90 फीसदी मूर्खों को सुधारना है तो सरकारी बंगला और लाल बत्‍ती छोड़नी होगी

: “तुझे हम वली समझते  जो ना बादा- ख्वार होता” : हमारे देश में जजों को न्यायमूर्ति कहा जाता है. हम सब जानते हैं कि मूर्ति भगवान की होती है इन्सान की नहीं. लिहाज़ा जजों को एक तरह से ठीक भगवान के नीचे का दर्ज़ा दिया गया है. यहाँ तक कि अवकाश प्राप्ति के बाद भी जजों के नाम के आगे यह महिमा-मंडन जारी रहता है. मंत्री हो या प्रधानमंत्री, कैबिनेट सचिव हो या संवैधानिक पड़ पर रहा सीएजी या विधायिका या कार्यपालिका के किसी बड़े से बड़े ओहदेदार को भी यह सम्मान हासिल नहीं है. ना तो वह मूर्ति होता है ना हीं उसके नाम के साथ पूर्व पदनाम जुड़ा होता है.

प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (न्यायमूर्ति) मार्कंडेय काटजू अपने एक लेख को लेकर एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं. भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि वह सुप्रीम कोर्ट से रिटायरमेंट के बाद इस ओहदे को पाने का शुकराना कांग्रेस पार्टी को अदा कर रहे हैं. पार्टी का यह भी आरोप है कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखे इस लेख या भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों पर प्रतिकूल टिप्‍पणी इस शुकराने का ही भाग है. “अगर पोलिटिकल टिप्पणियां करनी है तो उन्हें लाल बत्ती और ल्युटियन बंगला और सरकारी ओहदा छोड़ना पड़ेगा” मशहूर वकील और भाजपा के नेता अरुण जेटली ने कहा. कुछ ही मिनटों में जस्टिस काटजू का काउंटर-अटैक आया “जेटली राजनीति करने के योग्य नहीं हैं”.

मूर्ति की हम पूजा करते हैं और कोई उसे नापाक करने या खंडित करने की कोशिश भी करता है तो जबरदस्त सामूहिक प्रतिकार मूर्ति-पूजकों द्वारा होता है. चूंकि न्याय जाति, धर्म, समुदाय या अन्य संकीर्ण सोच से ऊपर है और दिक्-काल निरपेक्ष है लिहाजा इस तरह के हमले के खिलाफ सामूहिक प्रतिकार होना चाहिए. लेकिन अगर मूर्ति निरंतर विवाद में रहे तो उसकी गरिमा का प्रश्न खड़ा हो जाता है. काटजू के मामले में ऐसा हीं हुआ है. अपने लेख में काटजू ने मोदी को सन २००२ के हिंसा, जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग के हजारों लोग मारे गए, का जिम्मेदार माना है. लेख के अंत में उन्होंने कहा है “मैं भारत की जनता से अपील करता हूँ कि सभी बातों (जो उन्होंने लेख में कहीं हैं) को सोचें अगर उन्हें वास्तव में देश के भविष्य की चिंता है. अन्यथा वे वही गलती कर सकते हैं जो जर्मनी के लोगों ने १९३३ में किया था”.

मूर्ति संविधान के अनुच्छेद १९ (१) की दुहाई दे कर अपने अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार नहीं मांगती बल्कि मानव-मात्र के लिए यह अधिकार सुनिश्चित कराती है. खैर अगर मूर्ति मानव के रूप में धरती पर अवतरित हुई है तो लाल-बत्ती, वेतन, ल्युटियन क्षेत्र में बंगला क्यों? प्रेस कौंसिल एक्ट, १९७८ के सेक्शन ७ (१) में लिखा है “इसका अध्यक्ष पूर्णकालिक अधिकारी होगा —- जिसे वेतन मिलेगा“. इसका मतलब हुआ न्यायमूर्ति काटजू वेतन भोगी अधिकारी है और तब उन्हें उन मर्यादों को मानना पडेगा जो किसी भी अधिकारी पर लागू होती है. एक्ट के सेक्शन १३ (१) में कौंसिल का उद्देश्य “प्रेस की स्वतन्त्रता की हिफाज़त करना, अक्षुण्ण बनाये रखना और अखबारों एवं न्यूज़ एजेंसियों के स्तर को बेहतर करना है.” इसमें कहीं भी देश हित में जनता से अपील करने की बात नहीं लिखी है.

तो इसका मतलब कि लेख के अंत में की गयी यह अपील व्यक्तिगत रूप में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तहत जारी की गयी है एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जो वेतन भोगी अधिकारी है और जिसके नाम के पहले पूर्व पदनाम शाश्वत भाव से चस्पा है. अंग्रेजी अखबार में छपे इस लेख के अंत में भी लेखक का परिचय “प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश” के रूप में दिया गया है. काटजू साहेब ने जनता को पढ़ाने के लिए इस लेख को अपने जिस ब्लॉग में डाला है उस ब्लॉग का पता भी “जस्टिसकाटजू.ब्लागस्पाट” है. यानि यह सिद्ध हो गया कि यह लेख अगर प्रेस कौंसिल के अधिकारी और वेतन-भोगी अध्यक्ष ने नहीं तो सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति (भूतपूर्व) ने लिखा है.

