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फेंकू और पप्पू

पप्पू और फेंकू
फेंकू और पप्पू,
पप्पू ने फेंका
फेंकू गुस्साया,
फेंकू पप्पुआया
पप्पू गरमाया,

पप्पू और फेंकू
फेंकू और पप्पू,
पप्पू ने फेंका
फेंकू गुस्साया,
फेंकू पप्पुआया
पप्पू गरमाया,

ये इनका ट्रेडमार्क
ये इनका आईडी कार्ड
ये इनका पेटेंट
ये इनका कॉपीराईट,
कोई कितना भी फेंके
फेंकू नहीं हो सकता
कोई कितना पप्पुआये
पप्पू नहीं बन सकता,
पप्पू है बस एक
वन एंड ओनली
फेंकू भी बस एक
बिलकुल ओरिजिनल,
दोनों में दोस्ती
फेंकू और पप्पू
एक दुसरे की चिंता
सच्चे हितैषी,
हमारे तो अराध्य
पप्पू और फेंकू
हम तुम पर कुर्बान
फेंकू और पप्पू.

पप्पू और फेंकू
वैसे तो नाम सबके होते हैं,
और नाम के उपनाम भी
कोई अपना नाम जानता है
कोई-कोई नाम नहीं भी जानते,
कई अपने उपनाम नहीं जानते,
बहुत लोग जानते भी हैं,
गरीब हरि नारायण हरिया
दरिद्र कालीचरण कलुआ
भीखारी दीनानाथ दीनू
और फटेहाल रामचरण रामू,
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
हरिवंश राय श्रीवास्तव ‘बच्चन’
रामधारी सिंह ‘दिनकर’
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’,
लेकिन ये सब उपनाम बेकार
ये सब पुकार नाम बेजार
ये सब लघु नाम महत्वहीन
ये सब प्रति नाम चमक विहीन,
उपनाम हैं तो बस दो
पुकार नाम सिर्फ वे ही
एक हैं सेक्युलर पप्पू
एक हैं धार्मिक फेंकू,
पप्पू भी बेजोड़ हैं
अपने ढंग के नायब
पूरे हिन्दुस्तान में अकेले
न भूतो ना भविष्यति,
दसियों साल हो गए
आज भी बस “सीख” ही रहे हैं
कल के आये यूनिवर्सिटी चले गए
पप्पू नर्सरी में पड़े हैं,
पप्पू के पास माँ हैं
बँगला गाडी रूपया पैसा भी
ताकत भी पोजीशन भी
और साथ ही सीखने की जिद,
बड़ी मजेदार लड़ाई है
पप्पू में और ज्ञान में
पप्पू ज्ञान चाहते हर कीमत पर
ज्ञान पप्पू को नहीं चाहता हर कीमत पर,
पप्पू मन के मौजी हैं
कुछ कुछ चाँद की तरह
मन होता है रोज दिखते हैं
जरूरत हुई कि दूज के चाँद,
गुस्सा बहुत आता है उन्हें
शायद ब्लडप्रेसर की बीमारी हो
कागज़ फाड़ने की गन्दी आदत
किसी और बीमारी का शिकार हों,
दूसरी तरफ हैं फेंकू राजा
चाल, चेहरा और चरित्र
सब में फेंकने का अंदाज़
गजब के शगूफेबाज़,
दिन भर दिमाग लगाते हैं
और अपने दिमाग की खाते हैं
खूब सब्ज़ बाग़ दिखाते हैं
रोज नयी लोलीपॉप थमाते हैं,
देश हो विदेश की घटना
खोज लेते हैं अपनी रचना
धीरे-धीरे छुआते हैं
धीमी आंच में पकाते हैं,
अंदाज़ कुछ ऐसा रखते
जुलियस सीज़र फिर आया हो
नेपोलियन से गुर सिख कर
फेंकू को बनाया हो,
आगे जो करेंगे सो राम जाने
अभी ही इतना कर चुके हैं
नहीं भी कुछ हुआ तो
पेट कई सालों को भर चुके हैं,
समाधान हर चीज़ का
उपाय हर समस्या का
अद्भुत ज्ञानी हैं ध्यानी हैं
फेंकने के नायाब महारथी,
कौन जीतेगा कौन हारेगा
कौन बनेगा करोडपति
अनुभव से इतना तो दिखता
जनता रहेगी लूटी-पीटी

(नोट- फेंकू और पप्पू दो काल्पनिक पात्र हैं, इनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है)


इस कविता के रचयिता पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर हैं.

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