पहली बार रवींद्र शाह के बारे में तब जाना जब 2001 में दिल्ली ब्यूरो में दैनिक भास्कर ज्वाइन किया. भास्कर से उनका जाना और मेरा आना हुआ, यही कारण रहे कि आपस में कभी हमारी तार्रुफ़ नहीं हुई. भास्कर के ही कुछ साथियों ने उनके बारे में कुछ अच्छी तो कुछ उनके अड़ियल स्वभाव की कहानी बयां की थी. दस साल के बाद रवींद्र शाह से पहली बार मिला. हम साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्कींइग प्रतियोगिता में शिरकत करने हिमालय की चोटी पर गए थे.
शाह हम सभी में उमरदाराज़ रहे होंगे, मगर जवानी की गरमजोशी से लबरेज़, खुशमिजाज़ और ज़िन्दगी को और करीब से जानने की ललक उनमे साफ़ दिख रही थी. हम दोनों एक दूसरे को जान रहे थे, लेकिन बात की शुरुआत न तो उन्होंने की और न ही मैंने. बात की शुरुआत तब हुई जब हमने लोकल पत्रकारों से शिमला के अख़बारों के बारे में चर्चा छेड़ी और बात निकल पड़ी भास्कर शिमला में रहे कीर्ति राना की. पत्रकारों ने कहा राना के समय भास्कर के तेवर गज़ब के थे. हमने राना की खोज खबर ली तो शाह बोल पड़े वे इंदौर में दबंग दुनिया के संपादक हैं. फिर हमारे बीच अच्छी बातें हुईं. हिमालय के बर्फ की हसीन वादियों की आखिरी मुलाकात नहीं थी, ठीक तीन दिनों बाद बस्तर पर लिखे गए एक किताब विमोचन के अवसर पर रवींद्र शाह से दिल्ली में दोबारा संक्षिप्त मुलाकात हुई, इस वायदे के साथ कि फिर मिलेंगे. मगर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था.



शिशिर सोनी वरिष्ठ पत्रकार तथा दैनिक भास्कर के नेशनल ब्यूरो में वरिष्ठ विशेष
संवाददाता हैं. शिशिर की रवींद्र शाह से मुलाकात इसी दस फरवरी को हुई थी. इसके बाद वो मिलने का वादा करके मध्य प्रदेश चले गए थे, पर यह मुलाकात आखिरी साबित हुई. इसी आखिरी मुलाकात की तस्वीरों और शब्दों के साथ शिशिर सोनी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है.






