यशवंतजी नमस्कार, यह व्यक्तिगत पत्र है, प्रकाशनार्थ नहीं. भड़ास पर पचौरी जी के बारे में समाचार पढ़ा. समझ नहीं आता भाईसाहब कि ये दिल्ली के पत्रकार कुछ पत्रकारिता भी करते हैं या इसी जुगाड़ में लगे रहते है कि कैसे सत्ता शीर्ष के नज़दीक पहुंचा जाये, और अपना उल्लू सीधा किया जाये. वास्तव में हृदय से ख़ुशी तब होती जब कोई यशवंत सिंह किसी प्रतिष्ठान के नज़दीक पहुंचता, कम से कम सरोकार और मुद्दों की बात तो होती. पचौरी जी से एक बार की मुलाकात है लखनऊ में.
और, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि तब पचौरी जी मुलायम सिंह के कान में बात करते नज़र आते थे. दिल्ली तो चलिए देश की राजधानी हो गई, यहां लखनऊ में ये देखने में आता है कि जो पंचम तल के जितना नज़दीक, उसकी उतनी बड़ी दलाली और जिसकी जितनी बड़ी दलाली वो उतना बड़ा पत्रकार.
अन्ना के आन्दोलन के बाद एक वर्ग ऐसा भी था जिसने कहा कि आजकल इमानदार वो है जिसको मौका नहीं मिलता है, लेकिन आप हम सबसे वरिष्ठ हैं, आप खुद बतायें कि किस पत्रकार को मौका नहीं मिलता? लेकिन आजकल तो लगता है खुद को पत्रकार कहना एक फैशन हो गया है. एक हाकर भी खुद को पत्रकार बताता है और ऐसा लगता है कि मिशन या पैशन के लिए नहीं बल्कि दलाली करने के लिए ही लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे हैं. जो भी हो, भड़ास पढ़ कर शांति तो मिलती ही है कि कहीं तो हमारे बीच क़ी गंदगी को नंगा किया जा रहा है.
एक पत्रकार
लखनऊ
(पत्रकार मित्र के अनुरोध के बावजूद उनका यह पत्र प्रकाशित किया जा रहा है, इसी कारण उनका नाम नहीं दिया गया है ताकि उनकी पहचान उजागर न हो. -एडिटर)






