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चला गया दरबारी और सूना हो गया राग दरबार

श्रीलाल शुक्ल जी के निधन से एक युग का अंत हो गया है। वह युग जो भारतेंदु से प्रारंभ और व्यंग्य लेखन के शीर्ष तक पहुंचा। उन्होंने ऐसी खिड़की बनाई जिससे भारत का सच्चा रूप देखा जा सकता था। गांव-शहर के बीच के सम्बन्ध पर ऐसी तस्वीर किसी और उपन्यास में नहीं जैसा राग दरबारी में है। रूप में विद्रूप का यह स्वरूप ‘राग दरबारी’ की एक महाकाव्यात्मक उपलब्धि है, जो अपने प्रथम अनुच्छेद से ही बांध लेता है.. हमारे ट्रक हमारी सड़कों से कैसा सलूक करते हुए गुजरते हैं। और उस ट्रक में जो युवा है वह संजय के समान कस्बे में बदलते गांव की तस्वीर बांचते चले गये।

श्रीलाल शुक्ल जी के निधन से एक युग का अंत हो गया है। वह युग जो भारतेंदु से प्रारंभ और व्यंग्य लेखन के शीर्ष तक पहुंचा। उन्होंने ऐसी खिड़की बनाई जिससे भारत का सच्चा रूप देखा जा सकता था। गांव-शहर के बीच के सम्बन्ध पर ऐसी तस्वीर किसी और उपन्यास में नहीं जैसा राग दरबारी में है। रूप में विद्रूप का यह स्वरूप ‘राग दरबारी’ की एक महाकाव्यात्मक उपलब्धि है, जो अपने प्रथम अनुच्छेद से ही बांध लेता है.. हमारे ट्रक हमारी सड़कों से कैसा सलूक करते हुए गुजरते हैं। और उस ट्रक में जो युवा है वह संजय के समान कस्बे में बदलते गांव की तस्वीर बांचते चले गये।

शनिचर, वैद्यजी, रूपम बाबू, छोटे पहलवान और मास्टर, जो कक्षा में कम अपनी आटा चक्की पर ज्यादा दिखते हैं। गांव की सतही लेकिन गहरी राजनीति ..सब कुछ का व्यंग्य की नई भाषा गढ़ते हुए अद्भुत चितण्रहुआ है। राग दरबारी से पहले हालांकि अंगद का पांव व्यंग्य उपन्यास वे लिख चुके थे लेकिन राग दरबारी सातवें दशक के अंत के न केवल भारत का बल्कि पूरे विश्‍व का अनूठा उपन्यास बन गया। व्यंग्य की जो वर्णनशैली उन्होंने ईजाद की वह उनके व्यक्तित्व का प्रतिफल या हिस्सा नहीं थी। जब वे संवाद करते थे, गहन गंभीर आलोचक और सुपठित ज्ञानी की तरह लेकिन जब वे लिखते थे तो कोई ऐसा वाक्य नहीं होता था, जिसमें कोई आंकी- बांकी अदा न हो। निरीक्षण की अद्भुत क्षमता रखने वाले श्रीलाल जी ने एक जगह कहा है,‘उनकी बांछें खिल गई, जो शरीर में पता नहीं कहां होती है’ और यह सच है कि बांछें खिलने का मुहावरा हिन्दी क्षेत्र का प्रत्येक व्यक्ति मानता है लेकिन कहां होती हैं, किसी को नहीं मालूम। उनका व्यंग्य भी बांछों की तरह था, जो उनके साहित्य में खिलता और खिलखिलाता था।

ग्रामीण परिवेश की रोमानी अवधारणा को उन्होंने एक झटके में ध्वस्त कर दिया। ‘अहा! ग्राम्य जीवन’ भी क्या है की मुग्धता का विदग्ध उत्तर है-राग दरबारी। आजादी के बाद के मुग्धत्व को उन्होंने बड़ी व्यंग्यपरक निर्ममता से तोड़ा। बिम्बों में वर्णन करते हुए शब्दों को नये अर्थ-प्रसंग प्रदान किये। आज विश्रामपुर का संत का रचयिता स्वयं विश्रामपुर पहुंच गया लेकिन मैं कहता हूं कि उनका व्यंग्य हालिफलहाल के रचनाकारों द्वारा अंगद के पांव की तरह इधर-उधर डोलाया भी जा नहीं सकता। एक और बड़ी बात थी उनमें कि जहां वे एक ओर अज्ञेय के प्रशंसक और समीक्षक थे, भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर के अवदान पर समीक्षाएं लिखते थे, वहीं दूसरी ओर हिन्दी कविता की वाच्य परम्परा को भी प्यार करते थे। लखनऊ के ‘अट्टाहास’ द्वारा आयोजित अनेक काव्य-गोष्ठियों और संगोष्ठियों में मैंने उन्हें सुना और पाया कि वे साहित्य के लिए सम्प्रेषण को जरूरी मानते थे। रूपवादियों और कलावादियों को पसंद करने के बावजूद वे उनके पक्षधर नहीं थे। युवा साहित्यिकों को भरपूर प्रोत्साहन देते थे।

