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श्रीलाल शुक्‍ल की मौत और मेरे अंदर के खन्‍ना मास्‍टर साहब

राग दरबारी वाले शुकुल जी की मौत हो गयी. होनी ही थी. बुज़ुर्ग थे. उनकी मौत के बाद अपनी भी छाती में शूल चुभ रहा है. लगता है जैसे अपने ही सगे काका मर गए हों. दरअसल श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी ने ज़िंदगी में कहीं बहुत अंदर तक जाकर अपने को संबल दिया था. हालांकि किसी परीक्षा में हम कभी फेल नहीं हुए लेकिन ज़िंदगी के ज़्यादातर इम्तिहानों में अपने रिज़ल्ट वही रहे. हर बार फेल होना.

राग दरबारी वाले शुकुल जी की मौत हो गयी. होनी ही थी. बुज़ुर्ग थे. उनकी मौत के बाद अपनी भी छाती में शूल चुभ रहा है. लगता है जैसे अपने ही सगे काका मर गए हों. दरअसल श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी ने ज़िंदगी में कहीं बहुत अंदर तक जाकर अपने को संबल दिया था. हालांकि किसी परीक्षा में हम कभी फेल नहीं हुए लेकिन ज़िंदगी के ज़्यादातर इम्तिहानों में अपने रिज़ल्ट वही रहे. हर बार फेल होना.

अभी दयानंद पाण्डेय को पढ़ा, उन्होंने भी लिखा है कि वे भी कभी-कभी अपने आपको को रंगनाथ समझते थे. मैं भी ऐसा ही समझता था. लेकिन यह अनुभव बहुत दिन तक नहीं रहा. सच्ची बात यह है कि अपनी ज़िंदगी में शुरू में ऐसे अवसर बार-बार आये जब मैंने अपने आप को लंगड़ समझा था. हर गलत काम के खिलाफ अपने आपको खड़ा पाया था लेकिन दसवीं पास करने के बाद मेरे अंदर का लंगड़ कहीं मर गया, दुबारा उसने कभी भी चूँ चपड़ नहीं की. लंगड़ की मौत के बाद मैं कुछ दिन तक सनीचर हो गया था, जब मामूली ज़रूरतों के लिए भी घर से मदद मिलनी बंद हो गयी थी, दूसरों का मुंह ताकता था लेकिन आदमी की फितरत का क्या कहना. जैसे ही डिग्री कालेज में मास्टरी मिली, मेरे अंदर खन्ना मासटर की आत्मा प्रवेश कर गयी, बिना किसी सपोर्ट के मैं बागी बन गया. नौकरी हाथ से गयी.

अजीब बेवक़ूफ़ था मैं. हर नौकरी के बाद इस खन्ना मास्टर का अभिनय करता रहा और बहुत सारी नौकरियाँ छूटती रहीं. लेकिन इस रंगनाथ से कभी पिंड न छूटा. यह हर बेतुका मौके पर आता रहा और मुझे समझौते करने से रोकता रहा. आज साठ साल की उम्र पार करके लगता है कि वास्तव में मैं कुछ भी नहीं था. मैं रामाधीन भीखमखेडवी ही था और वही हूँ, जो करने चला था, कुछ नहीं कर सका लेकिन मुझे किसी तरह की ग्लानि नहीं है क्योंकि मैंने राग दरबारी को पढ़ा है और उसेक रचयिता को छूकर देखा भी है. आज वह साहित्यकार तो नहीं है लेकिन उसने मुसीबतों को हँसकर उड़ा देने का जो संबल राग दरबारी के ज़रिये  दिया था वह मेरे पास है, आने वाली पीढ़ियों के पास भी रहेगा. और हर उस रामाधीन भीखमखेडवी को ताक़त देता रहेगा जो कालेज खोलने का मंसूबा बनाएगा और आटे की चक्की खोलकर अपनी रोटी कमाएगा. 

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

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