Satyendra Pratap Singh : अभी महाराष्ट्र में एक ट्रेन के स्लीपर क्लास में आग लगने से सात लोग मर गए। इसके पहले आंध्र प्रदेश में ट्रेन में आग लगी थी। अगर चालीस साल की दुर्घटनाओं और लाशों को गिनें तो बस लाश ही गिनेंगे। अगर ये घटना यूपी/बिहार में होती तो शायद बुद्धिजीवी लोग कह देते कि ये भुच्चड़, मूर्ख, गंवार और बीड़ी पियाक हैं, मरने के ही काबिल हैं।
और एक जापान है। हिताची वहां रेल चलाते हैं साढ़े तीन सौ किलोमीटर प्रति घंटे रफ्तार से। मुस्कुराते हुए कहते हैं कि हमारी बुलेट ट्रेन एक्सीडेंट फ्री है, जो चालीस साल से ऊपर हुई चलते। उसमे यात्रा करने वाले बताते हैं कि अगर ट्रेन अचानक रुक जाए तो हम बूझ जाते हैं कि तेज भूकंप आने वाला है! बस हम लोग लगे रहें साम्प्रदायिकता / गैर साम्प्रदायिकता में! न पढने दें 80% आबादी को! मानें 20% को जन्मजा योग्य! गाएं कि हमारे पास पुष्पक विमान था, शल्य चिकित्सा थी, हाथी का मुंह आदमी को लगा देते थे! ये करने के अलावा हम कबार ही क्या सकते हैं…
पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.
Trivedi Nikhilesh : कल रात एक भयानक हादसे में देहरादून एक्सप्रेस के 9 यात्री जिन्दा जल गए। ये सभी गहन निद्रा में थे। एक दो हफ्ते पहले आंध्र में भी ऐसी ही घटना में 30 मुसाफिर चल बसे। अक्सर रात्रि में आग लगने पर सोये हुए यात्रियों पर आफत टूट पड़ती है और रेल विभाग मुआवजा देकर मामला नत्थी कर देता है। क्या रेलवे बोर्ड ऐसा सिस्टम विकसित नहीं कर सकता क्या कि आग की शुरुआत होते ही या धुँआ उठते ही ट्रेन के ब्रेक लग जाएँ और पूरी ट्रेन में सायरन बज उठे। यदि ऐसा हो जाये तो कितनी जिंदगियां बच सकेंगी।
निखिलेश त्रिवेदी के फेसबुक वॉल से.
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