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लखनऊ

मुलायम की बिसात पर पिटते ‘वजीर और प्यादे’

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव राजनीति के मझे हुए खिलाड़ी हैं। वह बिसात बिछाते हैं तो राजनीति के प्यादे ही नहीं वजीर तक उनकी चालों में उलझकर पिटते जाते हैं। राजनीति की नब्ज पहचानने में उन्हें महारथ हासिल है। राजनीति किस करवट बैठेगी या फिर बैठने वाली है, इसके बारे में उनसे बेहतर कम ही राजनीतिज्ञ समझ पाते हैं। वह राजनीतिक नब्ज टटोल लेते हैं तो अवाम का मिजाज भी जानते हैं, भले ही उनकी राजनीति को समय रहते कोई न समझ पाये, लेकिन उनकी दूरदर्शिता को कभी कम करके नहीं आका जा सकता है। अगर ऐसा न होता वह मुजफ्फरगनर और शामली आदि जगहों में राहत कैम्पों में रह रहे लोगों के लिये इतनी सख्त टिप्पणी नहीं करते, जो उनके मजबूत वोट बैंक भी हैं।

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव राजनीति के मझे हुए खिलाड़ी हैं। वह बिसात बिछाते हैं तो राजनीति के प्यादे ही नहीं वजीर तक उनकी चालों में उलझकर पिटते जाते हैं। राजनीति की नब्ज पहचानने में उन्हें महारथ हासिल है। राजनीति किस करवट बैठेगी या फिर बैठने वाली है, इसके बारे में उनसे बेहतर कम ही राजनीतिज्ञ समझ पाते हैं। वह राजनीतिक नब्ज टटोल लेते हैं तो अवाम का मिजाज भी जानते हैं, भले ही उनकी राजनीति को समय रहते कोई न समझ पाये, लेकिन उनकी दूरदर्शिता को कभी कम करके नहीं आका जा सकता है। अगर ऐसा न होता वह मुजफ्फरगनर और शामली आदि जगहों में राहत कैम्पों में रह रहे लोगों के लिये इतनी सख्त टिप्पणी नहीं करते, जो उनके मजबूत वोट बैंक भी हैं।

राजनैतिक पंडितों का मानना है कि मुलायम को आहट मिल गई थी कि राहत कैम्प उनकी भविष्य की राजनीति में रोड़ा बन सकते हैं। राहत कैम्पों में जितने दंगा पीड़ित रह रहे थे उसका दस गुना लोग ऐसे थे जिनकी सोच दंगा पीड़ितों के नाम पर आ रही मदद में लूटखसोट करना है। कई अन्य राज्यों से भी मदद की आस में लोग आकर यहां बस गये थे। यह वह लोग थे जो कभी यहां के वाशिंदे हुआ करते थे, लेकिन अब उनका यहां से दूर-दूर का वास्ता नहीं था। कुछ भूमाफिया टाइप लोगों की नजर उस जमीन पर भी थी जहां राहत कैम्प लगे हुए थे। यह बेश्कीमती जमीन थी। ऐसे लोगों को सपा विरोधियों और धर्म के कुछ ठेकेदारों की शह मिली है।

यहां शाम होते ही कुछ लोग राहत कैम्प में रहने वालों को नोट बांटने पहुंच जाते हैं। वह भी दस -बीस नहीं पॉच-पॉच सौ रूपये। राहत के नाम पर अरब के मुल्कों तक से पैसा आने लगा था। इस बात को स्थानीय प्रशासन भी स्वीकार करता दिखा। हद तो तब हो गई जब चारा घोटालें में जेल की हवा खा चुके बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी राहत शिविरों में विस्थापितों को पैसा बांटने पहुंच गये। कांग्रेस, भाजपा और रालोद तो पहले ही राहत कैम्पों के नाम पर राजनीति कर रहा था। मुजफ्फनगर के जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा तो साफ-साफ शिविर खत्म नहीं होने के पीछे राजनीतिक मकसद बताते है। उनका कहना था कि इंसाफ दिलाने का वास्ता देकर दंगा पीड़ितों को यही जमे रहने को कहा जाता है। उधर, सपा भी यह बात समझ रही थी कि राहत कैम्प उसके लिये अब नुकसान का सौदा बनते जा रहे हैं।

