You can take a look at the spread of [Gujarat’s] education system. You can take a look at the status of jobs offered to minorities,” says this fan of Amitabh Bachchan, the Bollywood superstar who happens to be a brand ambassador for the state. MJ wants Modi-baiters to take a look at the “figures produced by the Government of India” to dispel their doubts. “Truth cannot become a convenient truth,” says MJ.

WHY HE WAS WRONG ABOUT MODI

For someone who has founded and edited several publications such as The Telegraph, The Asian Age and others, MJ exudes an avuncular aura. And his columns and reports are mind-tinglingly good, yet he knows only too well that attributing finality to journalistic commentaries is a sin that deserves no mercy. Not that he ever condoned sloppy reporting. He was, on the other hand, a terror in the newsroom, a stickler for perfection and a conjurer of the snappiest of headlines. Sankarshan Thakur, one of his protégés at The Telegraph, writes in an article titled "The Tailor of Telinipara", with much admiration, “Believe me, this man could bleed you from orifices you did not know existed—such was the daily tyranny of distinctions you lived under.”

Like most editors, he too had attacked Modi over the Gujarat riots of 2002. In a profession where reacting to immediate circumstances is the name of the game, it is often easy to err. Such hazards are par for the course, because “while fiction is about contemporary life, journalism is about temporary life”, he says.

Rajiv Gandhi’s former buddy wants to thank the UPA Government for exonerating Modi. “In 10 years they have answered every question raised by me and many others. The whole effort of the past 10 years was not to find the guilty, but to link one man called Narendra Modi to that guilt. That is the only objective for which the police, lawyers, courts and turncoats, bureaucrats—all of them were used,” he says angrily. “If this investigation [of the Gujarat riots] had been done by an NDA Government, you may not have found it credible,” he thunders. “So whatever I wrote [against Modi] was wrong. And time has proved it to be,” MJ explains with a guffaw intended at sweetening his outbursts.

Cartoons may have appeared portraying him talking of Modi doing Jesus-like tricks such as walking on water, but MJ, who has authored books such as The Shade of Swords, Riot After Riot, Blood Brothers, says what struck him deeply about Modi are his rare leadership qualities— he says some of those were on full display at his 27 October Patna rally hit by serial blasts. When bombs were bursting in Patna at that rally, it was a threat to the audience, but there was also a threat to Modi. And at that moment it is not usually the “head” that takes charge of your senses, it is the “heart and the nerve”. Modi could have been emotional at that point. Instead, he was cool, focused and composed. He said something that resonates with MJ: Hindus must decide whether they want to fight Muslims or they want to fight poverty, and Muslims must decide whether they want to fight poverty or fight Hindus. MJ admits that it was the Patna address that blew his mind. He dismisses talk of him being a rank opportunist who veered towards the BJP, favourites to win this year’s polls, explaining that he prefers to “shrug and carry on” because in a democracy like India nobody can stop anyone from saying what they like. “Now, the most important thing is to live with my mirror and be true to myself,” he says raising the timbre of his voice as he speaks, stressing the words ‘mirror’ and ‘true’, and ending in a low growl.

Long ago, when MJ joined the Congress party, there was a similar outcry and he can’t forget the beast his announcement unleashed. How can a promising young editor join a dispensation scarred by the Bofors scandal? So sceptics asked. There was stardom then. Now MJ seeks an opportunity to give back to society.

Unlike the likes of the great writer and rhetorician Christopher Hitchens who shifted his loyalty from the Left to the Right overnight citing the 9/11 New York attacks, our own chronicler of the history and plight of minorities in the Subcontinent describes his transition as a gradual one. Not that he didn’t wish to be as blessed as St Paul on the road to Damascus (who was converted through divine intervention on his way), MJ says with a scholarly flourish. MJ’s journey has often been tough: he has won laurels for his sparkling prose but has also been stung by the actions of certain people whom his former mentor Kushwant Singh referred to as those “with less breeding and more money”.

ABOUT FORGING AHEAD

As a Congress MP from Kishanganj in Bihar between 1989 and 1991, he had seen first-hand how welfare schemes work, and believes such “positive discrimination” is right and necessary. “Do you think the West survives without social- welfare schemes? If they didn’t have it, there would be insurrection on the streets. But what people need are jobs. Welfare schemes operate only as a social net. The primary objective therefore has to be on legitimate ways of creating employment,” states MJ.

Having learnt Public Service 101 at the grassroots, MJ is profoundly excited about Modi’s plan to build 100 new cities. “It means jobs down the line and the priority of the next government should not be just jobs, but jobs for the poorest. The curse of poverty has to end in 10 years and that can be done by making the economy of the country meaningful for those at the bottom. And that is the great challenge,” says he. The man is also attracted by the idea of rebuilding India’s east—his home turf—which has fallen far behind in development as well as on human development indices. “It is in such areas that we need to focus on. Modi has many such great ideas. I am only giving an example of the imaginative thinking on the horizon,” MJ says, adding that the country should look at international relations with a fresh mind.

MJ’s last book was on Pakistan. He is a voracious reader too, and falls back on Mahatma Gandhi and various other leaders of the freedom struggle for intellectual inspiration. At his bedside, he keeps books by Agatha Christie and PG Wodehouse; he reads Christie when he is happy and Wodehouse when he is pensive.

In Tinderbox: The Past and Future of Pakistan, he concluded that Pakistan is a jelly state—which will not collapse, but will remain unstable. In the face of dynamic geopolitics, he has often warned against India’s stagnant foreign policy. MJ faults the Manmohan Singh Government for miscalculations on dealing with the neighbours, especially Pakistan. His policy was very much a part of a continuum and one of its underpinnings, regrettably, was emotional rather than practical, MJ points out. “I think we drifted along, propelled by a stagnant flow of understanding. We can’t afford it anymore,” says the author who says he has exhausted the sequence of books that dealt with the state of Muslims in the Subcontinent and the world. He adds, “We have to understand the nature of the adversary… tactical battles and strategic battles.”

MJ is well-read, caustic, defiant and outspoken. He is also an ideasmith who loves books but finds James Joyce’s Ulysses unreadable. He is copy fiend who spikes clichés. He also has strong views on India’s foreign-policy front: India’s challenges are numerous, especially because “the war zone of tomorrow” lies between the Brahmaputra and the Nile. “Very much at our doorsteps,” says this music aficionado who enjoys songs in Hindi, Urdu and Bhojpuri when he is not gorging on books on history. A Dev Anand fan, he stopped “worshipping” actresses after he began to see them in real life, confides this father of two—Prayaag and Mukulika—and husband of former journalist Mallika Joseph whom he met at the Illustrated Weekly. “I can only go back to actresses I have never seen in real life. There is Madhubala. I also like Vyjayanthimala,” MJ says, gesturing with folded hands.

For those familiar with the tessellated polish of his style, maybe the best of him is yet to emerge—as a public servant and an apostle of Modi’s development mantra. साभार : ओपेन

केवी में डीएनए की महिला पत्रकार को बनाया गया बंधक

इंदौर. पत्रकारों पर हमले और अभद्रता की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। इंदौर के संयोगितागंज थाना क्षेत्र में स्थित केंद्रीय विद्यालय में गुरुवार को ऐसी ही घटना घटी। केवी के अध्‍यापक एवं कर्मचारियों ने अंग्रेजी अखबार डीएनए की रिपोर्टर को घंटों तक बंधक बनाए रखा। महिला पत्रकार की शिकायत पर पुलिस ने केवी की वाइस प्रिंसिपल और कई पुरुष कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

महिला पत्रकार श्रुति माहवाहा दोपहर में स्कूल में कोर्स के बारे में जानकारी लेने गई थी। वे स्कूल के एक अधिकारी हरिओम कौशिक से अनुमति लेकर वहां पहुंची थी। उन्होंने ही वाइस प्रिंसिपल और स्टॉफ के अन्य सदस्यों से मिलवाया था। वहां उन्हें एक संविदा शिक्षिका के साथ पांचवीं कक्षा में भेजा गया। महिला पत्रकार ने कुछ किताबों के फोटो खींचे तो स्कूल स्टॉफ ने उनसे सवाल- जवाब शुरू कर दिया। उन्हें वाइस प्रिंसिपल के चैंबर में ले जाया गया और आईडी कार्ड मांगा गया।

पुलिस को की गई शिकायत में श्रुति ने बताया है कि वे आईडी कार्ड लेकर नहीं आई थीं। पर उन्‍होंने कहा कि वे शिक्षा विभाग के अधिकारियों से इस संदर्भ में बात करवा सकती हैं, लेकिन उनकी कोई बात नहीं सुनी गई। इस बीच श्रुति ने वाइस प्रिंसिपल के बयान रिकॉर्ड करने की कोशिश की तो उन्होंने पुरुष कर्मचारी को मोबाइल छीनने के आदेश दिए। पुरुष कर्मचारी ने श्रुति का पीछा किया और दौड़ाया।

श्रूति ने बताया कि इतना ही नहीं पार्किंग एरिया में उसे 7-8 पुरुष कर्मचारियों ने घेर लिया। वे बदतमीजी करने लगे। मोबाइल छीनने की कोशिश करने लगे। लगभग एक घंटे तक उन्‍हें बंधक बनाकर वहीं रोके रखा गया। बाद में श्रुति ने अपने ऑफिस कॉल किया तब उनलोगों ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने उन्‍हें केवी के कर्मचारियों से मुक्‍त कराया। संयोगितागंज पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ बंधक बनाने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में आईपीसी 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया है।

आफगानिस्‍तान में जर्मन फोटोजर्नलिस्‍ट की हत्‍या, कनाडा की पत्रकार घायल

काबुल : अफगानिस्तान में शनिवार को होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव से ठीक एक दिन पहले दो विदेशी महिला पत्रकारों पर हमला हुआ है. हमला करने का आरोप एक पुलिसकर्मी पर लगा है. खोस्त में हुए इस हमले में जर्मनी की फोटो जर्नलिस्‍ट मारी गयी हैं और कनाडा की पत्रकार बुरी तरह जख्मी हुई हैं. मारी गई महिला फोटो जर्नलिस्‍ट को प्रतिष्ठित पुलित्‍सर पुरकार मिल चुका है.

जर्मनी की आन्या नीडरिंगहाउस और कनाडा की कैथी गैनन समाचार एजेंसी एपी के लिए काम कर रही थीं. आन्या नीडरिंगहाउस नामी युद्ध फोटोग्राफर थीं और उन्हें अफगानिस्तान के उस इलाके और दूसरे विवादित इलाकों का सालों कवरेज करने का अनुभव था. वे 2002 से एपी के लिए काम कर रही थीं. उन्हें और उनकी टीम को इराक युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए पुलित्सर पुरस्कार मिला था.

गंभीर रूप से घायल कैथी गैनन को अस्पताल में भर्ती किया गया है. दोनों पत्रकारों पर हमला पाकिस्तान की सीमा से लगे एक छोटे से शहर खोस्त के पुलिस मुख्यालय में हुआ. हमले के काफी समय बाद तक हमलावर की पहचान को ले कर अटकलें लगती रहीं. लेकिन अब खोस्त के गवर्नर के प्रवक्ता ने कहा कि हमला वाकई एक पुलिसकर्मी ने ही किया. रॉयटर्स से बात करते हुए मोबारिज जदरान ने कहा कि नकीबुल्लाह खोस्त के तनाई जिले का पुलिसकर्मी है. उसी ने दो विदेशी पत्रकारों पर गोलियां चलाईं. इसमें एक की मौत हो गयी और एक घायल हुई है.

समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार वारदात जिले के पुलिस मुख्यालय में हुई है. न्यूयॉर्क के एपी मुख्यालय ने अब तक हमले की पुष्टि नहीं की है. वारदात की पृष्ठभूमि स्पष्ट नहीं है. दोनों रिपोर्टर राष्ट्रपति चुनाव की रिपोर्टिंग कर रही थीं और शुक्रवार को ही खोस्त पहुंची थीं. तालिबान ने पहले ही इस बात की धमकी दी थी कि धमाकों और लोगों पर हमलों से चुनावों को भंग करने की कोशिश की जाएगी. पिछले महीने तालिबान ने राजधानी काबुल में हमला करके समाचार एजेंसी एएफपी के वरिष्ठ पत्रकार सरदार अहमद की हत्‍या कर दी. इस हमले में अहमद के परिवार के तीन सदस्‍यों समेत 11 लोगों की मौत हो गई थी. 11 मार्च को हुए एक और हमले में स्वीडन के पत्रकार नील्स हॉर्नर की मौत हो गई थी.

फोटो जर्नलिस्‍ट रेपकेस : तीन आरोपियों को मौत, एक को आजीवन कारावास की सजा

मुंबई : मुंबई की एक अदालत ने शुक्रवार को पिछले साल शहर के सुनसान शक्ति मिल्स में अलग-अलग घटनाओं में दो फोटो पत्रकार एवं एक अन्‍य युवती से सामूहिक बलात्कार के दोषी पाए गए तीन आरोपियों को मौत तथा एक आरोपी को आजीवन करावास की सजा सुनाई गई। इस मामले में अदालत ने बलात्कार के कई मामले में दोषी पाए जाने से जुड़े नए कानून के तहत पहली बार सजा सुनाई।

अभियोजन पक्ष ने बलात्कार के मामले में फिर दोषी पाए गए विजय जाधव, कासिम बंगाली और सलीम अंसारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (ई) के तहत मृत्युदंड की मांग की थी। प्रधान न्यायाधीश शालिनी फानसाल्कर जोशी ने मौत की सजा सुनाते हुए कहा कि इन तीनों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। हालांकि फैसला सुनाने से पहले अदालत ने विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम की दलीलों पर विचार किया। निकम ने कहा था कि कि जिन परिस्थितियों में अपराध किया गया है, उसके लिए दोषियों को अधिकतम सजा मिलनी चाहिए।

अदालत ने गुरुवार को इन तीन आरोपियों को बलात्कार के कई मामलों में दोषी ठहराए जाने से जुड़ी आईपीसी की धारा के तहत दोषी ठहराया। इस धारा के तहत अधिकतम मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है। देश में इस संशोधित धारा के तहत पहली बार सजा सुनाई गई। इस धारा को वर्ष 2012 में दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद जोड़ा गया था। मुंबई में सामूहिक बलात्कार की दो घटनाएं दो महिलाओं – एक टेलीफोन आपरेटर और एक फोटो पत्रकार से जुड़ी हैं। ये घटनाएं पिछले साल मध्य मुंबई में स्थित शक्ति मिल्स परिसर में कुछ हफ्तों के अंतराल में हुई थीं।

पिछले साल जुलाई में 18 साल की टेलीफोन आपरेटर जबकि अगस्त में 22 वर्षीय फोटो पत्रकार से सामूहिक बलात्कार किया गया था। फोटो पत्रकार का विजय जाधव, कासिम बंगाली, सलीम अंसारी, सिराज रहमान और एक नाबालिग लड़के ने बलात्कार किया था। दोनों मामलों में शामिल तीन दोषियों को मृत्युदंड की सजा दी गई जबकि फोटो पत्रकार बलात्कार मामले में सिराज को आजीवन कारावास की सजा मिली।

शगुन चैनल पर भी अपशगुन, कई लोग हुए बाहर

नोएडा : टीवी चैनल शगुन का शगुन आज गड़बड़ा गया। गड़बड़ा क्‍या, सत्‍यानाश हो गया। खबर है कि अनुरंजन झा की जुगाड़-टेक्‍नालॉजी से खड़ा हुआ यह चैनल आपसी बंटवारा के बवाल के चलते बंटाधार हो गया। देर शाम को ही इस चैनल के सारे कर्मचारियों को नोटिस थमा दी गयी कि :- दुकान बंद हो चुकी है, अब कल से आफिस मत आना। कहने की जरूरत नहीं कि इससे इस चैनल के दर्जनों कर्मचारियों पर जबर्दस्‍त बज्रपात हुआ है। हालत इतनी टाइट है कि यह कर्मचारी भुखमरी की शिकार होते जा रहे हैं। वजह यह कि दो महीनों से ही यह चैनल अपने कर्मचारियों को वेतन तक वेतन नहीं दे पाया था।

कई चैनलों को शुरू और बंद करवाने में बाकायदा महारत हासिल कर चुके अनुरंजन झा ने इस चैनल को पैदा करने मेहनत की थी। शगुन के नाम पर यह इंटरमेंट चैनल शुरू हुआ था। इसमें एक बड़े अफसर सीडी चक्रधर का पैसा लगाया गया बताया जाता है। इस चैनल में करीब तीन दर्जन कर्मचारी शामिल किये गये थे। झा और चक्रधर ने कर्मचारियों के सामने खूब हांका था कि यह चैनल जल्‍दी ही चैनल की दुनिया में श्रेष्‍ठतम दर्जा हासिल कर लेगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। बताया जाता है कि इसमें लूट-खसोट के कीड़े बड़ी तादात में घुस गये थे और इस चैनल को देसी शौचालय के सोग-पिट जैसा बना डाला गया था।

कुछ भी हो, झा के इस चैनल में पिछले दो महीनों से चक्रधर ने पैसा देना बंद कर दिया था। हालत पतली ही जा रही थी। अब कल शाम झा ने सारे कर्मचारियों के सथ मीटिंग की और चैनल की बंदी का ऐलान कर दिया। बोले : अगले एक पखवाड़े में सारे कर्मचारियों का हिसाब-किताब हो जाएगा। आप लोग अब आफिस आना बंद कर दें। यह सुनते ही सारे कर्मचारियों पर मानो सांप ही सूंघ गया। कर्मचारियों ने तय किया है कि अगर एक पखवाड़े के भीतर सारे देयों और नोटिस आदि की रकम अदा नहीं की गयी तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उधर पता है कि अनुरंजन ने शगुन की बंदी के पहले ही अपने लिए एक नये चैनल की नाव पकड़ ली है। इस संदर्भ जब चैनल के हेड और सीईओ अनुरंजन झा से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि हां, मैंने टीम छोटी कर दी है। अब यह चैनल रिकार्डिंग मोड में डाल दिया गया है।

कुमार सौवीर की रिपोर्ट. श्री सौवीर यूपी के वरिष्‍ठ तथा तेजतर्रार पत्रकार हैं.

फोटो जर्नलिस्‍ट रेप केस : मुंबई की कोर्ट आज सुना सकती है फैसला

मुंबई : शक्ति मिल में फोटो पत्रकार से सामूहिक बलात्कार के मामले में सुनवाई कर रही सत्र अदालत मामले के तीन दोषियों की सजा की घोषणा आज कर सकती है। एक अन्य सामूहिक दुष्कर्म कांड में भी दोषी ठहराये गये तीनों शख्सों पर बलात्कार के मामले में एक नयी धारा लगाई गयी है जिसमें मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान है।

विशेष सरकारी अभियोजक उज्ज्वल निकम ने कहा कि अदालत ने तीन गवाहों के बयानों की रिकॉर्डिंग पूरी की जिन्हें कल फिर से बुलाया गया था। अंतिम दलीलों पर सुनवाई गुरुवार को शुरू होगी जिसके बाद फैसला आ सकता है। अदालत ने पिछले महीने आईपीसी की धारा 376 (ई) के तहत अतिरिक्त आरोप तय किया था। बार बार बलात्कार करने के अपराध से जुड़े प्रावधान में अधिकतम सजा मृत्युदंड है।

मामले के तीनों दोषी कासिम बंगाली, विजय जाधव और मोहम्मद सलीम अंसारी एक टेलीफोन ऑपरेटर के साथ सामूहिक बलात्कार कांड में भी दोषी करार दिये जा चुके हैं। 18 वर्षीय टेलीफोन ऑपरेटर के साथ पिछले साल जुलाई में शक्ति मिल परिसर में सामूहिक बलात्कार किया गया था। इस घटना के एक महीने बाद 22 अगस्त को फोटो पत्रकार के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना सामने आई। इस बीच अदालत ने एक आरोपी को बंद कमरे में सुना, जिसने कहा था कि वह कुछ कहना चाहता है। तीनों दोषियों को टेलीफोन ऑपरेटर के साथ सामूहिक दुष्कर्म कांड में पहले ही उम्रकैद की सजा दी जा चुकी है। (एजेंसी)

सुधीर चौधरी को कोर्ट में झटका, जिंदल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा खारिज

: जिंदल से जुड़े कार्यक्रमों में एनबीए की गाइड लाइन अनुसरण करने का निर्देश : नयी दिल्ली : राजधानी की एक निचली अदालत ने कांग्रेस सांसद एवं उद्योगपति नवीन जिंदल के खिलाफ जी न्यूज के संपादक एवं बिजनेस हेड सुधीर चौधरी की मानहानि याचिका खारिज कर दी है.

पटियाला हाऊस अदालत के न्यायाधीश धीरज मित्तल ने श्री चौधरी द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे को निरस्‍त कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि श्री जिंदल समेत 17 लोगों ने अक्टूबर 2012 में आयोजित एक संवाददाता सम्‍मेलन में उनका अपमान किया था.
      
न्यायालय ने कहा कि जिंदल स्टील एवं पावर लिमिटेड (जेपीएसएल) द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में दिए गए वक्तव्य शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने की आपराधिक मंशा अथवा सोची समझी रणनीति का हिस्सा कतई नहीं थे. न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि श्री जिंदल सहित सभी आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ मानहानि का अपराध साबित नहीं होता है. इस प्रकार मौजूदा शिकायत निरस्त की जाती है.

इस बीच एक अन्य मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने जी न्यूज को श्री जिंदल या उनकी कंपनी से संबंधित कार्यक्रमों के प्रसारण में न्यूज ब्रॉडमास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के दिशा-निर्देशों का अनुसरण करने का निर्देश दिया.

सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा – नहीं हैं जमानत के लिए दस हजार करोड़ रुपए

नई दिल्ली : सहारा ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट से गुरुवार को कहा है कि सहारा के पास सहारा प्रमुख सुब्रत राय की जमानत के लिए 10 हजार करोड़ रुपये नहीं है। सहारा समूह की तरफ से सर्वोच्‍च अदालत को बताया गया है कि वह इतनी बड़ी जमानत राशि दे पाने में असमर्थ है। सहारा ने कोर्ट को एक नया प्रस्‍ताव दिया है। समूह की तरफ से कहा गया कि वह 5000 करोड़ रुपए दे सकता है, जिसमें 2500 करोड़ रुपये तुरंत तथा शेष 2500 करोड़ की राशि अगले 21 दिन के भीतर जमा करा देगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत राय सहारा की जमानत के लिए 10 हजार करोड़ रुपये जमा करने की शर्त रखी थी। इससे पहले कोर्ट ने 27 मार्च को सुनवाई के दौरान उन्हें कोई राहत नहीं देते हुए 3 अप्रैल तक जेल में रहने का फरमान सुनाया था। गौरतलब है कि सहारा ग्रुप ने उनकी जमानत के लिए उस सुनवाई के दौरान भी 10,000 करोड़ रुपये की रकम देने में असमर्थता जताई थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत देने से इनकार कर दिया था।

इस मामले में सहारा प्रमुख व कंपनी के दो अन्य निदेशकों को अदालत ने चार मार्च को न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। सहारा की ओर से पेश प्रस्ताव में कहा गया कि 2,500 करोड़ की पहली किस्त तीन दिन के भीतर दे दी जाएगी। लेकिन इसके लिए खाते के संचालन पर लगी रोक हटानी होगी। 3,500-3,500 करोड़ रुपये की दूसरी, तीसरी और चौथी किस्त का भुगतान 30 जून, 31 सितंबर और 31 दिसंबर को किया जाएगा। पांचवी और आखिरी किस्त के रूप में सेबी को 7,000 करोड़ रुपये का भुगतान 31 मार्च, 2015 को किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह के इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था तथा सुब्रत रॉय की जमानत के लिए समूह को दस हजार करोड़ रुपए जमा कराने को कहा था। सहारा समूह के कर्मचारी भी अपने तरफ से पैसे जुटाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन कोई उत्‍साहजनक रिजल्‍ट नहीं आ पाया। फिलहाल सुब्रत राय की जमानत के मसले पर सुप्रीम कोर्ट मे सुनवाई जारी है।

तेजपाल के समर्थन में क्‍यों उतर गए अनुराग कश्‍यप?

दिल्‍ली : फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप अब रेप के आरोपी तहलका के फाउंडर एडिटर तरुण तेजपाल का बचाव करने कूद पड़े हैं. अनुराग ने फेसबुक पर तेजपाल के पक्ष में लिखकर अपनी बात रखी है. उनके इस कदम से उनके समर्थकों में भी नाराजगी है, जबकि विरोधियों को मौका मिल गया है.  अनुराग ने फेसबुक पर लिखा कि मैंने सीसीटीवी फुटेज भी देखी है और इसमें वैसा कुछ भी नहीं है, जैसा वह लड़की तरुण तेजपाल के बारे में कह रही है.

जानी मानी पत्रिका तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल पर अपनी जूनियर सहकर्मी पत्रकार से रेप का आरोप है. वे इसी मामले में जेल में बंद हैं. गोवा की पणजी फास्ट ट्रैक अदालत में मामले की सुनवाई होनी है. अनुराग के अचानक तेजपाल के समर्थन में उतरने को लेकर कयास लगा रहा है. हालांकि अभी तक यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया है कि कश्यप अचानक तरुण तेजपाल के समर्थन में क्यों उतर आए.

तेजपाल पर पिछले साल नवंबर में गोवा के एक पांच सितारा होटल की लिफ्ट में सहकर्मी महिला पत्रकार से बलात्कार, यौन उत्पीड़न और उसकी मर्यादा भंग करने का आरोप है. इसके बाद ही गोवा पुलिस ने उन्‍हें हिरासत में लिया था. शुरुआती जांच के बाद पुलिस ने उन्‍हें कोर्ट में पेश किया जहां से उन्‍हें जेल भेज दिया गया. वे अब भी जेल में ही बंद हैं.

मुंबई पत्रकार रेपकांड : तीन गवाहों को दुबारा बुलाए जाने की इजाजत

मुंबई : फोटो पत्रकार सामूहिक बलात्कार मामले की सुनवाई कर रही एक सत्र अदालत ने तीन दोषियों के खिलाफ अतिरिक्त अभियोग तय करने के सिलसिले में तीन गवाहों को दोबारा बुलाए जाने और उनसे जिरह की इजाजत की मांग करने वाली बचाव पक्ष की अर्जी स्वीकार कर ली है। अदालत ने पिछले महीने आईपीसी की धारा 376 ई (बलात्कार का अपराध दोहराने को लेकर सजा) के तहत एक अतिरिक्त अभियोग तय किया था, जिसमें  अधिकतम दंड के रूप में मौत की सजा तक हो सकती है।

कासिम बंगाली, विजय जाधव और मोहम्मद सलीम अंसारी को टेलीफोन ऑपरेटर सामूहिक बलात्कार मामले में भी आरोपी हैं, जिसके साथ शक्ति मिल परिसर में फोटो पत्रकार सामूहिक बलात्कार कांड से करीब एक महीने पहले सामूहिक बलात्कार हुआ था। विशेष अभियोजक उज्ज्वल निकम ने बताया कि अदालत ने तीन गवाहों को दोबारा बुलाए जाने की इजाजत दे दी है और उनसे कल जिरह की जाएगी। कल गवाही देने वाले तीनों गवाह पुलिस अधिकारी हैं।

हालांकि शुरुआत में बचाव पक्ष के वकील आरजी गाडगिल ने आरोपी कासिम बंगाली की ओर से पेश होते हुए अर्जी देकर चार गवाहों को दोबारा बुलाए जाने का अनुरोध किया था, पर अदालत ने सिर्फ तीन गवाहों को बुलाए जाने की इजाजत दी। प्रिंसिपल जज शालिनी फांसलकर जोशी ने गाडगिल को कहा कि वह सिर्फ नये आरोपों के बारे में ही गवाहों से जिरह करें। (पंके)

पणिनी बनेंगे राज्‍यसभा टीवी के सलाहकार संपादक, लक्ष्‍मण सिंह की नई पारी

आउटलुक पत्रिका से जुड़े रहे वरिष्‍ठ पत्रकार पणिनी आनंद अब अपनी नई पारी शुरू करने जा रहे हैं. वे राज्‍यसभा टीवी के साथ सलाहकार संपादक के रूप में जुड़ेंगे. पणिनी बीसीसी, एनबीटी, हिंदुस्‍तान, जनसत्‍ता और सहारा समेत कई संस्‍थानों के साथ वरिष्‍ठ पदों पर जुड़े रहे हैं. हालांकि इस संदर्भ में पणिनी से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन बात नहीं हो पाई.

अमर उजाला, बरेली से सेवानिवृत हो चुके वरिष्‍ठ पत्रकार लक्ष्‍मण सिंह भंडारी ने अपनी नई पारी बरेली में ही कैनविज टाइम्‍स के साथ शुरू की है. वे बरेली के अलावा हल्‍द़वानी में भी लंबे समय तक अमर उजाला से जुड़े रहे हैं. उन्‍हें कै‍नविज में समाचार संपादक बनाया गया है.

ये ‘दीन’ संपादक ‘प्रभात’ बनकर अवतार ले चुके हैं

किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगे
मल्लाहों तुम परदेसी को बीच भँवर में मारोगे,
मुँह देखे की मीठी बातें सुनते इतनी उम्र हुई
आँख से ओझल होते होते जी से ही बिसारोगे।

बहुत कुछ निहित है इन लाइनों में। कर्कश भाषा में तथाकथित मुहिम और तुरही का बखान करूं तो बस इतना ही कि सुहाग के लुटेरे तो बारातियों के अगुआ बने हुए हैं। अपनी गिरेबां में झांककर भी देखो। मीडिया से भ्रष्टाचार मिटाने के स्वयंभू ठेकेदार जी…आप दो दर्जन से ज्यादा लोगों का निवाला छीनने के आरोपी हैं। हद है… आपने तो नेताओं की भी लोमड़ी मानसिकता को मात दे दी।

दोस्तों, उपरोक्त पंक्तियों में व्यक्त की गई मेरी ये प्रतिक्रिया एक स्वनामधन्य अखबार और बड़े वाले संपादक की मुहिम के इश्तहार के संदर्भ में है। महानुभाव ने घोषणा की है कि वे जमीर और खबर नहीं बेचते। उन्हें चुनावी सीजन में महसूस हुआ है कि पेड न्यूज के कारण भारतीय मीडिया की बड़ी छीछालेदर हुई है। मालिक मलाई काट रहे हैं और पत्रकार की दशा दयनीय हो चली है। ऐसे घनघोर संकट की दशा में नाम के 'दीन' समाधान का 'प्रभात' बनकर अवतार ले चुके हैं।

संपादक महोदय ने जिस सलीके से पत्रकारिता और पत्रकारों की आबरू संभाल लेने की घोषणा की है उससे यही संदेश जाता है कि मानो आकाशवाणी हुई हो कि –हे भक्तजनों अब चिंता मत करो, पाप का समूल नाश करने के लिए ईश्वर एक संपादक के रूप में अवतार ले चुका है। इतना सुनना था कि चापलूसों का कुनबा भावविभोर हो गया। फेसबुक पर अपनी भावना भी व्यक्त की। भक्तों के मुंह से अचानक हर्षघ्वनि निकली और कह बैठे कि हे संपादक स्वरूप प्रभो…आपने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में अपनी अवतार स्थली तय कर बड़ी कृपा की है। लीला रास करने के लिए घोषणापत्र जारी कर आपने मानो नियामत पेश की है।

मैं आपको बताना चाहता हूं कि फेसबुक पर मैने कमेंट के खांचे में जब अपनी प्रतिक्रिया पोस्ट की तो उसे सुधी संपादक ने हटा दिया। वजह ये कि खुद को पत्रकारिता की पहली किरण समझने वाले संपादक जी तारीफ और चापलूसी सुनने के लती हो चुके हैं। उन्हें भी अब किसी मुखौटेदार नेता की तरह असलियत सुनना नागवार लगता है। यही कारण है कि उनके हर हर्फ पर स्तुतिगान होता है और भक्त फल की इच्छा में पानी पी-पीकर गुणगान करते रहते हैं। व्यवहारिक भी है कि जब बिना प्रसन्न हुए भगवान-फलदान नहीं करते तो फिर कोई दीन-दानवान कैसे हो सकता है।

असल तो ये है कि तथाकथित स्वयंभू बड़े पत्रकार उर्फ संपादक ऊंची कुर्सी पर बैठकर भी अपने दिल की दीन-हीनता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। जिस पत्रकारिता में वे भ्रष्टाचार और धनलोलुपतावाद के उन्मूलन और कानून का राज स्थापित करने की बात कर रहे हैं, दरअसल वो इमोशनल अत्याचार-2 की स्क्रिप्ट सी लगती है। हकीकत तो ये है व्यवस्था और हक की बात करने वाले इसी बरगद ने
पत्रकारिता की कई नई पौध को कलम करने का अपराध किया है। कुर्सी का लोभी ये शख्स अपनी सुविधा के लिए पत्रकारिता के नौनिहालों की जड़ में गरम पानी डालने में संकोच नहीं करता। इसका उदाहरण भी हाल का ही है। तकरीबन 28 लोगों को इस ओछे व्यक्ति ने अपनी क्षुद्र स्वार्थ पूर्ति के लिए बलि चढ़ा दिया।

पहले तो चेहरे पर मुखौटा डालकर दुःख में साथ होने का ढांढस बंधाया फिर पीठ में छुरा घोंप कर एक नहीं कई प्रतिभाओं को निस्तेज करने का प्रयास किया। आज वही महात्मा बनने की कोशिश कर रहा है। मैं इसलिए ये सब लिखने पर मजबूर हो रहा हूं कि जिस भ्रष्टाचार, अवसरवाद और भेदभाव के खिलाफ नकली मुहिम में वो लोगों को साथ लाना चाहता है, उसी कार्य के लिए मैं दिल की आवाज को अल्फाजों में ढाल रहा हूं। अगर आप सहमत हैं तो फिर नकली लोगों को नकाबपोश करने में साथ दें। लोमड़ी, हिरन और शेर, तीनों को जीने का अधिकार है। मेरी मंशा बस इतनी है कि यदि कोई लोमड़ी है तो वो शेर या फिर हिरन का मुखौटा पहन कर लोगों को गुमराह करने की चेष्टा हरगिज न करे। सादर वंदे।

लेखक महेंद्र सिंह इरुल युवा पत्रकार हैं. पिछले दिनों वॉयस ऑफ मूवमेंट के साथ जुड़े हुए थे, लेकिन नई संपादकीय टीम ने अपने लोगों को सेट करने के लिए इन समेत कई लोगों की नौकरियां लील ली. महेंद्र आई नेक्‍स्‍ट, कानपुर की शुरुआती टीम के हिस्‍से रहे हैं.

राजकुमार ने हिंदुस्‍तान तथा अभिषेक ने साधना से इस्‍तीफा दिया

हिंदुस्‍तान, धनबाद से खबर है कि राजकुमार सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पिछले चार सालों से कार्यरत थे. राजकुमार ने अपनी नई पारी दैनिक भास्‍कर के साथ जमशेदपुर में शुरू की है. उन्‍हें यहां डीएनई बनाया गया है. राजकुमार धनबाद में हिंदुस्‍तान के सिटी इंचार्ज की जिम्‍मेदारी भी निभा चुके हैं. आज अखबार से अपने करियर की शुरुआत करने वाले राजकुमार सिंह प्रभात खबर के साथ बारह सालों तक रांची और धनबाद में कार्यरत रहे हैं. इसके बाद ये पिछले आठ सालों से हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे. चार साल रांची में काम करने के बाद इन्‍हें धनबाद भेज दिया गया था. इनकी गिनती झारखंड के सुलझे हुए पत्रकारों में की जाती है.

