जब ब्रिटेन में हाउस ऑफ लॉर्डस ने दुनिया भर में उपलब्ध मशहूर किताब “स्पाईकैचर” के लेखक पीटर राइट को विश्वासघाती (ट्रेटर) करार दिया तब तत्कालीन संपादकों ने इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं प्रेस की आज़ादी के खिलाफ बताया। “मिरर” ने “यू फूल्स” शीर्षक एक बैनर हेडलाइन दी।
चूंकि हाउस ऑफ लॉर्डस का यह फैसला उसकी तत्कालीन न्यायिक शक्ति के तहत हुआ था, लिहाज़ा कुछ लोगों ने इसे खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाना चाहा, लेकिन ब्रिटेन की अदालतों ने इस टिप्पणी पर कोई भी कार्रवाई यह कह कर नहीं की कि यह अवमानना नहीं है, हां अगर अख़बार ने “यू क्रुकेड”(चालबाज़) कहा होता तब यह अवमानना की श्रेणी में आता, क्योंकि तब अखबार ने संस्था की नीयत, न कि बुद्धिमत्ता पर शक किया होता।
मीडिया की नीयत पर सीधे आरोप लगाए जा रहे हैं और वह भी गणमान्य संस्थाओं व उनके प्रतिनिधियों द्वारा। ज़रूरत यह है कि एक अनौपचारिक लेकिन सशक्त संस्था के रूप में मीडिया और सतर्कता बरते और जनता के प्रति अपनी उपादेयता को और सार्थक बनाए। अनौपचारिक प्रजातांत्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाना सत्ता का शगल है पर इन संस्थाओं का अस्तित्व एक ही वजह से अक्षुण्ण रहेगा और वह है जनता के प्रति अपनी उपादेयता सिद्ध करना।
बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय की एक सम्मानित महिला जज ने अपनी संपत्ति व देनदारी (एसेट्स एण्ड लाइबिलिटीज़) कॉलम में देनदारी के रूप में दो बेटियों का विवाह करना लिखा। एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने प्रथम पेज पर यह खबर छापी जिसका शीर्षक था “उच्च न्यायालय की जज का कहना है कि उनकी दो बेटियां देनदारी हैं”। आरोप यह लगाया गया कि इस अख़बार ने सेन्सेशन पैदा करने की गलत नीयत से तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश किया। यह भी कहा गया कि जज महोदया को ऐसा लिखने की कोई ज़रूरत नहीं थी क्योंकि देनदारी सिर्फ कानूनी देनदारी होती है, लेकिन ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा यह थी कि उनको बेटियों की शादी में धन खर्च करना पड़ेगा।
अब अगर इस खबर को हम सकारात्मक रूप से लें तो इसका यह भी मतलब निकलता है कि अखबार की मंशा यह बताने की थी कि शादियों में खर्च एक सामाजिक कुरीति है औऱ यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की माननीया जज भी इससे त्रस्त हैं। इस खबर का इस कुरीति के खिलाफ एक अच्छा सामाजिक संदेश भी जाता है। यह भी कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किसी भी बम-विस्फोट की घटना के तत्काल बाद आए किसी ई-मेल, जिसमें कि दावा किया गया है कि जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने घटना की ज़िम्मेदारी ली है, को तत्काल दिखाना शुरू कर देती है और नतीज़ा यह होता है कि भारत के एक सम्प्रदाय के सभी लोगों को आतंकवादी बना दिया जाता है। इस वाक्य में तार्किक दोष है। जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर का मतलब किसी सम्प्रदाय विशेष के सारे लोगों से नहीं होता, उसी तरह जिस तरह गाय जानवर होती है लेकिन हर जानवर गाय नहीं होता। दूसरा, चैनल यह नहीं कहता जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने यह किया है बल्कि वह यह कहता है कि उसे एक ई-मेल प्राप्त हुआ है जिसमें यह दावा किया गया है।
