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सुख-दुख...

ऐसे खतरनाक समय में मैं शुभकामनाएं दूं तो किसे दूं

आप को नये साल की शुभकामनाएं। शुभकामनाएं सबको अच्छी लगती हैं, जाहिर है मेरी शुभकामना आप को अच्छी लगेगी। पर किन्हीं खास मौकों पर ही क्यों? होली, ईद, दीवाली या नये साल पर ही क्यों? हम निरंतर शुभकाम क्यों नहीं रह सकते। कुछ चुने हुए लोगों के लिए, मित्रों के लिए ही शुभकामनाएं क्यों? तमाम अनाम, अनजान लोगों के जीवन में होली, दीवाली, नया साल जैसे आता ही नहीं।

आप को नये साल की शुभकामनाएं। शुभकामनाएं सबको अच्छी लगती हैं, जाहिर है मेरी शुभकामना आप को अच्छी लगेगी। पर किन्हीं खास मौकों पर ही क्यों? होली, ईद, दीवाली या नये साल पर ही क्यों? हम निरंतर शुभकाम क्यों नहीं रह सकते। कुछ चुने हुए लोगों के लिए, मित्रों के लिए ही शुभकामनाएं क्यों? तमाम अनाम, अनजान लोगों के जीवन में होली, दीवाली, नया साल जैसे आता ही नहीं।

उन्हें दुख इतना मौका ही नहीं देता कि वे इस बारे में सोचें। उन्हें अपनी जिंदगी की लड़ाई इतना वक्त ही नहीं देती कि वे समय को टुकड़ों में देख पायें। वे जीवन को भी टुकड़ो में नहीं देख पाते। रोटी की लड़ाई में उन्हें नया साल तो क्या रात और दिन, सुबह और शाम का फर्क नहीं मालूम पड़ता। कब सूरज उगता है, कब डूब जाता है, उन्हें पता ही नहीं चलता। उनके लिए मौसम भी बेमानी होते हैं। शीत, ग्रीष्म और बरसात का उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। खूबसूरती उन्हें रोमांचित नहीं करती, बदसूरती उन्हें पागल नहीं करती। मेहनत, थकान और रोटी के अलावा उनकी जिंदगी में कुछ खास नहीं। रोटी भी कई बार उनके लिए सपनों की चीज होती है। बेशक केवल शुभकामनाओं से उनकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आने वाला है लेकिन उनके लिए हमारे पास शुभकामनाएं भी तो नहीं हैं।

दुख, संघर्ष सारी दीवारें तोड़ देता है, सारे बँटवारे उसके लिए अर्थहीन होते हैं। वंचित लोगों की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, इन बेकार की चीजों पर सोचने का उनके पास समय ही नहीं होता। रात को सड़कों के किनारे अपने रिक्शों की बाहों पर टंगी हुई जिंदगियों को देखिये कभी। आप पता नहीं लगा पायेंगे कि इनमें कौन मुसलमान है, कौन हिंदू, कौन सिख है, कौन ईसाई। भूख की लड़ाई में सिर्फ आदमी होता है, गरीबी सारे बनावटी मुखौटों से मुक्त कर देती है। पर इनके लिए अब कहाँ हैं शुभकामनाएं? सत्ता, शक्ति, सुख और समृद्धि जीवन को, समय को, मनुष्य को बाँटते हैं। ये अक्सर मनुष्य से उसकी दृष्टि और सरोकार छीन लेते हैं। ऐसे में वह समय, जीवन और मनुष्य से खेलता है। हर नये साल पर पैसे वाले महंगे होटलों में नाचते हैं, गाते हैं, पूरी रात महंगी शराब पीते हैं, झूमते हैं, कई बार बेहोश हो जाते हैं। अरबों रुपये आतिशबाजी में उड़ा दिये जाते हैं। हवा बारूद की गंध से बोझिल हो जाती है। ऐसा अराजक मनोरंजन आखिर किस तरह सड़कों, फुटपाथों, झोपड़ियों की थकी हुई जिंदगियों की ओर देखने देगा, गाँवों और जंगलों में रहने वालों की कठोर जीवनचर्या के प्रति संवेदित करेगा।

 वैभव के आकर्षण और अमीर बनने की उत्कंठा ने समाज में भारी हलचल मचा रखी है। जिनको भी मौका है, वे एक ऐसी अंधी गली की ओर भागे चले जी रहे हैं, जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं। इसी आकांक्षा ने भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दिया है। हम अचानक नहीं बिगड़े हैं,  ये जहर धीरे-धीरे हमारी धमनियों में उतरा है, कोकीन की तरह। और अब हम सब लाचार हैं। बिना धन के, बिना वैभव के, बिना संपदा के सब सूना है। जिसको एक बार इस नशे का स्वाद मिल गया, वह इसके बिना रह नहीं सकता। बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, ऊंची अट्टालिकाएं, जहाजों में उड़ना। जो लोग दूर से देख रहे हैं, वे भी इसका मजा चखना चाहते हैं, वे अपने गंदे सपनों में व्यस्त हैं, उन्हें सच करने के तरीकों में व्यस्त हैं। मध्यवर्ग अपनी लपलपाती जीभ से हवा में घुली ऐश्वर्य की गंध लेकर मस्त है, वह कोई मौका चूकना नहीं चाहता। स्कूल जाते बच्चों को प्रारंभ से ही भविष्य की सपनीली कहानियों के देश में सफर कराना शुरू कर दिया जाता है। सारे गुण कंचन में हैं, धन आना चाहिए। चाहे जैसे आये। जिसके पास धन है, उसके पास ताकत है, उसके पास उड़ान है, उसके पास सब कुछ है। इसी नाते बच्चों के जीवन में भी तनाव है। वे अपनी सहजता से वंचित होते जा रहे हैं। उनके सपनों में ऐसी बड़ी जगहें हैं, जहाँ पहुंचकर वे अपनी तिजोरियाँ भर सकें। इस दृष्टिहीनता में वे गलत रास्ते पर भी जाते दिख रहे हैं। वे गाड़ियाँ चुरा रहे हैं, एटीम तोड़ रहे हैं। उन्हें जीवन नहीं चाहिए, पैसा चाहिए। पैसे की यह भूख उन्हें तनाव और खुदकुशी तक भी ले जा रही है।

गरीब के पास रास्ते नहीं हैं क्योंकि पैसे नहीं हैं। पूंजी की नयी सभ्यता में यह स्वीकार किया जा चुका है कि पैसे से ही सारे रास्ते खुलते हैं। इसी सोच के चलते मनुष्य केंद्र से हाशिये पर चला गया है। उसके हाशिये से बाहर हो जाने के खतरे सामने हैं। उसे बचाने के लिए जो लोग सामने आते हैं, उन्हें देशद्रोही, नक्सली कहकर मार देने की कोशिशें जारी हैं। ऐसे खतरनाक समय में इस नये साल पर मैं शुभकामनाएं दूं तो किसे दूं। बस इतनी उम्मीद कर सकता हूं कि सब शुभकाम हों, सब एक दूसरे के साथ खड़े हों, मनुष्य की पहचान स्मृति से बाहर न होने दें। बदलाव की इसी कामना के साथ इस नये साल में आप सबका स्वागत है।  

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 08853002001 के जरिए किया जा सकता है.   

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