साधना, नोएडा से खबर है कि अभिषेक राठी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे सीनियर वीडियो एडिटर के पद पर कार्यरत थे तथा पिछले चार सालों से साधना को अपनी सेवाएं दे रहे थे. अभिषेक अपनी नई पारी फिल्‍म से जुड़े कुछ प्रोजेक्‍टों के साथ करने जा रहे हैं. वे इसके पहले भी कुछ चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

फर्दाफाश टीम पर हमला, गगनदीप एवं शैलेंद्र हुए घायल

लखनऊ में पर्दाफाश की टीम के दो सदस्‍यों पर हमला किया गया है. लखनऊ के गाजीपुर कोतवाली में दर्ज कराए गए एफआईआर के मुताबिक पर्दाफाश टीम के रिपोर्टर गगनदीप मिश्रा तथा कैमरामैन शैलेंद्र शर्मा खबर की रिपोर्टिंग के लिए इंदिरानगर स्थित एचएएल कैम्‍पस के भीतर गए थे. जब वे वापस फैजाबाद रोड पर पहुंचे, इसी दौरान एचआर नंबर की फार्चूनर गाड़ी पर सवाल पांच-छह लोगों ने इन लोगों की बाइक रोक ली तथा गगनदीप को रोककर उसे बुरी तरह पीटने लगे.

बताया जा रहा है कि जब शैलेंद्र बीच बचाव करने पहुंचा तो उसे भी बुरी तरह पीटा गया तथा उसका कैमरा भी तोड़ दिया गया. इसके बाद सभी हमलावर धमकी देते हुए चले गए. इनलोगों से कहा कि यदि बीएन तिवारी के खिलाफ खबर प्रकाशित की तो जान से मार दिया जाएगा. घायल मीडियाकर्मियों ने गाजीपुर थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने आर्इपीसी की धारा 323, 304 और 427 के तहत मामला दर्ज कर लिया है. नीचे पूरी खबर….


Lucknow : Pardaphash has always been the torch bearer in unearthing scams from the various government departments in the Uttar Pradesh state. Practicing investigative journalism and standing true to the journalistic ethics has never been a cake walk as the unkind souls leave no stone unturned to create hindrances through verbal spats or by being violent.

The same has been once again suffered by two Pardaphash team members, who were attacked by the goons of corrupt BN Tewari, who is the owner Mars Farm Equipments ltd., for uncovering the fraud cooked by its firm worth several of crores.

Pardaphash team members Gagan Deep Mishra (Reporter) and Shailendra Sharma (Cameraman) were brutally beaten by 5 to 6 assailants in front of Hindustan Aeronautics Limited (HAL) campus in Indra Nagar, Lucknow at around 10.30 pm on Sunday. A First Information Report (FIR) has been registered in the Ghazipur Police Station under the sections 323, 304 and 427 of the Indian Panel Code (IPC).

Both Gagan and Shailendra were on their way to cover a news when a White colored Fortuner over took their bike and stopped just in front of them blocking their way. Five to six people got down from the vehicle, which has the number starting with HR, started hitting Gagan with batons. When Shailendra intervened, they first broke his camera and even went violent over him.

They even threatened both of dire consequences if they cover any story on BN Tewari or reported the complete incident to police. They abused both and even threatened of their life.

Gagan faced major injuries as his leg got fractured and even suffered critical knee wounds.

Read the below links to see BN Tewari’s tale of corruption:

http://www.pardaphash.com/news/cds-ignores-law-books-to-allocate-contracts-worth-several-crores-to-bank-defaulter-firm/730510.html

http://www.pardaphash.com/news/who-plays-a-puppet-to-sp-minister-azam-khan/731040.html

This attack justifies the irregularities of BN Tewari as he is now afraid of facing charges due to Pardaphash’s revelations about his anomalies.

संजय का तबादला, राजीव मेडिकल लीव पर गए

भास्‍कर, धनबाद से खबर है कि संजय चौधरी को रांची बुला लिया गया है. संजय कई बार विवादित सुर्खियों में रहे हैं. प्रबंधन ने संजय को रांची में रीजनल हेड बना दिया है. इसके पहले भी वे रांची में ही कार्यरत थे, लेकिन प्रबंधन ने उन्‍हें धनबाद भेज दिया था.

दैनिक भास्‍कर, रांची से खबर है कि राजीव मिश्रा मेडिकल लीव पर चले गए हैं. वे डीएनई के पद पर कार्यरत हैं. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने रामगढ़ जिले में भास्‍कर के लोगों की कोयला माफियाओं से मिली भगत को लेकर एक जांच रिपार्ट तैयार की थी. इसी रिपोर्ट को बदलने का दबाव था.

पंजाब केसरी का पत्रकार पशुपालन निदेशक पर बना रहा दबाव, मित्‍तल से की गई शिकायत

पंजाब केसरी के ब्यूरो प्रमुख असलम सिद्दीकी की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में है। इस संबंध में पशुपालन निदेशक डा. रुद्र प्रताप ने 26 मार्च 2014 को सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक प्रभात मित्तल को पत्र लिखकर कार्रवाई किए जाने की मांग की है। पत्र में उल्लेख किया गया है कि उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसियेशन के अध्यक्ष असलम सिद्दीकी पर आरोप लगाया है कि श्रीट्रॉन कम्पनी को ओएमआर शीट के मूल्यांकन कार्य दिए जाने के लिए अनैतिक रूप से दबाव बना रहे हैं।

असलम सिद्दीकी स्वयं और अपने साथियों के विभिन्न मोबाइल नम्बरों 9412456311, 8127786786 और 9839757865 के माध्यम से उनको धमकियां दे रहे हैं। डा. रुद्र प्रताप ने सूचना निदेशक से उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसियेशन की जांच करा कार्रवाई किए जाने की मांग की है। इस प्रकरण पर पंजाब केसरी के ब्यूरो प्रमुख असलम सिद्दीकी ने कहा कि नियुक्तियों में जमकर गड़बडिय़ां की जा रही है।

असलम ने कहा कि इसको लेकर उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसियेशन के लैटर पैड पर शिकायत की थी। उनकी मंशा गड़बडिय़ों को उजागर करने की है। उन्होंने कहा कि वे मान्यता प्राप्त पत्रकार नहीं हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसियेशन को रजिस्टर्ड करवा रखा है। जिसका नम्बर 2996 है। उन्होंने पशुपालन निदेशक के आरोपों को सिरे से खारिज किया।

भास्‍कर, धनबाद के नए संपादक बने अमरकांत, बसंत दिल्‍ली भेजे गए

दैनिक भास्‍कर, धनबाद से खबर है कि स्‍थानीय संपादक बसंत झा का तबादला दिल्‍ली के लिए कर दिया गया है. बसंत लगभग एक साल से इस पद पर तैनात थे. बताया जा रहा है कि स्‍थानीय प्रबंधन से मामला जम नहीं पाने के कारण उन्‍हें धनबाद से सीधे दिल्‍ली का टिकट पकड़ा दिया गया.

 अमरकांत को प्रमोट करके रांची का स्‍थानीय संपादक बना दिया गया है. अमरकांत की गिनती स्‍टेट हेड के खास लोगों में की जाती है. खबर है कि अभी कुछ और लोगों पर गाज गिर सकती है.

एनबीए के आदेशों का पालन करे जी मीडिया : हाई कोर्ट

नई दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट ने जी मीडिया हाउस को निर्देश दिया है कि वह न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करे। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वीके शाली की खंडपीठ ने यह आदेश सांसद नवीन जिंदल की ओर से दायर मानहानि की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। खंडपीठ ने कहा कि न्यूज चैनल किसी भी प्रकार का कार्यक्रम प्रसारित करते हुए इस बात का ध्यान रखे कि वह किसी भी तरह से न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन न करता हो।

सांसद नवीन जिंदल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। यचिकाकर्ता का कहना था कि लोकसभा चुनाव के दौरान जी न्यूज दुर्भावना पूर्ण उनके खिलाफ आपत्तिजनक व गलत खबरें प्रसारित कर रहा है। जिससे उनकी मानहानि हो रही है और उनकी राजनीतिक छवि को भी नुकसान पहुंच रहा है। जी न्यूज एक मार्च से लेकर अब तक 131 बार उनके खिलाफ खबरों का प्रसारण कर चुका है। जी न्यूज द्वारा खबरों का प्रसारण न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करती है। लिहाजा, जी न्यूज को उनके खिलाफ टीवी पर खबरें प्रसारित करने से रोका जाए। (जागरण)

एमजे अकबर के दादा हिंदू थे

मशहूर अखबारनवीस एमजे अकबर ने पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता बना दिया है. राजनीति उनके लिए कोई नया काम नहीं है. वे इससे पहले भी 1989 में कांग्रेस पार्टी की ओर से बिहार के किशनगंज लोकसभा से चुनाव जीत चुके हैं, बाद में 1991 में उन्हें यह सीट गंवानी पड़ी, इसके बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अधिकारिक प्रवक्ता के रूप में काम किया.

इस दौरान उन्होंने सरकार के सलाहकार के रूप में काम करते हुए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की योजना बनाने में मदद की. दिसंबर 1992 में उन्होंने पूरी तरह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया और फिर से पत्रकारिता के कैरियर में आ गये. एमजे अकबर का पूरा नाम मोबाशर जावेद अकबर है. उनके शुरुआती जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, मगर यह कहा जाता है कि उनका मूल निवास स्थान बिहार का सारण जिला है. उनके दादा प्रयाग हिंदू थे जो कोलकाता के करीब तेलिनीपाड़ा के एक जूट मिल में काम करते थे. बाद में उन्होंने इस्लाम को अपना लिया और अपना नाम रहमतुल्ला रख लिया. संभवत: अपने दादा के नाम पर ही एमजे अकबर ने अपने पुत्र का नाम प्रयाग रखा है. उनकी पढ़ाई कोलकाता ब्वाय कॉलेज और प्रेसिडेंसी कॉलेज कोलकाता में हुई.

उन्होंने अपने पत्रकारिता के कैरियर की शुरुआत 1971 में द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में ट्रेनी के रूप में की. कुछ ही महीनों बाद उन्होंने द इलेस्ट्रेड वीकली ऑफ इंडिया में सब एडिटर के रूप में योगदान किया. 1973 में उन्हें फ्री प्रेस समूह की एक पाक्षिक पत्रिका ऑनलुकर में संपादक बना दिया गया. 1976 में आनंद बाजार पत्रिका समूह ने उन्हें अपनी पत्रिका संडे का संपादक बना दिया. संडे की सफलता के बाद 1982 में उन्होंने देश के पहले आधुनिक समाचार पत्र द टेलिग्राफ की शुरुआत की. वहां वे 1989 तक कायम रहे, जब तक उन्होंने राजनीति की राह को नहीं अपनाया.

पत्रकार के तौर पर उनकी दूसरी पारी बहुत सफल नहीं रही. उन्होंने एशियन एज नामक अखबार की शुरुआत की जो सफल नहीं रहा. उन्होंने इंडिया टुडे समूह में संपादकीय निदेशक के रूप कुछ दिन काम किया. उन्होंने कोवर्ट और द संडे गार्जियन आदि पत्रों का प्रकाशन शुरू किया जो कोई खास पहचना नहीं बना पाया है. (प्रभात खबर)

एनटी अवार्ड में आजतक के हिस्‍से आए छह पुरस्‍कार

देश का सबसे तेज और चहेता न्यूज चैनल आज तक 'न्यूज टेलीविजन अवॉर्ड्स' में छाया रहा. आज तक को अलग-अलग श्रेणियों में कुल 6 अवॉर्ड्स से नवाजा गया. इसके अलावा हमारे सहयोगी चैनल हेडलाइंस टुडे को भी 2 अवॉर्ड्स मिले.

आज तक को मिले पुरस्कारों पर एक नजर-

1. '10तक' को बेस्ट डेली न्यूज बुलेटिन अवॉर्ड
2. 'सुपरहिट मुकाबला' को बेस्ट स्पोर्ट्स शो का अवॉर्ड
3. 'बजट कैफे' को अवॉर्ड
4. पुण्य प्रसून वाजपेयी को बेस्ट एंकर का अवॉर्ड
5. चारुल मलिक को बेस्ट इंटरटेनमेंट न्यूज एंकर का अवॉर्ड
6. 'कुश्ती को बचाना है' को बेस्ट स्पोर्ट्स टॉक शो को अवॉर्ड
इसके अलावा 'चेन्नई एक्सप्रेस' को बेस्ट प्रोमो के अवॉर्ड से नवाजा गया.

साभार : आजतक

एनटी अवॉर्ड में एनडीटीवी ने 23 पुरस्कार अपने नाम किए

नई दिल्ली: न्यूज टेलीविजन अवॉर्ड्स (एनटी अवॉर्ड्स) की शाम एनडीटीवी के नाम रही। बेस्ट न्यूज एंकर से लेकर बेस्ट न्यूज रिपोर्टर तक, बेस्ट मोबाइल ऐप से लेकर गेम चेंजर 2013 तक हर अवॉर्ड एनडीटीवी के नाम रहा। कुल मिलाकर एनडीटीवी की झोली में 23 अवॉर्ड आए।

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच रवीश कुमार को प्राइम टाइम के लिए एनटी अवॉर्ड मिला। अरविंद केजरीवाल के साथ उनके सफर 'मैं अरविंद केजरीवाल' को करेंट अफेयर्स स्पेशल कैटेगरी में सबसे शानदार कार्यक्रम माना गया। रात 9 बजे आने वाले रवीश कुमार के प्रोग्राम प्राइम टाइम को न्यूज डिबेट के लिए और हम लोग को बेस्ट एंटरटेनमेंट टॉक शो के लिए अवॉर्ड से नवाजा गया। एनटी अवॉर्ड्स समारोह में शरद शर्मा के 'वोट का खोट' से एनडीटीवी को अवॉर्ड मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो देर तक चलता ही रहा।

'वोट का खोट' को बेस्ट इंवेस्टिगेटिव प्रोग्राम चुना गया। कारों और बाइक्स पर क्रांति संभव के 'रफ्तार' को बेस्ट ऑटो शो चुना गया है। सामाजिक और पर्यावरण जागरुकता से जुड़े दो अवॉर्ड भी एनडीटीवी की झोली में आए हैं। उत्तराखंड त्रासदी पर सुशील बहुगुणा के 'हिमालय सा दर्द' को हिन्दी में और 'वी द पीपुल' को अंग्रेजी कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम माना गया। 'वी द पीपुल' को अंग्रेजी में बेस्ट टॉक शो भी माना गया है।

सॉल्यूशंस ग्लोबल समिट को किसी न्यूज चैनल की सबसे बेहतर लाइव पहल के तौर पर एनटी अवॉर्ड मिला है। 'स्पोर्ट्स टॉप 10' को बेस्ट स्पोर्ट्स शो माना गया। इयरइंडर 2013 को इंग्लिश सो पैकेजिंग एनडीटीवी 24×7 को स्पोर्ट्स स्पेशल के लिए एनटी अवॉर्ड मिला है। साथ ही अंग्रेजी चैनलों की कैटेगरी में ग्राफिक्स के सबसे शानदार इस्तेमाल के लिए एनडीटीवी 24×7 को  अवॉर्ड दिया गया है। एनडीटीवी के मोबाइल ऐप को बेस्ट मोबाइल ऐप चुना गया, जबकि सबसे चर्चित सोशल मीडिया न्यूज ब्रैंड और गेम चेंजर 2013 भी एनडीटीवी नेटवर्क के हिस्से आया है। शरद शर्मा को बेस्ट टीवी न्यूज रिपोर्टर, हिन्दी) और सिद्धार्थ पांडे बेस्ट रिपोर्टर, इंग्लिश चुने गए।

अवॉर्ड्स की सूची

रवीश कुमार – बेस्ट टीवी न्यूज एंकर, हिन्दी
बरखा दत्त – बेस्ट टीवी न्यूज एंकर, हिन्दी
अफशा अंजुम – बेस्ट स्पोर्ट्स न्यूज शो प्रेजेंटर
शरद शर्मा – बेस्ट टीवी न्यूज रिपोर्टर, हिन्दी
सिद्धार्थ पांडे – बेस्ट टीवी न्यूज रिपोर्टर, इंग्लिश
मोस्ट पोपुलर सोशल मीडिया टीवी न्यूज ब्रांड
सोशल कंट्रीब्यूशन बाइ ए न्यूज नेटवर्क
मोबाइल एप्लिकेशन बाइ ए न्यूज चैनल
एनडीटीवी 24X7- बेस्ट यूज ऑफ ग्राफिक्स, इंग्लिश न्यूज चैनल
इयरइंडर 2013- बेस्ट शो पैकेजिंग, इंग्लिश
प्राइम टाइम – बेस्ट न्यूज डिबेट शो
एनडीटीवी 24X7- बेस्ट स्पोर्ट्स स्पेशल
स्पोर्ट्स टॉप 10 – बेस्ट स्पोर्ट्स शो
अरविंद के साथ सफर में – (प्राइम टाइम) – बेस्ट करेंट अफेयर्स स्पेशल
सॉल्यूशंस – ग्लोबल समिट : न्यूज चैनल की सबसे बेहतर लाइव पहल
वी द पीपुल – सामाजिक / पर्यावरण जागरुकता, इंग्लिश
हिमालय सा दर्द – सामाजिक / पर्यावरण जागरुकता, हिन्दी
बिजनेस स्पेशल – राइज एंड फॉल ऑफ इंडियन इकोनॉमी
वी द पीपुल- टॉक शो
हमलोग – (मालिनी अवस्थी) इंटरटेनमेंट टॉक शो
गेम चेंजर 2013- एनडीटीवी नेटवर्क
रफ्तार – बेस्ट ऑटो शो
वोट का खोट – इंवेस्टिगेटिव प्रोग्राम

साभार : एनडीटीवी

एनटी अवॉर्ड में नेटवर्क 18 को 34 अवॉर्ड मिले

नई दिल्ली। न्यूज टेलीवीजन अवॉर्ड में एक बार फिर नेटवर्क18 की धूम रही और पूरे नेटवर्क को कुल 34 अवॉर्ड मिले। आईबीएन7 को दो अवॉर्ड मिले। आईबीएन7 के शो जिंदगी लाइव के लिविंग विद कैंसर एपिसोड को बेस्ट न्यूज टॉक शो का अवॉर्ड मिला। इसके अलावा जिंदगी लाइव के लिए ही बेस्ट न्यूज इनिशिएटिव टेकेन बाइ न्यूज चैनल का अवॉर्ड मिला।

जिंदगी लाइव को छठी बार एनटी बेस्ट न्यूज टॉक शो अवॉर्ड मिला। इसके अलावा cnn-ibn के INDIA AT 9 को बेस्ट डेली न्यूज बुलेटिन का अवॉर्ड मिला। cnn ibn को बेस्ट न्यूज चैनल पैकेजिंग का अवॉर्ड भी मिला है। हमारे सहयोगी वेबसाइट आईबीएन लाइव को बेस्ट न्यूज वेबसाइट के अवॉर्ड से नवाजा गया है। साभार : आईबीएन

लखनऊ में हवा और जमीन पर लिखने वाले पत्रकारों की भीड़ बढ़ी

लखनऊ। लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही लखनऊ में पत्रकारों की संख्‍या में अचानक इजाफा हो गया है. हवा और जमीन पर लिखने वाले तथा आसमान में खबर दिखाने वाले पत्रकारों की भीड़ कई राजनीतिक दलों के कार्यालयों में दिखने लगी है. ये पत्रकार किसी भी प्रेस कांफ्रेंस (पीसी) में निर्धारित समय से पहले पहुंच जाते हैं तथा कुर्सियों पर जम जाते हैं. राजनीतिक दलों के मीडिया मैनेज करने वाले लोग भी इस भीड़ को देखकर परेशान होते हैं, लेकिन इन लोगों की तथाकथित नाराजगी के डर से कुछ कहते-सुनते नहीं हैं.

सिर्फ राजनीतिक दलों की पीसी तक ही ये सीमित नहीं रहते हैं. ये सीएम की पीसी, होम की पीसी या जहां डग्‍गा मिलने की संभावना हो, वहां सबसे पहले पहुंच जाते हैं. इसके बाद सबसे ज्‍यादा सवाल ये ही लोग पूछते हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि कई ऐसे पत्रकार भी हैं जो कहीं नहीं लिखते पढ़ते हैं, लेकिन वे किसी भी पीसी में सबसे पहले नजर आते हैं ताकि नेता या अधिकारी इनका चेहरा देख ले और ये निकट भविष्‍य में उसका लाभ उठा लें. ट्रांसफर-पोस्टिंग करा के या किसी अन्‍य तरीके से.

एक पत्रकार हैं कई बच्‍चों के भविष्‍य से खिलवाड़ करने वाले अरिंदम चौधरी के मैगजीन के. पता नहीं यह पत्रिका अब छपती भी है या नहीं, लेकिन ये सभी दलों की पीसी, अधिकारियों की पीसी, निर्वाचन की पीसी में मौजूद रहते हैं और सबसे ज्‍यादा सवाल पूछते हैं. इनकी तरह के ही दर्जनों पत्रकार हैं जो कहां लिखते हैं, कहां पढ़ते हैं, किस चैनल पर दिखाते हैं, किसी को भी पता नहीं चलता. हां, पीसी में सबसे आगे रहने की वजह से नेता और अधिकारी इन्‍हीं को पत्रकार समझते हैं. हालांकि इन लोगों की भीड़ से कभी कभी अराजकता जैसी स्थिति बन जाती है.

दो-तीन दिन पहले भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह की पीसी थी. निमंत्रित अखबार और चैनल में काम करने वाले पत्रकारों को ही किया गया था, लेकिन इतनी भीड़ जुट गई कि हॉल में तिल रखने का जगह नहीं रह गया. तथाकथित पत्रकारों में राजनाथ सिंह को अपना चेहरा दिखाने के लिए आगे बैठने की होड़ लग गई. इस तरह की अराजक स्थिति हो गई जैसे मछली बाजार हो. चेहरा दिखाने वाले आगे आते तो चैनल वाले पीछे से चिल्‍लाने लगते. यह अजीब स्थिति भाजपा नेताओं के साथ लिखने पढ़ने वाले पत्रकारों के सामने भी उपस्थित हो गई. खैर, किसी तरह पीसी खत्‍म हुआ तो काम करने वाले निकल कर चले गए, सेटिंग वाले पत्रकार प्रधानी करने के चक्‍कर में भाजपा कार्यालय के आसपास लंबे समय तक मंडराते रहे.

डाल्‍टनगंज के पत्रकार मनोज कुमार की हत्‍या करने वाला शूटर अरेस्‍ट

झारंखड के डाल्‍टनगंज जिले के मेदिनीनगर पुलिस और सदर थाना पुलिस ने संयुक्‍त कार्रवाई में मोहम्‍मदगंज के पत्रकार मनोज कुमार की हत्‍या करने वाले कुख्‍यात शूटर को अरेस्‍ट किया है. मेदिनीनगर थाना के बहलोलवा गांव से शूटर विजय शर्मा उर्फ गुरुजी उर्फ उदय को गिरफ्तार किया गया. वह मोहम्‍मदगंज थाना के गाजीबिहरा का मूल निवासी है. पुलिस ने उसके पास से नाइन एमएम की पिस्‍टल और चार कारतूत बरामद किए हैं.

डीएसपी अजय कुमार ने बताया कि सदर थाना प्रभारी को सूचना मिली थी कि बहलोलवा गांव में कुछ अपराधी किसी घटना को अंजाम देने वाले हैं. इसी की घेरेबंदी के दौरान पुलिस को एक जगह लावारिश हालत में रखा ढाई सौ लीटर अवैध शराब मिला. पुलिस शराब को बहा ही रही थी कि कुछ लोग गांव से निकलकर जंगल की तरफ भागते दिखे. सुरक्षा बल के जवानों से इनमें से एक को पकड़ लिया. पूछताछ में उसने अपना नाम विजय शर्मा बताया तथा कई हत्‍याओं में वांछित निकला.

शूटर विजय शर्मा ने पुलिस के सामने कबूल किया कि मुहम्‍मदगंज के पत्रकार मनोज कुमार समेत आठ लोगों की हत्‍या उसने की है. गौरतलब है कि पत्रकार मनोज कुमार की हत्‍या 24 अक्‍टूबर 2009 में उनके घर के पास ही गोली मारकर कर दी गई थी. इस हत्‍याकांड में मनोज कुमार का भांजा अमित कुमार उर्फ छोटू गवाह था. हत्‍यारों ने बाद में उसकी भी हत्‍या गोली मारकर कर दी थी. छोटू का शव कायल नदी के बालू में गड़ा मिला था. पुलिस ने छोटू की हत्‍या में नवनीत और सोनू नाम के युवकों को गिरफ्तार किया था.

विजय वर्मा ने पुलिस को बताया कि पत्रकार मनोज की हत्‍या गांव के ही राजू सिंह और प्रेम सिंह के कहने पर की थी. उसकी मनोज से व्‍यक्तिगत रंजिश नहीं थी. बताया जा रहा है कि पुलिस उससे और सच उगलवाने की कोशिश कर रही है. संभावना है कि जल्‍द ही राजू सिंह और प्रेम सिंह को गिरफ्तार कर छोटू की हत्‍या का भी खुलासा किया जाएगा.

अरे! ये आपदा पीडि़त या भिखारी नहीं, पत्रकार हैं भाई

लखनऊ। अगर आपको लग रहा है कि नीचे के फोटो में सामान के लिए मारामारी करती भीड़ उत्‍तराखंड आपदा की है, या फिर ये लोग बाढ़ पीडि़त हैं या गरीब और भिखारी तबके के लोग हैं, तो आप बिल्‍कुल गलत सोच रहे हैं. ये ना तो भिखारी हैं और ना ही आपदाग्रस्‍त इलाकों के लोग. ये लोग देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी की राजधानी लखनऊ के बड़े बड़े पत्रकार हैं. जी हां, पत्रकार. चौंकिए नहीं, ऐसे दृश्‍य आए दिन लखनऊ की सरजमीं पर नुमाया होते रहते हैं.

खैर, हम आपको बताते हैं पत्रकारों की इस जुझारू दृश्‍य की असली कहानी. लखनऊ में शनिवार को योग गुरु बाबा रामदेव की प्रेस कांफ्रेंस थी. कई पत्रकार पहुंचे थे. कुछ बुलाए, कुछ बिन बुलाए. कुछ जमीन पर लिखने वाले, कुछ हवा में लिखने वाले. बाबा की पीसी खत्‍म होने के बाद पत्रकारों को उनकी तरफ से एक झोले में कुछ गिफ्ट दिया जाने लगा, जिसे पत्रकारों की भाषा में डग्‍गा कहा जाता है. बस फिर क्‍या था, पहले आप-पहले आप वाले लखनऊ की सरजमीं पर पहले मैं-पहले मैं शुरू हो गया. मीडियाकर्मी डग्गा पाने के लिए एक दूसरे पर टूट पड़े.

डग्गे के लिए एक दूसरे से छीना-झपटी होने लगी. धक्‍का-मुक्‍की होने लगी. अबे तेरी-तबे तेरी होने लगी. आयोजक पत्रकारों का यह रूप से देखकर हंसने लगे. बांटने वाले परेशान हो गए. कुछ पत्रकार दो-दो तीन-तीन बार डग्गा पाने के लिए संघर्ष करते नजर आए. क्‍या सीनियर क्‍या जूनियर. डग्गे के लिए सारी सीमाएं टूट गईं. सारे दीवार ढहा दिए गए. बाढ़ पीडितों, आपदा पीडितों की तरह लूट मच गई. कहीं भी नहीं दिखा कि ये समाज के पढ़े लिखे तबके के लोग हैं. डग्गे के चक्‍कर में अंधे बन गए.

हालांकि कुछ पत्रकार बंधु शर्म की दीवारों के पीछे रह गए और डग्गा पाने से चूक गए. हालांकि मन उनका भी मसोस कर रह गया, लेकिन करें तो क्‍या करें. पत्रकारों ने इस तरह की हरकत पहली बार नहीं की है. ऐसी हरकत अभी कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के एक कार्यक्रम में भी हो चुका है. मोबाइल और कुछ कैश पाने के लिए पत्रकार सारी सीमाओं को तोड़ते नजर आए. क्‍यां पुराने पत्रकार क्‍या नए पत्रकार, सबके सब बस डग्‍गा पाने का प्रयास करते दिखे. वैसे लखनऊ में आजकल पत्रकारों की भीड़ भी बढ़ गई है.

जनसंदेश टाइम्‍स की हालत पतली, तीन दिन बंद रही सीयूजी की आउटगोइंग

बनारस। जनसंदेश टाइम्‍स की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है. प्रबंधन ने डाक्‍टर बदला, इलाज बदला, फिर भी इस अखबार की सांसें उखड़ती जा रही हैं. कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है. ताजा सूचना है कि अखबार के उपर मोबाइल फोन का लाखों रुपए बकाया होने और पेमेंट न करने के कारण कंपनी की सीयूजी मोबाइल की आउटगोइंग तीन दिन तक बंद रही. किसी तरह पैसा जमा कराकर प्रबंधन ने रविवार से आउटगोइंग शुरू कराया है.

जब धूम धड़ाके के साथ जनसंदेश टाइम्‍स की लांचिंग हुई थी, तब कंपनी ने अधिकांश मीडियाकर्मियों को सीयूजी नंबर उपलब्‍ध करवाया था. पत्रकारों को एक तय सीमा तक कॉल करने की छूट थी. इससे ऊपर पैसा खर्च होने पर पत्रकारों की सैलरी से कटती थी. अब तक पत्रकारों का सीयूजी नंबर ठीक ढंग से काम कर रहा था. पर खबर है कि बीते 27 मार्च से मोबाइल कंपनी ने सभी सीयूजी नंबरों की आउटगोइंग सुविधा बंद कर दी है. सभी के नंबर पर मैसेज भी भेज दिया गया कि बिल पेमेंट नहीं होने के कारण आउटगो‍इंग सुविधा बंद की जाती है.

और यह केवल बनारस यूनिट का ही हाल नहीं है बल्कि सारे यूनिटों के सीयूजी नंबर का था. कंपनी की मु‍फलिसी का आलम यह है कि बनारस के कर्मचारियों को होली पर भी वेतन नसीब नहीं हुआ. काफी हो हल्‍ला के बाद कर्मचारियों को थोड़ी-बहुत नकदी देकर शांत किया गया. हालांकि होली फिर भी फीकी रही. अब सैलरी कब मिलेगी इसका भी अता पता नहीं है. इधर तेजी से चर्चा भी उड़ने लगी है कि जनसंदेश टाइम्‍स चुनाव बाद केवल फाइल काफी के रूप में ही छपेगा. कर्मचारी इससे काफी सहमे हुए हैं.

अखबार के कर्मचारियों का कहना है कि ये हालत तब से और ज्‍यादा बिगड़े हैं, जबसे आरपी सिंह को सीईओ बनाकर लाया गया है. उनके सुधार कार्यक्रम अखबार के साथ कर्मचारियों के सेहत को भी बिगाड़ रहा है. उन्‍होंने कई जिलों के ब्‍यूरो बंद कराए, कई लोगों को बेरोजगार किया उसके बावजूद कंपनी और अखबार की हालत में सकारात्‍मक बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है. कर्मियों का कहना है कि कंपनी ने तीन दिन बाद मोबाइल की आउटगोइंग तो शुरू करा दी है, लेकिन यह कब तक चालू रहेगा कहना मुश्किल है. 

इंडिया न्‍यूज को न्‍यूज नेशन ने पछाड़ा, आजतक नंबर वन

न्‍यूज चैनलों की ग्‍यारहवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. आजतक लगातार पहले नंबर पर काबिज है. रजत शर्मा की लाख कोशिशों के बावजूद इंडिया टीवी तीसरे नंबर से ऊपर नहीं चढ़ पा रहा है. जी न्‍यूज चौथे स्‍थान पर बना हुआ है. इस सप्‍ताह सबसे बड़ा उलटफेर न्‍यूज नेशन ने किया है. इस चैनल ने इंडिया न्‍यूज को छठे स्‍थान पर धकेल कर खुद टॉप फाइव में काबिज हो गया है. अब न्‍यूज 24 भी इंडिया न्‍यूज के गले तक पहुंच गया है.

एनडीटवी आठवें नंबर पर है, जबकि आईबीएन7 नवें नंबर से ऊपर चढ़ने की स्थिति में नहीं है. समय भी किसी तरह टॉप टेन में बना हुआ है. 25 प्‍लस एबीसी में टॉप फाइव में तो कोई परिवर्तन नहीं है, लेकिन इस कटेगरी में एनडीटीवी ने इंडिया न्‍यूज को पछाड़कर छठे स्‍थान पर पहुंच गया है. देखें टीआरपी का आंकड़ा….

WK 11 2014, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 17.9 dn 2.4
ABP News 14.7 up 0.8
India TV 12.5 up 0.7
ZN 10.5 up 1.5
News Nation 8.3 up 0.4
India news 8.3 dn 0.6
News24 8.2 dn 0.2
NDTV 7.4 up 0.3
IBN 5.4 dn 0.2
Samay 3.0 same
Tez 2.6 dn 0.2
DD 1.2 dn 0.1

Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 18.2 dn 2.6
ABP News 14.5 up 0.5
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ZN 11.3 up 2.0
News Nation 8.8 up 0.6
NDTV 8.1 dn 0.1
India news 7.8 dn 0.5
News24 6.9 dn 0.5
IBN 5.4 dn 0.6
Samay 2.7 up 0.1
Tez 2.3 up 0.3
DD 1.2 dn 0.1

संजीव ने अमर उजाला, आशु ने एनबीटी ज्‍वाइन किया

शाहजहांपुर से खबर है कि हिंदुस्‍तान से संजीव पांडे ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर क्राइम रिपोर्टर थे. संजीव ने अपनी नई पारी अमर उजाला, अमरोहा से शुरू की है. उन्‍हें यहां भी रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. वे पिछले चार सालों से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

बताया जा रहा है कि इंक्रीमेंट और प्रमोशन न होने से वे नाराज चल रहे थे. संजीव ने अपने करियर की शुरुआत पुवायां में स्‍वतंत्र भारत से की थी. गौरतलब है कि पिछले छह महीने में हिंदुस्‍तान, शाहजहांपुर से चार रिपोर्टर इस्‍तीफा देकर जा चुके हैं.

डीएनए, लखनऊ से खबर है कि आशु मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे लोकल में रिपोर्टर थीं. आशु ने अपनी नई पारी की शुरुआत लखनऊ में नवभारत टाइम्‍स के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है.

