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यूपी भाजपा : भ्रष्ट और हत्यारे नहीं हो सकते नायक

भारतीय जनता पार्टी वास्तव में नैतिकता वाली पार्टी है। इस प्रदेश के लोग भरोसा कर रहे थे कि अब ऐसी पार्टी सत्ता में आने की बात कर रही है जो खुद को ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बताती है। पार्टी के सभी नेता बहुत दिनों से जोर शोर से ऐलान कर रहे थे कि इस चुनाव में वे उन सभी लोगों को बेनकाब कर देंगे जो यूपी में भ्रष्टाचार का तांडव मचाते आये हैं। पार्टी बड़े जोर शोर के साथ दागी नेताओं को सबक सिखाने की बात भी कर रही थी। मगर जिस घोटाले ने पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश भर में हंगामा मचा दिया था उसके सूत्रधार को पार्टी में शामिल करके देश भर के लोगों को संदेश दे दिया कि भाजपा के दांत खाने के और तथा दिखाने के और हैं। इस एक कदम ने पार्टी को उन साफ सुथरे लोगों से बहुत दूर कर दिया जो इस पार्टी से तनिक भी परिवर्तन की उम्मीद लगाये  बैठे थे।

भारतीय जनता पार्टी वास्तव में नैतिकता वाली पार्टी है। इस प्रदेश के लोग भरोसा कर रहे थे कि अब ऐसी पार्टी सत्ता में आने की बात कर रही है जो खुद को ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बताती है। पार्टी के सभी नेता बहुत दिनों से जोर शोर से ऐलान कर रहे थे कि इस चुनाव में वे उन सभी लोगों को बेनकाब कर देंगे जो यूपी में भ्रष्टाचार का तांडव मचाते आये हैं। पार्टी बड़े जोर शोर के साथ दागी नेताओं को सबक सिखाने की बात भी कर रही थी। मगर जिस घोटाले ने पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश भर में हंगामा मचा दिया था उसके सूत्रधार को पार्टी में शामिल करके देश भर के लोगों को संदेश दे दिया कि भाजपा के दांत खाने के और तथा दिखाने के और हैं। इस एक कदम ने पार्टी को उन साफ सुथरे लोगों से बहुत दूर कर दिया जो इस पार्टी से तनिक भी परिवर्तन की उम्मीद लगाये  बैठे थे।

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी पूरे देश में केन्द्र सरकार के खिलाफ अभियान चलाते हुए निकले थे। उनका यह अभियान भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ था। देश भर में घूम-घूम कर आडवाणी जी ने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस ही भ्रष्टाचार की जननी है और इसका एकमात्र विकल्प भाजपा ही है। आडवाणी की रथ यात्रा के बाद भाजपा के लोग इस उम्मीद से खुश हो गये थे कि जो भ्रष्टचार के विरुद्ध खड़े होने की बात करेगा वे भाजपा को विकल्प के तौर पर अपनाने की बात सोचेगा।

भाजपा के वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया नें बड़ी मेहनत करके माया सरकार के खिलाफ दस्तावेज जुटाये थे। लखनऊ में जब सोमैया ने इसे जारी किया तो सरकार की कंपकपी चढ़ गयी थी। इन दस्तावेजों से साफ था कि बाबू सिंह कुशवाहा और बसपा सरकार के कई लोगों ने मिलकर फर्जी कंपनियां बनायी और उसमें अरबों का गोलमाल किया। सोमैया ने सबके सामने बाबू सिंह कुशवाहा की कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा रखा। पूरी भाजपा सिद्ध करने पर जुटी थी कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में हुए अरबों के घोटाले एवं तीन सीएमओ की हत्या के पीछे बाबू सिंह कुशवाहा का ही हाथ है। पार्टी के बड़े नेता उस समय बड़े खुश हो गये थे जब बाबू सिंह कुशवाहा को मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उनको लगता था कि अब कुशवाहा मायावती के साथ अपनी पार्टनरशिप उजागर कर देंगे।