बहरहाल, बात मुलायम के उस बयान की कि जाये जिसमें उन्होंने कहा था कि राहत कैम्पों में दंगा पीड़ित नहीं, कांग्रेस और भाजपा के लोग रह रहे हैं, तो यह साफ हो जाता है कि मुलायम ने दूर की कौड़ी चली थी। हालांकि मुलायम के बयान का जर्बदस्त विरोध हुआ, कांग्रेस-बसपा और भाजपा ही नहीं कई मुस्लिम धर्मगुरुओं तक ने मुलायम से माफी मांगने की बात कही, लेकिन मुलायम टस से मस नहीं हुए। पार्टी के बाहर ही नहीं भीतर भी समाजवादी सरकार और संगठन दोनों को ही पहले पहल जरूर लगा था कि नेताजी से कुछ चूक हो गई, परंतु यह दौर लम्बा नहीं चला। इसी के बाद समाजवादी सरकार का रवैया राहत कैम्पों में रहने वालों के प्रति सख्त हो गया। कैम्पों से लोगों को खदेड़ने के लिये अखिलेश सरकार ने तंबू हटाओ अभियान चला दिया। काफी हाय तौबा हुई लेकिन यह सिलसिला थमा नहीं। सरकार द्वारा उठाये गये सख्त कदमों से यह भी साफ हो गया कि अब राहत कैम्पों के नाम पर आगे सपा सरकार को घेरने का मौका किसी को नहीं दिया जायेगा।

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के बयान और राहत कैम्पों से लोगों का तंबू उखाड़े जाने के दौरान अखिलेश सरकार के कारागार मंत्री एवं प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी पार्टी औ सरकार का रूख रखने के लिये सामने आये। उन्होंने दो टूक घोषणा कर दी कि मुजफ्फरनगर और शामली में बने राहत शिविरों में रह रहे पीड़ितों को सरकार ने हरसंभव मदद की। अब सरकार चाहती है कि ठंड के इस मौसम में पीड़ितों के लिए पक्के मकानों में वैकल्पिक व्यवस्था हो। जो लोग घर वापस जाना चाहते हैं उन्हें पूरी सुरक्षा दिए जाने का भी भरोसा दिया गया है। इन पीड़ितों को आर्थिक तथा अन्य मदद भी दी गई हैं। राज्य सरकार ने पीड़ितो को सुविधा और सम्मान दोनों मिले इसका पूरा ख्याल रखा है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्षी मानव त्रासदी में भी अपनी राजनीति की रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। यही लोग पीड़ितों में भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं।

चौधरी ने सफाई देते हुए कहा कि इसी से दुःखी होकर मुलायम सिह यादव ने कहा था कि पीड़ितों के प्रति संवेदना जताने के बजाय भाजपा-कांग्रेस शिविरों में राजनीति करने की साजिश में जुटे हुए हैं। उनके बयान को संदर्भ से अलग तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। कुछ लोग अब भी भ्रम फैलाने पर लगे हैं और मुलायम सिंह यादव के बयान को गलत ढंग से उद्धृत कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी तमाम नेताओं ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा अपनी जमीन खो चुके हैं। समाजवादी पार्टी की सरकार के प्रति जनता का बढ़ता विश्वास और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की लोकप्रियता से इन्हें डर है।

वहीं सपा प्रमुख मुलायम के राहत शिविर खाली कराने के पैंतरे से सपा विरोधी चारो खाने चित हो गये हैं, जबकि सपा के थिंक टैंक का मानना है कि उसे इससे थोड़ा-बहुत नुकसान तो जरूर होगा, लेकिन समय-समय पर मुसलमानों को मरहम लगा कर इसे पूरा कर लिया जायेगा, क्योंकि अल्पसंख्यकों में भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो यह मान कर चल रहे थे कि राहत कैम्पों की हकीकत वैसे नहीं है जैसी तस्वीर सपा विरोधी पेश कर रहे हैं। सपा सरकार ने राहत कैम्पों में रहने वालों की ठीकठाक मदद की है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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