तेजपाल जेल में उठा सकेंगे एसटीडी फोन की सुविधा

पणजी। दक्षिण गोवा स्थित साडा उप जेल के अधीक्षक ने तहलका के सह संस्थापक तरुण तेजपाल को जो फिलहाल न्यायिक हिरासत में है, एसटीडी टेलीफोन सुविधा के इस्तेमाल की इजाजत दे दी है।
गौरतलब है कि 50 वर्षीय पत्रकार पिछले साल 30 नवंबर से सहकर्मी महिला पत्रकार से बलात्कार के आरोप में सलाखों के पीछे हैं।

तेजपाल ने एक आवेदन देकर यह अनुरोध किया था कि उन्होंने गोवा के बाहर वकीलों से सम्पर्क करने के लिए एसटीडी सुविधा उपलब्ध कराई जाए। जेल सूत्रों के अनुसार तेजपाल को एसटीडी फोन सुविधा का इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी गई। तेजपाल के पास बीते 26 फरवरी को औचक निरीक्षण के दौरान मोबाइल फोन पाये गये थे। इसके बाद से एसटीडी सुविधा वापस ले ली गई थी। हालांकि उनके आवेदन पर यह सुविधा बहाल कर दी गई है।

अमर उजाला के पत्रकार के पुत्र ने छात्रा की गोली मारकर हत्‍या की

शाहजहांपुर। केंद्रीय विद्यालय नंबर एक में सीबीएसई की परीक्षा के दौरान इंटर के एक छात्र ने परीक्षा कक्ष में घुसकर इंटर छात्रा की गोली मार दी। एक गोली छात्रा के हाथ पर लगी तथा दूसरी सीने पर लगी, छात्रा की मौके पर ही मौत हो गई। इस वारदात से स्कूल में भगदड़ मच गई। स्कूल के सिक्योरिटी गार्डों ने छात्र को मय तमंचा घेरकर पकड़ लिया। इस मामले में पुलिस ने छात्रा के पिता की तहरीर पर छात्र के खिलाफ हत्या की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। यह छात्र बरेली में कार्यरत अमर उजाला के पत्रकार का पुत्र बताया जा रहा है। 

बताया जा रहा है कि छात्र और छात्रा में प्रेम प्रसंग चल रहा था। यह बात परिजनों को पता चली तो छात्रा ने उससे बोलना बंद कर दिया। इसी से कुपित होकर छात्र ने इस घटना को अंजाम दिया है। जानकारी के अनुसार 18 वर्षीय छात्रा सुम्बुल केंद्रीय विद्यालय नंबर दो में कामर्स विषय से इंटर की छात्रा थी। सुम्बुल मूलतः हरदोई जिले के कस्बा शाहबाद की रहने वाली थी। उसके पिता हाफिज यार खां शाहबाद में क्लीनिक चलाते हैं। 12 साल से हाफिज यार खां का परिवार शाहजहांपुर के मोहल्ला खलील गर्वी में बहनोई महफूज के मकान में रह रहा था। सुम्बुल पहली कक्षा से ही केवी-टू में पढ़ रही थी।

इसी स्कूल में शहर की भरद्वाज कालोनी निवासी अमर उजाला, बरेली में उप संपादक कुलदीप दीपक का पुत्र शिवम श्रीवास्तव भी इंटर का छात्र है। वह विज्ञान वर्ग से पढ़ाई कर रहा है। केवी टू की परीक्षा का सेंटर केवी-वन में हैं। गुरुवार की सुबह साढ़े दस बजे से हिंदी का पेपर था। सुम्बुल और शिवम अलग-अलग परीक्षा कक्ष में थे। दोपहर करीब सवा बारह बजे शिवम अपनी सीट से उठा और परीक्षक से कहा कि वह पानी पीने को जा रहा है। कक्ष से निकलने के बाद वह उस कक्ष में पहुंचा जिसमें सुम्बुल परीक्षा दे रही थी। कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही शिवम ने सुम्बुल के नजदीक जाकर गोट से तमंचा निकालने के बाद ताबड़तोड़ दो फायर कर दिए। एक गोली छात्रा के हाथ में लगी तो दूसरी सीने पर। छात्रा की मौके पर ही मौत हो गई।

इस घटना से स्कूल में भगदड़ मच गई। सिक्योरिटी गार्डों ने शिवम को मय तमंचा दबोच लिया। घटना के बाद छात्रा को तुरंत मिलिट्री हास्पिटल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। घटना की सूचना स्कूल प्रशासन ने परिजनों को दी। सूचना पाते ही उसके पिता हाफिज यार खां स्कूल पहुच गये। इस बीच थाना सदर बाजार पुलिस ने शव को पंचनामा भरवाकर पीएम के लिए भिजवा दिया। खबर मिलते ही चेयरमैन तनवीर खां समेत सैकड़ों लोग पोस्टमार्टम हाउस पर पहुंच गए और परिजनों को ढांढ़स बधाया। हत्या की घटना से परिजन गहरे सदमे व आक्रोश में थे। पुलिस ने पिता की तहरीर पर शिवम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली है। पुलिस ने शिवम को हिरासत में ले लिया है।

लखनऊ की पत्रकारिता का सबसे बड़ा दलाल?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में इन दिनों पत्रकारिता की एक नई बयार बह रही है। जिसे दलाली का बयार कहा जाये तो गलत नहीं होगा। आज उसी दलाली की पत्रकारिता में राजधानी लखनऊ के कई तथाकथित पत्रकार जो ईमानदारी का डंका पीटते और नौकरशाही को उसी तथाकथित ईमानदारी के दम पर डरा कर ब्लैकमेलिंग कर रहे है। ब्लैकमेलिंग के इस रंग में रंग कर कभी नौकरशाही इन पर हावी होकर इनका इस्तेमाल करती है तो कभी ये नौकरशाही पर हावी होकर उसे ब्लैकमेल करते हैं।

इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश शासन के कुछ नौकरशाहों और और इन नौकरशाहों की दलाली और ब्लैकमेलिंग करने वाले पत्रकारों की असलियत प्रकाश डाल रहा हूं। राजधानी की पत्रकारिता इन दिनों दो भागों में विभाजित प्रतीत हो रही है। पहले भाग में वे पत्रकार हैं जो वास्तव में पत्रकारिता करते हैं और दूसरे वह जो पत्रकारिता को अपना सर्वस्व मानते हुए अपने कर्तव्‍य का निर्वहन करते हैं। वही कुछ ऐसे भी पत्रकार हैं जो नौकरशाहों को ब्लैकमेलिंग करने का कार्य करते हुए शासन सस्ता में अपनी साख जमाये हुए हैं। जिन्हें न तो जनहित की फिक्र है और नहीं पत्रकारिता से कुछ लेना देना। ये पत्रकारिता को मात्र पैसे उगलने वाली एटीएम मशीन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार का हाल शासन के कुछ नौकरशाहों का भी है, जो अपनी तनख्वाह से अपने परिवार का पेट पालने में अपनी तौहीन समझते हैं और जनता के पैसों का गबन करते और आपस में मिल बांट कर खा जाते हैं। इन भ्रष्ट पत्रकारों और अधिकारियों की सूची में पहला नाम यदि सबसे पहले किसी की आता तो वह नाम हेमंत तिवारी, शरत प्रधान, और राजेन्द्र गौतम और नवनीत सहगल का है। राजेन्द्र गौतम अपनी पत्नी के नाम से दिव्य संदेश अखबार का संचालन करते हैं। इस अखबार के माध्यम से उन्होंने तथाकथित पत्रकारिता के एक दो दलालों और नौकरशाहों, जैसे – बिजली विभाग के पूर्व अध्यक्ष नवनीत सहगल और अन्य अधिकारियों की करतूतों पर्दाफाश किया। उन दिनों उनके कार्यों से ऐसा लगा कि वास्तव में उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता एक बार फिर जीवंत हो उठी।

इन्‍होंने समाजवादी पार्टी के मुखिया के खिलाफ एक गुप्त रिपार्ट पाई। जिसको इन्होंने छापने का प्रयास किया, मगर बीच में समाजवादी के पदाधिकारियों से समझौता हो गया और इन्हें गिफ्ट के रूप में एक मकान एलाट कर दिया गया। इसी प्रकार कृषि विभाग, मंडी परिषद, बिजली विभाग, एलडीए में भी इन्होंने अधिकारियों के कुकृत्‍यों को छिपाने के बदले में सौदेबाजी की। जिससे लाखों रुपये की इन्होंने कमाई की। इसी ब्लैकमेलिंग के दम पर इन्होंने अपने अखबार की सूचीबद्धता और अपनी मान्यता करा ली। इनके अखबार का राजधानी में वास्तविक रूप में कुल सर्कुलेशन 500 प्रति है। मगर सूचना विभाग में इन्होंने फर्जीवाड़ा करते हुए अपना सर्कुलेकशन 25000 से 50000 के बीच में दिखाया है।

इनका पारिवारिक बैक ग्राउन्ड भी ठीक-ठाक नहीं है। मगर तीन साल की अवधि में इन्होंने कैसे अपने अखबार का संचालन किया, यह भी कहीं न कहीं इनकी ईमानदारी पर अंगुली तो उठा ही रही है। इनको आज तक एक भी प्राईवेट विज्ञापन नहीं मिला है। फिर इनका अखबार रंगीन पेज के रूप में नियमित 500 प्रतियां छपती रही है। वह कैसे अखबार निकालते हैं यह समझ से परे है। अभी तक तो जो बातें की गई वह इनकी संदेहास्यपद ईमानदारी के बारे में कही गई हैं। अब इनके ऊपर नौकरशाही की किस प्रकार नजरें इनायत रहीं, वह इस प्रकार है।

कुछ साल पहले यह पावर कारपोरेशन में विज्ञापन मांगने जाते थे। मगर उन्हें एमडी के आफिस में घुसने नहीं दिया जाता था, जिससे चिढ़ कर उन्होंने उस समय के एमडी नवनीत सहगल, जिनकी बेईमानी की चर्चा आम थी और जो उस समय ट्रांसफार्मरों की खरीद फरोख्त में काफी चर्चा में थे, के खिलाफ अपने अखबार में खूब लिखा। मगर इनकी दाल नहीं गली। संयोग की बात थी कि एक दिन इनके गुरु उनका नाम नहीं लूंगा वह किसी मुद्दे पर एमडी का वर्जन लेने के लिए बैठै थे, उसी वक्त राजेन्द्र गौतम भी विज्ञापन के सिलसिले में वहां आये, मगर कर्मचारियों ने उन्होंने बाहर निकाल दिया, मगर उनके गुरु से रहा नहीं गया। उन्होंने कर्मचारियों को हड़काते हुए इन्हें अन्दर आने को कहा, वह अंदर आये। इनके गुरु ने इनका परिचय एमडी से कराया और इनके विज्ञापन के लिए सिफारिश भी की।

अब सबसे मजेदार बात यह है कि राजेन्द्र गौतम जानते थे कि नवनीत सहगल बेईमान हैं, मगर इन्होंने ईमान से समझौता करते हुए नवनीत सहगल का पालतू कुत्ता बन गये। जब कि इनका परिचय कराये वाले इनके गुरु को वास्तविक रूप में अपना सर्वस्व जीवन पत्रकारिता को समर्पित कर दिया, उनको सैकड़ों बार नवनीत सहगल और अन्य अधिकारियों ने लोभ लालच दिया। मगर आज तक उन्होंने अपने कर्म, धर्म और सिद्धांत से समझौता नहीं किया। मगर आज यही राजेन्द्र गौतम अपने ही गुरु को तथाकथित पत्रकार की संज्ञा दिये हैं। संज्ञा देने से पहले इन्होंने अपने गुरु के एहसानों का भी ख्याल नहीं रखा। नौकरशाही की दलाली करते हुए इनका जमीर इतना मर गया कि वह अपनी इंसानियत को भी भूल गये।

इसी क्रम में पत्रकारिता की दलाली का दूसरा नाम शरत प्रधान है। इनके बारे थोड़ा बख्‍श दे रहा हूं। इनको ये पता नहीं है कि पत्रकारिता किसके लिए की जाती है। प्रेस क्लब में एक महिला अपने बेटी की मौत को लेकर प्रेस कांन्फ्रेंस कर रही थी। इस घटना में डा. अखिलेश दास का नाम आ रहा था। इसलिए शरत प्रधान और कुछ तथाकथित पत्रकार जो अखिलेश दास के तलवे चाटते हैं। वह भीड़ में उस महिला को अपनी बात कहने के बजाय प्रेस क्लब से भगा दिये। यह कहने के लिए पत्रकार हैं। मगर चलते सफारी से हैं। रही बात इनकी प्रापर्टी की तो शुरू से तो भिखारी थे, मगर नेताओं के तलवे चाटते हुए इन्होंने तीन-तीन मकान और करोड़ों रुपये के बैंक बैलेंस बना रखे हैं।

अब रही हेमंत तिवारी की इनके बारे में विस्तृत रूप से अगले भाग में कहूंगा। हेमंत तिवारी कहने के लिए पत्रकारों के नेता हैं। यह पत्रकारों के हक की लड़ाई लड़ते हैं। मगर यह पत्रकारों के हक को खाते-खाते अपना तोंद कब बढ़ा लिये इसके बारें में शायद ही कोई जानता है। गत वर्ष जुमे की नमाज के दौरान एक समुदाय द्वारा माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई थी। उस घटना में पुलिस ने मीडिया कवरेज करने के दौरान पत्रकारों और कैमरामैनों को ही पीट दिया। उनके कैमरे तोड़ दिये गये। किसी तरह प्रमुख सचिव को बहला फुसला कर पत्रकारों को कैमरा देने के लिए नाम पर शांत करा दिया गया। कैमरे खरीदने के लिए पीडि़त कैमरामैनों को और घायल कैमरामैन और पत्रकारों को 20 हजार से लेकर 50 हजार तक रुपये दिये जाने की बात कही गई, जिसमें हेमंत तिवारी कुछ कैमरामैनों को पैसे दे दिये बाकी के हस्ताक्षर करा कर उनके पैसे अपनी तोंद में डकार गये। अब सवाल यह उठता है कि पत्रकारिता के नाम पर दलाली किसने की, राजेन्द्र गौतम के गुरु, शरत प्रधान, नवनीत सहगल या फिर हेमंत तिवारी?

विनीत राय का यह लेख लखनऊ के तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्‍ता के फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है।

जनसंदेश टाइम्‍स, इलाहाबाद से एडिटोरियल हेड रवि प्रकाश मौर्य का इस्तीफा

इलाहाबाद से खबर है कि जनसंदेश टाइम्स में एडिटोरियल हेड के रूप में कार्य कर रहे रवि प्रकाश मौर्य ने यहां के जीएम रंजीत कुमार मौर्य से विवाद होने के बाद इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने रवि मौर्या से विज्ञापन की एक खबर लगाने को कहा था जिसे उन्होंने लगाने से मना कर दिया था। यह बात सीईओ व डायरेक्टर तक पहुंची तो रवि मौर्या ने सीईओ को इस्तीफा भेज दिया। बता दें कि करीब दो माह पूर्व सीईओ आरपी सिंह से विवाद के होने बाद यहां के सम्पादकीय प्रभारी आनंद नारायण शुक्ल ने भी इस्तीफा दे दिया था और अपनी टीम लेकर सिटी टाइम्स चले गये।

विकट परिस्थितियों में रवि मौर्या ने जनसंदेश को संकट से उबारा और गिने-चुने कर्मचारियों के सहारे अपने दम पर अखबार निकाला। बनारस के मैनेजमेंट ने भी इसके लिये रवि मौर्या की जमकर तारीफ की क्योंकि इससे पूर्व जनसंदेश के लिये ऐसा किसी ने नहीं किया था। गोरखपुर में शैलेन्द्र मणि की टीम के विद्रोह के बाद वहां छह दिन अखबार नहीं निकला था। जनसंदेश के कर्मचारी अभी भी नहीं समझ पा रहे हैं कि जिस रवि ने जनसंदेश को डूबने से बचाया और जो जनसंदेश के चक्कर में आनंद शुक्ला से मुकदमा लड़ रहा है, उसका एहसान मानने के बजाय उसका इस्तीफा कैसे स्वीकार कर लिया गया। कहीं यह सुनियोजित तो नहीं था।

बता दें कि रवि प्रकाश मौर्य की गिनती एक तेज-तर्रार पत्रकार और लेखक के रूप में होती है। रवि मौर्या इससे पूर्व दैनिक जागरण, हरिभूमि, हर शनिवार साप्ताहिक पत्रिका में काम करने के साथ कई पत्रिकाओं का संपादन कर चुके हैं। 2005 में उनकी एक किताब ‘सप्त शिखरों से साक्षात्कार’ प्रकाशित हो चुकी है। जल्द ही पाठकों के हाथों में उनकी चार किताबें- मच्छरों की मीटिंग (व्यंग्य संग्रह), साढ़े सात चरित्र (कहानी संग्रह) व दो उपन्यास ‘जीवन युद्ध’ व ‘पापा’ भी होंगी। इसके अलावा अभी हाल ही में आई चर्चित नई पत्रिका ‘प्रयाग’ (अर्धवार्षिक) के वह सह संपादक है।

इस्तीफे की खबर की पुष्टि के लिये जब रवि मौर्या को फोन किया गया तो उन्होंने बताया कि कुछ समय पूर्व पायनियर से आये विज्ञापन प्रबंधक प्रमोद यादव का हस्तक्षेप सम्पादकीय विभाग में इतना बढ़ गया था कि काम करना मुश्किल हो गया था। ऑफिस के कर्मचारी तक उन्हें मिनी जीएम कहते हैं। जीएम रंजीत मौर्या के पास अखबार का कोई अनुभव न होने से प्रमोद जितना कहते हैं, वह उतना ही करते हैं। प्रमोद की बात मानने की दूसरी वजह यह है कि प्रमोद को रंजीत के भाई व लखनऊ के जीएम विनीत मौर्या ने ज्वाइन करवाया है, तीसरा इनके सबसे बड़े भाई व डायरेक्टर रवीन्द्र मौर्या भी प्रमोद की ही सुनते हैं। प्रमोद के बेलगाम होने की यही वजह है। दूसरी ओर बनारस से डिमोट कर इलाहाबाद भेजे गये आशीष बागची भी अपने अस्तित्व के चक्कर में प्रमोद की ही बात मानने को मजबूर हैं। ऐसी परिस्थिति में मेरे लिये काम करना असंभव हो गया था इसलिये इस्तीफा दे दिया।
 

रवि मौर्या ने कुरेदने पर कुछ और भी खुलासे किये। आशीष बागची ने आने के बाद से ही रवि मौर्या के ऊपर दबाव बनाना शुरू किया कि वह आनंद शुक्ला के खिलाफ दर्ज कराये गये मुकदमे को वापस ले लें और उनसे समझौता कर लें। यही नहीं, अन्य लोगों से भी यह कहते रहे कि वे रवि को समझाएं। खिसियाये रवि मौर्या ने इसकी शिकायत सीईओ आरपी सिंह से कर दी। हतप्रभ सीईओ ने इस हिमाकत की चर्चा मालिक अनुराग कुशवाहा से की। नतीजतन रंजीत व बागची को जमकर डांट पड़ी। इससे वे रवि मौर्या से खुन्नस रखने लगे। इसके बाद बागची ने जागरण की वेबसाइट से खबर उड़ाकर जनसंदेश में छपवाने का कुचक्र रचा।

रवि मौर्या ने इसकी शिकायत तत्काल रंजीत मौर्या से की तो उन्होंने कोई सुनवाई नहीं की क्योंकि वह पहले से ही रवि से भिन्नाये थे। इसके बाद रवि मौर्या ने इसकी शिकायत सीईओ आरपी सिंह से कर दी तो उन्होंने इसे बेहद संगीन अपराध मानते हुये रंजीत मौर्या व बागची को दुबारा सख्त हिदायत दी कि अब आइंदा ऐसा नहीं होना चाहिये। जागरण ने मुकदमा ठोंका तो कंपनी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। ये लोग तभी से रवि मौर्या से खुन्नस खाये थे, वहीं प्रमोद की राह में भी रवि मौर्या ही सबसे बड़े रोड़ा थे। फिर एक षडयंत्र के तहत रवि मौर्या को इस्तीफे के लिये मजबूर कर दिया गया। रवि मौर्या ने बताया कि इस्तीफे के बाद वह कहीं और ज्वाइन करने के बजाय अपना पूरा समय साहित्य सेवा में लगायेंगे।

कानपुर में सरकारी गुंडा बनी पुलिस, डाक्‍टरों के बाद मीडियाकर्मियों पर तोड़ी लाठियां

: कई प्रेस फोटोग्राफरों को आई गंभीर चोट : कई डाक्‍टर भी घायल : कानपुर में एक छोटी सी घटना ने विकराल रूप धर लिया. पहले सत्‍ता के मद में चूर सपा विधायक के लोगों ने जूनियर डाक्‍टरों से मारपीट किया. इसके बाद विधायक की सहयोगी बनकर पुलिस ने सारी हदें पार करते हुए जूनियर व सीनियर डाक्‍टरों के अलावा मीडियाकर्मियों पर भी जमकर हमला बोला. एक दर्जन से ज्‍यादा प्रेस फोटोग्राफरों को गंभीर चोटें आई हैं. एसएसपी के आदेश के बाद कानपुर की पुलिस सरकारी गुंडा बन गई और जो भी मिला उसको लाठियों से जमकर पीटा.

बताया जा रहा है कि मेडिकल कालेज से जुड़े हैलेट अस्‍पताल के पास कुछ जूनियर डाक्‍टर दवा खरीदने गए थे. इसी बीच किसी बात को लेकर डाक्‍टरों की एक उम्रदराज व्‍यक्ति से विवाद हो गया. बात बढ़ने पर जूनियर डाक्‍टरों ने उक्‍त व्‍यक्ति को थप्‍पड़ मार दिया. वहीं पास में सपा विधायक इरफान सोलंकी अपने गनर के साथ खड़े थे. मामला सुलटाने की बजाय विधायक ने अपने गनर को आदेश दिया कि जूनियर डाक्‍टरों को उनकी औकात बताओ. गनर एक जूनियर डाक्‍टर को थप्‍पड़ रसीद कर दिया. इसके बाद जूनियर डाक्‍टर भी गुस्‍से में गनर को पीट दिया. गनर ने हवाई फायर कर दिया. इसके बाद जूनियर डाक्‍टर हास्‍टल में भाग गए.

बताया जा रहा है कि इसके बाद इरफान सोलंकी के समर्थक तथा कुछ पुलिसकर्मी हैलट अस्‍पताल पहुंचे तथा हवाई फायरिंग करने के साथ दूसरे जूनियर डाक्‍टरों को पीटना शुरू कर दिया. इसकी सूचना जब हास्‍टल के जूनियर डाक्‍टरों को मिली तो उन्‍होंने भी विधायक समर्थकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. दोनों तरफ से ईंट-पत्‍थर चले तथा जमकर हवाई फायरिंग हुई. इसके बाद एसएसपी यशस्‍वी यादव बड़ी भारी फोर्स के साथ हैलेट अस्‍पताल पहुंचे तथा जूनियर डाक्‍टरों पर लाठी चार्ज करा दिया. पुलिस ने हवाई फायरिंग भी की.

फायरिंग से घबराए जूनियर डाक्‍टर जब हास्‍टल में भागे तो भारी पुलिस बल वहां भी घुस गई. एसएसपी के खुले आदेश से मदमस्‍त पुलिस जूनियर व सीनियर सभी डाक्‍टरों को गिरा गिराकर मारने लगी. यहां तक कि हास्‍टल में पड़े सामानों को भी पुलिस ने तहस नहस कर दिया. जो भी मिला पुलिस ने बिना किसी कारण के उसे पीटना शुरू कर दिया. इस घटना की जानकारी जब मीडियाकर्मियों को मिली तो तमाम अखबारों के फोटोग्राफर मौके पर पहुंचे तथा फोटो पुलिस की गुंडागर्दी की फोटो खिंचने लगे.

बताया जा रहा है कि फोटोग्राफरों को फोटो खिंचते देख एसएसपी बौखला गया. उसने पुलिस वालों को इन पर भी हमला करने का इशारा कर दिया. अपने आका का इशार मिलते ही पुलिसवाले कुत्‍तों की तरह फोटोग्राफरों पर टूट पड़े. लाठी चार्ज में आई नेक्‍स्‍ट के अभिनव, दैनिक जागरण के आशु अरोड़ा, अमर उजाला के धीरेंद्र जायसवाल, ओपी वाधवानी, संजीव शर्मा, हिंदुस्‍तान के गजेंद्र सिंह, वैभव शुक्‍ला समेत कई अखबारों के एक दर्जन से ज्‍यादा फोटो जर्नलिस्‍ट गंभीर रूप से घायल हो गए. किसी के हाथ पैर में चोट आई तो किसी का सिर फट गया. कई मीडियाकर्मियों को फ्रैक्‍चर भी हुआ है.

सत्‍ता के मद में चूर विधायक के समर्थन में सरकारी गुंडा बनी पुलिस की इस कार्रवाई से कानपुर की मीडिया में जबर्दस्‍त रोष है. पत्रकारों ने पुलिस की इस एकतरफा कार्रवाई की निंदा करते हुए एसएसपी तथा दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ दंडात्‍मक कार्रवाई करने की मांग की है. बताया जा रहा है कि कानपुर के मीडियाकर्मी तथा डाक्‍टर संघर्ष का रास्‍ता अपनाने की तैयारी कर रहे हैं. अब देखना है कि प्रशासन पूरे मामले का निष्‍पक्ष जांच कराकर दोषियों को सजा दिलाता है या फिर एकतरफा कार्रवाई करते हुए डाक्‍टरों तथा मीडियाकर्मियों को ही प्रताडि़त करता है.

रवींद्र शाह स्मृति व्याख्यान में बोले वक्ता- वर्तमान पत्रकारिता पर कार्पोरेट कल्चर पूरी तरह हावी है (देखें तस्वीरें)

: पत्रकार रवींद्र शाह को याद किया गया : इंदौर। पत्रकारिता का आवरण और कलेवर बदल गया है। वर्तमान में पत्रकारिता पर कॉर्पोरेट कल्चर पूरी तरह हावी है। मीडिया अब टर्नओवर वाली कंपनी बन गया है। समाज से जुड़े सरोकार अब पत्रकारिता में दिखाई नहीं देते हैं। न्यू मीडिया के लिए भारत अब सिर्फ एक बाजार है। मीडिया में आए इन्हीं परिवर्तनों से सोशल साइट्‍स के रूप में नए मीडिया का उदय हुआ है।

ये विचार मीडिया से जुड़े वक्ताओं ने स्व. पत्रकार रवीन्द्र शाह की याद में 'पत्रकारिता- कॉर्पोरेट कल्चर- न्यू मीडिया' विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में व्यक्त किए। पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि मीडिया के स्वरूप में बदलाव आ रहा है और अब अखबारों का एकाधिकार खत्म हो गया है। न्यू मीडिया के नाम पर सोशल साइट्‍स जैसा प्लेटफार्म लोगों को मिल गया है। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया के इस दौर में देश में कई हिस्सों में ऐसी समस्याएं हैं, जो देश के सामने नहीं आ पाती हैं। न्यू मीडिया केजरीवाल का इलेक्ट्रॉनिक एडिशन है।

श्रीवर्धन त्रिवेदी ने कहा कि पत्रकारिता का आवरण, कलेवर बदल गया है। व्यावसायिक जरूरतों ने कॉर्पोरेट कल्चर को बढ़ावा दिया है। हर तरह के मीडिया पर दबाव बड़ा है। पछाड़ने की प्रतियोगिता के घालमेल ने मीडिया के स्वरूप को बदल दिया है। कॉर्पोरेट कल्चर का मीडिया में आना बुरी बात नहीं हैं, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए। इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया के बारे में कहा कि यह आत्ममुग्‍धता का क्षेत्र है। इससे लोगों की निजता खत्म हुई है।

भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह ने कहा कि आजकल मीडिया पैसा पैदा करने की मशीन बन गया है। मीडिया टर्नओवर बढ़ाने वाली कंपनी हो गया है। कॉर्पोरेट घरानों के इस क्षेत्र में आने से पत्रकारिता करने वाले पत्रकार मैनेजर बन गए हैं। कॉर्पोरेट मीडिया के दौर में पत्रकारिता बिकाऊ है। उन्होंने कहा कि मीडिया भ्रष्ट नहीं हुआ है, उसे भ्रष्ट किया गया है। न्यू मीडिया के नए स्वरूप में सोशल मीडिया सामने आया है जिसने कॉर्पोरेट मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। सोशल मीडिया से हर आदमी पत्रकार बन गया है। सच बोलने वाले ही पत्रकारिता को बचाएंगे।

डॉ. प्रवीण तिवारी ने कहा, बदलते मीडिया में अच्छी चीजें भी हैं और बुरी भी। जनता से जुड़े सरोकार अब मीडिया में नजर नहीं आते हैं। चैनलों, अखबारों की देश में बाढ़ आ रही है। मीडिया इंडस्ट्री में अच्छी चीज यह है कि युवाओं को अवसर मिल रहे हैं। नकारात्मक पहलू यह है कि बिना कॉर्पोरेट कल्चर के आज मीडिया चल नहीं सकता। अभिनेता पदमसिंह ने कहा कि मीडिया में कॉर्पोरेट कल्चर से आ रही परेशानियों का हल भी मीडिया से जुड़े लोगों को निकालना होगा।

कार्यक्रम की शुरुआत में भैरूसिंह चौहान ने कबीर गीत प्रस्तुत किए तथा सामाजिक संस्था परितृप्ति के सामाजिक कार्यों को वीडियो फिल्म द्वारा प्रस्तुत किया गया। सभी वक्ताओं ने रवीन्द्र शाह को इनोवेटिव और कर्मशील पत्रकार बताया। 2012 में एक कार्यक्रम में रवीन्द्र शाह द्वारा कहे गए आखिरी शब्दों की वीडियो क्लिप भी दिखाई गई। विचार गोष्ठी में राजीव शाह ने ‍विषय की परिकल्पना पेश की। दीपक चौरसिया की ओर से देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की छात्रा श्रुति को पहला रवीन्द्र शाह स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके लिए उन्हें 10 हजार रुपए और स्मृति चिन्ह दिया गया। कार्यक्रम का संचालन संजय पटेल ने किया। (साभार : वेबदुनिया)

गैर-जमानती वारंट रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे सुब्रत रॉय

नई दिल्ली: सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट की तामील करवाने के लिए पुलिस लखनऊ में उनके घर पहुंची। बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था।

वहीं, आज सुब्रत रॉय अपने खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और उन्होंने 4 मार्च को न्यायालय में हाजिर होने का आश्वासन दिया। उन्होंने न्यायालय में बुधवार को पेश नहीं होने के लिए बिना शर्त माफी मांगी है।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बुधवार को सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी के लिए गैर- जमानती वारंट जारी किया था, क्योंकि निवेशकों का 20 हजार करोड़ रुपये नहीं लौटाने के कारण लंबित अवमानना के मामले में सहारा प्रमुख न्यायिक आदेश के बावजूद न्यायालय में पेश नहीं हुए थे।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की खंडपीठ ने बुधवार को कहा था, हमने मंगलवार को ही राय को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट देने से इनकार कर दिया था। वह आज भी पेश नहीं हुए हैं और हम गैर-जमानती वारंट जारी कर रहे हैं, जिसकी तामील 4 मार्च तक होनी है।

इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही रॉय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने न्यायाधीशों को सूचित किया कि सुब्रत रॉय अपनी 95-वर्षीय मां के खराब स्वास्थ्य की वजह से कोर्ट में पेश होने में असमर्थ हैं। इस पर न्यायाधीशों ने कहा, इस कोर्ट के हाथ बहुत लंबे हैं। मंगलवार को ही हमने व्यक्तिगत पेशी से छूट देने का आपका अनुरोध ठुकराया था। हम गैर-जमानती वारंट जारी करेंगे। यह देश की सर्वोच्च अदालत है।

न्यायाधीशों ने कहा, हमने आपसे कहा था कि हम व्यक्तिगत पेशी से आपको छूट देने के पक्ष में नहीं हैं। यदि अन्य निदेशक पेश हो सकते हैं तो फिर आप क्यों नहीं? कोर्ट ने निवेशकों को 20 हजार करोड़ रुपये लौटाने के आदेश पर अमल नहीं किए जाने के कारण 20 फरवरी को सहारा समूह को आड़े हाथ लेते हुए सुब्रत रॉय के साथ ही सहारा इंडिया रियल इस्टेट कार्प लि और सहारा इंडिया हाउसिंग इन्वेस्टमेन्ट कार्प लि के निदेशकों रवि शंकर दुबे, अशोक राय चौधरी और वंदना भार्गव को समन जारी किए थे। (एनडीटीवी)

सूचना मांगना पत्रकार को पड़ा महंगा, पुलिस ने झूठे मुकदमें में फांसा

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में आरटीआई के तहत सूचना मांगना तथा मानवाधिकार आयोग में पुलिस उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराना एक पत्रकार को इतना महंगा पडा कि पुलिस ने उसे झूठे मुकदमें में फंसाकर उसका उत्पीड़न शुंरू कर दिया। यूपी पुलिस इसके पहले भी पोल खोले जाने से नाराज होकर या बड़े लोगों के दबाव में फर्जी फंसाती रही है। बिजनौर पुलिस के उत्‍पीड़न का विरोध करते हुए पत्रकारों ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

जानकारी के अनुसार थाना नूरपुर क्षेत्र के पुलिस उत्पीड़न के शिकार वरिष्ठ पत्रकार ने थाना कांठ के अतंर्गत ग्राम कुमखिया में एक प्राइवेट कालेज में शिक्षक व वरिष्ठ लिपिक पद पर कार्य किया था। स्कूल प्रबंधक जितेंद्र सिंह की ओर से निर्धारित मानदेय न देने तथा मांगने पर सबक सिखाने की धमकी दी थी, जिसके बाद पीडित द्वारा 19 जून को पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की गई थी। इसके बाद मानदेय न मिलने पर बिजनौर कोर्ट में वाद दायर किया गया।

तीन दिसम्बर को मानवाधिकार आयोग में पुलिस की एक पक्षीय कार्यवाही की शिकायत दर्ज कराई गई। बाद इसके थाना कांठ पुलिस आरटीआई के तहत संबधित विद्यालय तथा पुलिस से मानदेय संबंधी प्रार्थना पत्रों पर जांच संबंधी सूचनाएं मांगने पर पत्रकार कमलजीत सिंह नूर का उत्पीड़न करने पर लगी। संस्था प्रबन्धक द्वारा शासन-प्रशासन की किसी भी जांच से बचने के लिए पुलिस से मिलकर कमलजीत सिंह के खिलाफ थाना कांठ में दिनांक 5 अक्टूबर 13 को मुकदमा दर्ज करा दिया गया।

दर्ज एफआईआर का प्रतिवादी पक्ष को पता नहीं चला तथा पुलिस ने एकतरफा विवेचना कर कमलजीत सिंह नूर व उनके परिवार का उत्पीड़न शुरू कर दिया। इस संबंध में क्षेत्रीय पत्रकार पिछले सप्ताह वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुरादाबाद से मिलकर उन्हें सही स्थिति से अवगत कराते हुए इस मैटर की किसी अन्य थाने से निष्पक्ष जांच की मांग कर चुके हैं। एक बार फिर स्थानीय पत्रकारों ने पुलिस की कार्रवाई पर रोष व्यक्त करते हुए इस प्रकरण की शिकायत कर उच्च स्तरीय जांच तथा दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

घर पर नहीं मिले सुब्रत राय, बैरंग लौटी गोमतीनगर पुलिस

: कोर्ट की अवमानना पर जारी हुआ था एनबीडब्ल्यू : लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना के दोषी सहारा इंडिया के प्रमुख सुब्रत राय के खिलाफ जारी नान बेलेबल वारंट (एनबीडब्ल्यू) को तालीम कराने के लिए गुरुवार को लखनऊ की गोमतीनगर पुलिस उनके आवास पर पहुंची, लेकिन सुब्रत राय घर पर नहीं मिले।

एसपी ट्रांसगोमती हबीबुल हसन ने बताया कि लखनऊ के गोमतीनगर में सहारा शहर में सुब्रत राय रहते हैं। पुलिस की टीम सहारा शहर के बाहर ही है। उनके स्टॉफ ने बताया है कि सुब्रत राय इस समय सहारा शहर में नहीं हैं। उनकी लोकेशन का भी अभी कुछ पता नहीं चल पाया है। जानकारी के अनुसार सुब्रत रॉय ने गिरफ्तारी वारंट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वे चार मार्च को जरूर कोर्ट के समक्ष पेश होंगे।

गौरतलब है कि बुधवार को समन के बावजूद कोर्ट में पेश न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। अदालत ने उन्हें गिरफ्तार कर चार मार्च को सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने आदेश सहारा के खिलाफ दाखिल सेबी की अवमानना याचिका पर जारी किया। बाजार नियामक सेबी ने निवेशकों के 20,000 करोड़ रुपये वापस करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाते हुए सुब्रत राय और सहारा की दो कंपनियों के निदेशकों के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की है।

20 फरवरी को शीर्ष अदालत ने सहारा प्रमुख व तीन अन्य निदेशकों को 26 फरवरी को निजी तौर पर कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया था। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति जेएस खेहर की पीठ को उनके वकील ने बताया कि सहारा की दो कंपनियों के तीन निदेशक अशोक राय चौधरी, रवि शंकर दुबे व वंदना भार्गव कोर्ट में पेश हुए हैं। मगर सुब्रत राय मां की बीमारी के कारण पेश नहीं हो सके। इन्‍होंने इस आशय का विज्ञापन भी कई अखबारों में प्रकाशित करवाया है।

बसपा प्रत्‍याशी ने चंदौली के पत्रकारों को बांटी नगदी!

हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक शशि शेखर 26 फरवरी की सुबह लोगों को 'वोट की चोट का अर्थ' समझा रहे थे. अपने 'आओ राजनीति करो अभियान' की सफलता का गुणगान कर रहे थे. इसी दिन एक जगह उनके अखबार के एक ब्‍यूरोचीफ के बिकने की तैयारी चल रही थी. पेड न्‍यूज पर मातम करके पेड न्‍यूज छापना हिंदुस्‍तान की पुरानी नीति रही है. पिछली बार भी विधानसभा चुनाव के दौरान हिंदुस्‍तान, बनारस में माफिया डॉन ब्रजेश सिंह का पेड न्‍यूज छापने पर कई लोगों की बत्‍ती गुल हुई थी. इसके बाद भी हिंदुस्‍तानियों ने स‍बक नहीं लिया. हालांकि इस बार हिंदुस्‍तान समेत कई अखबारों के ब्‍यूरो चीफ और पत्रकार पैसा पाकर संबंधित प्रत्‍याशी के पक्ष में माहौल बनाने को तैयार हुए हैं.

मामला चंदौली जिले का है. चंदौली लोकसभा सीट से बसपा ने धनबली अनिल मौर्या को प्रभारी घोषित किया है. यानी एक तरह से प्रत्‍याशी बनाया है. अनिल मौर्या लंबे समय से चुनाव की तैयारियों में जुटे हुए हैं. अखबारों को बड़े-बड़े विज्ञापन पहले से ही देते रहे हैं. इस बार उन्‍होंने पत्रकारों को ही ओबलाइज करने की तैयारी की. इसके लिए दिन चुना गया 26 फरवरी, जिस दिन सुबह हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक शशि शेखर वोट की चोट का अर्थ समझा रहे थे. जगह चुना गया मुगलसराय और चंदौली के बीच स्थित चौपाल सागर. समय तय किया गया दिन के एक बजे. खिलाने-पिलाने से लेकर गिफ्ट और नगदी देने की तैयारी की गई.  

बसपा प्रभारी अपने नियत समय से चौपाल सागर पहुंचे. इसके बाद दैनिक जागरण के प्रभारी विजय सिंह जूनियर भी विज्ञापन प्रभारी नन्‍हें मुगल और फोटोग्राफर के साथ चौपाल सागर पहुंचे. आज अखबार के ब्‍यूरोचीफ शिव पूजन व पत्रकार गनपत राय, राष्‍ट्रीय सहारा के ब्‍यूरोचीफ आनंद सिंह भी पहुंच गए. सवा बजे तक हिंदुस्‍तान और अमर उजाला के ब्‍यूरोचीफ नहीं पहुंचे तो इंतजार करने वालों की धड़कन बढ़ गई. इंतजार के दर्द को कम करने के लिए पनीर पकौड़े का दौर शुरू हुआ. पत्रकार बंधु जमकर पनीर पकौड़ा तोड़ने लगे. इसी बीच लगभग पौने दो बजे के आसपास हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरोचीफ प्रदीप शर्मा भी मौके पर पहुंच गए.

इसके बाद मौर्या जी के पक्ष में लंबी-लंबी फेकने का दौर चलने लगा. पत्रकार चौपाल सागर में ही अनिल मौर्या को जिताने लगे. उन्‍हें जातीय समीकरण समझाने लगे. अखबार में उनके लिए गुडी गुडी लिखने के कसमे वादे भी खाने लगे. दो बजे के आसपास अमर उजाला के ब्‍यूरोचीफ अजातशत्रु चौबे भी अपने दो साथियों अमित द्विवेदी और शमशाद के साथ पहुंचे. इसके बाद शुरू हुआ खाने का दौर. पत्रकार बंधु जमकर खाना पीना खाए. जब चलने लगे तो ब्‍यूरोचीफ लोगों को एक-एक लिफाफा थमाया गया, जबकि उनके साथ गए चिंटू-पिंटू को गिफ्ट पैकेट दिए गए. इसमें महंगे टी सेट और अन्‍य सामान थे. सूत्रों ने बताया कि ब्‍यूरोचीफों को जो लिफाफे दिए गए उसमें नगद ग्‍यारह-ग्‍यारह हजार रुपए थे.

लिहाफा थामने के बाद खुशी मन से सभी ने अपनी अपनी जेबों में रख लिया. किसी ने भी उसे वापस करने की हिमाकत नहीं की, किसी ने भी मुंह पर मारने की हिम्‍मत नहीं की. सभी लोग खुश होकर मौर्या की वाहवाही करते हुए अपने कामों पर लौट आए. हालांकि गलती यह हो गई कि यह काम चोरी छिपे करने की बजाय सरेआम होने से भेद खुल गया. चूंकि इस मामले की कोई खबर अखबार में भी नहीं प्रकाशित हुई, लिहाजा यह भी कहने को नहीं बचा कि प्रत्‍याशी ने प्रेस कांफ्रेंस या ऐसा कुछ कार्यक्रम किया था. अब माल और गिफ्ट लेने वाले भेद खुलने के बाद मुंह छिपाते फिर रहे हैं. ऐसी घटनाएं पहले भी होती थी, लुके और छिपे लेकिन अब तो यह दस्‍तूर बन गया है. (कानाफूसी)

नीतीश ने फोटोग्राफर से कहा- परेशान मत करो, अखबार में कुछ नहीं छपेगा

पटना : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मीडिया के बहुत नाराज है क्योंकि उनकी संकल्प रैलियों में मीडिया में पर्याप्त जगह नहीं मिल रही। अभी तक नीतीश कुमार पर बिहार में मीडिया का गलत इस्तेमाल करने के आरोप लगाए जाते रहे। यह आरोप न केवल विपक्षी नेता लालू प्रसाद यादव द्वारा बल्कि प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन मार्केंडय काटजू द्वारा भी नीतीश पर लगाए गए।

गत बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश ने बेगू सराय में अपनी एक रैली के दौरान मंच पर मौजूद फोटोग्राफर से कहा कि आप दूर हो जाए। समाचारपत्रों में कुछ नहीं छपेगा। आप हमें क्यों परेशान कर रहे है? मुझे मालूम है कि अखबार में कुछ भी नहीं छपेगा। नीतीश ने यह भी टिप्पणी की कि उनका चेहरा अच्छा नहीं है, ‘छपने के लिए चेहरा होना चाहिए।

नीतीश ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हम अविकसित राज्य से है न इसलिए हमारे बारे में कुछ ज्यादा नहीं छपता। इस सप्ताह के शुरू में जद(यू) नेता ने मोदी और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को मीडिया के चहेता बताया। (पंजाब केसरी)

श्रीनगर में सड़क हादसे में चार मीडियाकर्मी घायल

श्रीनगर से खबर है कि सड़क हादसे में तीन पत्रकार समेत चार मीडियाकर्मी घायल हो गए। बताया जा रहा है कि तीन पत्रकार आदिल लतीफ, कारी इंजमाम, इशान वानी तथा प्रेस फोटोग्राफर शाहिद तांत्रे शनिवार की सुबह खबर कवरेज के लिए श्रीनगर से बारामूला जा रहे थे. रास्‍ते में उनकी टवेरा गाड़ी हैदरवेग पट्टन के पास विपरीत दिशा से आ रही अल्‍टो कार से टकरा गई. इस हादसे में चारों मीडियाकर्मी समेत अल्‍टो में सवार दो लोग घायल हो गए.

दुर्घटना के बाद स्‍थानीय लोगों ने सभी घायलों को कार से बाहर निकाला तथा इलाज के लिए तत्‍काल एक निजी अस्‍पताल में पहुंचाया. जहां उनका इलाज हो रहा है. चारों मीडियाकर्मी समेत सभी घायल खतरे से बाहर बताए जा रहे हैं.

यूपी में भी लागू हो सकता है पत्रकार बीमा योजना, पीजीआई में फ्री इलाज शुरू

लखनऊ। बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों की तर्ज पर पत्रकारों के लिए ‘‘उत्तर प्रदेश राज्य पत्रकार बीमा योजना‘‘ लागू करने पर प्रदेश सरकार गंभीर पहल के लिए तैयार है। उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तत्काल विधिक परीक्षण कराने का आष्वासन दिया है। प्रस्ताव के मुताबिक इस योजना में ग्रुप मेडिक्लेम एवं व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा दोनों को शामिल किया जायेगा।

संवाददाता समिति ने अपने प्रस्ताव में ग्रुप मेडिक्लेम के बीमाधारक पत्रकारों के लिए फ्लोटिंग आधार पर 6 लाख रुपये तथा व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा के लिए भी 6 लाख रुपये का प्रावधान किये जाने की मांग की है। इसके तहत प्रिंट एव इलेक्ट्रानिक मीडिया के 21 से 70 वर्ष तक के पत्रकारों को शामिल किये जाने का प्रस्ताव है। शुक्रवार को कैबिनेट बैठक के उपरान्त पत्रकारों से वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी की मांग पर यह आश्‍वासन दिया। श्री तिवारी ने संजय गांधी पीजीआई में राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए मुफ्त चिकित्सा सुविधा शुरू कराने के लिए मुख्यमंत्री के प्रति आभार प्रकट किया।

उल्लेखनीय है कि प्रदेश सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग एवं एसजीपीजीआई प्रशासन के बीच इस विषय में कल ही करारनामे पर दस्तखत हुए हैं और अब यह सुविधा प्रारम्भ हो गयी है। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने पत्रकारों की निशुल्क चिकित्सा सुविधा में विलम्ब होने पर खेद व्‍यक्त किया और बताया कि एमओयू हस्ताक्षर होने के उपरान्त पत्रकारों को अब पीजीआई में निःशुल्क चिकित्सा सुविधा तत्काल प्रभाव से प्राप्त होगी। इस मौके पर समिति के उपाध्यक्ष नरेन्द्र श्रीवास्तव, सचिव सिद्धार्थ कलहंस, संयुक्त सचिव राजेश शुक्ला, कोषाध्यक्ष नीरज श्रीवास्तव, कार्यकारिणी सदस्य नायला किदवई तथा अविनाश मिश्र, मो: कामरान, मोहसिन हैदर, संजय राजन एवं बड़ी संख्या में मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित थे।

चंदौली में शिक्षिका ने पत्रकार पर लगाया यौन शोषण का आरोप

वैलेंटाइन वीक में एक पत्रकार की प्रेम कहानी का चैप्टर उस वक्त क्लोज हुआ जब प्यार में धोखा खाई प्रेमिका थाने पहुंच कर उस पर यौन शोषण करने का संगीन आरोप लगाने लगी। पत्रकार भी कहां कम था, उसने भी पत्रकारिता का रौब गांठते हुए मामले को सिरे से खारिज करने का पुलिस पर दबाव बनाया और फिर शुरू हुई पुलिस की जी हुजूरी और बलात्कार का आरोपी पत्रकार बन गया पुलिस का मेहमान।

मामला यूपी के चंदौली जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र का है, जहां एक तथाकथित पत्रकार व निजी कान्वेंट स्कूल के मैनेजर पर उसी विद्यालय की शिक्षिका ने यौन उत्पीड़न का सनसनीखेज आरोप लगाया है। पीडिता ने बताया की विगत छह माह से पत्रकार जकाउल्ला उसके साथ प्रेम करने का नाटक कर यौन शोषण करता रहा और इसी बीच पत्रकार ने अन्यत्र अपनी शादी कर ली और शिक्षिका को बरगलाने लगा। नौबत जब मारपीट तक आई तो मामला अलीनगर थाने पंहुचा लेकिन करीब चार घंटे चली पंचायत के बाद पत्रकारिता का धौंस जमाते हुए पत्रकार वहां से चलता बना और पीडिता न्याय की गुहार लगाते हुए पुलिस के सामने गिड़गिडाती रही। फिर भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा।

पीडिता के अनुसार पुलिस ने उसे मेडिकल के बाद एक सप्ताह तक नारी निकेतन भेजने की बात कह कर डरा रही है ताकि वह अपनी तहरीर वापस ले ले। पुलिस के इन कृत्यों से क्षुब्ध पीडिता की अभिभावक बन कर आई उसकी बड़ी बहन ने आरोपी पत्रकार के मुंह पर थूक कर अपनी भड़ास निकाली। पुलिस के असयोगात्‍मक रवैया से निराश होकर पीडिता घर चली गयी। बता दें कि जकाउल्ला कुछ माह पूर्व तक वाराणसी से प्रकाशित अख़बार निष्पक्ष दैनिक समाचार ज्योति का बीट रिपोर्टर हुआ करता था, जिसे ब्यूरो प्रमुख केसी श्रीवास्तव ने लापरवाही के आरोप में हटा भी दिया था। लेकिन आरोपी अब तक उसी बैनर का रौब जमाता चला आ रहा था।

पत्रकारिता की आड़ में विद्यालय का धंधा जब फलने फूलने लगा तो जरूरतमंद असहाय लडकियों को प्रेम का सब्जबाग दिखाने का धंधा शुरू किया और जब पोल खुली तो थाने में जलालत झेलनी पड़ी। करीब महीने भर पूर्व एक निजी चैनल के डिबेट कार्यक्रम के दौरान नगर के जाने माने प्रोफ़ेसर डा. अनिल यादव कहा था कि आजकल निजी विद्यालयों की आड़ में लडकियों का शारीरिक शोषण तेजी से चल रहा है। उनके इस बात की पुष्टि इस घटना से हो भी गई। श्री यादव ने इसे काफी शर्मनाक बताया साथ ही यह भी कहा कि हर बुराई को छिपाने की एक समयावधि होती है अब समय आ गया है शोषित व्यक्ति अब सामने आने से नहीं डर रहा है ये तो शुरुआत है अभी आगे आगे देखिये कितनों की कलई खुलती है।

कैनविज टाइम्‍स, बरेली के आरई बने ब्रजेंद्र निर्मल, संजीव एवं केके को नई जिम्‍मेदारी

करीब 24 वर्ष से प्रिंट मीडिया में सक्रिय ब्रजेंद्र निर्मल के बारे में खबर है कि उनको कैनविज टाइम्स बरेली का स्थानीय संपादक बनाया गया है। उनका नाम समाचार-पत्र की प्रिंट लाइन में प्रकाशित होने लगा है। कैनविज टाइम्स अब तक अपने लखनऊ संस्करण से ही तैयार पहला पेज से लेकर सभी जनरल पेज (संपादकीय, राष्ट्रीय, व्यापार, खेल व फलक आदि) प्रकाशित करता था। अब ये सभी पेज बरेली से बनाकर लखनऊ भेजे जा रहे हैं यानी जो जिम्मेदारी कैनविज टाइम्स के पूर्व संपादक प्रभात रंजन दीन निभा रहे थे, वह काम बरेली से करवाया जा रहा है। निर्मल इसके पहले अमर उजाला और हिंदुस्‍तान में लंबे समय तक वरिष्‍ठ पदों पर रहे हैं।

बरेली से जुड़े हमारे सूत्रों का कहना है कि यह जिम्‍मेदारी ब्रजेंद्र निर्मल को सौंपी गई है। उन्होंने ही अखबार का नया ले-आउट तैयार किया है। बरेली में अभी करीब 20 दिन से इस अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ है, लेकिन शुरुआती दौर में ही इस अखबार ने पहले से स्थापित अखबारों को चुनौती देनी शुरू कर दी है। यदि इसी तरह से अखबार के तेवर बने रहे तो यह आने वाले समय में यह कई अखबारों को मात दे सकता है। खबर यह भी है कि इस अखबार के संचालक अब बरेली को कैनविज टाइम्स का हेड आफिस बनाकर प्रदेश के दूसरे शहरों में भी विस्तार करने की योजना बना रहा है।

बरेली से दूसरी खबर यह आ रही है कि दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिन्दुस्तान में करीब 15 साल सेवाएं दे चुके संजीव गंभीर को कैनविज टाइम्स बरेली में ही मुशाहिद रफत की जगह सिटी डेस्क का इंचार्ज बना दिया गया है। वहीं दैनिक जागरण बरेली से आए केके सक्सेना को रिपोर्टिंग टीम का हेड बनाया गया है। माना जा रहा है कि दोनों के आने से कैनविज टाइम्‍स की टीम मजबूत हुई है। संभावना है कि कई और जाने पहचाने चेहरे कैनविज टाइम्‍स से जुड़ सकते हैं।

अंकुर ने ईटीवी तथा पंकज ने डीएनए ज्‍वाइन किया

डेली न्‍यूज ऐक्टिविस्‍ट, लखनऊ से खबर है कि अंकुर सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. अंकुर ने अपनी नई पारी हैदराबाद में ईटीवी के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर कॉपी एडिटर बनाया गया है तथा नेशनल डेस्‍क पर जिम्‍मेदारी सौंपी गई है.

अंकुर डीएनए से पहले दैनिक जागरण से जुड़े हुए थे. पत्रकारिता के साथ वे फोटोग्राफी में भी माहिर हैं.

अंकुर सिंह
सूत्रों का कहना है कि ईटीवी प्रबंधन ने 15 लोगों की ज्‍वाइन कराया है. इसमें चार लखनऊ से हैं, जिनमें प्राची और अंबुज शामिल हैं. अन्‍य लोगों के नामों की जानकारी नहीं मिल पाई है.

दूसरी तरफ अंकुर सिंह के स्‍थान पर पंकज पांडेय ने डेली न्‍यूज ऐक्टिविस्‍ट के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. वे इसके पहले वॉयस ऑफ मूवमेंट के साथ जुड़े हुए थे. प्रभात रंजन दीन की टीम के आने के बाद इन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था.

झांसी मीडिया क्‍लब : 17 पदों के लिए भरे गए 35 नामांकन

झांसी में जल्द ही झांसी मीडिया क्लब का गठन होने जा रहा है। जिसको लेकर बुधवार को नामांकन दाखिल किए गए। चुनाव 16 फरवरी को होंगे। झांसी में यह पहली बार हो रहा है कि झांसी मीडिया क्लब के गठन होने से पहले ही पत्रकार एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं। इस क्लब में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खासा उत्साह के साथ-साथ एकता भी भरपूर नजर आ रही है। वहीं, अब भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार ऐसे हैं, जो इस झांसी मीडिया क्लब के गठन से खासे नाराज हैं। इतना ही नहीं इन पत्रकारों ने अन्य पत्रकारों में फूट फैलाने की प्रयास किया, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके।

यह झांसी का पहला क्लब है, जिसमें पत्रकारों की भारी तादाद है। इस क्लब में पत्रकारों की भारी संख्या देख झांसी में पहले से गठित मीडिया क्लबों में खासी हलचल है और अंदर ही अंदर इसका विरोध भी कर रहे हैं, लेकिन पत्रकारों की खासी संख्या देख अन्य संगठनों की हवा खराब हो चुकी है। झांसी में शुरुआती दौर से ही प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अलग-अलग था। अन्य पत्रकारों द्वारा फूट डालने की राजनीति के चलते पत्रकार एक मंच पर खड़े नहीं हो पा रहे थे।

इस फूट डालो राजनीति में सबसे ज्यादा श्रेय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उन पत्रकारों को जाता है, जिन्होंने कभी पत्रकारों को एक नहीं होने दिया। समय के साथ-साथ सब कुछ बदलने लगा। देखते ही देखते अब पत्रकारों ने अपना भी मंच तलाशना शुरू किया। पहल हुई और यह पहल समय के हिसाब से सही साबित हुई। झांसी में पहले से ही पत्रकारों के कई संगठन बने हुए हैं, लेकिन इन संगठनों ने कभी पत्रकारों के हित की बात नहीं की है बल्कि अपना उल्लू सीधा किया है। कई बार झांसी में पत्रकारों पर हमले हुए तो कई बार उनकी जान पर भी बन आयी, लेकिन किसी भी संगठन ने अपने पत्रकारों का साथ ने देते हुए दूसरे पक्षों के साथ खड़े नजर आए।

दिन पर दिन झांसी में पत्रकार बिखरते जा रहे थे। इसी को देखते हुए झांसी के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारों ने झांसी मीडिया क्लब गठित करने का निर्णय लिया। यह पहला संगठन हैं, जिसमें प्रिंट के 126 व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के 27 पत्रकार शामिल हुए। इसके लिए बाकायदा दो सदस्यता प्रभारी बनाए गए, जिसमें आईबीएन-7 के संवाददाता शकील अली हाशमी व दैनिक जनसेवा मेल के संवाददाता शशांक त्रिपाठी को सदस्यता प्रभारी नियुक्त किया गया था, जिन्‍हें 10 फरवरी तक सदस्य बनाने थे। पत्रकारों ने भी उत्साह दिखाते हुए सदस्यता हासिल की।

नामांकन की प्रक्रिया पत्रकार भवन में तीन सदस्यीय चुनाव समिति के वरिष्ठ पत्रकार मोहन नेपाली, राज्य कर्मचारी महासंघ के प्रांतीय मंत्री दिनेश भार्गव व व्यापारी नेता राजीव राय की देखरेख में हुई। 17 पदों के लिए 35 नामांकन भरे गए। अध्यक्ष पद के लिए बालेन्द्र गुप्ता, शैलेन्द्र सिंह गौर, शशांक त्रिपाठी व मुकेश वर्मा ने नामांकन किया। इसी तरह, उपाध्यक्ष पद के लिए मुकेश त्रिपाठी, लक्ष्मीनारायण शर्मा, मदन यादव व रिपुसूदन नामदेव ने एवं मंत्री पद हेतु शकील अली हाशमी, दीपक चंदेल, शैलेन्द्र सिंह गौर व रिपुसूदन नामदेव, संगठन मंत्री पद हेतु सुलतान आब्दी, संजय कुमार, विनोद गौतम व नंदकिशोर व कोषाध्यक्ष पद हेतु अमित कुमार श्रीवास्तव, देवेन्द्र शुक्ला, व भूपेन्द्र रायकवार तथा आय-व्यय निरीक्षक पद के लिए भूपेन्द्र रायकवार, रामकुमार साहू व प्रमेन्द्र वर्मा ने आवेदन पत्र भरा।

इसी तरह, कार्यकारिणी सदस्य के लिए एसएस झा, हनीफ खान, एस शिवहरे, इमरान खान, तारिक इकबाल शीबू, देवेन्द्र शुक्ला, अमित तिवारी, लोकेश प्रताप सिंह, अजय झा, बीके कुशवाहा, अख्तर खान, इदरीश खान व मनीष अली ने नामांकन किया। अब 16 फरवरी को मतगणना सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक पत्रकार भवन में मतदान होगा और उसी दिन दोपहर 2 बजे मतगणना उपरांत परिणाम की घोषणा की जाएगी।

पारिवारिक जीवन की बारीकियों पर नज़र

पारिवारिक जीवन में गुंथी इन ग्यारह समकालीन कहानियों में लेखक दयानंद पांडेय जी ने गांव व शहर दोनों के परिवेश को बड़ी कुशलता से उभारा है l दोनों परिवेशों पर आप का विस्तृत अनुभव आप के लेखन पर समान नियंत्रण रखता है और इसे समर्थ बनाता है l पारिवारिक जीवन में सांस लेती हुई इन कहानियों की परिधि में इंसान के जीवन के हर पहलू व उसकी समस्त भावनाओं की झलक मिलती है l आप के लेखन में गांव व शहर दोनों के बदलते हुए परिवेश, सामाजिक व पारिवारिक समस्याओं का उल्लेख बड़ी सहजता से हुआ है l

'साहित्य समाज का दर्पण है' और दयानंद जी की ये पारिवारिक कहानियां इस बात का प्रमाण हैं कि इंसान जिस परिवेश में रहता है उस में होने वाली गतिविधियों से पूर्णतया अछूता नही रह सकता l यथार्थ की ज़मीन पर उगी ये कहानियां अतीत और वर्तमान का ऐसा संगम हैं जो हमें कभी विचलित करती हैं, कभी संवेदनशील बनाती हैं और कभी आक्रोश से भर देती हैं l

बड़की दी का यक्ष प्रश्न :

इस कहानी में सामाजिक तथ्यों पर आधारित एक विधवा के जीवन को दिखाया गया है l जिसे पढ़ कर अन्य विधवाओं के जीवन की झलक मिलती है l इस समाज में पति के बिना एक विधवा का जीवन कितना दूभर हो जाता है और अकेले रहना कितना मुश्किल होता है ये हम सभी जानते हैं l गांव या कस्बे में रहने वाली विधवा अपना जीवन रिश्तेदारों के यहां रहते हुए कैसे काटती है ये कहानी उस का अच्छा उदाहरण है l वो कितनी ही परेशानियों को चुपचाप सह लेती है और लोग समझते रहते हैं कि बड़ी उम्र की किसी विधवा का उन के बीच दबदबा है l इस कहानी में बड़की दी की ससुराल व मायके के लोगों में इज्ज़त है और यदि कोई परेशानी होती है तो शायद छुपा जाती हैं l किसी संयुक्त परिवार में सिर्फ़ गांवों और कस्बों में ही किसी मजबूर विधवा को लोग उस के रिश्तेदार रख पाते हैं वरना कौन किस की परवाह करता है l लेकिन बड़की दी को उन का हर रिश्तेदार अपने पास रखना चाहता है यहां तक कि उन के भाई का बेटा भी l लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है उन्हें साथ रखने का राज़ भी खुल जाता है कि उन सब की आंखें  बड़की दी की सेवा-टहल पर और ससुराल वालों की ज़मीन जायदाद पर हैं l लेकिन ये भी सर्वव्यापक सत्य है कि कितना ही कोई किसी विधवा को अपने घर में रख कर आश्रय दे लेकिन अगर उस विधवा की कोई संतान है तो वह उसे ही अपना पैसा व ज़मीन जायदाद सौंपना चाहेगी, अपने जीते जी या मरने के बाद l और यही यहां बड़की दी कर रही हैं l बेटा नहीं है उन का तो क्या हुआ, बेटी तो है l हर किसी के कहने के वावजूद कि कोई बेटी के यहाँ का पानी भी नहीं पीता बड़की दी को बुढ़ापे में अपनी बेटी के यहां रहने में ही सुख महसूस होता है l समय के साथ दुनिया कहां से कहां आ गई साथ में बड़की दी के विचार भी बदल गए लेकिन उन के रिश्तेदारों को उन के बेटी के साथ रहने में आपत्ति है l मुंह से नहीं कहते तो क्या हुआ इस के पीछे उन की संपत्ति ही तो है जिसे लोग उन्हें अपने पास रख कर हथिया लेना चाहते हैं l

सिर्फ़ अन्नू की बहू ही समझती है कि बेटी के यहां ना रहने वाली बातें सब ढकोसला हैं l बेटी व बेटा में कैसा फ़र्क? इसी लिए कहती है,’'आखिर वह अपनी बेटी के पास ही तो गई हैं l बेटी के पास ना जाएं तो किस के पास जाएं? रही बात ज़मीन जायदाद की तो वह भी अगर बेटी को लिख दिया तो क्या बुरा कर दिया? कौन सा आसमान फट पड़ा l किसे अपने बच्चों से मोह नही होता l’' उधर बड़की दी की छोटी बहन के कोई संतान नहीं है तो ये सुन कर उन्हें अपनी चिंता होने लगती है कि उन के बुढ़ापे में कौन सहारा बनेगा l लेकिन वह अपने मन को समझा लेती हैं कि पति और वह एक दूसरे का सहारा बनेंगे l सारांश में कहा जाए तो ये जीवन बड़ा कठिन है l जिन के बच्चे हैं तो उन के बड़े होने पर कई बार माता-पिता के प्रति उन के विचार बदल जाते हैं तो ये समस्या l और बच्चे नहीं हैं तो लोगों को अपने बुढ़ापे में किसी के सहारा ना होने की समस्या l सभी रिश्ते-नाते स्वार्थ के होते हैं l इस कहानी में दयानंद जी जीवन की वास्तविकता का सच्चा रूप दिखाने में सफल हुए हैं l

सुमि का स्पेस :

आज के तेज़ी से बदलते हुए आधुनिक परिवेश में बेटी व बेटों के विचार व उन की ज़िंदगी में बदलाव का सत्य दयानंद जी की इस कहानी में साफ जाहिर होता है l आप की सूक्ष्म दृष्टि ने एक आधुनिक और महत्वाकांक्षी लड़की के जीवन की कई समस्याओं को इस कहानी में पिरोया है l अब मां-बाप की ख्वाहिशें कोई अर्थ नहीं रखतीं l उन्हें अपने बच्चों की हां में हां मिलाते हुए चलना पड़ता है l बच्चे अपने जीवन साथी स्वयं चुनते हैं और आजकल के ट्रेंड में शादी करते हुए जीवन साथी एक दूसरे में कई बार कम्पैटिबिलिटी ढूंढते हैं l सुमि ऐसी बेटियों की मिसाल है जहां मां-बाप तो उन की शादी की चिंता में घुले जाते हैं पर बेटियां अपनी क्लास में टाप करते हुए इतनी महत्वाकांक्षी हो जाती हैं कि वह ज़िंदगी में और आगे निकल जाना चाहती हैं l सुमि को जब तक अपना लक्ष्य नहीं मिल जाता अपनी पढ़ाई जारी रखती है l एक तरफ तो समाज बदल रहा है और दूसरी तरफ कुछ दकियानूसी लोग हैं जिन्हें चैन नहीं जो उस के माता-पिता को सुमि की शादी के लिए कोंचते रहते हैं कि जवान बेटी की शादी अब हो जानी चाहिए वरना उस की शादी की उम्र निकल जाएगी l लेकिन अब बच्चे शादी की उम्र जैसी बातों पर ध्यान नहीं देते ये भी इस कहानी से जाहिर होता है l सुमि को इस संघर्ष में अपने घर वालों और समाज की बातों की तरफ से बहरा या कहो चिकना घड़ा बन जाना पड़ता है l कौन क्या कहता है उसे इस की परवाह नहीं l उसे बस अपने पिता की तरफ से मनोबल मिलता रहे यही काफी है उस के लिए l इस कहानी के परिवेश में एक बात और गौर करने वाली है कि यदि मां-बाप बच्चों की शादी तय करते हैं तो यदि लड़की क्वालिफिकेशन में लड़के के मन माफिक ना हुई तो रिश्ते को ठुकरा देते हैं चाहें लड़की टापर ही क्यों ना हो l यहां भी गौर करना पड़ता है कि इतना सब बदलने पर भी ये पुरुष प्रधान समाज है जहां लड़का ही अधिकतर रिश्ते ठुकराता है l और दूसरी तरफ विदेशों में जा कर बसे वो बेटे हैं जो जाति-धर्म की सीमाएं तोड़ कर जिस लड़की पर दिल आ गया उस से शादी करना चाहते हैं l और समझदार माता-पिता अपने बच्चों से कहीं रिश्ता ना टूट जाए इस डर से उन की हर बात को खुशी या नाखुशी से मानते रहते हैं l सुमि अपने माता-पिता की टिपिकल सोच, कि उस की शादी हो जानी चाहिए, को चैलेंज देती हुई उन्हें समझाती है वह अपनी पढ़ाई जारी रखती है l उसे अपने परिवार से हौसला व स्पेस चाहिए l उधर लड़की अपना भविष्य संभालने में लगी है और इधर पिता को समाज की कड़वी बातें सुननी पड़ती हैं l पर अंत में सुमि जिस मंज़िल को हासिल करती है उस से उस के माता-पिता को गर्व होता है भले ही वो औरों के लिए ईर्ष्या का कारण बन जाती है l सुमि जैसी बेटियां समाज की अन्य बेटियों के लिए मिसाल व अपने भाई-बहन के लिए प्रेरणा बनती हैं l वो कहते हैं न कि 'अंत भला तो सब भला l'

संगम के शहर की लड़की :

अपनी कन्या के लिए वर ढूंढते हुए कई बार उस का परिवार लड़के के बारे में अधिक पूछताछ नहीं करता, खास तौर से जहां दहेज की मांग ना रखी गई हो l यदि लड़का ठीक हुआ तो लोग लड़की की अच्छी तकदीर कहते हैं वरना दोष उस के मां-बाप पर आ जाता है कि उन्हों ने लड़के के बारे में जांच-पड़ताल क्यों नहीं की ढंग से l लड़के की तरफ से धोखा लड़की की ज़िंदगी तबाह कर देता है l दयानंद जी ने इस कहानी में ऐसी धोखेबाजी व इस से संबंधित मामले का कोर्ट-कचेहरी तक भी पहुंचने का बड़ी कुशलता से चित्रण किया है l इस में एक ब्याहता लड़की पति के पहले से शादी-शुदा होते हुए भी उस से तलाक नहीं चाहती और उस का पति पुरुष होने के नाते अपनी ऐंठ दिखाता है और लड़की को तिरस्कृत करता है l इस कहानी में लड़की उन लड़कियों की तरह है जो पति की पहली पत्नी होते हुए भी अपने पति के संग गुज़र करने को तैयार रहती हैं l पर जब पति उसे किसी तरह अपनाने को तैयार नहीं होता तो बड़ी बेबस हो जाती है l पुरुषों के इस समाज में पुरुष जो भी सही या गलत निश्चय करते हैं उस के आगे औरत को सर झुका देना पड़ता है l कुछ पुरुष औरत को कूड़े की तरह समझते हैं l इस लड़की के पति ने पहले अपनी पहली पत्नी को जाहिल समझते हुए उसे रास्ते से हटाने की सोची और इस लड़की से अपने बारे में सचाई बताये बिना शादी कर ली l और बाद में पता नहीं उस पर क्या फितूर चढ़ा कि पहली पत्नी और बच्चे के संग ही रहने के लिए इस लड़की से नफ़रत करने लगा l पुरुष औरत को युगों से छलता आया है, कभी दहेज के लिए तो कभी उस पर बिना बात के लांछन लगा कर l औरत के संग कैसी-कैसी चालें खेली जाती हैं l औरत ना हो गई जैसे बिना दाम के खरीदा हुआ माल l जब जी चाहा पसंद किया और जब जी चाहा किसी और औरत के लिए उसे तंग कर के छोड़ने के बहाने ढूंढ लेते हैं l और लड़की अपनी तकदीर को रोती रह जाती है l औरत की अच्छी या बुरी शादी-शुदा ज़िंदगी पति की मानसिकता पर निर्भर होती है l और तभी लोग कहते हैं कि शादी एक जुआ है l जिस की बेटी ऐसी परिस्थिति में फंसती है उस का पिता ही इस दर्द को समझ सकता है l समाज की इस बुराई को दयानंद जी ने इस कहानी में आवाज़ दी है जहां एक बेटी और उस के पिता का हृदय चीत्कार करता है l

सूर्यनाथ की मौत :

वो कहते हैं ना कि चाहे सारी दुनिया बदल जाए पर कुछ लोग अपने आदर्शों पर हमेशा अडिग रहते हैं l  उन के मिजाज नहीं बदलते।  ऐसे ही हैं इस कहानी के पात्र, सूर्यनाथ जी l पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं में उलझे इन सज्जन की आर्थिक असमर्थता उन के मानसिक तनाव का असली कारण है पर सच्चाई और ईमान की लीक पर चलते हुए वो कम में ही गुज़ारा करना ठीक समझते हैं l ये उन के जीवन की सचाई है l जिस का तनाव सहते हुए वह समय की दौड़ में पछाड़ खाते रहते हैं l अपने जमाने की बातें, चीज़ों के सस्ते दाम आदि सोचते हुए वह इस नए परिवेश को झेल पाने में असमर्थ महसूस करते हैं l घर की गाड़ी खींचते हुए ज़िंदगी की सचाइयों को झेलते हुए हर दिन तिल-तिल मरते रहते हैं l पर किसी से ना अपनी चिंताएं कहते हैं और ना ही कहीं बेईमानी या भ्रष्टाचार का रास्ता अपनाते हैं l अपने आदर्शों को सीने से चिपकाए हुए जीना ही उन की ज़िंदगी का मकसद है l घर की गाड़ी खींचते हुए रिश्तेदारी की सामाजिक ज़रूरतों को भी निभाना पड़ता है l इन सब के बीच पिस कर अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने की विकट परिस्थिति में एक पुरुष लोगों के ताने व व्यंग्य सहता है, और बच्चों के भविष्य व उन के सपनों के लिए अधिक ना कर पाने पर टूटता रहता है l आर्थिक परिस्थितियों की विषमता झेलते हुए सूर्यनाथ जी के रूप में अनेक पुरुषों की तसवीर को दयानंद जी ने इस कहानी में बखूबी खींचा है l  