एक अन्य आरोप लगा कि जिस देश में 80 प्रतिशत गरीबी व अभाव में जी रहा है उस देश में मीडिया एक फिल्म अभिनेता की पत्नी को एक बच्चा होगा या जुड़वा होंगे यह दिखा रहा है, लैक्मे फैशन शो दिखा रहा है जबकि विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। पहला यह कि भारतीय मीडिया अगर गरीबी को न दिखा रही होती तो शायद समाज के सुविधाभोगी और शक्तिसंपन्न वर्ग को शायद इसका पता भी न चलता। दूसरा, मीडिया ने इस तरह की खबरें दिखाईं तो कितनी बार अवमानना की शक्ति से सम्पन्न न्यायपालिका में बैठे लोगों ने अपनी तरफ से (सुओ मोटो) उसका संज्ञान लिया और कितनी बार कार्यपालिका ने उसे तरजीह दी? विश्व का कोई अन्य प्रजातांत्रिक देश नहीं है जिसमें कि मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन से 12 सांसद निकाल दिए जाएं। टूजी स्पेक्ट्रम की खबर जब 2007 में कुछ मीडिया संस्थाओं ने दी तब इसका संज्ञान नहीं लिया गया लेकिन जब एक विश्वसनीय सी.ए.जी ने इस राज से परदा उठाया तब मीडिया का स्वर ऊंचा हुआ और अन्य संस्थाओं ने संज्ञान लेना शुरू किया।
मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की बात फिर जोर-शोर से उठी है। पत्र-सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर आज भी दो हफ्ते पहले हुआ मंत्रिमण्डल का फैसला देखा जा सकता है। इस फैसले के तहत अगर किसी चैनल ने प्रोग्राम संहिता का पांच बार से ज़्यादा का उल्लंघन किया तो दस साल के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस का पुनर्नवीनीकरण नहीं होगा। अब ज़रा कैबिनेट के इस फैसले का व्यावहारिक पक्ष देखें। अगर कोई चैनल पहले ही साल पांच बार इस संहिता का उल्लंघन करे तब भी अगले नौ साल तक यह फैसला उसे उल्लंघन करने की इजाज़त देता रहेगा। दूसरा, अगर मान लीजिए कि उसने चार बार उल्लंघन किया तो क्या यह डर नहीं है कि पांचवे उल्लंघन की धमकी देकर सरकार उससे जो चाहे करवाए खास करके अगर उसका दसवां साल चुनाव का वर्ष है। तीसरा, अगर तथाकथित संहिता के उल्लंघन के तहत सरकारी अमले ने उसका लाइसेंस दोबारा जारी नहीं किया लेकिन अगले दो साल में वह कोर्ट से बरी हो जाता है तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?
फिर, क्या पहले से बनाए गए दर्जनों कानून सक्षम नहीं हैं? संविधान के अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आठ प्रतिबंध लगाए गए हैं। उन प्रतिबंधों के तहत सरकार को कानून बनाने के अधिकार है। यह प्रतिबंध हैं – भारत की संप्रभुता व अखण्डता के हित में, राज्य की सुरक्षा के हित में, किसी मित्र देश के साथ मैत्रिक संबंध के हित में, जन व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता, अदालत की अवमानना के संबंध में, मानहानि एवं अपराध के लिए उकसाने के संदर्भ में।
संविधान निर्माताओं ने इस बात को सुनिश्चित किया कि इन आठों में कोई भी प्रतिबंध जनहित को लेकर न हो। यानि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सरकार जनहित के नाम पर बाधित न कर सके। इसकी स्पष्ट पुष्टि इसी अनुच्छेद के 19(6) में होती है जहां व्यवसाय के अधिकार संबंधी प्रतिबंधों को लेकर सरकार को जनहित में फैसला करने का अधिकार है। इसका स्पष्ट मतलब यह है कि संविधान निर्माताओं ने सरकार को मीडिया के विषय-वस्तु को जनहित में नियंत्रित करने का अधिकार नहीं दिया है।
स्पष्ट है कि अन्य सभी आठ प्रतिबंधों पर पहले से ही कानून बने हुए हैं और वह सारे कानून इन प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति या मीडिया को दंडित कर सकते हैं, लिहाज़ा कोई औचित्य नहीं बनता कि सरकार मीडिया की विषय-वस्तु से कोई
छेड़छाड़ करे और कोई नया कानून बनाए। संस्थाओं को विकसित होने में समय लगता है लेकिन दो साल में जो उपलब्धि हासिल की है उससे स्पष्ट है कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने वाले समय में विश्व के लिए एक उदाहरण पेश कर सकती है।
लेखक एनके सिंह वरिष्ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्लॉग पोस्टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हो चुका है.