मैं उनके स्नेह में नहाया हूं। सातवें विश्‍व हिन्दी सम्मेलन के दौरान सूरीनाम में उनसे अच्छा सत्संग रहा। पिछले बरस में उनसे साक्षात्कार लेने के लिए उनके घर पर गया था। उनके साथ बिताये हुए वे कुछ घंटे मेरी स्मृति में भी हैं। वे अस्वस्थ थे और अपनी एक पुस्तक मुझे भेंट करना चाहते थे, जिसकी केवल एक प्रति कहीं बची थी। पूरे परिवार ने खोजा, पुस्तक मिली तो वे बच्चों की तरह प्रसन्न हुए और मैं उसको पाने के बाद और भी छोटे बच्चे की तरह मगन हुआ। तीन दशकों तक लखनऊ के रास्ते आने-जाने के बाद और सभा-संगोष्ठियों में अनेकों बार मुलाकात के बाद इस बार दिल्ली से प्रण कर  के गया था कि उनके घर जाना है। जो ईमारत दिखाई दी वह भी किताबों जैसी नजर आई। लगा लोहे के फाटक के पीछे अलग-अलग ऊंचाइयों पर रखे हुए गेरुए रंग से पुते अपार गमले थे। उनमें तरह-तरह के आड़े-तिरछे पौधे, जैसे राग दरबारी के चरित्र हों और जिस तरह मुखपृष्ठ पर कई बार लेखक का चित्र छपा होता है।

उसी तरह से शुक्ल जी दिख गए बरामदे में एक टेढ़ी बिछी हुई चारपाई पर लेटे हुए। शुक्ल जी आधे लेटे आधे बैठे हमारे बैठने की चिंता करने लगे। जैसे अच्छी पुस्तक मिले तो पहले आवरण पर हाथ फिराने का मन करता है। मन किया उनके चरणों पर हाथ फिरा लिए जाएं। यही वे चरण हैं, शिवपालगंज के गंजहों की बस्ती में घूमने के बहाने भारतीय मन और मनीषा की वीथियों में अस्सी साल से ज्यादा बसंत और पतझड़ रौंद चुके हैं। आशीष के कुछ बुदबुद स्वर सुने। मैंने आठवें वि हिन्दी सम्मेलन के समय की स्मारिका दी। अब वे लगे चश्मा ढूंढ़ने। पहला स्पष्ट वाक्य जो सुनने में आया, वह था, आधी उमर तो चश्मा ढूंढने में निकल गई। उठकर बैठने के लिए कहने लगे, पिछले दो महीने से यही दिक्कत हो गई है, लेट जाओ तो बैठना कठिन, बैठ जाओ तो पता नहीं चलता कि पीछे झुकते-झुकते कहां तक बिना झटके जाया जाए कि लेटना सम्पन्न हो जाए। चल लेता हूं, बीमारी कोई नहीं है। उम्र है। उम्र विस्तार पाए तो शिराएं सिकुड़ने लगती हैं। न्यूरो सर्जन ने भी देखा, कोई क्लॉट नहीं मिला। प्लॉट जो दिमाग में आते हैं, वे डाक्टर अभी देख नहीं सकते। ठीक हो जाऊंगा। पायल को उन्होंने आशीर्वादनुमा धन्यवाद दिया।

मैं चादर और मसनद के चौखानों में अटका हुआ था। लेखक किन-किन चौखानों से देखता है और किन-किन चौखटों में शब्दों के चित्र फ्रेम कर देता है। टेढ़े चौखटे, सीधे चौखटे, गोल मसनद, कटे शंकु जैसे गमले, उनके पौधों में त्रिशंकु जैसे लटके कुछ फूल। वे सम्मेलन समाचार पलट रहे थे। फिर उन्होंने पुस्तिका बंद करके पूछने लगे, ‘आज लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में कौन-कौन कवि आ रहे हैं। मैंने बताया अनूप जी ने बीस-बाईस कवि बुलाए हैं। उनमें श्रीयुत रामाधीन भीखमखेड़वी और जनाब टांडवी भी नाम बदल कर आ रहे हैं। इस पर उन्होंने ठहाका लगाया और मैंने भी। ये दोनों कवि राग दरबारी के कवि पात्र थे। पुस्तक से निकलकर कवि सम्मेलन में शरीक होने प्राय: आते रहते हैं। अब हमें तो घर की पुस्तक के यानी श्रीलाल जी के घर अंदर जाना था। गए मकान की पुस्तक के अंदर। यहां पलंग पर चौखाने नहीं थे। फूल पत्तियां थीं। कोणार्क के पहियों जैसी आकृति के हत्थेवाली बेंत की एक शानदार कुर्सी थी। उस पर बैठ गया चक्रधर। फूल-पत्तियों पर बैठ गए थे शुक्ल जी। आज वे ही श्रीलाल जी अज्ञातवास में चले गए। उन्होंने भी जीवन जगत में आदमी के महत्त्व को सर्वाधिक करीब से जाना। यहां से वहां तक उमराव नगर से विश्रामपुर तक साहित्य का घर उनका घर है। हालांकि वे कहते रहे कि यह घर मेरा नहीं है।

लेखक अशोक चक्रधर कवि एवं साहित्‍यकार हैं. उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

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