घोड़े वाले बाऊ साहब :

जीवन में इंसान का रुतबा भी उस के लिए समाज में एक खास जगह बनाता है l और कभी-कभी यही रुतबा समाज में इतना ऊंचा होता है कि यदि समय कभी पलटा खाए तो भी उस रुतबे की चमक कुछ न कुछ बनी ही रहती है l जैसा कि इस कहानी के नायक बाऊ साहब के रुतबे से पता चलता है,'‘खद्दर की कलफ लगी धोती और कुर्ता भले ही उन से बिसर कर उनकी अकड़ के इजाफे को धूमिल करते थे पर लुजलुजे टेरीकाट के कुर्ते में भी उनकी मूंछों की कड़क पहले ही जैसी थी l'' बाबू गोधन सिंह को घुड़सवारी का इतना शौक था कि ना केवल उस के करतब दिखाते थे लोगों को बल्कि शादी-ब्याह में अगुवानी भी करने लगे l और अगुवानी के शौक का क्या कहना कि स्वयं की दूसरी शादी में भी अगुवानी करने की सोचने लगे थे l जब किसी वस्तु से लगाव होता है तो उसे खोते हुए बड़ा दुख होता है वही हाल था बाऊ साहब का घोड़ों से बिछड़ने की बात को ले कर l इतना लगाव कि भविष्य में बढ़ते हुए खर्चों से उन्हें कुछ खेत आदि व कुछ घोड़े भी बेचने पड़े l पर घोड़े बेचते हुए उन्हें अपार दुख होता था l घोड़ों के दाना-पानी के खर्चे भी होते हैं इस पर बात उठाने पर छोटी बबुआइन को उन का चांटा भी खाना पड़ा l ‘घोड़े और घुड़सवारी जैसे उन की साँस थे।’  दुनिया चाहे ताना दे, समझाए या हंसे पर कुछ लोगों के शौक वैसे ही रहते हैं l नई चीज़ों से उन्हें लगाव नहीं हो पाता l यहाँ भी ’घोड़े वाले बाऊ साहब’ ने मोटर साइकिल आदि का जायका लिया पर माफिक नहीं आया l बैलगाड़ी मजबूरी में खींचनी पड़ी पर ‘बैलगाड़ी वाले बाऊ साहब’ कहलाना पसंद नहीं था l इस कहानी में एक और पहलू इस समाज की दकियानूसी बातों से जुड़ा है जिस में भूत-प्रेत का साया व किसी मंशा के पूरी ना होने पर लोग साधू-संन्यासियों की शरण लेते हैं l संतान के लिए तरसने वाले आस्तिक इंसान उम्मीद में कहां-कहां जाते हैं और क्या-क्या नहीं करते इस का अच्छा उल्लेख किया है दयानंद जी ने अपनी इस कहानी में l प्रमाण हैं ऐसे धूर्त और पापी लोग जो किसी की संतान प्राप्ति के लिए पूजा करते हुए उसी स्त्री को अपने संभोग का निशाना बना बैठते हैं l बाबू गोधन सिंह को भी बच्चों की उतनी ही ललक थी जितनी घोड़ों के लिए l अगर वारिस पैदा करने का औरत पर इतना प्रेशर हो कि उसे पति की ज़िंदगी में बनी रहने के लिेए आखिर में अपने पति को धोखा देना पड़े और किसी और से गर्भवती होना पड़े तो ये कहानी इस का सबूत है l लेकिन ये भेद जिस दिन खुलता है उस दिन बाप पर पहाड़ टूट पड़ता है l गोधन जी का पुराना रुतबा होने से समाज पीठ पीछे ही खुसफुस करता है l सवाल उठता है कि संतान न होने से हमेशा औरत ही क्यों अपने को हीन समझने लगती है? पति को भी तो अपने में कमी होने का अहसास होना चाहिए l कभी उस में भी दोष हो सकता है l दयानंद जी के लेखन कौशल  ने इस कहानी से पुरुषों की आंखें खोलने की कोशिश की है l पुरुष अपने में कभी कोई कमी नहीं देखते और उन का ये अहम ही किसी दिन उन्हें ले डूबता है l फिर ऐसे लोग अपनी बची-खुची इज्ज़त ना गंवा बैठें इस लिए खिसिया कर कुछ न कुछ बात बनाते ही हैं l तो यहां इस कहानी में भी गोधन सिंह उर्फ ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ अपनी सफाई में कहते हैं,'‘घोड़े की भी लगाम हमारे हाथ में रहती थी, अब बैलगाड़ी की लगाम अपने हाथ है l'' कह कर ठठ्ठा लगाते कहते,'‘बैलगाडी हो, घोड़ा हो, बीवी हो या कुछ और सही, लगाम अपने हाथ में होनी चाहिए l तभी ड्राइव करने का मजा है l'' ‘रस्सी जल गई पर ऐंठ ना गई’ ऐसा ही हुआ घोड़े वाले बाऊ साहब के साथ l पैसे से खोखले हो गए और संतान को ले कर लोगों के ताने सह कर भी मूंछों की सामंती अकड़ नहीं गई l

मन्ना जल्दी आना :

धर्म के नाम पर किसी निर्दोष इंसान के साथ कितना अधर्म हो जाता है ये कहानी इस का उदाहरण है l भारत का बंटवारा होने के बाद केवल पाकिस्तान में रहने वाले मुस्लिमों को ही नहीं बल्कि भारत के मुस्लिम को भी नफरत व शक की निगाह का सामना करना पड़ा l उच्च शिक्षा प्राप्त अच्छी नौकरी पेशे वाले मुस्लिम पर भी शक की सूली लटकती रहती है l जिहाद के नाम पर आतंक फैलाने वाले मुस्लिम लोगों से तमाम मुस्लिम बदनाम हो गए l एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है वाली बात हो गई l और जो भारतीय-मुस्लिम पाकिस्तान पहुंच कर बसते हैं वहां उन्हें मुस्लिम होने के वावजूद शक की निगाहों से देखा जाता है, क्यों कि वह भारत से आया है l ऐसा इंसान न घर का रहा न घाट का l और फिर बिहारी व बंगाली मुस्लिम का भेदभाव l मुस्लिम होना जैसे एक गुनाह हो गया l उसे कहीं चैन नहीं l इस कहानी के पात्र अब्दुल मन्नान भी पाकिस्तान में शक की निगाह से देखे गए लेकिन ससुराल वालों की वजह से चैन की बंशी बजाते रहे l फिर वहां भी मंजर बदल गया और खून खराबा की नौबत आ गई तो भाग कर वापस भारत आना पड़ा पर यहां तो उन्हें पाकिस्तानी जासूस समझ लिया गया l मुस्लिम लोगों ने भी उन से बात करना बंद कर दिया l सभी ने उन पर शक करना शुरू कर दिया l ना नौकरी, ना इज्ज़त और ना चैन l ये सब सहन न हो पाया तो मय परिवार खुदकुशी करने की सोची किंतु उन्हें बर्बाद करने वालों को ये भी गवारा ना हुआ l दूसरी तरफ एक और मुस्लिम शफ़ी साहब हैं जिन पर किसी की हत्या का आरोप लगता है व हिंदू लड़की को फंसा कर बीबी बनाने के कारण चुनाव नहीं जीत पाते l फिर भी उन की काबिलियत, शोहरत व इज्ज़त में कमी नहीं आती l उन की ही इनायत और तिकड़मबाजी से मन्नान मियां की घूरे जैसी ज़िंदगी में फिर से बहार आ जाती है l पर शफ़ी के अहसानों तले डूबे हुए बहार देर तक नहीं रही l एक बार पाकिस्तान हो आए मुस्लिम की हालत उस कुत्ते जैसी हो जाती है जिसे शक की लाठी से लोग बार-बार खदेड़ते हैं l ये इस कहानी के द्वारा साफ पता चलता है l शफ़ी ने लोगों में अपनी इमेज को शफ़्फ़ाक रखते हुए मन्नान मियां पर एक तरफ तो इनायत की दूसरी तरफ उन के लिये कब्र भी खोद दी l इस कहानी में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को धोखा देता है l किसी को चारा फेंक कर फंसाना, क्या इसे ही कहते हैं भाई-चारा? एक मछली है और दूसरा मगरमच्छ l धोखा मिलने पर मन्नान एक तरफ शफ़ी के अहसानों का बखान करते हैं तो दूसरी तरफ आवेश में आ कर शफ़ी की बखिया उधेड़ने लगते हैं l न जाने क्या-क्या कह जाते हैं,''आप लोग नहीं जानते शफ़ी साहब को l नहीं जानते कि वह भीतर से और क्या-क्या हैं l बहुत से राज हैं इस सीने में, मत खुलवाइए l'' एक ही धर्म में शिया और सुन्नी का फर्क, कभी बिहारी और बंगाली भाषा का टकराव l धर्म के अंदर धर्म l अब मामला हुआ गर्म l खैर, सालों बाद न जाने कितनी तकलीफें सह कर और न जाने कितने पापड़ बेल कर मन्नान की अपने वतन लौटने की मन्नत पूरी होती है l सालों चलती हुई कानूनी कार्यवाही अपना रंग लाती है और उन के वतन-प्रेम की तपस्या सफल होती है l ये एक ऐसे मुसलमान की कहानी है जो सच्चा वतन प्रेमी है जो देश से खदेड़ने के बाद इतनी तकलीफें सहने के वावजूद वापस अपने मुल्क भारत में ही रहना चाहता है l धर्म और राजनीति दो चीज़ें हमेशा से देश व समाज में अशांति का कारण बने रहे हैं l और दयानंद जी ने अपनी इस कहानी में इन समस्याओं का चित्रण बड़ी कुशलता से किया हैl

संवाद :

अकसर देखा गया है कि जब बेटा बड़ा होने लगता है फिर भी उसे अपने पिता की हर बात माननी पड़ती है l तो बाप-बेटे के बीच बिचारों में टकराव होने से मनमुटाव हो जाता है l और उन के बीच दूरियां बढ़ने लगती हैं l समय के साथ ये खाई कभी इतनी बढ़ जाती है कि इसे पाटना मुश्किल हो जाता है l पिता का अहम अपनी कमियां देखना नहीं चाहता l इस बात से घर में किसी को खुशी नहीं मिलती l बाप-बेटे दोनों के ही मन रोते रहते हैं l  इस लिए कभी बाप या कभी बेटा अपनी तरफ से ये दीवार हटाने की कोशिश करते हैं l दयानंद जी ने इस कहानी में एक बेटे के 'संवाद' से उन तमाम बेटों के मन की बात कहनी चाही है जिन के पिता अपने हठ के कारण अपने व बच्चों के बीच दूरियां बना लेते हैं l बेटा जानता है कि वो जो कुछ कहना चाहता है उसे पिता के सामने कहने में कठिनाई होगी और पिता को भी अपने विरुद्ध इन सब बातों को सुनने पर तकलीफ होगी l

'संवाद' में इसी विकट परिस्थिति को दर्शाया गया है l मां तो जन्म देती है किंतु घर में अगर पिता का हर बात पर कंट्रोल होता है और अपनी बात के आगे किसी की बात नहीं चलने देता और बच्चों को उस की बातों का विरोध करने पर भी मानना पड़ता है तो बच्चों के मन में आक्रोश पलने लगता है l बच्चे डरे व सहमे-सहमे रहते हैं l उन्हें कोई बात कहने का मौका नहीं दिया जाता l हर बात में पिता के थोपे निश्चय से उन का आत्म विश्वास भी मरने लगता है l मन में सालों की भरी कुढ़न को बेटा अपने बाप को चिट्ठियों में लिखता है पर कभी पोस्ट करने की हिम्मत नहीं कर पाता l इस कहानी के पात्र को, जो किसी ऐसे ही बेरहम बाप का बेटा है, अपनी लिखी एक पुरानी चिठ्ठी मिल जाती है जिस में भरी हुई कुढ़न व आक्रोश को कल्पना में अपने पिता को सुनाता है l कुछ भी हो पर ऐसे बच्चों के मन आपस के टूटे संबंधों को जोड़ना चाहते हैं और वो ये भी चाहते हैं कि उन के पिता अपनी कमियां व गलतियां स्वीकार करें जिन के कारण वो अपने बच्चों को दूर हो जाने देते हैं l इस कहानी के बेटे के मन में भावनाओं की बाढ़ सी आ रही है l उस का भी यही कहना है,''बीच की ये दीवार हटाई नहीं जा सकती क्या? जहां तक मैं समझ पाया हूं, अकसर हम दोनों के बीच कुछ स्थितियों के अलावा आप का 'सैद्धांतिक' हठी आग्रह जो कहीं मुझे जड़ भी जान पड़ता है, और मेरा 'व्यक्तिगत सच' बार-बार टकराते रहे हैं l टकरा कर ओछे साबित होते रहे हैं, लोगों की नज़र में, अपनी नज़र में भी l'' बाप के तानाशाही वर्ताव पर उस की ये शिकायत व व्यंग्य भरी चिट्ठी दुनिया के तमाम बेटों के मन का दर्द कह जाती है जिसे वो कभी अपने बाप के मुंह पर कहने की हिम्मत नहीं कर पाते,''मैं यह खूब जानता हूँ…आप बातों को सुन कर भी नहीं सुन पाते l चीज़ों को बहुत गहरे जानने के बाद भी नहीं जान पाते l वैसे लोग तो आप के तेज़ दिमाग और पारखी नज़र की बड़ी तारीफ़ करते हैं l मैं पूछता हूं कि हमारे लिए आप का ये तेज़ दिमाग क्यों सड़ जाता है? यह पारखी नज़र कहां धंस जाती है? क्यों…? खैर, छोड़िए भी l अब तो पानी सिर से इतना गुज़र चुका है कि….! चाहें तो आप इसे कमीनेपन के विशेषण से भी जोड़ कर देख सकते हैं l यह भी देखिए, बल्कि ज़रा गौर से देखिए कि यह विशेषण किस के साथ ठीक-ठीक जुड़ पाता है l'' दयानंद जी ने परिवार का एक ऐसा मुद्दा इस कहानी में दिखाया है जहां बाप के हठ से घर में तनाव रहता है l 'संवाद' में कितने बेटों के मन की घुटन चिट्ठी के संवाद में घुली है l लेखक ने इस कहानी में उन पिताओं की आंखें खोलने की कोशिश की है जो अपने 'थोथे आदर्शों' के कारण अपने बच्चों की 'मूक वेदना' नहीं सुनते और उन्हें खो देते हैं l

भूचाल :

जब कोई औरत अपने ही घर में पुरुषों से छली जाती है तो वह हर किसी से सचेत हो जाती है, उस का व्यवहार सब के प्रति शक भरा हो जाता है l  उसे लगता है कि लोग उस का बुरा चाहते हैं l लोगों के लिए वह पागल और सनकी लगने लगती है l दयानंद जी की इस कहानी में विभा नाम की नायिका का व्यवहार भी ऐसा ही है जो उसे सब की निगाहों में बुरा बना देता है l  अपने बेटे को गाली देती है तो लोगों को अजीब लगता है कि एक  मां उस तरह की गाली अपने बेटे को कैसे दे सकती है l कोई भी उस की इस मानसिकता के पीछे छुपा राज़ नहीं समझ पाता l 'जाके पांव ना फटी विवाई वो क्या जाने पीर पराई' वाली बात l और ये राज जब वह किसी से फ़ोन पर बात करती है तब खुलता है l बच्चे अपना मतलब निकाल कर मां को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देते हैं l जैसा विभा कहती है,''उसे पी.एम. के साथ फ़ारेन विजिट पर जाना था l'' वह बोलती जा रही थी, ''तो पी.एम. के साथ जाने का जुगाड़, पासपोर्ट, वीजा सब मेरे कंधे पर बैठ कर करवाना था l मेरे कांटेक्ट और इन्फ्लुएंस को कैश करना था l'' वह बोलीं, ''तो कुछ दिनों के लिए मैं मम्मी जी बन गई थी और काम खत्म होते ही कुतिया, साली हरामजादी हो गई l'' कह कर वो रोने लगीं,'' बताओ कि मैं साली कुतिया हरामजादी हूँ कि मां हूं उस की l'' दयानंद जी की इस मार्मिक कहानी ने समाज में उभरती एक ऐसी गंभीर पारिवारिक समस्या का रूप प्रस्तुत किया है जिस में बच्चों के मन में मां के प्रति प्यार नहीं बल्कि उस का सब कुछ हड़प करने का लालच रहता है l आज-कल बेटा-बहू मां को अपने पास रख कर उस की सेवा करना तो दूर उस की वो हालत कर डालते हैं कि हर मां का दिल कांप उठे l इस कहानी की मां विभा कितनी ही बार अपने बेटे के अत्याचार का शिकार होती है l पति के बिना एक शिक्षित औरत जो आर्थिक रूप से समर्थ है अपने बेटे के द्वारा ठगी जाती है l मां अपने बच्चों के आगे झुकती है, मातृत्व निछावर करती है, ज़रूरत पड़ने पर उन के काम आती है पर उस के बदले में प्यार, आदर व भावनात्मक सुरक्षा ना पाने पर उस का जीवन बिखर जाता है, उस का अस्तित्व मिटने लगता है l आखिरकार इंसान अपने मन के दुख किसी से तो बांटता है और एक औरत किसी औरत से ही अपने मन की व्यथा कहती है l पर दयानंद जी की इस कहानी में कुंदन नाम के एक मित्र से विभा अपने मन की सारी पीड़ा उंडेलती है l लेकिन दुख कोई नहीं बांटता l हर तरफ से लाचार नारी को खुद के हौसलों पर जीना होता है l जीवन का रास्ता अकेले ही तय करने के लिए अपने को तैयार करना पड़ता है l विभा के प्रति मन संवेदनशीलता से भर उठता है l कहानी में विभा के जीवन की असलियत पढ़ कर मन चीत्कार करने लगता है:
नारी तेरे जीवन में भरी है इतनी पीर
आंचल में कांटे भरे और आंखों में नीर l

रामअवतार बाबू :

दुनिया में किस्म-किस्म के लोग होते हैं ये इस कहानी से जाहिर है l परिवार में कोई बच्चा बचपन से ही विचित्र हरकतें करता पाया जाता है तो सब लोग सोचते हैं कि बाद में बदल जाएगा l किंतु कुछ ऐसे केस होते हैं जो बदलते नहीं बल्कि उन के लक्षण बीमारी की तरह और गंभीर होते रहते हैं l दयानंद जी की इस कहानी में रामअवतार बाबू भी एक ऐसा ही नमूना हैं l बचपन से खामोश रहने वाले इस इंसान को इंसानों से नहीं बल्कि जानवरों और पेड़-पौधों से लगाव हो जाता है l घर वाले सोचते रह जाते हैं कि उन के ये लक्षण गायब हो जाएंगे l किंतु रामअवतार बाबू तो ऊपर से ही ऐसे बन कर आए थे l अड़ियल किस्म के आदमी थे इस लिए उन पर किसी के समझाने-बुझाने का असर नहीं होता था l उन्हों ने शादी भी नहीं की l अपनी अजीब आदतों और हरकतों से उन्हों ने अपने लिए एक ऐसी दुनिया बना ली जिस में इंसान से अधिक उन के लिये पशु-पक्षी व जानवरों का महत्व था l उन्हें उन सब से इतना मोह था कि वह अधेड़ उम्र तक कुंवारे ही रहे l और जब शादी की तो उन्हें अपनी पत्नी से लगाव ही नहीं हो पाया l घर में वह अनचाहे फर्नीचर की तरह पड़ी रही l उन की ही शर्तों पर जीती रही l पता नहीं क्यों इस तरह के पागल लोग किसी औरत से शादी कर के उसे गले में अनचाही ढोल की तरह बांध लेते हैं l उस औरत का जीवन बेकार कर देते हैं l जिसे वो सर्वस्व समझ कर आती है उस के लिए वह कोई मायने ही नहीं रखती l पत्नी से ज्यादा कुत्ते-बिल्लियों को प्यार मिलता है l रामअवतार बाबू को पत्नी के भले-बुरे की कोई फिक्र नहीं हुई l वह मरे या जिए उन पर कोई असर नहीं l उस के बीमार होने पर भी कोई चिंता नहीं l आखिर में वह मर ही गई l इधर उसे शादी की यातना से मुक्ति मिली उधर रामअवतार बाबू लोगों के बीच कुछ टेसुआ बहा कर सामाजिक फ़ारमैलिटी पूरी करके निश्चिंत हो कर अपना पहले वाला जीवन गुज़ारने लगे l यहां तक कि श्राद्ध के अगले ही दिन पत्नी की बरसी भी निपटा दी l कई लोग उन की पीठ पीछे उन्हें पगलू भी कहते थे l उन का बुढ़ापा सामाजिक सेवा और पशु-पक्षियों में फिर गुज़रने लगा जैसे कुछ असाधारण हुआ ही न हो l  इस कहानी में दयानंद जी का इशारा ऐसे लोनर टाइप लोगों पर है जो अपनी रोजी-रोटी कमाते हुए जीवन को अकेले ही गुजारने में शांति महसूस करते हैं l कुछ शौक आदि पाल लेते हैं पर शादी उन्हें रास नहीं आती l रामअवतार बाबू का शौक और दिलचस्पी पशु-पक्षियों में थी l वह कुछ लोगों से संपर्क रखते हुए अपना जीवन खामोशी से गुज़ारते रहे l

कन्हईलाल :

इस कहानी में दयानंद जी ने आफिस के एक चपरासी के माध्यम से अनपढ़ लोगों की सोच-समझ का अच्छा-ख़ासा नक्शा खींचा है l ऐसे लोग अज्ञानतावश अपने व अपने परिवार का भला-बुरा सोचने के लिये दूसरों पर निर्भर रहते हैं l इस में कन्हईलाल नाम का एक अनपढ़ चपरासी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने में आफिस के लोगों पर निर्भर रहता है l किंतु अपनी मूढ़ता से न केवल अपने बच्चों की शिक्षा का आरक्षण करने में असफल होता है बल्कि अपनी पत्नी की बीमारी के प्रति भी गैर ज़िम्मेवार साबित होता है l नतीज़ा ये कि उस की पत्नी की असमय मौत हो जाती है l और उसे खोने के बाद पश्चाताप में खुद को उस का हत्यारा समझने लगता है l

मेड़ की दूब :

इस कहानी में दयानंद जी ने गांव के परिवेश का चित्रण करते हुए बिन बरसात फसलों के मर जाने पर ग्रामवासियों की कंगाली की दशा व उन के अंधविश्वास के बारे में बहुत अच्छी तरह वर्णन किया है l गांव में किसान का भविष्य फसलों पर निर्भर रहता है l और जब फसलें नहीं पनपतीं तो लोग इंद्र देवता का कोप दूर करने को न जाने किन-किन अंधविश्वासी तरीकों को अपनाते हैं l गांव की विपदा और लोगों की दयनीय दशा के बीच सांय-सांय करती हवा और सूखे खेतों के बीच लेखक के शब्द चयन से अनजाने में काव्य की बौछार हो जाती है l इस से कहानी की रोचकता और बढ़ जाती है,''सावन-भादों का महीना और आकाश को घेरे ढेर सारे बादल l काले, भूरे, उनीले और तहीले बादलों को देख कर बरसात की उम्मीद बंधती है l लेकिन बेरहम पछुआ हवा बादलों को बटोर अपने डैनों पर चढ़ा कर उड़ा ले जाती है और रह जाता है बादलों से वीरान आग उगलता ये आसमान….छिटपुट बादलों में कैद सूरज वैसे ही चमकने लगता है जैसे बैसाख और जेठ में दहकता था l धान, कोदो, सांवा, टागुन और मक्का की फसलें झुलस कर नेस्तनाबूद हो चुकी हैं l नदियां सिमट कर अपने दोनों कगारों के बीच दफन हैं l क्या ताल, क्या पोखर और क्या पोखरी….सब का पेट खाली हो चुका है l सारे मेड़ और चकरोड…बैसाख-जेठ जैसे आग की तरह तपते हैं l'' कहानी के विवरण में कुछ काव्यात्मक शब्दों से विपदा में लिपटी कहानी भी खूबसूरत लगने लगती है l एक तरफ गांव की दशा पर मन संवेदनशील हो उठता है, और दूसरी तरफ पाठक उस की मिट्टी की खुशबू व खेतों की लहक में उलझता जाता है l मार्मिक सीन सुंदर, सहज भाषा शैली से निखर जाते हैं l गाँव के परिवेश में लोगों की सरलता उन की तरफ खींचती हैं l किंतु लोग उस परिवेश को छोड़ कर शहर की तरफ भागने की सोचते हैं l वो ये नहीं सोचते कि शहर में भी रोजी-रोटी का बंदोबस्त आसानी से नहीं होता l दूर के ढोल सुहावने होते हैं, ये बाद में समझ आता है l पाठक भी अचानक कल्पना के आसमान से वापस तपती धरती पर आ गिरता है, जहां दो वक्त के खाने का जुगाड़ व खेतों की फसल की देख-रेख के लिए किसान को परिवार की औरतों के गहने भी बेच देने पड़ते हैं l फिर भी उन के सारे सपनों और उम्मीदों पर आग लग जाती है l लेकिन इन उम्मीदों की राख पर भी कभी-कभी किसान की आशा मेड़ की सूखी दूब की तरह हरियाने लगती है l

ज़िंदगी की वास्तविकता का हर पहलू दयानंद जी की इन ग्यारह कहानियों में देखने को मिला l हर कहानी कहीं न कहीं दुनिया में किसी के जीवन से जुड़ी सी लगती हैं l समस्याओं को झेलते हुए भी आप की कहानी के पात्रों में हौसला व जिजीविषा है l  हर कहानी के आरंभ व उस के समापन में एक नवीनता है l आप के लेखन में एक खास सादगी है जिसे पढ़ने के बाद पाठक का मन खुद व खुद दूसरी कहानी पढ़ने को लालायित रहता है l जीवन का यथार्थ रोजमर्रा की सहज भाषा में पाठक को आकर्षित करता है l इन कहानियों में पारिवारिक समस्याओं का कोई भी पहलू आप की नज़र से नहीं बचा l आप ने जीवन की बारीकियों पर नज़र रखते हुए हर कहानी में पात्रों के जरिए तमाम पारिवारिक मुद्दों पर सशक्त अभिव्यक्ति की है l पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम वहाँ अदृश्य रूप में उन पात्रों के बीच मौजूद हैं, उन के साथ उन पलों को जी रहे हैं, उन का सुख-दुख महसूस कर रहे हैं l ‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’ में एक विधवा मां की ममता उसे अपनी बेटी के पास खींच कर ले जाती है l और हम भी उन के जीवन की वारदातों में उलझ जाते हैं l ‘सुमि का स्पेस’ में एक बेटी की आकांक्षाएं व उस की ज़िद के आगे माता-पिता का झुकना साबित करता है कि बच्चे जिस तरह खुश रहें उसी में उन की खुशी होनी चाहिए l यही समय की मांग है l ‘संगम के शहर की लड़की’ कहानी समाज को लड़की की शादी के मामले में सतर्कता से काम लेने की सीख देती है l शादी के पहले लड़के के बारे में बिना जांच-पड़ताल किए कितनी लड़कियों का जीवन उजड़ जाता है l ‘सूर्यनाथ की मौत में’ आर्थिक तंगी कैसे एक इंसान को अंदर से मार देती है ये इस कहानी को पढ़ कर ही अंदाज़ा होता है l ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ में इंसान का रुतबा होते हुए भी संतान की तीव्र इच्छा जीवन में कैसी उथल-पुथल मचा देती है और फिर उस का परिणाम भुगतना कैसा लगता है l इस कहानी को पढ़ कर हर पुरुष को सीख मिलनी चाहिए l 'मन्ना जल्दी आना' में मन्नान में ऐसे देश प्रेमियों की झलक मिलती है जो जाति-धर्म के नाम पर झूठे इल्जाम और मुसीबतें सहते हुए वहां से खदेड़़ने के बाद भी वापस अपने वतन आना चाहते हैं l अपने वतन की मिट्टी से ही चिपके रहना चाहते हैं, उसी में उन की जान बसती है, उसी मिट्टी में दम तोड़ना चाहते हैं l कितने पापड़ बेलने के बाद मन्नान की फिर अपने वतन भारत में वापसी होती है l मुस्लिम भी हिंदुस्तान की मिट्टी में पैदा होने से उसी के वफ़ादार हैं l लेकिन लोग उन्हें समझ नहीं पाते l 'संवाद' में एक बेटे की अपने बाप के थोथे आदर्शों को झेलने के बारे में लिखी चिट्ठी पाठक के मन को हिला देती है l चिट्ठी के हर शब्द में दुनिया के तमाम बेटों के मन का दर्द भरा हुआ है l बाप-बेटा दोनों के स्वाभिमान ने एक दूसरे के संबंधों में दूरियां खींच दी हैं l लेकिन मन की सारी पीड़ा जो बेटा अपने बाप से कह नहीं सकता वो सब चिट्ठी में उकेरी हैं l 'भूचाल' में आप ने ऐसी पारिवारिक समस्या को प्रस्तुत किया है जो आज का सच है l मां के लिए बच्चों की भावनाएं बदल जाती हैं किंतु मां का अखंड प्यार बड़ी मुश्किल से हिलता है l पर यथार्थ ये भी है कि अपनी ही संतान जब अपमान करने की हद से गुज़र जाती है तब मां के जीवन में जैसे भूचाल सा आ जाता है l उस का सारा अस्तित्व हिल जाता है l और तब संतान के लिए भी मां के मुंह से गुस्से में कुछ अनाप-शनाप निकल जाता है l और 'रामअवतार बाबू' कहानी में ऐसे लोगों की झलक है जो अपने परिवार से बिलकुल मेल नहीं खाते और बचपन से ही उन के व्यवहार में विचित्रता रहती है l उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी से अधिक मिलना-जुलना पसंद नहीं होता व अपने जीवन में किसी साथी के अभाव को अन्य शौकों से पूरा कर के ही मगन रहते हैं l 'कन्हईलाल' कहानी में अनपढ़ लोगों की अज्ञानता का एक चपरासी पात्र द्वारा दिखाने का अच्छा प्रयास हुआ है l 'मेड़ की दूब' में बिन बरसात फसलों का मर जाना और ग्रामवासियों की कंगाली की हालत का अच्छा ब्यौरा है l लेकिन किसान अपनी आशाओं को मरने नहीं देता वो मेड़ की दूब की तरह फिर हरियाने लगती हैं l दयानंद पांडेय जी की ये कहानियां सही मायने में ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ की कसौटी पर खरी उतरती हैं l

आप के लेखन की 'प्रतिबद्धता' से इन कहानियों में समाज की तमाम समस्याओं व लोगों की पीड़ा को स्वर मिला है l इस प्रतिभाशाली लेखन पर आपको बहुत बधाई व भविष्य के लिए शुभकामनाएं l

[ जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित ग्यारह पारिवारिक कहानियां की भूमिका]


-शन्नो अग्रवाल
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दयानंद पांडेय के ब्‍लाग सरोकारनामा से साभार.

दैनिक जागरण, बनारस में फिर शुरू हुआ हस्‍ताक्षर अभियान

दैनिक जागरण ऐसे ही जागरण प्रकाशन नहीं बना है. उसके पीछे कितने ही पत्रकारों के शोषण और खून चूसे जाने की लंबी कहानियां रही हैं. मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले दैनिक जागरण ने अपने सारे यूनिटों में खूब हस्‍ताक्षर अभियान चलाया. पत्रकारों से जबरिया हस्‍ताक्षर करवाया कि वे कम पैसे पर ही खुश हैं, उन्‍हें ज्‍यादा पैसों की जरूरत नहीं. कई पत्रकारों के तबादले किए गए, कई को दूसरे तरीकों से प्रताडित किया गया, कई पत्रकार अपने रिटायरमेंट के आखिरी बेला में बाहर कर दिए गए.

कुल मिलाकर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश के आधार पर कर्मचारियों को पैसा न देना पड़े इसके लिए दैनिक जागरण प्रबंधन ने अपने सारे घोड़े खोल डाले. खैर, सारी कवायदों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट से उसे राहत नहीं मिली. सुप्रीम कोर्ट ने तमाम अखबार संस्‍थानों को सुनने के बाद मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने का निर्देश दे दिया. इसके बाद अन्‍य अखबारों ने इसकी खबर प्रकाशित की, लेकिन दैनिक जागरण ने इस खबर को भी नहीं छापा. यानी मजीठिया वेज बोर्ड के फैसले से जागरण प्रबंधन बेहद आहत और निराश है.

अब असली खबर. बनारस में प्रबंधन ने एक बार फिर हस्‍ताक्षर अभियान शुरू किया है. अब इस अभियान की खास बात यह है कि पत्रकारों को यह पढ़ने नहीं दिया जा रहा है कि वे किस बात पर हस्‍ताक्षर कर रहे हैं. लिखे गए शब्‍दों को ढंककर पत्रकारों से हस्‍ताक्षर कराया जा रहा है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार प्रबंधन ने वरिष्‍ठ पत्रकार आदर्श शर्मा समेत तीन लोगों से हस्‍ताक्षर कराए हैं. इन सभी ने किस चीज पर हस्‍ताक्षर किए हैं, इनको कोई जानकारी नहीं है. अब ये पत्रकार चर्चा कर रहे हैं कि कहीं प्रबधंन ने जबरिया उनका जमीन-जायदाद तो नहीं लिखवा रहा है.  

बताया जा रहा है कि पत्रकारों को शक है कि प्रबंधन मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार पैसा न देना पड़े इसके लिए यह हस्‍ताक्षर करवा रहा है. साथ ही इस बात का भी ध्‍यान रखा जा रहा है कि यह मामला बाहर ना चला जाए, इसके लिए छोटे-छोटे ग्रुपों में हस्‍ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है. संभावना है कि अगले कुछ दिनों तक तीन-चार के समूह में हस्‍ताक्षर कराए जाएंगे. प्रांरभिक खबर तो बनारस से है, लेकिन बताया जा रहा है कि जल्‍द ही यह हस्‍ताक्षर सारे समूह में चलाया जाएगा. 

आलोक मिश्रा ने संभाला बनारस में कार्यभार

दैनिक जागरण, बनारस से खबर है कि भागलपुर से आए नए संपादक आलोक मिश्रा ने अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है. आलोक के पहले संपादकीय प्रभारी आशुतोष शुक्‍ला की विदाई बनारस से हो गई है. उल्‍ल्‍लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही आशुतोष का तबादला लखनऊ के लिए कर दिया गया था, जबकि उनकी जगह भागलपुर में कार्यरत आलोक मिश्रा को दैनिक जागरण, बनारस का नया संपादकीय प्रभारी बनाया गया है.

भारत दूत में एनई बने आरआरएस सोलंकी

वरिष्‍ठ पत्रकार आरआरएस सोलंकी ने बनारस में भारत दूत ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें यहां पर समाचार संपादक बनाया गया है. सोलंकी कुछ समय पहले ही दैनिक जागरण से रिटायर हुए थे. अब वे भारत दूत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की जिम्‍मेदारी निभाएंगे.

