हर आदमी पत्रकार है. यह सोशल मीडिया का नारा है. और, इस चक्कर में कुछ घनचक्कर ऐसी ऐसी हरकत कर रहे हैं कि आप अपना माथा पीट लें. बांग्लादेश में पिछले दिनों हिंसा और उपद्रव के दौरान एक टीवी पत्रकार को पीटने की तस्वीर रायटर एजेंसी ने रिलीज की. इस तस्वीर को कई वेबसाइट्स, अखबारों, चैनलों ने अपने यहां प्रचारित प्रसारित किया. बांग्लादेश में शांति स्थापना के बाद लोग इसे भूलने लगे. पर मुजफ्फरनगर कांड के बाद कुछ लोग मुस्लिमों के खिलाफ घृणा व नफरत का माहौल क्रिएट करने के लिए इसी तस्वीर का सहारा ले रहे हैं.
ओरीजनल फोटो…

सोशल मीडिया पर प्रसारित फोटो…

तस्वीर में एक जर्नलिस्ट को कई लोग घेरे हुए हैं. सिरफिरे लोग ऐसा कहकर इसे फेसबुक व ट्विटर पर शेयर कर रहे हैं कि जर्नलिस्ट हिंदू है और बाकी मुस्लिम. साथ ही तस्वीर को मुजफ्फरनगर कांड से जुड़ा बताया जा रहा है. पर जब कुछ लोगों ने नेट पर छानबीन की तो पता चला कि यह तस्वीर इसी साल छह मई की है और कई चर्चित वेबसाइट्स पर बांग्लादेश में हिंसा की खबर के साथ प्रकाशित हो चुकी है. इस तस्वीर के साथ एक वेबसाइट पर कैप्शन यूं है- ''टीवी पत्रकार को पीटते हिफाजत ए इस्लाम के कार्यकर्ता''. जिस टीवी जर्नलिस्ट को पीटता हुआ दिखाया जा रहा है, वह भी मुस्लिम है. पर सोशल मीडिया पर इसे हिंदू बताकर दो समुदायों में नफरत की दीवार खड़ी करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. जर्मनी की वेबसाइट डायचेवेल पर यह तस्वीर व इससे संबंधित मूल खबर है, जिसे आप यहां क्लिक करके देख पढ़ सकते हैं…
मजेदार है कि कुछ लोग इस तस्वीर की ओरीजिन जानने की जगह फोटो को मुजफ्फरनगर की मान कर रक्षात्मक तर्क देने की कोशिश कर रहे हैं. एक वेबसाइट के संचालक इस तस्वीर को मुजफ्फरनगर की मानकर अपने एफबी वाल पर लिखते हैं- ''मुजफ्फरनगर दंगों की यह फोटो फेसबुक पर खूब प्रचारित की जा रही है। फोटो में साफ दिख रहा है कि मुस्लिम गुण्डों ने एक पत्रकार को घेर रखा है। किसी के हाथ में चाकू है, किसी के हाथ में तलवार। जो आप देख नहीं सकते है वह लिखकर बता दिया गया है। फोटो के ऊपर लिखा शांति संदेश भी यही बता रहा है कि मुस्लिम कितने बड़े गुण्डे होते हैं और किस तरह से कत्लेआम करते हैं। पत्रकार तक को नहीं छोड़ते हैं। ठीक है। लेकिन लाल घेरे में उठे हुए वे दो निहत्थे हाथ किसे बचाने के लिए बेताब हैं? क्या वे निहत्थे हाथ किसी हिन्दू के हैं? अगर मारनेवाले आठ दिख रहे हैं तो उन्हीं आठ हाथों में वे दो हाथ क्यों दिखाई नहीं देते जो किसी 'काफिर' पत्रकार की जान बचाने के लिए दांव पर लगे हुए हैं? वह सांप्रदायिकता है तो नफरत का सैलाब कौन सा मानवतावाद है?''
हालांकि कुछ ऐसे भी सजग पत्रकार हैं जिन्होंने यह बताने में देर नहीं लगाई कि यह तस्वीर मुजफ्फरनगर की नहीं बल्कि बांग्लादेश की है. पत्रकार राहुल पांडेय फेसबुक पर लिखते हैं- ''ये फोटो बांग्लादेश में हुए दंगों के दौरान की है जिसे रॉयटर्स ने जारी की थी। कृपया मेरी प्रोफाइल के फोटो आर्काइव में देखें, जिस दिन ये फोटो रॉयटर्स ने जारी की थी, उसी दिन वहां से उठाकर मैनें शेयर की थी।''
भड़ास तक सूचनाएं [email protected] पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.






