केंद्र सरकार ने पिछले दिनों एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये नए चैनल खोलने के इच्छुक आवेदकों के लिए भावी दिशानिर्देश जारी किए। दरअसल, अगले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और फिर दो साल बाद होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर कई चैनल मालिक इस बहती गंगा में हाथ धोने की तैयारी में हैं। इस समय तकरीबन 578 टेलीविजन चैनल सक्रिय हैं, जो धर्म, मनोरंजन, खान-पान, क्षेत्रीयता और विभिन्न समुदायों से जुड़ी तमाम चीजें परोसते रहते हैं। इनमें 122 समाचार चैनल हैं।
अखबारों के ज्यादातर पाठक दुनिया की ताजातरीन घटनाओं से खुद को अपडेट रखना चाहते हैं। अब देखने वाली बात यह है कि ये चैनल समाचार के भूखे इन दर्शकों की क्षुधा को किस तरह शांत करते हैं। पहली बात यह कि अधिक से अधिक छह चैनलों को छोड़कर ज्यादातर समाचार चैनल कुछ खास क्षेत्रों में नए चैनल खोल रहे हैं, लेकिन उन्हें कारोबार में घाटा हो रहा है। इन क्षेत्रों के दर्शकों के लिए परोसी जाने वाली समाचार सामग्री पक्षपातपूर्ण होती है। वे अकसर एक राय बनाते हैं, जो स्थानीय आबादी की नहीं, बल्कि चैनल मालिक के हितों की पूर्ति करता है।
साथ ही समाचार चैनलों की मालिकाना पद्धति काफी संदिग्ध है। तकरीबन 90 फीसदी मामलों में देखा गया है कि समाचार चैनल के मालिक बिल्डर हैं। इनमें से कुछ अपनी फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल विदेश में प्रसारण के लिए कर रहे हैं। मसलन, एक ऑपरेटर दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स और कनाडा के वैंकूवर के दर्शकों के लिए इसका इस्तेमाल कर रहा है। यह ऑपरेटर एक धार्मिक और एक मनोरंजन चैनल भी चला रहा है।
एक दूसरे चैनल ऑपरेटर ने शराब ठेकेदार के रूप में अपने पारिवारिक कारोबार की शुरुआत की थी। इसके बाद वह निर्माण क्षेत्र में आया और फिर उसने फिल्म उद्योग में हाथ आजमाया। आज उनके पास एक हिंदी समाचार चैनल और चार क्षेत्रीय समाचार चैनल हैं। अब यह एक अंगरेजी समाचार चैनल शुरू करने की तैयारी में है। यह सूची काफी लंबी है। इसके अलावा टेलीविजन क्षेत्र में कई बड़े नाम हैं। इनमें से कुछ स्विट्जरलैंड, अमेरिका, सऊदी अरब और अन्य संदिग्ध स्रोतों से धन प्राप्त कर रहे हैं।
इसी तरह देश में गरीबों के हितों के लिए लड़ने की कसम खाने वाले वामपंथी नेताओं का पैसा एक अंगरेजी समाचार चैनल में लगा हुआ है। अगर इन चैनलों की सामग्री पर गौर करें, तो निश्चित रूप से घोटालों की भयावहता का अंदाजा खुद-ब-खुद होने लगेगा। अधिकांश समाचार चैनल केवल शहरों की खबरों को तवज्जो देते हैं। भारत एक विशाल देश है और हर गांव में तमाम अच्छी खबरें छिपी रहती हैं। क्या कोई समाचार चैनल गांवों की खबरों के लिए समय दे रहा है? क्या ये चैनल यह दिखाने की जरूरत महसूस करते हैं कि ग्रामीण भारत में क्या हो रहा है?
सभी समाचार चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज का तमाशा साफ देखा जा सकता है। पिछले साल एक चैनल ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त के कुत्ते की गुमशुदगी की खबर पूरे दिन ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चलाई। अखबारों के शीर्षकों की तुलना अगर समाचार चैनल में दिखाई जाने वाली खबरों से करें, तो पता चलता है कि कोई खबर जिसे राष्ट्रीय स्तर के अखबार में एक छोटे पैराग्राफ में जगह मिलती है, वही एक राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनल में पूरे दिन चलती रहती है।
समाचार चैनलों पर कॉमेडी से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। सवाल यह है कि जब उन्हें केवल समाचार दिखाने का लाइसेंस मिला हुआ है, तो वे इस तरह के बेहूदा कार्यक्रम क्यों दिखाते हैं? समाचार की जगह से घंटों तक फिल्मों के ट्रेलर और फिल्मी कलाकारों के साक्षात्कार क्यों दिखाते हैं। दर्शकों को इन सबसे राहत इसलिए नहीं मिल पा रही है, क्योंकि इसके लिए कोई स्वतंत्र नियामक निकाय नहीं है। समाचार चैनलों के सामग्री की निगरानी के लिए अब केंद्र सरकार ने एक नियामक की नियुक्ति की ओर संकेत किया है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में टेलीविजन उद्योग युवा पीढ़ी को ज्यादा शिक्षित, जवाबदेह और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के प्रति जवाबदेह नहीं है। दरअसल, टेलीविजन अज्ञानता और मूर्खता के सूचकांक को बढ़ावा देने वाला एक साधन बन चुका है। इसलिए कहा जा सकता है टेलीविजन देखना बेहतर बेवफूक बनने की सही विधि है।
गौतम कौल का यह लिखा अमर उजाला में प्रकाशित हो चुका है. इसे वहीं से साभार लिया गया है.