सन 1979 में नार्दन इंडिया पत्रिका से अपने करियर की शुरुआत करने वाले सोलंकी लंबे समय तक दैनिक जागरण को इलाहाबाद, बनारस, मेरठ और बरेली में अपनी सेवाएं दी. इसके अलावा वे जनवार्ता, स्‍वतंत्र भारत, अंग्रेजी पायनियर, जेवीजी टाइम्‍स को भी विभिन्‍न स्‍थानों पर कार्यरत रहे. अमर उजाला के साथ भी मेरठ और बरेली में जुड़े रहे. हिंदुस्‍तान, बनारस के साथ भी लंबे समय तक काम किया.  

बेनी बाबू के दिए दर्द से नहीं उबर पा रहे लखनऊ के कई पत्रकार

लखनऊ : बेनी बाबू के मोबाइल, कैश और बैग ने लखनऊ की पत्रकारिता को गरम कर रखा है. होटल ताज में आयोजित कार्यक्रम में बैग पाने के लिए दर्जनों पत्रकार लाइन में लगे रहे. शर्म हया को ताक पर रखकर. इतना करने के बाद भी बेनी बाबू ने इन लोगों को छोटा सा बैग थमाकर अरमानों पर पानी फेर दिया. कई दिनों तक यह मामला सचिवालय के प्रेस रूम और तमाम जगहों पर गरमा गरम बहस का मुद्दा बना रहा.

लखनऊ के वे पत्रकार तो दुखी हुए ही जिन्‍हें बड़ा या छोटा कोई बैग नहीं मिला, लेकिन सबसे ज्‍यादा दुखी वे पत्रकार नजर आए जो वहां पहुंचने के बाद भी नगदी वाला बैग नहीं लहा पाए. कई शातिर पत्रकार बंधु तो नगदी भी लिए, मोबाइल भी लिए, दो-दो लोगों के वास्‍ते लिए और बेनी बाबू को अपने अपने अखबारों में बेइज्‍जत भी किया. पर अब इस मामले से अलग एक और भी खबर सामने आ रही है.

एक पत्रकार बंधु, जिन पर माया सरकार में सौंदर्यीकरण में दलाली खाने का आरोप है, बताते फिर रहे हैं कि खुद को जर्नलिस्‍टों का नेता कहने वाले एक बड़े पत्रकार बेनी बाबू से 25 बैंग लिए हैं. इन बैंगों में कैश, मोबाइल भी शामिल है. दलाली खाने के आरोपी पत्रकार बताते फिर रहे हैं कि कई किताबें लिखने वाले ये पत्रकार महोदय खुद को पत्रकारों का बड़ा नेता बताकर बेनी बाबू को अर्दब में लिया है. उन्‍हें आश्‍वस्‍त भी किया है कि वे सभी 25 डग्‍गा बड़े पत्रकारों तक पहुंचा देंगे.

अब पत्रकार महोदय की बातों में कितनी सच्‍चाई है यह तो वे ही जाने, लेकिन लखनऊ की मीडिया हलकों में दोनों पत्रकारों की दलाली की किस्‍सागोई नमक मिर्च लगाकर सुनाई-बताई जा रही है. हालांकि ये दोनों ही पत्रकार मोटी चमड़ी के माने जाते हैं, लिहाजा इनके ऊपर किसी बात का असर होगा कहना मुश्किल है. हां, लखनऊ के पत्रकारों ने हार नहीं मानी है. उन्‍हें उम्‍मीद है कि बेनी बाबू ने नहीं दिया तो क्‍या हुआ, अभी तो लोकसभा चुनाव बचा ही है. (कानाफूसी)

कैनविज टाइम्‍स को धोखा देने वाली टीम ने वॉयस ऑफ मूवमेंट ज्‍वाइन किया

: पुराने मीडियाकर्मी को काम करने से मना किया गया : लखनऊ : कुछ दिन पहले प्रभात रंजन दीन लगभग तीस लोगों की टीम के साथ कैनविज टाइम्‍स को ठप करके निकल गए थे. दीन के चलते कैनविज टाइम्‍स दीन हीन स्थिति में पहुंच गया. टीम के जाने के अगले दिन अखबार भी प्रकाशित नहीं हुआ. लखनऊ में इस बात की जबर्दस्‍त चर्चा रही. अखबारों में वीर रस लिखने वाले दीन के नैतिकता पर उंगली उठी. उनकी पीठ में छूरा घोंपने की आदतों पर भी लोग चर्चा करते दिखे. इस बार दीन ने दो दर्जन मीडियाकर्मियों को दीन दुखी बना दिया है.

प्रभात अपनी पूरी टीम के साथ लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक छोटे अखबार वॉयस ऑफ मूवमेंट पहुंच गए हैं. कैनविज से धोखेबाजी करने वाली पूरी टीम ने उनके साथ यहां ज्‍वाइन कर लिया है. लेकिन सबसे बुरी खबर यह है कि दीन यहां पहुंचने के साथ ही अखबार का प्रकाशन कर रहे लगभग दो दर्जन कर्मचारियों के पेट पर लात मार दी है. संपादक सुर्कीत को भी बाहर कर दिया गया है. बताया जा रहा है कि यह अखबार एक पुलिसकर्मी का पुत्र प्रकाशित करता है.

सूत्रों का कहना है कि दीन ने पुलिसकर्मी के इस पुत्र को लंबे चौड़े सब्‍जबाग दिखाए हैं. इसी सब्‍जबाग के चलते इस अखबार का मालिक प्रखर कुमार सिंह ने अपने लगभग दो दर्जन मीडियाकर्मियों को काम पर आने से मना कर दिया है. बताया जा रहा है कि सभी कर्मियों को पिछले दो महीने से सैलरी भी नहीं मिली है. सूत्रों ने बताया कि मैनेजमेंट ने हटाए गए सभी कर्मचारियों को रविवार की सुबह आने को कहा है. समझा जा रहा है कि इसी दिन इन लोगों से बातचीत की जाएगी.

पत्रिका ने लिखा – आईआरएस की सर्वेक्षण पद्धति सर्वश्रेष्ठ!

नई दिल्ली। एमयूआरसी ने मंगलवार को इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी को लिखे एक पत्र में विस्तार से बताया है कि क्यों वर्तमान सर्वेक्षण पद्धति सर्वश्रेष्ठ है।

नया सर्वेक्षण

आबादी : सर्वेक्षण में आबादी के अनुमान का आधार 2011 की जनगणना रही। 2001-11 के बीच कई शहरों की सीमाओं और आबादी में काफी परिवर्तन आया है।

डाटा कलेक्शन मैथडोलॉजी : सभी साक्षात्कारों में डुएल स्क्रीन कंप्यूटर असिस्टेड पर्सनल इंटरव्यू का प्रयोग। इसमें एक साथ दो कंप्यूटर स्क्रीन की सहायता से पाठक का इंटरव्यू लिया जाता है -एक स्क्रीन पर डाटा फीड होता है तो दूसरी स्क्रीन पर यह सब पाठक देख सकता है। इंटरव्यू के तुरंत बाद इसे "लॉक" कर दिया जाता है, इसके बाद इसमें फेरबदल संभव नहीं होता।

साक्षात्कार अवधि : हर इंटरव्यू की अवधि 30 मिनट रही। इसमें भी 50 हजार से भी ज्यादा की ऑडियो रिकॉर्डिग सुरक्षित। कौन से 50 हजार इंटरव्यू रखे जाएंगे यह पूर्व तय नहीं था।

मीडिया उपभोग के नए पैमाने : मीडिया उपभोग के लिए एक विशेष समय सीमा का प्रयोग – उदाहरण के लिए समाचार पत्र के लिए एक माह की सीमा अवधि रखी गई।

सैंपल साइज : वर्तमान पाठक सर्वेक्षण में सैंपल साइज काफी बड़ी – लगभग 235000 घर (हाउसहोल्ड) थे। इसमें शहरी भारत से 160000 घर तथा ग्रामीण भारत से लगभग 75000 घर रहे, जो किसी एक क्षेत्र में केंद्रित नहीं वरन सारे देश में फैले हुए थे।

पुराना सर्वेक्षण

सर्वेक्षण में आबादी के अनुमान का आधार 2001 की आबादी रही। यह सर्वेक्षण मुख्यत: पेपर एडिड पर्सनल इंटरव्यू पर ही आधारित रहे। केवल कुछ ही डाटा कलेक्शन में डीएस-सीएपीआई का प्रयोग किया गया था। डाटा रिकॉर्ड करने के बाद डाटा फीडिंग में फेरबदल संभव। इंटरव्यू की अवधि 90 मिनट रही। इतनी लंबी अवधि इंटरव्यू लेने और देनेवाले, दोनों के लिए काफी थकाऊ होती थी। ऑडियो रिकॉर्डिग भी कम। मीडिया उपभोग के लिए ऎसी किसी समय अवधि की प्रयोग नहीं किया गया था। इसके पूर्व के सर्वेक्षणों में सैंपल साइज अपेक्षाकृत कम थी। (पत्रिका)

रीडरशिप में पोल खुलने से नाराज 18 मीडिया समूह आईआरएस से अलग हुए

नई दिल्ली। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी की कार्यकारी समिति की ओर से सर्वसम्मति से इंडियन रीडरशिप सर्वे (आइआरएस-2013) को खारिज करने के बाद दैनिक जागरण समेत कई प्रमुख अखबारों ने खुद को आइआरएस से अलग कर लिया है।

दैनिक जागरण के अलावा जिन अन्य प्रमुख अखबारों ने आइआरएस से अलग होने के पत्र भेज दिए हैं उनमें दैनिक भास्कर समूह, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह, द इंडिया टुडे समूह, द हिंदू समूह, द आनंद बाजार पत्रिका समूह, द ट्रिब्यून, दिनाकरन समूह, मिड-डे, लोकमत समूह, मलयाला मनोरमा समूह, आउटलुक समूह, द स्टेट्समैन समूह, अमर उजाला, बर्तमान समूह, आज समाज, साक्षी मीडिया समूह, डीएनए समूह और नई दुनिया भी शामिल हैं।

प्रमुख अखबारों ने यह कदम मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमआरयूसी) की ओर से आइआरएस के हास्यास्पद नतीजे वापस न लेने के फैसले के बाद उठाया। देश के सभी राज्यों में सभी भाषाओं के अखबारों पर किए गए इस सर्वे में सैकड़ों हैरान कर देने वाली विसंगतियां हैं। कुछ चुनिंदा इस तरह हैं:

पंजाब-हरियाणा

सर्वेक्षण के मुताबिक पंजाब में कुल संख्या के 33 फीसद (10 लाख 20 हजार) पाठक घट गए हैं। पंजाब केसरी की रीडरशिप में 43 फीसद गिरावट बताई गई है और द ट्रिब्यून के पाठकों की संख्या आधी कर दी गई है। इसके उलट हरियाणा में हरिभूमि के पाठकों की तादाद में 390 फीसद उछाल दिखाया है, जो 2012 के दौरान राज्य में कहीं दिखाई ही नहीं देता था।

उत्तर प्रदेश

कानपुर में अग्रणी अखबार की हर प्रति के 2.6 पाठक के मुकाबले हिंदुस्तान को 10 से ज्यादा लोग पढ़ने की बात कही गई है। वाराणसी में दैनिक जागरण का सर्कुलेशन हिंदुस्तान के मुकाबले दोगुने से ज्यादा है, फिर भी वहां हिंदुस्तान के पाठकों की संख्या अग्रणी अखबार से कहीं ज्यादा दिखाई गई है। मेरठ में दैनिक जागरण हिंदुस्तान के मुकाबले सौ फीसद आगे है, लेकिन सर्वे में पाठकों की संख्या के मामले में उसे हिंदुस्तान से महज 18 फीसद बढ़त पर रखा गया है। सर्कुलेशन के लिहाज से आगरा में हिंदुस्तान तीसरे नंबर पर है और वह अमर उजाला का दो तिहाई ही है, लेकिन उसके पाठकों की संख्या अग्रणी अखबार से 43 फीसद ज्यादा दिखाई गई है। अलीगढ़ में सर्कुलेशन के मामले में जागरण हिंदुस्तान से 38 फीसद आगे है, लेकिन उसकी पाठक संख्या में महज नौ फीसद बढ़त दिखाई गई है। इलाहाबाद में अमर उजाला सर्कुलेशन में तो हिंदुस्तान से 44 फीसद आगे है, लेकिन रीडरशिप में हिंदुस्तान 16 फीसद बढ़त हासिल किए हुए है।

उत्तराखंड

सर्वेक्षण में उत्तराखंड के अग्रणी अखबार अमर उजाला के मुकाबले हिंदुस्तान को 30 फीसद ज्यादा सर्कुलेशन के साथ पहले पायदान पर दिखाया गया है। इस राज्य में हिंदुस्तान का महज एक प्रिंटिंग सेंटर है, जबकि अन्य प्रमुख अखबारों के दो-दो प्रिंटिंग सेंटर हैं। हिंदुस्तान की 20 लाख प्रतियों को पढ़ने वालों की तादाद अप्रत्याशित तौर पर एक करोड़ 40 लाख बताई गई है।

महाराष्ट्र और गुजरात

महाराष्ट्र की स्थिति कुछ ज्यादा ही हास्यास्पद है। नागपुर के अग्रणी अंग्रेजी अखबार हितवाद का प्रमाणित सर्कुलेशन 60 हजार है, लेकिन सर्वे में इसे एक भी पाठक नहीं दिया गया है। यहां साकाल और लोकमत के पाठकों में भी अविश्वसनीय कमी दिखाई गई है।

दिल्ली-मुंबई

मुंबई में अखबारों की पाठक संख्या में 20.3 फीसद उछाल दर्शाया गया है, जबकि हर मामले में आगे बढ़ रही दिल्ली में पाठकों की संख्या 19.5 फीसद घटी बताई गई है।

गुजरात-मध्यप्रदेश

गुजरात में पिछले आइआरएस सर्वे में गुजरात समाचार को राज्य का अग्रणी अखबार बताया गया था। इस बार सर्वे में उसके पाठकों की संख्या सात लाख छह हजार घटा दी गई है, जबकि संदेश के पाठकों की संख्या में पांच लाख 23 हजार की वृद्धि बताई गई है। मध्य प्रदेश में नई दुनिया के 24 फीसद पाठक घटा दिए गए हैं, जबकि उसके सर्कुलेशन में शानदार बढ़ोत्तरी हुई है। राज्य में पत्रिका के पाठकों की पिछली संख्या 18 लाख में 135 फीसद का उछाल बताया गया है और आंकड़ा 44 लाख से ऊपर निकल गया है, जबकि अखबार ने कोई नया संस्करण शुरू नहीं किया है।

तमिलनाडु

तमिलनाडु में हिंदू की पाठक संख्या करीब आधी होकर 6.1 लाख रह गई है, जो पहले 10.7 लाख थी। दिनाकरन ने भी कथित तौर पर 14 लाख पाठक खोए हैं। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में हिंदू बिजनेस लाइन की पाठक संख्या चेन्नई के मुकाबले तीन गुनी बताई गई है। (जागरण)

सात प्रेम कहानियां : स्त्री मन को झकझोर देने वाली कहानियां

प्रेम शब्द से सारी दुनिया परिचित है l यह एक ऐसी अनुभूति है जिस के बिना इंसान को सारा जीवन निरर्थक लगने लगता हैl इस अनुभति के विभिन्न रूप लोगों के जीवन में देखने को मिलते हैं l प्रेम कहीं पूजा है, कहीं तपस्या है l प्रेम के बिना जीवन मरुथल है l इस के बिना इंसान को जीवन की राहें बहुत लंबी लगने लगती हैंl समय-समय पर इसके बारे में कहानियाँ भी लिखी गयी हैं l प्रेम राधा और मीरा ने कृष्ण से किया l प्रेम के उदाहरण लैला-मजनू, शीरीं-फरहाद भी हैं l प्रेम के नाम पर लोगों की गर्दनें भी कट गयी हैंl

कई बार प्रेम लोगों के मरने के बाद भी अमर रहता है l उन की गाथायें गाई जाती हैं l शाहजहाँ का प्रेम मुमताज के लिए ताजमहल के रूप में देखने को मिलता है l स्त्री-पुरुष के संबंधों में प्रेम के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं l अपनी सात प्रेम कहानियों में प्रसिद्ध लेखक दयानंद पांडेय जी ने स्त्री-पुरुष के समकालीन प्रेम संबंधों का विवरण अपनी सरल, सहज सुंदर भाषा-शैली में जिस तरह किया है उसे पढ़ कर पाठक का मन आंदोलित हो उठता है l मन स्त्री-पुरुष के रिश्तों के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर हो उठता है l ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने प्रेम के तमाम पहलुओं पर गहन चिंतन करते हुये इन कहानियों को लिखा है l प्रेम के विभिन्न रंगों में लिपटी इन कहानियों को पाठक तक पहुँचाने की जिम्मेवारी को आपने बखूबी निभाया है l पढ़ कर मन कह उठता है 'काटा प्रेम-कीट ने जिस को, रास न आए फिर कुछ उस को l'

मैत्रेयी की मुश्किलें :

दयानंद जी की पहली कहानी की प्रेमिका मैत्रेयी लोगों पर हावी हो जाने के बारे में बदनाम है l लोग उस से दूर भागते रहते है l तकदीर की मारी ‘भड़भूजे के भाड़’ जैसी मैत्रेयी का अतीत अवसाद से भरा है l पहले के दो विवाह असफल होने के बाद नागेंद्र नाम के प्रेमी से अपने खोए हुए सुख को प्राप्त करना चाहती है l स्वभाव में एक तरफ उदारता की देवी और दूसरी तरफ बच्चों की तरह जिद पर अड़ने की आदत l नागेंद्र से वह बुरी तरह प्रेमासक्त है और एक पत्नी की तरह उस से मान-मनौवल की उम्मीद रखती है l प्रेमी को डर है समाज का पर उसे नहीं l शादी-शुदा प्रेमी मैत्रेयी के चक्कर में हैl मैत्रेयी तो मन से उसे चाहती है पर नागेंद्र का प्रेम एक भँवरे की तरह है l और उस का मन मौका पाते ही अन्य स्त्रियों के लिए भी डावांडोल होता रहता है l ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ वाली सिचुएशन है l

नागेंद्र के शब्दों में ‘मर्द हूँ और लंपट किस्म का मर्द हूँl विवाहित होने के वावजूद अगर उस के साथ हमबिस्तरी कर सकता हूँ तो बाकी और औरतों से भी राखी नहीं बंधवाई हैl’ लेकिन ये सब जानने के बाद भी मैत्रेयी, जो आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं है, उन औरतों की तरह असहाय महसूस करती है जो समाज में एक पति के बिना नहीं रह सकतीं l और इसी लिए वह नागेंद्र को अपने सम्मोहन के जाल में फंसा कर अक्सर शादी का जिक्र करती रहती है l उसे उस की पत्नी व बच्चों की कोई परवाह नहीं l वह भी ऐसी स्त्रियों की तरह है जो प्रेमी की पहली पत्नी के संग भी जिंदगी शेयर करने को तैयार हो जाती हैं l ऐसी औरतें बिना पुरुष के समाज में अपने को असुरक्षित समझती हैंl

मैत्रेयी का कहना है ‘दरअसल मुझे लगता है कि बिना बाप की बेटी और पति के औरत की समाज में, परिवार में बड़ी दुर्दशा होती है l' शायद ये कहते हुये वह भूल जाती है कि कभी उसका भी अजय नाम का पति था जो उस की सुरक्षा नहीं कर पाया बल्कि अपने घर वालों के संग मिल कर दहेज को ले कर मैत्रेयी की दुर्गति कर डाली थी l फिर भी अजय उस का पहला प्यार था और मैत्रेयी को उसे भुलाना मुश्किल है l इस समाज में अकेले जीवन व्यतीत करने की वजाय वो जानते हुए भी नागेंद्र जैसे लंपट किस्म के इंसान तक से शादी करने को तैयार रहती है l और भावनात्मक व आर्थिक सुरक्षा की खोज में अपने से काफी बड़ी उम्र तक के पुरुष से शादी कर लेती है l कई बार मैरिज फेल होने पर या कम उम्र में बाप का साया सर से उठ जाने पर औरत के जीवन में जो असुरक्षा की भावना निहित हो जाती है उसे अपनी उम्र से काफी बड़े व्यक्ति से शादी करके पूरी करना चाहती है l ऐसे पतियों को अंग्रेजी में ‘शुगर डैडी’ कहते हैंl दयानंद जी ने इस प्रेम कहानी में बड़ी कुशलता से इन सब पहलुओं का शब्दांकन किया है l

बर्फ़ में फँसी मछली :

इस दूसरी प्रेम कहानी को पढ़ना शुरू करते ही आइडिया होने लगता है कि ये कहानी एक लव मैनियेक के बारे में है l इस के प्रेमी को प्रेम का असली अर्थ ही नहीं पता l उसे हर लड़की से प्यार हो जाता है l शुरू में कभी उसे भी 'लव एट फर्स्ट साइट' हुआ था लेकिन उस लड़की की शादी कहीं और हो जाने से धीरे-धीरे इन का लव हवा हो जाता है l बाद में खुद की शादी करने के बाद भी फुटकर प्यार के किस्से चलते रहते हैं l कुछ लोगों के लिए प्यार एक मृगतृष्णा के समान है, उस के पीछे भागते ही रहते हैं l पता नहीं किन-किन लोगों के बीच अजीब परिस्थितियों में फँस कर भी उन की प्रेमासक्ति नहीं खत्म होती l इस कहानी में भी एक ऐसा ही लव मैनियेक है जो प्यार के पीछे लगातार भागता रहता है l इसे हर स्त्री से प्यार हो जाता है या होता रहता है l प्रेम ना हुआ जैसे एक रोग हो गया l 'तू नहीं तो और सही’ वाली सोच के इस इंसान को प्यार का गूढ़ अर्थ ही नहीं पताl जिस तरह फूड से हद का लगाव रखने वालों को फूड मैनियेक कहा जाता है, उन का मन तरह-तरह के खाने ढूंढ कर खाने को मन करता है और रोज उसी चक्कर में रहते हैं उसी तरह इस कहानी में प्रेम के रसास्वादन से मन ना भरने वाले एक इंसान का ज़िक्र है l और ऐसे लोगों को लव मैनियेक कहना ही सही होगाl

इन लोगों के लिए प्रेम शब्द एक आइसक्रीम या पान तमाखू की तरह है l हर बार जायका लेने के बाद फिर दूसरे फ्लेवर का खाना चाहते हैं l ऐसे इंसान आजीवन प्रेम के पीछे भागते रहते हैं l एक इंसान से प्रेम कर के चैन से नहीं रहना चाहते l दयानंद जी ये कहानी लिखते हुए इस लव मैनियेक के जीवन में कितने और पहलू जोड़ते रहे हैं l जिन में इंटरनेट से जुड़ी प्रेम की दुनिया भी है जिस से तमाम लोग दूर रहना चाहते हैं l केवल ऐसे लोग ही इन साइटों को यूज करते हैं जिन की मानसिकता विकृत हो या जो कैजुएल प्रेम या इस तरह के संबंधों के चक्कर में हों l प्रेम-संबंधों में कहानी का पात्र धीरे-धीरे अन्य देशों की स्त्रियों से जुड़ कर भी अपनी प्रेम-पिपासा नहीं बुझा पाताl एक रशियन लड़की रीमा जो 'बर्फ़ में फंसी मछली' की तरह है इस से बुरी तरह प्यार करने लगती हैl वो जानती है कि रशियन आदमी केवल शरीर के भूखे होते हैं वो सच्चा आत्मिक प्यार करना नहीं जानतेl लेकिन वो बेचारी ये नहीं जानती कि ये लव मैनियेक भी उसे उस तरह का प्यार नहीं दे सकता जिसे वह चाहती हैl

प्रेम-पत्रों के जरिये प्रेम कायम रहता है पर मिलने के पहले ही रीमा की मौत हो जाती है l और अंत में अपने ही कर्मों से बिछे जाल में ये लव मैनियेक भी मछली बन कर फँस जाता है l प्रेम के नाम पर पत्नी के हाथों जो दुर्गति होती है वो अलग l 'ना खुदा ही मिला ना बिसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे' l ऐसे लोग अपनी मानसिकता से मजबूर होते हैं l इस तरह के प्रेम को एक मानसिक रोग कहना ही उचित होगा जिस का इलाज होना चाहिए वरना यदि कोई शादी-शुदा है तो देर-अबेर उस के घरेलू जीवन पर असर पड़ता है l दयानंद जी ने इस कहानी में एक पात्र के माध्यम से प्रेम का ऐसा अस्थिर रूप प्रदर्शित किया है जिस में एक लव मैनियेक अपनी सोच से लाचार है l और ऐसा प्रेम घर-परिवार को उजाड़ देता है l सीख देती हुई इस कहानी का समापन आपने बड़ी खूबी से किया गया है l

फ़ोन पर फ्लर्ट :

फ़ोन पर फ्लर्ट में ऐसे प्रेम संबंध की गंध है जहाँ दयानंद जी की लेखनी ने उन शादी-शुदा औरतों व पुरुषों के प्रेम को उघाड़ा है जो चोरी-छुपे घरवालों की आँखों में धूल झोंक कर किसी से प्रेम-संबंध बना कर आनंद लेते हैं l इस तीसरी कहानी में प्रार्थना नाम की औरत अपने बच्चे की पढ़ाई और अच्छी जिंदगी जीने के सपने बुनती है और शायद किसी अधेड़ उम्र के प्रेमी को अपने शरीर और अदाओं से लुभा कर अपने जाल में फंसाए हुए है l लेकिन वो खुद भी मेहनत कर के पैसे कमाने का जुगाड़ सोचती है l उस के प्रेम संबंध की सब बातें एक दिन किसी से रांग नंबर डायल हो जाने पर वार्तालाप के जरिए पता लगती हैंl प्रार्थना उस व्यक्ति की आवाज़ को अपने प्रेमी की आवाज़ समझ कर इतराते हुए बेबाक उस से काफी देर तक बातें करती रहती है l ये पुरुष भी धोखा दे कर मजा लेने में कम नहीं होतेl

पीयूष मौके का फायदा उठा कर प्रार्थना को अपनी असलियत न बता कर फोन पर ही बातों में फंसा कर उस के बारे में तमाम कुछ जान लेता है l लेकिन वास्तव में ऐसे पुरुष मिलने से डरते हैं कि उन की पोल खुल जाएगी l प्रार्थना को पीयूष की सचाई का पता लगने पर उससे बेरुखाई व नाराजी हो जाती है कि उस दिन फोन पर फ्लर्ट करने वाला उसका प्रेमी नहीं बल्कि पीयूष था l जाहिर है कि दयानंद जी ने ऐसे प्रेम-संबंधों के बारे में बताने की कोशिश की है जिन में औरत केवल एक प्रेमी को ही चाहती है या कहिए कि वफादार होती है l हर किसी को वो मन से नहीं चाह पाती l उस ने फोन पर फ्लर्ट धोखे में किसी को अपना प्रेमी समझते हुए किया था l

एक जीनियस की विवादास्पद मौत :

इस चौथी कहानी में जीनियस, स्मार्ट और खुद्दार विष्णु जी अच्छी नौकरी और इज्ज़त सब को एन्जॉय करते हुए लोगों में धाक जमाए हैं कि उन के मीठे शांत समुंदर जैसे जीवन में बिंदु नाम की एक नमकीन लहर आ जाती है l इस दुनिया में जलने वालों की कमी नहीं l आफिस के लोगों ने बिंदु और विष्णु जी के बारे में तिल का ताड़ बना कर उन के प्रेम के झूठे चर्चों का ऐसा तूफ़ान उठाया कि एक दिन विष्णु जी अपनी अच्छी-खासी नौकरी से ही हाथ धो बैठे l और बीवी बच्चों को लखनऊ में ही छोड़ अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर दूर दिल्ली में जा कर उन्हें छोटी-मोंटी कंसल्टेंसी कर के गुजारे के लिए काम चलाना पड़ा l लेकिन बिंदु तो स्त्री है और पुरुषों का खेला कब रुका है l उस पर अब उस के नए बास ने हावी होना शुरू कर दियाl

एक औरत अपनी इज्ज़त या तो खोए या दाग लगने के पहले कोई और रास्ता टटोले l सो मजबूरन बिंदु ने भी नौकरी पर लात मार कर दिल्ली का ही रास्ता पकड़ा l जहाँ वो विष्णु जी की शरण में आईंl ‘आसमान से गिरे तो खजूर में अटके’ वाली बात हुई l यहाँ भी धक्के खाने पड़े l कुछ औरतें पुरुषों का सहारा लेते हुए छली जाती हैं धीरे-धीरे l और कभी औरत भी मजबूरी में किसी का सहारा पा कर उस का इस्तेमाल करती है और भूल जाती है कि उस पुरुष की जिंदगी में पहले से ही बीवी के रूप में एक औरत है l और वो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उस औरत व उस के परिवार को चोट पहुँचा रही है l बिंदु जी अब बिंदु नहीं रहीं बल्कि विष्णु जी की ज़िंदगी पे इस कदर छा गयीं कि पत्नी व उन में कोई फरक ही नहीं रहा l जिस पत्नी के लिए उन्हों ने अपने घर वालों को छोड़ दिया था किसी दिन अब उस प्रेम को भूल कर बिंदु से उन का लगाव हो गया l और बिंदु एक दिन इतनी स्मार्ट हो गयीं कि उन का प्रेम-वेम सब एक तरफ रह गया l विष्णु जी की पत्नी व बच्चों का कोई ख्याल किए बिना वे उन का सब पैसा गड़प कर गईं साथ में उन को भी खा गईं l मतलब ये कि खुद्दार विष्णु जी अपनी जान से ही हाथ धो बैठे l इसे औरत का प्रेम नहीं बल्कि किसी को प्रेम के झूठे अहसास में रखना कहते हैंl

एक पुरुष को अपने जाल में फंसा कर उस का इस्तेमाल कर के अपना उल्लू सीधा करना कहते हैं l लेकिन औरत की मजबूरी का फायदा उठाने में कभी पुरुष भी पीछे नहीं रहते l बिंदु का प्रेम विष्णु जी के प्रति एक छलावा है जिस में वह अपना स्वार्थ ढूँढती है l वो केवल अपनी आर्थिक व भावनात्मक सुरक्षा के बारे में सोचती है l पैसे की तंगी या फिर परिस्थितियों से मजबूर औरतों की मानसिकता कितनी बदल जाती है कि वो अपने स्वार्थ में अंधी हो कर परवाह नहीं करतीं कि उन के प्रेमी पहले से ही शादी-शुदा हैं l इस तरह की बातें दयानंद जी की इस कहानी के प्रेम-संबंध से साफ विदित होती हैं जिन्हें पढ़ते हुए मन कभी आक्रोश व कभी संवेदनशीलता से भर उठता है l

प्रतिनायक मैं :

ये पाँचवीं कहानी इकतरफा प्रेम की कहानी है जिस में प्रेमी की प्रेमिका को कुछ पता नहीं कि उसे शादी के पहले कोई और लड़का चाहता था l कुछ लोग मन ही मन में किसी को प्यार करते रहते हैं और बताने की हिम्मत नहीं कर पाते l और एक दिन वो जिस से प्यार करते हैं उस की शादी भी हो जाती है l प्यार भी अजीब जगहों व परिस्थितियों में होते हुए सुना है व प्यार करने की कोई खास उम्र भी होना जरूरी नहीं l कभी स्कूल-कालेज के दिनों में पढ़ते हुए तो कभी जान-पहचान के बच्चों में भी एक दूसरे के लिए प्रेम के बीज कब पनपने लगें इस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता l इस कहानी में भी धनंजय बचपन से ही किसी जान-पहचान वालों की बेटी शिप्रा को वह पहली बार देखने पर ही चाहने लगा था यानि ‘लव एट फर्स्ट साइट’ l शिप्रा को देखते ही उस पर रीझ गया l पर संकोच या शर्म जो भी कहो उस के कारण वो उस लड़की को बता ना सका और फिर एक दिन शिप्रा की शादी भी हो गई l 'कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे’ वाली बात हो गईl

खैर, समय बीतता गया पर धनंजय शिप्रा को भूल न सका l वो शिप्रा की याद मन में दफनाए उस की पूजा करता रहा l कई बार देखा-सुना गया है कि ऐसे लोग फिर किसी और से शादी न कर के कुंवारे रहना ही पसंद करते हैं l तो यहाँ धनंजय की भी यही हालत हुई l इतना गहरा आत्मिक प्यार कि शिप्रा की शादी हो जाने के बाद भी वो मन में बसी रही l कल्पना में ही उस से शिकवे-शिकायत करता रहा l कुछ साल बाद एक दिन शिप्रा से मुलाक़ात के दौरान मौका मिलते ही अकेले में इतने सालों से मन का अनकहा गुबार निकाल लिया l शिल्पा लड़की होने के नाते झिझक रही थी l लेकिन ‘अब पछताए का होत जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत’, अब तो बहुत देर हो चुकी थी l शिप्रा ने अपनी तरफ से कुछ कबूल नहीं किया l लेकिन कोई उस से इतना प्यार करता है कि उस के लिए शादी भी ना की इस के अहसास से उस की आँखें भीग जाती हैं l ऐसे केस में अगले जन्म में मिलने के वादे के अलावा और कुछ नहीं सूझता और प्रेमिका के दिए हुए रुमाल को ही प्रेमी सीने से लगाये रहता है l दयानंद जी ने इस कहानी के प्रेम संबंध में समाज की वो झलक दिखाई है जिस में एक पुरुष अपनी प्रेमिका की पावन यादों में ही जीवन व्यतीत कर देता है l कोई उस पर लांछन नहीं लगाता ना ही किसी की उँगली या भौहें उस पर उस तरह उठती हैं जिस तरह एक अकेली स्त्री के साथ होता है l

सुंदर भ्रम :

दो प्रेमियों की कहानियों में अक्सर ही प्रेमी या प्रेमिका के पिता की मृत्यु होने पर या तो वह अपने जीवन की तरफ से उदासीन हो जाते हैं या किसी लक्ष्य को ले कर उस में अपने को गुम कर देते हैं l जैसे कि इस में अनु के साथ हुआ l घर में केवल बेटियाँ हैं तो अनु परिवार का पेट भरने के लिए आगे की पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने लगती है l ऐसा करते हुए वह जीवन की तरफ से उदासीन हो जाती है l उस का प्रेमी देव अपनी प्रेमिका का यहाँ-वहाँ पीछा करते हुए आहें भरा करता है l उस की मन ही मन में पूजा करते हुए उस के आने-जाने की जगहों पर चक्कर काट कर अपनी टांगें घिसा करता है l कभी-कभी प्यार के जुनून में चिट्ठियाँ लिख कर उन की ढेरी लगाता रहता है l ऐसे प्रेमी मजमून दिल में लिए या कागज के टुकड़ों पर लिख कर ही रह जाते हैं l कागज का वो टुकड़ा प्रेमिकाओं के हाथ में सही समय पर नहीं पहुँच पाता l प्रेमी उन्हें पोस्ट करने से हिचकिचाते हैंl कभी इत्तफाक से मौका आया बात करने का तो या तो हकलाने लगते हैं या नर्वस होते हुए मन में जो कुछ रिहर्स किया होता है वो सब कहना या पूछना ही भूल जाते हैं l और भी हादसे होते रहते हैंl

अगर प्रेमिका को संदेह हो जाता है कि कोई उस का पीछा करता है तो डर से या घबरा कर उस लड़के से कन्नी काटने लगती हैl और प्रेमिकायें कभी अचानक सीन से गायब हो जाती हैं तो प्रेमी चिंता के मारे घुलता रहता है l हर समय घुट-घुट कर जीता है लेकिन बेशर्मी से हर बात की खोज खबर रखता है किंतु डरता भी रहता है कि कहीं मन की बात कह देने से जूते न पड़ें या उसे जेल की हवा न खानी पड़े l और अगर कभी ऐसा हुआ कि प्रेमिका के दीदार ना हो पाए और उस का पता-ठिकाना ना मिल पाए तो प्रेमी घबरा जाता है कि कहीं उस की प्रेमिका की शादी ना हो गई हो l प्रेम-ग्रस्त इंसान क्या-क्या फितूर की बातें नहीं सोचता l यही सब इस कहानी के नायक देव के साथ होता रहा l एक ऐसा प्रेमी जो मन में ही बातें सोच कर छटपटाता रहता है लेकिन अपनी प्रेमिका से कुछ कह नहीं पाताl