मगर इसी बीच पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव विनय कटियार ने घोषणा कर दी कि बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल कर लिया गया है। इनके अलावा बसपा से भ्रष्टाचार के आरोप में निकाले गये मंत्री अवधेश वर्मा और दद्दन मिश्रा को भी भाजपा में शामिल कर लिया गया। बादशाह सिंह बुंदेलखंड में अपनी इंसाफ सेना बनाकर जमीन हथियाने के मामले में खासे चर्चित रहे हैं। इस घोषणा से पार्टी के यूपी के नेता ही नहीं आम जन भी भौंचक्के रह गये। दरअसल गलती भाजपा की नहीं है। सभी राजनैतिक दलों को यह यकीन हो चुका है कि जनता को जब चाहो तब मूर्ख बना सकते हो। उनकी बात करने वाला कोई नही है। उनको अपने लुभावने भाषण सुनाकर रंगीन सपने दिखाओ और किसी तरह से अपना उल्लू सीधा कर लो। अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा बाबू सिंह कुशवाहा जैसे दागदार राजनैतिक व्यक्ति को लेने से पहले हजार बार सोचती। बाबू सिंह कुशवाहा मायावती की सबसे कमाऊ नोट छापने की मशीन थे। पूरे प्रदेश में खदानों के ठेकों में उन्होंने तथा उनके चेलों ने अरबों रुपये के वारे-न्यारे किये। खदान के ठेकों का मामला कई बार न्यायालय तक गया मगर कुछ नहीं हो सका। और कर्नाटक की तर्ज पर यूपी में भी अवैध खनन निर्विवाद रूप से जारी रहा।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना में जिस तरह से घोटाले किए गये उसकी कोई सपने में भी कल्पना नहीं कर सकता। इस विभाग में गर्भवती महिलाओं के लिए टीके, जिन लोगों की आंखो की रोशनी चली गयी है उनके इलाज के लिए दवाएं, बेसहारा और बीमार लोगों के लिए एम्बुलेंस, जननी सुरक्षा योजना के तहत मां बनी महिलाओं एवं उनके बच्चों का अनुदान जैसी कई चीजें शामिल थीं। जिन लोगों की आंख में जरा भी शर्म होगी तो वह इन गरीब और बेसहारा लोगों के लिए आये पैसे में बेईमानी की कल्पना भी नहीं कर सकते। मगर बाबू सिंह कुशवाहा और उनके कुछ दलाल आईएएस अफसरों ने मानो सारी नैतिकता और मानवता की हदें पर कर दी थीं। यह लोग सिर्फ एक ही बात समझ रहे थे कि दुनिया में सबसे बड़ी ताकत पैसा है और वह पैसा गरीब से लूटो या फिर अमीर से। पैसा अपने पास होना चाहिए। मगर कहा जाता है कि उपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। जिस पैसे के दम पर गरीबों का खून चूसा गया वही पैसा अब बाबू सिंह कुशवाहा और उनके दलाल अफसरों के काम नहीं आ रहा। जिन तीन सीएमओ की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गयी कि वह पैसा कमाने की राह में रोड़ा बन रहे थे शायद उनके परिजनों की बददुआ अब इन लोगों को लग रही है।

मगर धन्य है भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता। भाजपा के लिए एक बात बहुत दिनों से कही जाती रही है कि उन्हें दुश्मनों की जरूरत नहीं है। भाजपा के नेता ही एक दूसरे को निपटाने के लिए काफी हैं। जाहिर है बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लाने का आत्मघाती फैसला इन जैसे ही किसी नेता ने लिया होगा। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि बाबू सिंह कुशवाहा के आने से कुशवाहा वोट भाजपा को मिल जाएगा।

अन्ना के सुर में सुर मिलाकर नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा के नेता अब क्या यह भी नहीं समझ पा रहे कि यह परिवर्तन का दौर है। कोई भ्रष्ट, हत्यारा नेता किसी जाति का नायक नहीं हो सकता। अगर बाबू सिंह कुशवाहा पर इस योजना में करोड़ों के घोटाले और हत्याओं का आरोप सिद्ध होता है तो फिर उन्हें कुशवाहा समाज का नेता कहना इस समाज का अपमान करना है। ऐसा ही काम पहले मायावती मुख्तार अंसारी को गरीबों का मसीहा तथा बेनी प्रसाद वर्मा ने कुख्यात डकैत ददुआ को कुर्मी नेता मानते हुए उसकी प्रशंसा की थी। जाहिर है न तो मुख्तार अंसारी ही मुसलमानों के नेता हैं और न ही डकैत ददुआ को कुर्मी समाज का नेता माना जा सका। जो बात आम चौराहे पर खड़ा हुआ व्यक्ति और ठेले पर चाय बेच रहा साधारण नागरिक समझ रहा है वह भाजपा नहीं समझ पा रही कि अब लोग जागृत हो रहे हैं और वह भ्रष्ट तथा अपराधी लोगों को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं अब विनय कटियार की महिमा वही जानें जब कांग्रेस के लोग कह रहे हैं कि बाबू सिंह कुशवाहा को पैसा लेकर पार्टी में शामिल कराया गया है तो लोगों को रायबरेली का वह चुनाव याद आता है जब विनय कटियार पर आरोप लगा था कि पार्टी से मिले पैसे हजम करके वह अपनी जमानत गंवा बैठे थे। उम्मीद है गडकरी शायद वह घटना याद करके सबक ले सकें।

लेखक संजय शर्मा वीकएंड टाइम्‍स के संपादक एवं लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. 

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