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खबर छपने से नाराज विधायक समर्थकों ने राष्‍ट्रीय सहारा, पटना के संपादक को पीटा

पटना से खबर है कि राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक दयाशंकर राय के साथ जदयू विधायक सतीश कुमार यादव के समर्थकों ने मारपीट की है. समर्थक एक अखबार में विधायक को अपराधियों का संरक्षक बताए जाने से नाराज थे. संपादक की परेशानी यह थी कि वे अपना बचाव भी नहीं कर सकते थे, क्‍योंकि वे उसी विधायक के आवास में रहते थे, जिसके खिलाफ उनके अखबार में खबर प्रकाशित हुई थी. इस मामले की जांच करने नोएडा से एडमिनिस्‍ट्रेशन हेड सीबी सिंह जाने वाले हैं. 2 अक्‍टूबर को समूह संपादक रणविजय सिंह के भी जाने की योजना है.

पटना से खबर है कि राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक दयाशंकर राय के साथ जदयू विधायक सतीश कुमार यादव के समर्थकों ने मारपीट की है. समर्थक एक अखबार में विधायक को अपराधियों का संरक्षक बताए जाने से नाराज थे. संपादक की परेशानी यह थी कि वे अपना बचाव भी नहीं कर सकते थे, क्‍योंकि वे उसी विधायक के आवास में रहते थे, जिसके खिलाफ उनके अखबार में खबर प्रकाशित हुई थी. इस मामले की जांच करने नोएडा से एडमिनिस्‍ट्रेशन हेड सीबी सिंह जाने वाले हैं. 2 अक्‍टूबर को समूह संपादक रणविजय सिंह के भी जाने की योजना है.

जानकारी के अनुसार राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक दयाशंकर राय का जब से तबादला हुआ है, वे खानाबदोश तरीके से रह रहे थे. पहले एक-दो महीने गेस्‍ट हाउस में रहे. जब वहां से जवाब मिल गया तो वे राष्‍ट्रीय सहारा में कार्यरत संतोष कुमार यादव के विधायक भाई के सरकारी आवास पर रहने लगे. संतोष के भाई सतीश कुमार यादव जदयू के टिकट पर राघवपुर विधानसभा सीट से राबड़ी देवी को पराजित करके विधायक बने हैं. इनको पटना के कबूतरखाना स्थित विधायक निवास में 1989 तथा 1990 नम्‍बर फ्लैट आव‍ंटित हुआ है.

संपादक डीएस राय पिछले साल यानी 2012 के सितम्‍बर महीने से ही विधायक के आवास में रह रहे हैं. शुरुआत में किसी ने ऐतराज नहीं किया. पर यह महीनों तक वहीं जमे रहे. जब काफी कहने के बावजूद इन्‍होंने अपने लिए मकान या कमरा नहीं खोजा तो विधायक निवास पर रहने वाले लोग इनको तरह-तरह से परेशान करने लगे. कभी इनकी अटैची इस कमरे में तो कभी उस कमरे में की जाने लगी. इसके बाद भी संपादक जी टस से मस नहीं हुए. इसके बाद संपादक जी सुबह नहाने धोने के बाद अटैची लेकर ऑफिस जाने लगे.

पर विधायक निवास से रुखसत होना इन्‍हें गंवारा नहीं हुआ. विधायक और उनके समर्थक परेशान हो गए तो उन्‍होंने दूसरे तरीकों से परेशान करना शुरू किया. जब संपादक देर रात लौटते तो विधायक समर्थक दरवाजा ही नहीं खोलते. घंटों दरवाजा पीटने, घंटी बजाने के बाद किसी तरह दरवाजा खुलता तो इनको सोने की जगह नहीं दी जाती. तमाम तरीके से इन्‍हें परेशान किया गया, लेकिन इसके बावजूद संपादक जी ने किराए का कमरा लेने की नहीं सोची. इस बीच इन्‍होंने पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी से भी फ्री में मकान देने की गुजारिश की, पर उन्‍होंने इनके ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए बहाना बना दिया.

बीते सोमवार को ही संपादक लखनऊ से पटना पहुंचे थे, त‍ब विधायक समर्थकों ने उनको निवास में रहने को लेकर परेशान‍ किया. बताया जा रहा है कि इसी बीच हाजीपुर जिले के राघवपुर विधानसभा के गिदूपुर थाना क्षेत्र में दो युवतियों से बलात्‍कार हुआ था. इसको लेकर ग्रामीण थाने पर हंगामा कर रहे थे. सभी अखबारों ने इस खबर को प्रकाशित किया, लेकिन राष्‍ट्रीय सहारा ने खबर को प्रकाशित करने के साथ यह भी लिख दिया कि राघवपुर के विधायक सतीश कुमार यादव अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं. इसके अलावा भी विधायक के खिलाफ कई बातें लिखी गईं.

प्रत्‍यक्षदर्शियों का कहना है कि सुबह जब विधायक और उनके समर्थकों ने अखबार देखा तो संपादक को उठाकर उनकी ऐसी तैसी करनी शुरू की. पहले गाली-ग्‍लौज हुई. बात बढ़ी तो विधायक समर्थकों ने संपादक की धुनाई कर दी. कुछ अन्‍य लोगों ने बीच बचाव कर संपादक को गंभीर रूप से घायल होने से बचाया. इसके बाद संपादक ऑफिस पहुंचे तथा साथी पत्रकारों से पांच सौ रुपए किराए का कमरा ढूंढने का निर्देश दिया. हालांकि इस बीच यह खबर नोएडा तक भी पहुंच गई. प्रबंधन ने प्राथमिक स्‍तर पर घटना की सत्‍यता को देखते हुए जांच की जिम्‍मेदारी एडमिनिस्‍ट्रेशन हेड सीबी सिंह को सौंपी है.

सूत्रों का कहना है कि मामले की जांच के लिए दो अक्‍टूबर को समूह संपादक रणविजय सिंह भी पहुंचने वाले हैं. दयाशंकर राय पिछले साल जून में पटना भेजे गए थे, तब से ही वे अटैची संपादक के रूप में रह रहे थे. किराए का कमरा लेने की बजाय यहां वहां रहकर दिन काट रहे थे. इसके पहले भी पटना यूनिट विवादों में रह चुका है. कुछ साल पहले एक सर्कुलेशन मैनेजर को हॉकरों ने पीट दिया था, तब भी सीबी सिंह और रणविजय सिंह इनके मामले की जांच करके तत्‍कालीन संपादक ओंकारेश्‍वर पांडेय को हटा दिया था. बाद में सर्कुलेशन मैनजर को भी हटा दिया गया था. अब देखना है कि इन लोगों की टीम इस मामले में क्‍या निर्णय लेती है. इस संबंध में संपादक दयाशंकर राय को फोन किया गया लेकिन उनका फोन नहीं लगा, जिससे उनका पक्ष नहीं जाना जा सका. अगर इस संबंध में उनका पक्ष आता है तो उसे भी ससम्‍मान प्रकाशित किया जाएगा.

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