उसे अपनी प्रेमिका के आगे कोई भी अन्य लड़की सुंदर नहीं लगती l और उस दीवानेपन में कुछ बदकिस्मत प्रेमी मानसिक संतुलन खो बैठते हैं जैसा कि इस कहानी में भी हुआ l सालों से प्रेम-अग्नि में जलता हुआ वह अपनी हर किस्म की भावनाओं को चिट्ठियों में प्रकट करता रहा l कुछ लोग किसी से प्रेम करते हुये जीवन भर ऐसे ही घुटते रहते हैं l अतीत की यादों के नशे में ही धुत रहते हैं l ये नहीं कि ‘जो बीत गया सो बीत गया, अब आगे की सुधि ले l’ देव कल्पना में ही अनु से इश्क लड़ाते हुए अपनी प्रेम-पीड़ित भावनाओं को चिट्ठियों में लिख कर ढेर लगाता रहा किंतु उन्हें पोस्ट करने की हिम्मत ना कर पाया l जिंदगी के कई साल बीत जाने पर ही वो उन चिट्ठियों को अनु को पोस्ट करने की हिम्मत कर पाता है l दयानंद जी ने अपने निपुण लेखन से प्रेम की अधीरता व पीर दोनों को ही इस कहानी में दर्शाया है l

वक्रता :

इस कहानी के प्रेमी को कालेज के दिनों से ही प्रेम रोग लग गया था l वो एक ही लड़की से प्रेम करता है l कभी-कभी परिस्थितियाँ विपरीत होने पर एक खास प्रेमिका ना मिल पाने पर कुछ लोग विद्रोही बन कर और लड़कियों से भी प्यार का स्वांग रचाने लगते हैं और उन का जीवन नष्ट कर देते हैं l  ऐसा ही इस कहानी के नायक परितोष उर्फ ‘अवनींद्र’ ने किया  'शुरू में तो तुम्हारे प्रतिशोध में कुछ कन्याओं से खेला l उन्हें जी भर कर उलीचा l उलीच-उलीच तबाह करता रहा l कुछ समय बाद पाया कि वह तुम्हारी बिरादर कन्यायें तबाह हुई हों, या ना हुई हों, मैं ज़रूर तबाह हो गया l’ परितोष व पश्यंति दोनों ही अपनी दुनिया में एक दूसरे के लिए प्यार के सदाबहार मंजर में डूबे रहे l परिस्थितियों के बहाव में शादी अन्यत्र हो जाने पर भी एक दूसरे को भूल नहीं पाए l रसिक परितोष की रग-रग में पश्यंति  इतनी समाई थी कि सपने में भी उस का नाम मुँह से निकल जाता थाl

यहाँ तक कि उन दोनों ने अपने बच्चों को भी एक दूसरे का नाम दे डाला l प्रेमी की बेटी पश्यंति  और प्रेमिका का बेटा परितोष हो गया l प्रेमिका ने तो अपने बेटे को अपने प्रेमी के डीलडौल में ढालना चाहा और काफी सफल भी हुई उस में l दोनों के लाइफ पार्टनर के गुज़र जाने के बाद उन का रास्ता साफ हो जाता है किंतु एक दूसरे का अता-पता ना मालूम होने से अपनी-अपनी दुनिया में रहते हुए यादों में ही हिलगे रहते हैं l पर एक दिन किस्मत से वह अपने बच्चों की प्रेम कहानी में उलझ कर अजीब परिस्थितियों में फिर मिलते हैं l पर उन के बच्चे नहीं जानते कि उन के माँ-बाप आपस में कभी प्रेमी रहे थे l और इत्तफाक से एक दिन उन के माँ-बाप जब पार्क में मिलते हैं तो प्रेमिका इतनी मोटी हो चुकी होती है कि प्रेमी परितोष उसे पहचान नहीं पाता l किंतु असली प्रेम में मोटापा से कुछ फर्क नहीं पड़ता l मिलते ही वही प्रेमियों वाले गिले-शिकवे चालू हो जाते हैं l जैसे यहाँ पश्यंति  का शिकायत भरा लहजा 'मैं ठूँठ दीवार बन कर भरभराती गई l कोई नहीं आया मुझे संभालने l तुम भी जाने किस दुनिया में भटक रहे थे l वैसे तुम से मैं ने कोई उम्मीद भी न की थीl’

अकेलापन झेलते हुए और उम्र के इस पड़ाव में जैसा होता है पश्यंति  का भी आत्मविश्वास मजबूत होने की वजाय भरभरा कर ढह रहा था l जिसे उस ने अपनी बातों में जाहिर करने में संकोच नहीं किया l जहाँ सच्चा प्यार होता है वहाँ किसी और से शादी हो जाने पर भी दोनों एक दूसरे को भूल नहीं पाते ये कहानी उस का उदाहरण है l अब दोनों प्रेमी अपने बच्चों के प्रेम के आगे मजबूर हैं किंतु एक तो चाहता है कि बच्चों की शादी हो किंतु दूसरा इसे जीवन में फ़िल्मी किस्म का मोड़ समझ कर उन बच्चों की शादी को राजी नहीं होना चाहता l किंतु प्रेमिका परितोष की माँ की इच्छा का उल्लेख करके खोये हुये संबंध को आगे बढ़ाना चाहती है l जो धागा अब तक छोटा था उसे अब एक नए रिश्ते में बांध कर संजोना चाहती है l वो दोनों तो जीवन साथी नहीं बन सके किंतु अब आपस में प्यार करने वाले इन दोनों बच्चों को वो दर्द ना सहना पड़े जिस से वो खुद गुजर चुके हैं l पश्यंति  का कहना है ’हमारे साथ जो हुआ सो हुआ, अब इन के साथ तो ऐसा वैसा कुछ ना होने दो प्लीज…..!’ इस कहानी में परितोष की पत्नी पर तरस आता है कि अपना फर्ज निभाते हुए एक दिन वह इस दुनिया से ही चली गई l और उस का पति परितोष पति परमेश्वर बन कर भी मन से उसे नहीं चाह सका बल्कि अपनी प्रेमिका की यादों में ही आजीवन डूबा रहा l एक औरत जो ऐसे इंसान की पत्नी होती है उस के अभागे जीवन की बिडम्बना इस कहानी में अप्रत्यक्ष रूप से जाहिर होती है l

दयानंद जी ने हर प्रेम कहानी को एक नए खाके में ढाल कर प्रस्तुत किया है l आप की कहानियाँ 'मैत्रेयी का मुश्किलें', ‘फोन पर फ्लर्ट’ व ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ में काफी समानता है जहाँ प्रेमिकाएं अपने प्रेमी की पत्नी व बच्चों के प्रति हृदय हीन हैं l इन सभी कहानियों को आप ने स्त्री और पुरुष दोनों के मानसिक गठन पर ध्यान देते हुए लिखा है l स्त्री अपने संबंध में मजबूती चाहती है चाहें वो पत्नी हो या प्रेमिका, लेकिन पुरुष की प्रवृत्ति एक भँवरे की तरह है जो केवल फूल की सुंदरता के रसपान के बारे में सोचता है l पढ़ते हुए जिज्ञासु मन कहानी के पात्रों में ऐसा उलझ जाता है कि इन प्रेम संबंधों की समस्याएं पाठक से आंतरिक सवाल और जबाब करने लगती हैं l जैसे कि: क्या वास्तव में मैत्रेयी जैसी प्रेमिका की नागेंद्र जैसे प्रेमी से शादी हो सकती है? क्या वाकई समाज इस की इजाजत दे सकेगा? मैत्रेयी, बिंदु और प्रार्थना जैसी औरतें जिस भावनात्मक सुरक्षा की खोज में हैं क्या उन के प्रेमी लोग उन्हें आजीवन दे सकेंगे?

क्या मैत्रेयी शादी के बाद एक ‘लंपट’ इंसान के साथ खुश रह सकेगी? और फिर शादी उस के या किसी और के साथ हो भी गई तो बाद में उस के पति का कायर साबित होना व पति की पहली पत्नी व अन्य लोगों का उसपर तमाम तरह से दोषारोपण करना आदि को सहते-सहते जिंदगी और भी भयानक हो जाए, तब क्या होगा? जब वह समाज में इज्जत पाने की बात करती है तो उस पर सवाल उठता है कि क्या इस तरह के प्रेमी से शादी कर के वो समाज की निगाहों में सम्मान पा सकती है? मन कहता है बिलकुल नहीं l क्यों कि तब समाज पीठ पीछे कहेगा कि इस अमुक स्त्री ने किसी का घर उजाड़ कर अपना घर बसाया है l कई बार प्रेम की भूल-भुलैया में पड़ कर प्रेमी लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं l सच्चे प्यार का अर्थ ना समझते हुए कुछ लोग शारीरिक आकर्षण के पीछे भागते हैं l ऐसे प्रेम-संबंधों और शादियों से पुरुष की पहली बीवी व बच्चों के जीवन उजड़ जाते हैं l शादी करते हुए पत्नी को नहीं पता होता कि कब पति जीवन भर के लिए किए वादों को भूल जाए l और प्रेमिकाएं नहीं जानतीं कि कब प्रेमी बदल जाए, कब भँवरा रसपान कर के उड़ जाएl

मैत्रेयी के शब्दों में ‘बातों-बातों में ताजमहल बनवाने वाले बहुतेरे मिलते हैं पर साथ निभाने वाले मर्द शायद इस समाज में नहीं हैं l’ और 'बर्फ़ में फँसी मछली' के लव मैनियेक पर मन सवाल करने लगता है कि उस के जैसे लोग शादी क्यों करते हैं व औरतें क्यों ऐसे लोगों से प्रेम करने लगती हैं? अंतर्मन बिचलित होता है पर प्रेम-सागर में न जाने कितने प्रेमी डूबे हैं और न जाने कितने डूबते रहेंगे l प्रेम इंसान को देश, समाज, जाति, धर्म आदि सभी बंधनों को तोड़ कर अपने पाश में जकड़ लेता है l और दयानंद जी ने अपनी सातों प्रेम कहानियों में बड़ी कुशलता से इस तरह के सभी प्रेम-संबंधों के विभिन्न रूप दिखाए हैं l स्त्री-पुरुष के कानूनी व गैरकानूनी संबंधों का शब्दों में अच्छा चित्रण किया है जहाँ जिंदगी कभी रोती है, कभी मुस्काती है l ऐसे प्रेम-संबंधों से परिवार व समाज पर क्या प्रतिक्रिया होती है ये इन सभी सातों कहानियों से साफ जाहिर होता है l एक बार पढ़ना शुरू करो तो कहानी का अगला मोड़ क्या होगा इस की जिज्ञासा अंत तक बाँधे रहती है l तमाम तरह की प्रेमानुभुतियों से युक्त ये कहानियाँ कभी पाठक को सतर्क करती हैं, कभी नसीहत देती हैं l प्रेम के अस्थिर रूप से विरक्ति व इसका गूढ़ अर्थ समझने को बाध्य करती हैं l जिस शादी को सात जन्मों का बंधन कहते हैं उस पर सोचते हुए एक स्त्री के मन को ये कहानियाँ झकझोर देती हैं l प्रेम के नाजुक धागों के बारे में सोच कर मन कहना चाहता है:

'घर-आँगन रचे प्रेम-रंगोली

प्रेम के रंग में बरसे होली

पावन प्यार की उठे सुगंध

ना मन टूटें और ना संबंध l'   

दयानंद जी के लिए लेखन उन के ही शब्दों में एक 'प्रतिबद्धता' है जिस में सामाजिक समस्यायों की झलक के साथ अनेकों बार इंसान के मन की पीड़ा की चीत्कार उठती रहती है l जीवन-समाज का विपुल अनुभव आप के लेखन को निखारता है l तमाम उपन्यासों, कहानियों और कविताओं के रचयिता वरिष्ठ साहित्यकार दयानंद जी को इन कहानियों के लेखन पर हार्दिक बधाई व शुभकामनायें l आप साहित्य के आकाश पर इसी तरह निरंतर अपने लेखन से ऊँची उड़ान भरते रहें l लेखनी से आप का सरोकार हमेशा बना रहे ऐसी मेरी कामना है।

[ जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित सात प्रेम कहानियां की भूमिका]

दयानंद पांडेय के ब्‍लॉग सरोकार से साभार.

बेनी ने पत्रकारों को बांटे कैश, मोबाइल और सूटकेस

लखनऊ : लोकसभा चुनावों की अधिसूचना इसी महीने जारी होने की संभावना है। इससे ठीक पहले केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने सोमवार को होटेल ताज में एक करोड़ से ज्यादा रुपए कैश बांटा। इस्पात उपभोक्ता परिषद की सदस्यता के नाम पर ज्यादातर पैसा लखनऊ और बाराबंकी के पत्रकारों व मंत्रीजी के संसदीय क्षेत्र के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को दिया गया।

हालांकि कुछ पत्रकारों ने समिति का सदस्य बनने से इनकार कर दिया। इसके अलावा पत्रकारों समेत करीब एक हजार से अधिक लोगों को बेनी ने ट्रॉली सूटकेस और मोबाइल फोन भी दिया।

पिछले दिनों लखनऊ के कई पत्रकारों को दिल्ली स्थित केंद्रीय इस्पात मंत्री के आवास से फोन कर उनका नाम और पता नोट किया गया। पूछने पर बताया गया कि मंत्रीजी के कहने पर उनका पता नोट किया जा रहा है। चार दिन पहले पत्रकारों के घर एक पत्र आया जिसमें उन्हें इस्पात उपभोक्ता परिषद का सदस्य बनने की जानकारी दी गई। दो दिन पहले पत्रकारों को एसएमएस के जरिए जानकारी दी गई कि उन्हें परिषद का सदस्य बनाया गया है।

परिषद की बैठक तीन फरवरी को लखनऊ के फाइव स्टार होटेल में है। बैठक के लिए बनने वाले पहचान-पत्र के लिए वह अपनी दो फोटो साथ लेकर आएं। साथ ही यह भी जानकारी दी गई कि बैठक के बाद इस्पात मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करेंगे। पत्रकार जब कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे, तो वहां हजारों की भीड़ पहले से मौजूद थी। सदस्य बनने के लिए धक्का मुक्की भी जमकर हो रही थी।

पता चला कि उपभोक्ता परिषद का सदस्य बनने के लिए गोंडा और लखनऊ के कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बुलाया गया था। बैठक में शिरकत करने के लिए गोंडा और अन्य शहरों से आने वाले नवनियुक्त सदस्यों को एसी टू के किराए के साथ सात हजार रुपये का डीए और एक हजार रुपए लोकल कन्वेंस का भुगतान किया गया।

स्थिति यह थी कि जिस समय उपभोक्ता परिषद की बैठक चल रही थी, उस समय बैठक में शिरकत करने आए नवनियुक्त सदस्य टीए और डीए के भुगतान के लिए काउंटरों पर भीड़ लगाए थे। और तो और बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस भी खत्म हो गई लेकिन, काउंटर पर भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। टीए और डीए के भुगतान के साथ ही सदस्यों को करीब डेढ़ हजार रुपए कीमत का मोबाइल फोन और एक ब्रीफकेस भी दिया गया। (एनबीटी)

युवक ने हरियाणा के सीएम हुड्डा को थप्‍पड़ मारा

पानीपत : कांग्रेस के रोड शो के दौरान एक युवक ने हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को थप्पड़ जड़ दिया। सीएम को थप्पड़ जड़ने का दुस्साहस करने वाले इस युवक को सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत हिरासत में ले लिया। बताया जा रहा है कि यह युवक नौकरी न मिलने के कारण डिप्रेशन में चल रहा था। अधिकारियों ने बताया कि युवक से पुलिस पूछताछ कर रही है।

दरअसल मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन करने और उनकी आधारशिला रखने के लिए दिल्ली से करीब 80 किलोमीटर दूर पानीपत गए थे। हुड्डा की मारुति जिप्सी जब भीडभाड़ वाले स्थान से गुजर रही थी, तभी कमल मुखीजा नाम का एक युवक सुरक्षा घेरे को तोड़कर आगे आ गया और उसने छलांग लगाकर मुख्यमंत्री को थप्पड़ मार दिया। हुड्डा ने नीली जींस पैंट और भूरा जैकेट पहने युवक को पीछे धकेल दिया।

सूत्रों ने बताया, युवक थप्पड़ मारने के बाद चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था कि उसने नौकरी के लिए पैसे दिए, फिर भी उसे नौकरी नहीं मिली। युवक इसके लिए हुड्डा को जिम्मेदार बता रहा था। गौरतलब है कि अगस्त 2010 में महेन्द्रगढ़ में 21 वर्षीय शक्ति सिंह ने हुड्डा की ओर जूता फेंका था। हालांकि यह निशाने से काफी पीछे रह गया था।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि यह युवक अवसाद में है और उसे फौरन हिरासत में ले लिया गया। अधिकारी ने बताया कि आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। अधिकारियों ने बताया कि युवक से पुलिस पूछताछ कर रही है। गौरतलब है कि अगस्त 2010 में महेंद्रगढ़ में 21 वर्षीय शक्ति सिंह नाम के युवक ने हुड्डा की ओर जूता उछाल दिया था। उसने कहा था कि वह राज्य सरकार द्वारा उसे नौकरी दे पाने में नाकाम रहने को लेकर परेशान है। (जी)

महिला पत्रकार गुणसेकर की निर्मम हत्‍या

कोलंबो : श्रीलंका की एक वरिष्ठ महिला पत्रकार की उनके घर में हत्या कर दी गई । पुलिस प्रवक्ता अजीथ रोहना ने बताया कि मेल गुणसेकर (40) का शव कोलंबो के उपनगर में स्थित उनके आवास से मिला। रोहना ने बताया कि उनके माता-पिता और भाई ने गिरजाघर से लौटने के बाद रविवार सुबह सवा आठ बजे उनका शव देखा। उन्होंने बताया कि पत्रकार के सिर और चेहरे पर कटने के जख्म हैं।

उनकी हत्या की जांच के लिए छह टीमें गठित की गई हैं। गुणसेकर एक जानी मानी आर्थिक मामलों की पत्रकार हैं। उन्होंने 'संडे टाइम्स', 'लंका बिजनेस ऑनलाइन' और फ्रेंच संवाद समिति के कोलंबो ब्यूरो में भी काम किया है।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभुदयाल बाजपेयी बने कैनविज टाइम्‍स के संपादक

कैनविज टाइम्‍स, लखनऊ से खबर है कि शंभुदयाल बाजपेयी को अखबार का नया संपादक बनाया गया है. बाजपेयी ने अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है. खबर है कि प्रभात रंजन दीन अपनी टीम के साथ निकल गए हैं. शंभुदयाल वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. वे लंबे समय तक दैनिक जागरण से जुड़े रहे हैं. वे बरेली तथा गोरखपुर में जागरण के संपादकीय प्रभारी रहे हैं. कुछ समय उन्‍होंने इस्‍तीफा देकर चंद्रकांत त्रिपाठी के अखबार से जुड़े. माहौल अनुकूल नहीं होने पर उन्‍होंने इस अखबार को भी अलविदा कह दिया.

कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानित शंभुदयाल के ऊपर बिखर चुकी टीम को एकजुट करने की चुनौती भी है. बताया जा रहा है कि दीन की पूरी टीम उनके साथ चली गई है. इस स्थिति में एक दो दिन अखबार प्रकाशन में दिक्‍कत का सामना भी करना पड़ सकता है. संभव है कि बाजपेयी जल्‍द अपनी टीम गठित कर नए सिरे से कैनविज टाइम्‍स को पटरी पर ले आएं.

फोटो जर्नलिस्‍ट को थप्‍पड़ मारने वाला सिपाही सस्‍पेंड

नई दिल्ली। दिल्ली के राजघाट पर एक पागल हाथी की तस्वीरें ले रहे ट्रिब्यून अखबार के फोटो जर्नलिस्ट मानस रंजन को थप्‍पड़ मारने वाले सिपाही को सस्‍पेंड कर दिया गया है। हुआ यूं कि राजघाट पर एक हाथी ने रेलिंग और साइन बोर्ड उखाड फेंके और अपने ऊपर बैठे महावत को नीचे गिरा दिया।

गुस्साए हाथी को काबू करने के लिए दमकल से लेकर पुलिस का अमला मौके पर पहुंचा और काफी मशक्कत के बाद उसे नियंत्रित किया गया। ट्रिब्‍यून का फोटो जर्नलिस्‍ट इसी घटनाक्रम की तस्वीरें ले रहा था। इसी दौरान दिल्‍ली पुलिस का एक सिपाही मानस के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया। पत्रकारों के विरोध के बाद सिपाही को सस्‍पेंड कर दिया गया है।

11 पारिवारिक कहानियां : रिश्‍तों के जाल में उलझे कुछ किस्‍से

दुनिया और समाज चाहे जितने बदल जाएं परिवार और परिवार की बुनियाद कभी बदलने वाली नहीं है। माहेश्वर तिवारी का एक गीत है, 'धूप में जब भी जले हैं पांव, घर की याद आई !' सार्वभौमिक सच यही है। भौतिकता की अगवानी में आदमी चाहे जितना आगे बढ़ जाए, जितना बदल जाए परिवार के बिना वह रह नहीं सकता और परिवार उस के बिना नहीं रह सकता। कहा ही जाता है कि कोई भी घर छत, दीवार और दरवाजे से नहीं बनता। घर बनता है आपसी रिश्तों से।

बहुत पुराना फ़िल्मी गाना है, ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर तो मुझ से आ के मांग ले तेरी नज़र, मेरी नज़र! घर की तफ़सील की इबारतें और भी कई हैं। बस देखने की अपनी-अपनी नज़र है। इस संग्रह में संग्रहित ग्यारह कहानियों में भी परिवार का यह उतार-चढ़ाव, यह बुनावट, यह संवेदना आप को निरंतर मथती मिलेगी। बड़की दी का यक्ष प्रश्न संयुक्त परिवार की भावनाओं और ज़िम्मेदारियों की ही कहानी है। बाल विधवा बड़की दी की यातना सारे परिवार की यातना बन जाती है। चाहे मायका हो, चाहे ससुराल ! हर कोई बड़की दी का तलबगार है। सब के सब बड़की दी में अपना आसरा ढूंढ़ते हैं। लेकिन यही बड़की दी जब वृद्ध होती है तो अपना आसरा, अपनी इकलौती बेटी में ढूंढ़ती है। अपनी बेटी के प्रति वह इतनी आशक्त हो जाती है, इतनी पजेसिव हो जाती है कि उस के बिना रह नहीं पाती। उस के साथ रहने चली जाती है। तो जैसे कोहराम मच जाता है। परिवार का बना-बनाया ढांचा टूट जाता है। लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। क्या मायका, क्या ससुराल। हर कहीं बड़की दी की थू-थू होने लगती है।

और जब बड़की दी अपना सब कुछ बेटी के नाम लिख देती है तो जैसे तूफान-सा आ जाता है। और बड़की दी अकेली पड़ जाती है। बेटी को कैंसर हो जाता है। बड़की दी असहाय हो जाती है। बड़की दी का यक्ष प्रश्न में बड़की दी की यातना को बांचना किसी भी भारतीय विधवा स्त्री की यातना को बांचना है। सुमि का स्पेस कहानी में कैरियर और विवाह के बीच झूलती एक लड़की की कहानी है। सुमि कैसे तो अपने कैरियर के फेर में पड़ कर विवाह को टालती जाती है, यह परिवार के नित बदलने और युवाओं की छटपटाहट की अद्भुत कहानी है। सुमि अंततः अपना कैरियर चुनती है। न सिर्फ अपना कैरियर चुनती है बल्कि अपनी बहन को भी खींच लाती है। इस कैरियर की दौड़ में। यह सुमि का अपना स्पेस है जहां परिवार भौचक हो कर खड़ा ताकता रहता है और वह आगे बढ़ जाती है। संगम के शहर की लड़की भी शादी के छल-कपट की मारी हुई है।

दहेज और पुरुष के दूसरे विवाह की यातना की मारी यह लड़की पारिवारिक अदालत में चक्कर लगाने को मजबूर हो जाती है। सिंदूर लगाते ही तलाक के दंश का दाहक विवरण अगर पढ़ना हो तो संगम के शहर की लड़की को पढ़ा जा सकता है। सूर्यनाथ की मौत कहानी में संयुक्त परिवार जैसे एक बार फिर लौटता है। परिवार के बच्चे एक साथ दिल्ली घूम रहे हैं सूर्यनाथ के साथ। सूर्यनाथ की प्राथमिकताएं गांधी की हत्या की जगह बिरला भवन, राष्ट्रपति भवन, नेशनल म्यूजियम आदि हैं तो बच्चों की प्राथमिकता पर मेट्रो और माल हैं। परिवार के मुखिया और बच्चों की सोच में बदलाव और प्राथमिकता की जो धड़कन है, बाज़ार और मूल्यों की जो मार है वह एक साथ सूर्यनाथ की मौत में उपस्थित हैं। घोड़े वाले बाऊ साहब एक निःसंतान दंपति की कथा तो है ही, सामंती अवशेष और उस की ऐंठ की पड़ताल भी इस कहानी में दिलचस्प है।

मन्ना जल्दी आना परिवार की ऐसी त्रासदी में डूबी कहानी है जो सरहदें लांघती मिलती है। अब्दुल मन्नान देश-दर- देश बदलते हैं एक साज़िश का शिकार हो कर लेकिन अगर वह भारत देश से फिर भी जुड़े रहते हैं तो वह परिवार और पारिवारिक विरासत के ही चलते। यहां तक कि तोता भी उन के परिवार का अटूट हिस्सा बन जाता है। मन्ना जल्दी आना में तमाम यातनाओं और मुश्किलों के बावजूद परिवार कैसे तो एकजुट रहता है। यह देखना अविरल अनुभव है। संवाद कहानी में पिता, पुत्र और विमाता के अर्तंसंघर्ष की कड़वी टकराहट है। कैसे दो पीढ़ियों का टकराव जिसे हम जनेरेशन गैप भी कह सकते हैं संवाद में हमारे रु-ब-रु है। तो भूचाल कहानी में एक मां और बेटे का संघर्ष, महत्वाकांक्षा, अपेक्षा और कुढ़न की अजीब कैफियत है।

जब मां कहती है कि बलात्कार से पैदा हुआ बेटा, बेटा नहीं होता ! तो उस मां की यातना, उस की तड़प का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। लेकिन परिवार तो परिवार है। वह टूटता है तो जुड़ता भी है। हर परिवार की यही कहानी है। राम अवतार बाबू कहानी में तो जीव-जंतु भी कैसे तो परिवार के अभिन्न सदस्य बन जाते हैं, देख कर कौतूहल होता है, आश्चर्य होता है। कन्हई लाल की मुश्किलें और हैं तो मेड़ की दूब की जिजीविषा और संघर्ष का ताना-बाना और है। सूखे का मारा पूरा गांव और परिवार का जीवन इस कहानी की इस इबारत में बांचा जा सकता है, ‘हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी ! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो जिंदगानी है। और यह बज्जर सूखा सदा थोड़े ही रहेगा। इन ग्यारह पारिवारिक कहानियों के सारे रेशे, सारे तनाव और सारी भावनाएं परिवार की खुशियों, परिवार की अनिवार्यता और उसके तनाव से ही जुड़े हुए हैं। आमीन !

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

दनपा
पुस्तक मेले में जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली के स्टाल पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

सात प्रेम कहानियां : मासूम दिलों के निश्‍छल प्‍यार की कथा

अकथ कहानी प्रेम की। तो कबीर यह भी कह गए हैं कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय! कबीर के जीवन में दरअसल प्रेम बहुत था। जिस को अद्वितीय प्रेम कह सकते हैं। उन की जिंदगी का ही एक वाकया है। कबीर का विवाह हुआ। पहली रात जब कबीर मिले पत्नी से तो पूछा कि क्या तुम किसी से प्रेम करती हो? पत्नी भी उन की ही तरह सहज और सरल थीं। दिल की साफ। सो बता दिया कि हां। कबीर ने पूछा कि कौन है वह। तो बताया पत्नी ने कि मायके में पड़ोस का एक लड़का है।

कबीर बोले फिर चलो तुरंत तुम्हें मैं उस के पास ले चलता हूं और उसे सौंप देता हूं। पत्नी बोलीं, तुम्हारी मां नाराज हो जाएंगी। तो कबीर बोले, नहीं होंगी। और जो होंगी भी तो मैं उन्हें समझा लूंगा। पत्नी बोलीं, लेकिन बाहर तो बहुत बारिश हो रही है। भींज जाएंगे। कबीर ने कहा होने दो बारिश। भींज लेंगे। पत्नी बोलीं, बारिश बंद हो जाने दो, सुबह चले चलेंगे। कबीर बोले नहीं फिर तो लोग कहेंगे कि रात बिता कर आई है। सो अभी चलो ! पत्नी बोलीं, और अगर उस लड़के ने नहीं स्वीकार किया मुझे तो? कबीर बोले तो क्या हुआ, मैं तो हूं न ! तुम्हें वापस लौटा लाऊंगा। पत्नी बोलीं, अरे, इतना परेम तो वह लड़का भी मुझे नहीं करता। और कहा कि मुझे कहीं नहीं जाना, तुम्हारे साथ ही रहना है।

कबीर और उन की पत्नी जैसा यह निश्छल प्रेम अब बिसरता जा रहा है। यह अकथ कहानी अब विलुप्त होती दिखती है। आई लव यू का उद्वेग अब प्यार का नित नया व्याकरण, नित नया बिरवा रचता मिलता है। प्यार बिखरता जाता है। प्यार की यह नदी अब उस निश्छल वेग को अपने आगोश में कम ही लेती है। क्यों कि प्यार भी अब शर्तों और सुविधाओं पर निसार होने लगा है। गणित उस का गड़बड़ा गया है। प्यार की केमेस्ट्री में देह की फिजिक्स अब हिलोरें मारती है और उस पर हावी हो जाती है। लेकिन बावजूद इस सब के प्यार का प्याला पीने वाले फिर भी कम नहीं हैं, असंख्य हैं, सर्वदा रहेंगे। क्यों  कि प्यार तो अमिट है। प्यार की इन्हीं अमिट कथाओं को इस संग्रह में संग्रहित कुछ कहानियां बांच रही हैं। इन कहानियों की तासीर और व्यौरे अलग-अलग हैं जरूर लेकिन आंच और प्याला एक ही है। वह है प्यार।

मैत्रेयी की मुश्किलें कहानी का ताप और उस की तपिश उसे हिंदी की अनन्य कहानी बना देती है। बर्फ में फंसी मछली की आकुलता प्रेम के हाइटेक होने का एक नया बिरवा रचती है। एक जीनियस की विवादास्पद मौत में प्रेम का एक नया रस और आस्वाद है जो अवैध संबंधों की आग में दहकता और भस्म होता मिलता है। फोन पर फ़्लर्ट आज के जीवन और प्रेम का दूसरा सच है। प्रेम कैसे देह की फितरत में तब्दील हुआ जाता है, इन कहानियों का एक प्रस्थान बिंदु यह भी है। मैत्रेयी की मुश्किलें, बर्फ़ में फंसी मछली, एक जीनियस की विवादास्पद मौत और फ़ोन पर फ़्लर्ट कहानियां अगर एडल्ट प्रेम में नहाई कहानियां हैं तो सुंदर भ्रम, वक्रता और प्रतिनायक मैं जैसी कहानियां टीनएज प्रेम के पाग में पगलाई, अकुलाई और अफनाई कहानियां है।

इन कहानियों की मांस-मज्जा में प्रेम ऐसे लिपटा मिलता है जैसे किसी लान में कोई गोल-मटोल अकेला खरगोश। जैसे कोई फुदकती गौरैया, जैसे कोई फुदकती गिलहरी। जीवन में परेम का यह अकेला खरगोश कैसे किसी की जिंदगी में एक अनिर्वचनीय सुख दे कर उसे कैसे तो उथल-पुथल में डाल देता है, तो भी यह किसी फुदकती गौरैया या गिलहरी की सी खुशी और चहक किसी भी प्रेम की जैसे अनिवार्यता बन गया है। प्रेम की पवित्रता फिर भी जीवन में शेष है। प्रेम की यह पवित्राता ही उसे दुनिया में सर्वोपरि बनाती है। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर मौजू है यहां:

मैं तो चुपचाप तेरी याद मैं बैठा था
घर के लोग कहते हैं, सारा घर महकता था।

जीवन में प्रेम इसी पवित्रता के साथ सुवासित रहे। ऐसे ही चहकता, महकता और बहकता रहे। सात जन्मों के फेरे की तरह। तो क्या बात है !

