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सरकार नाराज ना हो जाए, इसलिए बंद कर दिया एनबीटी ने ‘यह समय’

: प्रमुख संवाददाता अनिल यादव लिखते थे यह साप्‍ताहिक कॉलम : लखनऊ। यहां की सरकार के खिलाफ लिखने की औकात इस समय किसी भी मीडिया संस्‍थान में दिखाई नहीं पड़ रही है. इसकी बानगी देखने को मिली कुछ महीने पहले लांच हुए नवभारत टाइम्‍स में. यहां एक साप्‍ताहिक कॉलम को इसलिए बंद कर दिया गया क्‍योंकि इसमें सरकार के खिलाफ कुछ ज्‍यादा ही कड़ा संदेश जा रहा था. सूत्र बता रहे हैं कि सरकार से कोई पंगा न हो जाए इसलिए यह कॉलम अखबार से खतम कर दिया गया. जब लोगों ने कॉलम बंद होने के बारे में जानकारी जुटाई तो यह तथ्‍य सामने आया.

: प्रमुख संवाददाता अनिल यादव लिखते थे यह साप्‍ताहिक कॉलम : लखनऊ। यहां की सरकार के खिलाफ लिखने की औकात इस समय किसी भी मीडिया संस्‍थान में दिखाई नहीं पड़ रही है. इसकी बानगी देखने को मिली कुछ महीने पहले लांच हुए नवभारत टाइम्‍स में. यहां एक साप्‍ताहिक कॉलम को इसलिए बंद कर दिया गया क्‍योंकि इसमें सरकार के खिलाफ कुछ ज्‍यादा ही कड़ा संदेश जा रहा था. सूत्र बता रहे हैं कि सरकार से कोई पंगा न हो जाए इसलिए यह कॉलम अखबार से खतम कर दिया गया. जब लोगों ने कॉलम बंद होने के बारे में जानकारी जुटाई तो यह तथ्‍य सामने आया.

नवभारत टाइम्‍स में प्रमुख संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं अनिल यादव. ये वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा दैनिक जागरण, हिंदुस्‍तान और अमर उजाला जैसे बड़े संस्‍थानों के साथ काम कर चुके हैं. इन सभी अखबारों में इनके नियमित कॉलम प्रकाशित होते रहे हैं तथा इसका एक बड़ा पाठक वर्ग भी है. इसी तरह का एक कॉलम 'यह समय' के नाम से नवभारत टाइम्‍स में भी शुरू हुआ. इस कॉलम का प्रकाशन शनिवार को किया जा रहा था, लेकिन अचानक कुछ किस्‍तों के बाद इस कॉलम को बंद कर दिया गया.

जब इस कॉलम का प्रकाशन कुछ शनिवार नहीं हुआ तो लोगों ने अपने स्‍तर से पता लगाने की कोशिशें शुरू कर दीं, इसी बीच चौंकाने वाली जानकारी मिली कि अनिल यादव का यह कॉलम मात्र इसलिए बंद कर दिया गया क्‍योंकि इसमें सरकार के प्रति कुछ कड़ा संदेश जा रहा था. इससे हुजुर-ए-आला के नाराज हो जाने का खतरा था. यह नाराजगी नवभारत टाइम्‍स से जुड़े तमाम पत्रकारों के अन्‍य गोरखधंधों पर भारी पड़ सकते थे, लिहाजा इस कॉलम को ही बंद कर दिया गया. क्‍या अब इसके बाद भी उदाहरण देने की जरूरत है कि ये बड़े अखबार और संस्‍थान कौन सा काम कर रहे हैं. इन बड़े अखबारों से अच्‍छे वे छोटे अखबार हैं जो सरकार की कमियों को बिना डर भय के छाप रहे हैं, उजागर कर रहे हैं.

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