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

दनपा
पुस्तक मेले में जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली के स्टाल पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

सिनेमा सिनेमा : बड़़े पर्दे के सरोकार को बताती एक पुस्‍तक

सिनेमा के सच और समाज के सच जैसे एक दारुण सच बन गए हैं। लगता ऐसे है जैसे सिनेमा न हो तो जीवन न हो। जीवन का एक विकट सच यह भी है कि हमारे भारतीय समाज में, दुनिया में हिंदी अगर आज तमाम दुश्वारियों के बावजूद सर उठा कर खड़ी है तो उस में हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा योगदान है। सोचिए कि अगर हिंदी सिनेमा हिंदीमय और बाज़ार न हो तो हिंदी कौन बोलेगा? कौन सुनेगा? रोजगार से हिंदी गायब है, अदालतों से, विधाई कार्यों से, ज्ञान-विज्ञान से और तमाम हलकों में हिंदी का नामलेवा कोई नहीं है। ऐसे में हिंदी सिनेमा और उस का संगीत हिंदी की अप्रतिम ताकत है।

गरज यह है कि सिनेमाई सरोकार हमारे जीवन की धड़कन बन चले हैं। खाना, ओढ़ना, पहनना, रहना, जीना यानी जीवन के सारे रंग, रस और रोमांच जैसे सिनेमाई सरोकारों ने ज़ब्त कर लिए हैं। अमिताभ बच्चन बताते हैं कि उन के बाबू जी हरिवंश राय बच्चन कहते थे कि हिंदी फ़िल्में पोयटिक जस्टिस देती हैं। कहीं सच भी लगता है। क्यों कि सेल्यूलाइड के परदे पर अन्याय की सारी इबारतों को मिटा कर नायक सत्यमेव जयते एक बार लिख तो देता ही है। जीवन में यह संभव हो, न हो लेकिन सिनेमा में सब कुछ संभव है।

इस किताब में सिनेमा के कुछ नायकों, नायिकाओं का बड़े मन से ज़िक्र किया गया है। उन के काम को ले कर चर्चा की गई है। उन की अदा, उन के अभिनय में सराबोर कुछ लेख यहां अपने पूरे ताप में उपस्थित हैं। तो कुछ लेखों में सिनेमाई सरोकार, उन की प्रवृत्तियां और उन के लाग लपेट का व्यौरा है। जैसे सिनेमा हमारे जीवन की धड़कन है, फैंटेसी होते हुए भी हमारे जीवन का एक सच है, सच होते हुए भी हमारे जीवन का मनोरंजन है, मनोरंजन होते हुए भी हमारे जीवन का रंग और रस है। ठीक वैसे ही इस किताब में उपस्थित तमाम लेखों में सिनेमा का सच, सिनेमा का जीवन, सिनेमा का रस और उस का सौंदर्य, उस का संघर्ष बार-बार रेखांकित हुआ है। जैसे समाज में सब कुछ अस्त-व्यस्त और पस्त है वैसे ही सिनेमा और सिनेमाई व्याकरण भी अब अस्त-व्यस्त और पस्त है।

कभी बनती थी दो आंखें बारह हाथ, मदर इंडिया या मुगले आज़म, लेकिन अब दबंग, गैग्स आफ़ वासेपुर, डेढ इश्किया और जय हो जैसी हिंसा और सेक्स से सराबोर फ़िल्में हैं। कभी बनती थीं उमराव जान और लोग उस की गज़लें गुनगुनाते थे पर अब तो फ़िल्में जैसे हिंसा और सेक्स की चाश्नी में लथपथ हैं, सराबोर हैं। गीत-संगीत जैसे नदी के इस पार, उस पार बन गए हैं। गुलज़ार, श्याम बेनेगल, शेखर कपूर, मुज़फ़्फ़र अली, गोविंद निहलानी, केतन मेहता, एन. चंद्रा, भीमसेन, सागर सरहदी, सुधीर मिश्रा जैसे निर्देशक अब जाने कहां बह-बिला गए हैं। अब तो कुछ और ही है। संजीव कुमार, सुचित्रा सेन, नूतन जैसे लोगों की अदायगी की याद अब बस याद ही रह गई है। सब कुछ करिश्माई सिनेमा, हिंसा और क्रूर गीत-संगीत में डूब गया है।

मुज़फ़्फ़र अली ने डेढ़ दशक पहले ही मुझ से एक इंटरव्यू में कहा था कि हम व्यावसायिकता की मार में खो गए हैं। और अब तो परिदृश्य बहुत बदल चुका है। समाज और सिनेमा दोनों का। ऐसे में जब हमारा सिनेमा 100 साल का हो गया है तो इस किताब के मायने बढ जाते हैं। सिनेमा की बात हो और बोलना-बतियाना न हो यह भला कैसे संभव है? तो कई सारे इंटर्व्यू भी हैं इस किताब में। इस में गायक भी हैं, संगीतकार भी और अभिनय की दुनिया के सरताज भी। जिन से आप मुसलसल रूबरू हो सकते हैं। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर है, 'आंख अपना मज़ा चाहे है, दिल अपना मज़ा चाहे है।' तो इस किताब के मायने इस अर्थ में भी भरपूर हैं। यानी आलेख भी और इंटरव्यू भी।

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

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लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

250 रुपए से कारोबार शुरू करने वाला यह पूर्व पत्रकार 800 करोड़ का मालिक है

नई दिल्ली : राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए नामांकन दाखिल करने वाले सभी उम्मीदवारों में सबसे अमीर बीजेपी की ओर से प्रत्याशी रविंद्र किशोर सिन्हा हैं। उनकी और उनकी पत्नी की कुल संपत्ति करीब 800 करोड़ बताई गई है। सिन्हा के नाम दर्ज संपत्ति की कीमत 564 करोड़ रुपये जबकि उनकी पत्नी के पास 230 करोड़ रुपये कीमत की संपत्ति है। सिन्‍हा चार सालों तक पटना के एक अखबार में पत्रकार भी रहे हैं। 

सेक्योरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विस (सिस) नाम की सेक्योरिटी एजेंसी के मालिक सिन्हा ने जेडीयू की ओर से राज्यसभा सांसद का चुनाव लड़ चुके महेंद्र प्रसाद को धन के मामले में पीछे छोड़ दिया है। प्रसाद के पास करीब 683 करोड़ रुपये की संपत्ति बताई गई थी। स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा पहुंच चुके विजय माल्या (615 करोड़ की संपत्ति) और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा पहुंची गुजरे जमाने की सिने स्टार जया बच्चन (493 करोड़ की संपत्ति) के पास भी रविंद्र किशोर सिन्हा जितना धन नहीं है।
 
62 साल के रविंद्र किशोर सिन्हा आरएसएस से जुड़े रहे हैं और बीजेपी से राज्यसभा के नामांकन के लिए लगातार कोशिशें कर रह थे। 1971 पटना के एक दैनिक अखबार में ट्रेनी जर्नलिस्ट के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले सिन्हा को बांग्लादेश वॉर कवर करने का मौका मिला था। सिन्हा ने 1974 में पत्रकारिता छोड़ दी। बांग्लादेश युद्ध को 'कवर' करने के दौरान उनकी मुलाकात कुछ फौजियों से हुई थी जिन्होंने उन्हें सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेस सर्विस (सिस) बनाने की सलाह दी थी।

रविंद्र किशोर सिन्हा ने महज 250 रुपये से अपना कारोबार शुरू किया था और देखते ही देखते उनकी कंपनी सैकड़ों करोड़ का कारोबार करने लगी। सेक्योरिटी फर्म के कारोबार में क्या हैसियत है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2008 में 'सिस' ने ऑस्ट्रेलियन सेक्योरिटी एजेंसी क्यूब को टेकओवर किया। (भास्‍कर)

20 पत्रकारों पर मुकदमा लादने की तैयारी

मिस्र में सरकारी वकीलों का कहना है कि 16 पत्रकार 'चरमपंथी संगठनों से संबंध रखने' और चार पत्रकार उनकी मदद करने या झूठी ख़बरें फैलाने संबंधी आरोपों का सामना कर रहे हैं. इन कुल बीस पत्रकारों में से दो ब्रिटेन, एक हालैंड और एक ऑस्ट्रेलिया का पत्रकार है. समझा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया के वो पत्रकार पीटर ग्रेस्ट हैं, जो अल-जज़ीरा के संवाददाता हैं.

इससे पहले, बीबीसी समेत अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ नेटवर्क्स ने अल-जज़ीरा के पांच पत्रकारों की रिहाई की मांग की थी. बाकी 16 पत्रकार मिस्र के ही हैं जिन पर एक चरमपंथी संगठन से संबंध रखने, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक शांति को नुक़सान पहुंचाने तथा अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए चरमपंथ को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करने जैसे कई आरोप हैं.

चार विदेशी पत्रकारों पर मिस्र के पत्रकारों के साथ सूचना, उपकरण, धन संबंधी सहयोगी करने, ग़लत सूचना प्रसारित करने और ऐसी अफ़वाहें फैलाने का आरोप है जिनसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश जाए कि मिस्र में गृह युद्ध के हालात हैं. सरकारी वकीलों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इन बीस में से आठ पत्रकार हिरासत में हैं जबकि 12 अन्य गिरफ़्तारी वॉरंट जारी होने के बावजूद फ़रार हैं.

बयान में किसी का नाम नहीं लिया गया है लेकिन इतना अवश्य कहा गया है कि चार विदेशी संवाददाता क़तर के अल-जज़ीरा नेटवर्क के लिए काम करते थे. वहीं अल-जज़ीरा के समाचार संकलन विभाग की प्रमुख हेदर एलन का कहना है, ''हम केवल इतना जानते हैं कि पांच लोग जेल में हैं. हमें नहीं पता कि आरोप क्या हैं. इस समय चीजें स्पष्ट नहीं हैं. हम अब भी बातें स्पष्ट होने का इंतज़ार कर रहे हैं.''

ग़ौरतलब है कि पीटर ग्रेस्ट ने उन्हें बिना किसी आरोप के हिरासत में रखे जाने के ख़िलाफ़ अपील की थी जिसे काहिरा की एक अदालत ने बुधवार को ख़ारिज़ कर दिया था. एक होटल के कमरे से अवैध तरीक़े से प्रसारण करने के आरोप में मिस्र के गृह मंत्रालय ने बीते साल दिसम्बर में अल-जज़ीरा के पत्रकारों और कर्मचारियों को गिरफ़्तार किया था. इस पर अल-जज़ीरा की ओर से कहा गया था कि उसके पत्रकार महज़ मिस्र के हालात पर रिपोर्टिंग कर रहे थे.

एक महीने पहले जिन तीन पत्रकारों को गिरफ़्तार किया गया था, उनमें ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार पीटर ग्रेस्ट भी शामिल थे. उन पर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों से बात करके 'चरमपंथियों' के साथ सहयोग करने का आरोप है. मुस्लिम ब्रदरहुड पर सैन्य समर्थित सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है. अल-जज़ीरा के काहिरा ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद फ़ाहमी और मिस्र के प्रोड्यूसर बहर मोहम्मद पर मुस्लिम ब्रदरहुड की सदस्यता का कहीं अधिक गंभीर आरोप है.

अल-जज़ीरा नेटवर्क का कहना है कि मिस्र के अधिकारियों ने जब उसके संवाददाताओं को गिरफ़्तार किया तो उसे बड़ी 'हैरानी' हुई. उसके दो अन्य कर्मचारी- पत्रकार अब्दुल्लाह अल-शमी और कैमरामैन मोहम्मद बद्र को बीते साल जुलाई-अगस्त में गिरफ़्तार किया गया था. बीबीसी, स्काई और डेली टेलीग्राफ़ अख़बार सहित अन्य समाचार संगठनों ने बुधवार को एक न्यूज़ कॉन्फ्रेंस करके मिस्र में पकड़े गए सभी पत्रकारों को फ़ौरन रिहा किए जाने की मांग की है. (बीबीसी)

रीडरशिप घटाने वाला सर्वे जागरण को मंजूर नहीं

नई दिल्ली। देश के सभी समाचार पत्रों के बीच दैनिक जागरण ने लगातार 26वीं बार पहले पायदान पर अपना कब्जा बरकरार रखा है। हालांकि, आइआरएस के जून-दिसंबर, 2013 सर्वेक्षण के मुताबिक देश के ज्यादातर अखबारों की रीडरशिप घटी है, लेकिन बावजूद इसके दैनिक जागरण को देश का नंबर एक अखबार घोषित किया गया है।

आइआरएस की ओर से सर्वेक्षण एजेंसी एसी नील्सन ने यह जो सब्जबाग दिखाया था कि वह कंप्यूटरीकृत वैज्ञानिक आधार पर सर्वे करेगी उस पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यही कारण है कि दैनिक जागरण सर्वेक्षण की प्रक्रिया और उसके नतीजों का विरोध करता है। इस सर्वेक्षण में रीडरशिप को लेकर बहुत विसंगतियां है और वह सर्कुलेशन की वास्तविकता को नकारता है, जबकि सर्कुलेशन ही रीडरशिप का मूल आधार और उसकी आत्मा होता है।

आइआरएस-2013 के सर्वेक्षण में जो वास्तविक स्थिति दिखाने की कोशिश की गई है वह हकीकत से बड़ी हद तक दूर है। सर्वेक्षण के नतीजों ने अखबारों के सर्कुलेशन को हाशिये पर ले जाने का काम किया है। सर्वेक्षण के लिए जो पद्धति अपनाई गई है उस पर सवालिया निशान इसलिए लग गए हैं, क्योंकि वह इस नतीजे पर पहुंचता है कि किसी शहर में एक अखबार की एक प्रति को तो 10-12 लोग पढ़ते हैं, लेकिन दूसरे अखबार की एक प्रति को महज दो-तीन लोग और वह भी उसे जो उस शहर का शीर्ष अखबार है।

बतौर उदाहरण कानपुर में दैनिक जागरण की एक प्रति को पढ़ने वालों की संख्या दो ही बताई गई है। वहीं प्रतिद्वंद्वी अखबार की एक प्रति को पढ़ने वालों की संख्या 11 बताई गई है। यही विसंगति वाराणसी में भी है। यहां दैनिक जागरण की एक प्रति पढ़ने वालों की औसत संख्या 2.6 बताई गई है और प्रतिद्वंद्वी अखबार की एक प्रति को 4.8 पाठक दिए गए हैं। सभी राज्यों के कुछ इलाकों में इसी तरह के हास्यास्पद आकलन किए गए हैं।

कई जगहों पर निकटतम प्रतिद्वंद्वी अखबार वहां के अग्रणी अखबार का महज 30 फीसद है, लेकिन आइआरएस ने उन जगहों पर प्रतिद्वंद्वी को नंबर एक बता दिया है। इन्हीं विसंगतियों के चलते सर्वेक्षण के नतीजे सवालों के घेरे में आ गए हैं। दैनिक जागरण ने सर्वेक्षण के नतीजों पर सख्त एतराज जताया है।

दैनिक जागरण का कहना है कि आइआरएस, 2013 में उसे भले ही नंबर एक अखबार घोषित किया गया हो, लेकिन इसके बावजूद वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि यह मौजूदा समय का सबसे ज्यादा खामियों भरा सर्वेक्षण है। दैनिक जागरण सच्चाई के साथ है और इसी कारण इस सर्वेक्षण से असहमत है। (जागरण)

दरअसल दैनिक जागरण और अमर उजाला की अपनी दिक्‍कतें हैं

जिस अखबार का प्रसार ज्यादा है, अगर उसी की रीडरशिप भी ज्यादा होगी तो क्या जरूरत है, रीडरशिप सर्वे की। कोई यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि वह पिछड़ गया है। अपने अखबारों में पहले पेज पर खबर छाप रहा कि सर्वे गलत है। यह फर्जीबाड़ा है। तकनीक गलत है। कंपनी को कोई ज्ञान ही नहीं है। अरे .. .. .. कुछ नया करोगो नहीं। खुद को बदलोगे नहीं। जब पिछड़ोगे, तो हल्ला करोगे।

दरअसल दैनिक जागरण और अमर उजाला की अपनी दिक्कतें हैं। उन्हें सर्वे के सही और गलत होने से कोई लेना देना ही नहीं है। उन्हें पीड़ा सिर्फ इस बात की है कि हिन्दुस्तान आगे कैसे निकल गया। इसीलिए अन्य मामलों में स्वयं का प्रतिस्पर्धी कहने वाले अखबार अब एक हो गए हैं। दैनिक जागरण ने बुधवार के अखबार में क्या खूब तथ्य रखे हैं। वह कहता है कि दैनिक जागरण को सिर्फ दो लोग पढ़ते हैं। और दूसरे अखबार को 11 लोग कैसे पढ़ते हैं। अरे ज्ञानियों, यह पाठक पर है कि वह कौन सा अखबार पढ़ता है। वह सालों से आपका अखबार खरीद रहा है, तो वह खरीद रहा है, लेकिन पढ़ेगा भी आपका ही अखबार यह जरूरी तो नहीं।

जरा ध्यान दीजिए। प्रसार में दैनिक जागरण और अमर उजाला आगे हैं। अगर यह बात सही है तो जाहिर है कि इनके पास विज्ञापन भी ज्यादा होगा। जब विज्ञापन ज्यादा होगा तो खबरों के लिए जगह कम होगी। खबरों के लिए जगह कम होगी तो सबकी खबरें छप पाना मुश्किल होगा। जब सबकी खबरें नहीं छपेंगी तो कोई व्यक्ति आपका अखबार खरीद तो लेगा, लेकिन पढ़ेगा कि नहीं, यह कह पाना दुश्कर है। दूसरी ओर हिन्दुस्तान में इतना विज्ञापन नहीं होता। कम से कम उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों के बात करें तो। यहां अखबारों में खबरें ज्यादा रहती हैं। यानी सबकी खबरें छप जाती हैं। अगर हिन्दुस्तान में सबकी खबरें छपेंगी तो किसी व्यक्ति के यहां भले हिन्दुस्तान न आता हो, लेकिन वह किसी से मांग कर पढ़ तो जरूर लेगा। तो बताओ रीडरशिप हिन्दुस्तान की बढ़ेगी कि नहीं। शोर मचाना हो, हल्ला करना हो तो करते रहिए। पाठक बहुत समझदार है वह सब जानता है।

जरा गौर कीजिएगा, चार राज्यों के चुनाव से पहले जो एक्जिट पोल आया था, उसमें सिर्फ एसी नेलसन ने यह बताया था कि आम आदमी पार्टी को 28 सीटें तक मिल सकती हैं। इसका सबने मजाक बनाया। लेकिन जब परिणाम सामने आए तो सबकी बत्तीसी अंदर की ओर चली गई। एसी नेलसन ही कंपनी है, जिसने इस बार रीडरशिप का सर्वे किया है। अगर दो तीन अखबार मिलकर किसी सर्वे पर संदेह कर रहे हैं तो यह वाकई शर्मनाक और निंदनीय है। वही सर्वे जब आपको नम्बर वन बता देता है तब तो आप खुश हो जाते हैं और जब वही आपको पीछे दिखा देता है तो आप नाराज हो जाते हैं। ऐसा क्यों। फिर आप कहिए कि एबीसी का सर्वे भी गलत है और हम नम्बर वन नहीं हैं।

पहली बार कोई नई तकनीक इजाद होती है तो इस तरह से सवाल उठते ही हैं, जैसे उठ रहे हैं। जब पहली बार ईबीएम आया तब भी तो लोगों ने फर्जीबाडे़ की आशंका जताई थी। फिर क्या हुआ। सबने उस पर विश्वास किया और वह तकनीक आज हमारे लिए सहूलियत का विषय बन गई है। तो मित्रों सवाल उठना छोड़ो अपने आप को बदलो, क्योंकि तरक्की करनी है तो नया नजरिया तो लाना ही पड़ेगा।

हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के सीनियर कॉपी एडिटर पंकज मिश्रा के एफबी वॉल से साभार.

प्रो. निशीथ राय बने डा. शकुंतला मिश्रा विश्‍वविद्यालय के वीसी

लखनऊ। डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चेयरमैन एवं प्रोफेसर निशीथ राय ने उत्तर प्रदेश विकलांग उद्धार डा: शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय के कुलपति पद का कार्यभार मंगलवार को ग्रहण कर लिया। यह जानकारी यहां देते हुए एक सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि प्रो. राय का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा।

उल्‍लेखनीय है कि प्रो. निशीथ राय इससे पूर्व लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। इसके अलावा श्री राय केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा स्थापित रीजनल सेंटर फॉर अर्बन एण्ड इन्वायरमेन्टल स्टडीज के निदेशक पद

प्रो.निशीथ राय
पर भी कार्यरत थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए एवं पीएचडी की उपाधि प्राप्त की तथा जनवरी, 1991 से लखनऊ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया।

प्रो0 राय ने एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन व सम्पादन के साथ-साथ 13 शोध पत्रों का प्रकाशन भी किया। उन्होंने 13 बुक रिव्यू, दो दर्जन से अधिक शोध कार्य एवं ट्रेनिंग माड्यूल तैयार किए। इसके अलावा 200 से अधिक राज्य स्तरीय एवं राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन भी किया। प्रो0 राय ने लखनऊ विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, भावनगर विश्वविद्यालय, गुजरात एवं पाण्डेचेरी विश्वविद्यालय की कार्य परिषद एवं सेलेक्शन कमेटी के सदस्य के रूप में कार्य भी किया।

दैनिक जागरण के लोकल इंचार्ज ने एनबीटी के फोटोग्राफर को हड़काया

दैनिक जागरण, लखनऊ के लोकल इंचार्ज की दबंगई संस्‍थान के अंदर और बाहर दोनों जगह एक जैसे ही चालू हैं. इनकी दबंगई का सार्वजनिक मुजाहिरा नगर निगम में सदन की कार्यवाही के दौरान देखने को मिले. मंगलवार को नगर निगम के सदन के दौरान पार्षदों के बीच हुए हंगामे के दौरान एनबीटी के फोटोग्राफ्रर आशुतोष त्रिपाठी फोटो खींच रहे थे. ये जनाब बार बार आशुतोष के सामने आकर अपने मोबाइल से फोटो क्लिक कर रहे थे. 

आशुतोष ने जब इनसे थोड़ा हटने की गुजारिश करते हुए कहा कि हट जाइए फोटो के फ्रेम में आप आ रहे हैं. तो इन्‍होंने कई बार उसकी गुजारिश को अनसुना करके अपने मोबाइल से फोटो खिंचते रहे. आशुतोष ने जब जोर से कहा तो यह भड़क गए तथा उसकी औकात बताने लगे. हुआ कुछ यूं कि दैनिक जागरण के लोकल इंचार्ज अजय श्रीवास्तव ने हाल ही में एक नया फोन लिया है, जिसमें इन्होंने व्हाट्स एप डाउनलोड किया है. इसी मोबाइल के सहारे ये हर जगह खुद ही फोटो खीचने लगते हैं, जबकि उनके अखबार के फोटोग्राफर मौके पर मौजूद रहते हैं.  

नगर निगम में हंगामे के दौरान जब इनसे एनबीटी के फोटोग्राफर ने कहा कि आपका फोटोग्राफर मौजूद है, वो फोटो खींच रहा है. आप थोड़ा किनारे हट जाइये तो मैं फोटो खीच सकूं. इस पर लोकल इंचार्ज महोदय तमतमा गए. फोटोग्राफर की ऐसी तैसी करते हुए कहने लगे कि जानते हो किससे बात कर रहे हो. मैं दैनिक जागरण का चीफ रिपोर्टर हूं. तुम्‍हारी औकात क्या है मेरे सामने? इसके बाद  उन्होंने फोटोग्राफर का हाथ पकड़ लिया तथा कहने लगे अभी दिखाता हूं मै क्या हूं.  मौके पर मौजूद अन्‍य अखबारों के फोटोग्राफरों ने बीच बचाव किया तब जाकर मामला शांत हुआ. हालात कुछ इस तरह हो गए थे कि हाथापाई की नौबत आ गई थी.

हालांकि अजय श्रीवास्‍तव केवल बाहर ही इस तरह का व्‍यवहार नहीं करते बल्कि ऑफिस के अंदर भी इनका व्‍यवहार इसी तरह का होता है. इसी का परिणाम है कि ज्‍यादातर रिपोर्टर जागरण को अलविदा कहकर दूसरे संस्‍थानों में जा चुके हैं. तमाम रिपोर्टर दूसरे संस्‍थानों में जुगाड़ खोज रहे हैं. रिपोर्टरों की नाराजगी संपादक दिलीप अवस्‍थी तक भी पहुंच चुकी है, इसलिए वे प्रत्‍येक कर्मचारी से व्‍यक्तिगत रूप से मिलकर उसकी समस्‍याओं के बारे में पूछताछ कर रहे हैं.

आईआरएस 2013 IRS 2013 : बनारस में हिंदुस्‍तान ने जागरण को पछाड़ा

आईआरएस के सर्वे में सबसे बुरी ख‍बर दैनिक जागरण के लिए आई है. लांचिंग के बाद से बनारस में नम्‍बर एक रहे अखबार को हिंदुस्‍तान ने खिसका कर दूसरे स्‍थान पर कर दिया है. दैनिक जागरण में जहां विजन की कमी और गुटबाजी हावी रही वहीं हिंदुस्‍तान की टीम एकजुट होकर काम में जुटी रही. बनारस दैनिक जागरण के गढ़ के रूप में जाना जाता रहा है. अमर उजाला, हिंदुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्‍स के आने के बाद भी दैनिक जागरण को उसकी गद्दी से कोई उतार नहीं पाया था, परंतु 2013 के चौथी तिमाही में जागरण का राज खतम हो गया.

बनारस में हिंदुस्‍तान अखबार को नंबर एक पर पहुंचाने का श्रेय पूर्व संपादक मनोज पमार को है तो दैनिक जागरण को दूसरे स्‍थान पर खिसकाने का श्रेय आशुतोष शुक्‍ला को दिया जा सकता है. मनोज पमार ने पब्लिक कनेक्‍ट अभियान चलाकर लोगों को हिंदुस्‍तान से जोड़ा तो दैनिक जागरण के संपादक ऐसा कोई अभियान नहीं चला सके. दूसरे मनोज पमार बिखरी हुई टीम को एकजुट किया तो आशुतोष शुक्‍ल ने एकजुट टीम को बिखेर दिया. इसका परिणाम रहा कि हिंदुस्‍तान ने दैनिक जागरण को पीछे छोड़कर नम्‍बर एक पर पहुंच गया है.

हिंदुस्‍तान में बिना भेदभाव के सबको जिम्‍मेदारी सौंपी गई तो दैनिक जागरण में पुराने संपादक के लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया. सूत्रों का कहना है कि इसी के चलते दैनिक जागरण पहली बार दूसरे नंबर पर खिसका है. राघवेंद्र चड्ढा के समय में जो टीम एकजुट होकर अखबार को नम्‍बर एक पर बनाए रखा, उसके बिखरने की कीमत दूसरे नंबर पर पहुंच कर चुकानी पड़ी है. सूत्र बता रहे हैं कि पद्म पुरस्‍कारों के दौरान भी एक पत्रकार को संपादक आशुतोष शुक्‍ल ने दो दिन की छुट्टी पर भेज दिया जबकि वह बीट उस रिपोर्टर की थी ही नहीं.

आईआरएस 2013 IRS 2013 : चौथे स्‍थान पर पहुंचा राजस्‍थान पत्रिका

जयपुर। आज का दिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए ऎतिहासिक है, जब इन दोनों प्रदेशों ने एक नए प्रदेश को जन्म दिया है। यह नया प्रदेश एक नई सोच और आम आदमी के विश्वास का प्रतीक है। भारतीय पाठक सर्वेक्षण की मंगलवार को मुम्बई में जारी वर्ष 2013 की नवीनतम रिपोर्ट में "पत्रिका" ने मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में अपनी ऎतिहासिक सफलता का परचम लहराते हुए वृद्धि के आंकड़ों में शेष सभी अखबारों को पीछे छोड़ दिया है।

वर्ष 2012 की अंतिम तिमाही की तुलना में वर्ष 2013 में पत्रिका डबल से भी अधिक हो गया है। पत्रिका ने इस अवधि में अपनी पाठक संख्या में 124 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की है, जो कि देश के हिन्दी समाचार पत्रों में सर्वाधिक है, जबकि मध्यप्रदेश का सिरमौर कहलाने वाला अखबार अपने 11 प्रतिशत पाठक खोकर देश में तीसरे स्थान पर लुढ़क गया है।

सफलता की इस दौड़ में "राजस्थान पत्रिका" ने भी झण्डे गाड़ने का सिलसिला बनाए रखा है। राजस्थान पत्रिका अपने पाठकों की संख्या 12 प्रतिशत बढ़ाते हुए देश के शीर्ष दस हिन्दी अखबारों की सूची में अब चौथे स्थान पर आ गया है। आईआरएस 2012 की चौथी तिमाही में इसका स्थान पांचवां था।

पत्रिका समूह की यह सफलता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि देशभर में कई अखबारों की पाठक संख्या घट रही है। शीर्ष दस हिन्दी अखबारों में दैनिक भास्कर सहित छह समाचार पत्र ऎसे हंै, जिनकी पाठक संख्या में गिरावट आई है। इस अवधि में इन अखबारों को 50 लाख 94 हजार पाठकों से हाथ धोना पड़ा है। जिन चार अखबारों के पाठक बढ़े हैं, उनमें पत्रिका समूह के दोनों समाचार पत्र शामिल हैं, जिन्होंने 33 लाख 88 हजार नए पाठक जोड़े हैं।

पत्रिका समूह के अखबारों की बढ़ती लोकप्रियता मीडिया विश्लेषकों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है। दूसरी ओर, अंग्रेजी समाचार पत्रों की हालत तो और भी बुरी है। देश के शीर्ष दस अंग्रेजी अखबारों में से मात्र चार ही ऎसे हैं, जो 13 से 32 हजार तक नए पाठक जोड़ पाए हैं।

शेष सभी की पाठक संख्या गिर गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में "पत्रिका" की पाठक संख्या में तेज वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि पाठक निष्पक्ष, गंभीर और मुद्दे आधारित पत्रकारिता के हिमायती हैं। पत्रिका की बेबाक कलम अन्याय, अत्याचार, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिना किसी दबाव के निरंतर चलती रही। हाल ही सम्पन्न विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी निष्पक्षता के कारण "पत्रिका" पाठकों की पहली पसंद बन गया।

चुनाव में "पत्रिका" की सकारात्मक भूमिका को देखते हुए राष्ट्रपति ने पिछले दिनों पत्रिका को राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार भी प्रदान किया है। दूसरी ओर, जिन अखबारों ने वास्तविक पत्रकारिता से मुंह मोड़कर "चटपटेपन" का सहारा लिया, पाठक उनका साथ छोड़ते चले गए। जिन अखबारों ने राजनीतिक दलों से जुड़कर या बिजनेस हित में निष्पक्षता त्याग दी, वे पाठकों के दिल से भी उतर गए।"पत्रिका" के खाते में एक उपलब्घि यह भी जाती है कि इस वर्ष यह देश के दस शीर्ष हिन्दी अखबारों की सूची में न सिर्फ शामिल हो गया है, बल्कि इसमें छठा स्थान हासिल कर लिया है।

इतने सारे पाठकों का पत्रिका से जुड़ना अपने आप में एक नए प्रदेश के जन्म जैसा ही है। ऎसा प्रदेश जिसका हर नागरिक अपने कत्तüव्यों के प्रति जागरूक है। जो स्थानीय समस्याओं के प्रति संवेदनशील है। जो प्रदेश के विकास को लेकर सक्रिय है। और जो एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्द्र की भावना रखता है। यही तो है हमारी कल्पनाओं का प्रदेश। पत्रिका के पाठकों का अपना प्रदेश।

उम्मीदों का यह कारवां एक समाचार पत्र से कहीं आगे बढ़ कर हमारी जिन्दगी ही बन गया है। यह सब आप सुधि पाठकों के समर्थन और विश्वास के कारण ही संभव हुआ है। पाठकों का यही विश्वास वो ऊर्जा है जिसके दम पर पत्रिका आज इस मुकाम पर पहुंचा है। इस सफलता से पत्रिका ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाठकों के दिल में एक खास जगह बनाई है। हम अपने पाठकों के इस स्नेह से अभिभूत हैं और उनके प्रति अपना कोटि-कोटि आभार व्यक्त करते हैं। (पत्रिका)

आईआरएस 2013 IRS 2013 : यूपी में दूसरे स्‍थान पर पहुंचा हिंदुस्‍तान

आम चुनाव अभी चंद महीने दूर हैं लेकिन पाठकों की पसंद के आधार पर जिन हिन्दी अखबारों का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है उस सर्वे के नतीजे आ गए हैं। ‘हिन्दुस्तान’ ने दौर-दर-दौर अपनी पाठक संख्या को बढ़ाते जाने वाले इकलौते हिन्दी दैनिक के तौर पर शानदार प्रदर्शन जारी रखा है।

‘हिन्दुस्तान’ की औसत अंक पाठक संख्या पिछले दौर से 20 लाख बढ़कर अब 1.42 करोड़ हो गई है। रिसर्च एजेंसी एसी नीलसन तथा एमआरसीयू द्वारा आयोजित नवीनतम आईआरएस सर्वे (आईआरएस क्यू4 2013) में औसत अंक पाठक संख्या के परिणामों के मुताबिक ‘हिन्दुस्तान’ एक पायदान और आगे बढ़कर पूरे भारत में दूसरे नंबर पर आ गया है।

जबकि ‘हिन्दुस्तान’ के प्रतियोगी अखबारों दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर तथा अमर उजाला की पाठक संख्या में इस अवधि में कमी दर्ज की गई है। प्रिय पाठकों, ये नतीजे आपके सहयोग का परिणाम हैं। आपने हमारे तथ्यों, पत्रकारिता के उच्चस्तरीय मानदंडों को हमेशा सराहा और तरक्की की राह दिखाने वाले अखबार के जरिए सेवा करने का मौका दिया है। पिछले तीन साल में हमने पाठक संख्या में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की है। ‘हिन्दुस्तान’ की पाठक संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और आईआरएस सर्वे के नवीनतम दौर में हमने उत्तराखंड में पहले स्थान पर कब्जा कर लिया है। उत्तर प्रदेश में हम दूसरे स्थान पर आ गए हैं जबकि बिहार और झारखंड में हमारा पहला स्थान बरकरार है।

दिल्ली में ‘हिन्दुस्तान’ 8.3 लाख पाठकों की औसत अंक पाठक संख्या के साथ दूसरे स्थान पर बना हुआ है। पाठक संख्या में हुई तीव्र वृद्धि पिछले तीन वर्षों में अखबार द्वारा चलाए गए विस्तार अभियान का परिणाम है और पाठकों ने मौजूदा दैनिक अखबारों की तुलना में हमारे तथ्य तथा अनूठेपन को सराहा है। आर्थिक परिदृश्य पर मंदी के बादल छाने के बावजूद ‘हिन्दुस्तान’ ने राज्य के सभी प्रमुख शहरों में जोरदार तेजी दर्ज कराई है जबकि ज्यादातर शहरों में प्रतियोगियों की पाठक संख्या में कमी आई है।

उत्तर प्रदेश में ‘हिन्दुस्तान’ ने एक नई ऊंचाई को छुआ है और 29.7 लाख पाठकों को अपने साथ जोड़ा है। अब उत्तर प्रदेश में हम 72 लाख पाठक संख्या के साथ दूसरे स्थान पर आ गए हैं जबकि राज्य में लंबे समय से दूसरे स्थान पर काबिज अमर उजाला को 8.45 लाख पाठकों का नुकसान उठाना पड़ा है। (हिंदुस्‍तान)

दैनिक जागरण ने हड़पे फोटोग्राफर के पैसे

दैनिक जागरण पत्रकारों के शोषक के रूप में पहले से ही जाना जाता रहा है. अब लखनऊ से खबर है कि मैनेजमेंट ने एक फोटोग्राफर का भी लगभग दस हजार रुपए मार लिया है. उक्‍त फोटोग्राफर से दो महीने काम कराया गया और जब पैसा देने की बात आई तो उसे हटा दिया गया. फोटोग्राफर कई बार प्रबंधन के वरिष्‍ठ लोगों से मिलकर अपने साथ हुए अन्‍याय की गुहार कर चुका है, परंतु मोटी चमड़ी वाले प्रबंधन पर इसका कोई असर नहीं है.

जानकारी के अनुसार बबलू शर्मा ने लगभग तीन माह पूर्व दैनिक जागरण में फोटोग्राफर के पर पर ज्‍वाइन किया था. हालांकि उसको ज्‍वाइन कराने के बाद भी ज्‍वाइनिंग लेटर नहीं दिया गया. अमूमन जागरण में ज्‍यादातर नियुक्तियां मुंहजबानी ही की जाती हैं ताकि शोषण का दौर चालू रखा जा सके. ऐसा ही इस फोटोग्राफर के साथ प्रबंधन ने किया. बताया जा रहा है कि एक महीना पूरा होने पर जब फोटोग्राफर ने अपनी सैलरी के बारे में पूछा तो उसे कागजी कार्रवाई का आश्‍वासन देकर मामले को टाल दिया गया.
 
हालांकि इसके बाद फोटोग्राफर बबलू शर्मा को प्रताडित करने का दौर भी शुरू हो गया. उसे एक ही टाइम पर दो से तीन असाइनमेंट सौंपे जाने लगे. बबलू किसी तरह मैनेज करके सारे असाइनमेंट पूरा करते रहे, लेकिन जब दो महीने पूरे होने के बाद भी उनकी सैलरी नहीं मिली तो उन्‍होंने प्रबंधन से पूछा. फिर आश्‍वासन देकर टाल दिया गया. बताया जा रहा है कि यह सब लोकल इंचार्ज की शह पर किया जा रहा था, क्‍योंकि एक बार बबलू ने सभासदों के एक कार्यक्रम में खाने के दौरान गलती से उनका भी फोटो खींच लिया था, जिससे वे कुपित हो गए थे और फोटो भी डिलीट करवा दी थी.

खैर, दो महीना पूरा होने के बाद भी जब बबलू को पैसा नहीं मिला तो उन्‍होंने हारकर दैनिक जागरण जाना ही बंद कर दिया. प्रबंधन ने उन्‍हें सैलरी की बजाय फोटो के हिसाब से रकम देने की बात कही. इस हिसाब से भी बबलू ने दो महीने में साढ़े नौ हजार रुपए बने. परंतु यह रकम दैनिक जागरण ने बबलू को नहीं दी. वे अब भी अपने पैसे के लिए जागरण के लोगों के पास भटक रहे हैं. अब देखना है कि दैनिक जागरण प्रबंधन एक गरीब फोटोग्राफर को उसके मेहनत का पैसा देता है या उस रकम को हड़प कर खुद को और अमीर बनाता है.