अब इसी लेख के एक अन्य भाग में आयें. न्यायमूर्ति  काटजू ने एक जगह कहा कि “उनके समर्थक कहते हैं कि मोदी का (उपर के पैरे में २००२ में हजारों मुसलमानों के हत्या का जिक्र है) नरसंहार में कोई हाथ नहीं है और यह भी कहते हैं कि किसी भी कानून कि अदालत ने उन्हें दोषी करार नहीं दिया है. मैं अपनी न्यायपालिका पर कोई टिपण्णी नहीं करना चाहता लेकिन निश्चित ही मैं इस कहानी पर विश्वास नहीं कर सकता मोदी का २००२ की घटनाओं में हाथ नहीं था. वह गुजरात के मुख्यमंत्री उस समय थे जब इतने बड़े पैमाने पर ये वीभत्स घटनाएँ हुई. क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि उनमें उनका कोई हाथ नहीं था? कम से कम मेरे लिए यह विश्वास कर पाना असंभव है”.

यह कहने के एक पैरा बाद जस्टिस काटजू कहते है- “मैं इससे ज्यादा इस मुद्दे की गहरे में नहीं जा रहा हूँ क्योंकि यह मामला अदालत के विचाराधीन है”. हम पत्रकार के रूप में यह जानना चाहते हैं कि क्या देश की सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यानि “न्यायमूर्ति” का, फैसले से पूर्व यह जानते हुए भी कि मामला नीचे की कई अदालतों में विचाराधीन है मोदी को हत्याओं का आरोपी मानना न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगा? विवादों में रहने की एक अन्य घटना लें. पिछले साल मई के उत्तरार्ध में जस्टिस काटजू पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलकर बाहर निकले और पत्रकारों से कहा “मैं बंगाल की और देश की जनता से कहना चाहता हूँ कि ममता बनर्जी के रूप में उन्हें एक महान नेता मिला है. वह एक ऐसी नेता हैं जिनमे महान गुण हैं”.

लेकिन तीन महीने बाद “न्यायमूर्ति” ने कहा “मेरा विश्वास है कि वह (ममता) भारत सरीखे प्रजातंत्र में राजनीतिक नेता बनने के लिए सर्वथा योग्य हैं”. हम मूर्तियों से आशीर्वाद लेते हैं. अब मान लीजिये पहले आशीर्वाद के तहत जनता ममता को वोट देदे तो दूसरे आशीर्वाद पर ठीक उल्टा व्यवहार कैसे करे क्योंकि भरतीय प्रजातान्त्रिक संविधान के अनुसार पांच साल बाद ही उनकी योग्यता का फैसला हो सकता है. समाज सुधार करना है और देश के ९० प्रतिशत जाहिलों (जैसा की जस्टिस काटजू ने कहा है) को जहालत से निकलना है तो सरकारी बंगला, लाल बत्ती, अधिकारी की हैसियत तथा पगार तो छोड़नी होगी. देश न्यायमूर्ति को सर आँखों में बैठा सकता है पर मूर्ति के रूप में, वेतन –याफ्ता के रूप में नहीं. ग़ालिब का शेर याद आता है

“ये मसाइले-तसव्वुफ़ ये तेरे बयान ग़ालिब,
तुझे हम वली समझते जो ना बादा-ख्वार होता”.

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

सत्ता वर्ग की छुई-मुई मानसिकता और सोशल मीडिया

पिछले जनवरी से जून महीने तक भारत ने गूगल से 358 विषय-सामग्रियां हटाने की “अपील” की। इनमें से 255 यानि 75 प्रतिशत ऐसी सामग्री थी जिनमें सरकार की आलोचना की गयी थी। भारत के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन अन्य देश हैं जिन्होंने इस तरह की अपील गूगल से की थी। जरा सोचें प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी अगर कोई सरकार अपनी आलोचना के प्रति इतनी असहनशील हो तो उस प्रजातंत्र की गुणवत्ता कैसी होगी।

एक बात औऱ गौर करें। अगर इस सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित करने के निर्बाध अधिकार हों तो क्या यह “अपील” सरकारी तंत्र के डंडा-शक्ति में नहीं बदल जाएगी? चूंकि यह अपील गूगल ने नहीं सुनी लिहाज़ा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इसे डंडा-शक्ति में बदलना चाहते हैं।

भंवरी देवी केस में सी.बी.आई की चार्जशीट में पेज नं. दस पर एक क्षेत्रीय चैनल का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि जैसे ही इस चैनल ने भंवरी देवी और एक मंत्री की सेक्स सी.डी होने की खबर दी वैसे ही मंत्री ने “अपने आदमियों से मामले का निपटारा करने संबंधी विचार-विमर्श किया”। एक तर्क यह हो सकता है कि अगर यह खबर न दी गयी होती तब भंवरी का अपहरण न होता और हत्या की आशंका न होती। दूसरा तर्क यह हो सकता है कि अगर यह खबर न दिखायी होती तब एक मंत्री प्रजातंत्र में कितना खतरनाक चरित्र रख सकता है, यह उजागर न होता। सोशल नेटवर्क की भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में एक बड़ी भूमिका रही है, लेकिन अगर कुछ नेताओं के खिलाफ की गयी टिप्पणी या फोटो नकारात्मक हैं तो क्या सोशल मीडिया को नियंत्रित किया जाना चाहिए?

तकनीकि ज्ञान को जब व्यवहार में लाया जाता है तब उसके प्रयोग की एक शर्त होती है। वह यह कि प्रयोग करने वाला उसे पूरी तरह समझता है और उपभोक्ता उसके सकारात्मक व नकारात्मक पहलू से पूरी तरह वाकिफ है। तेज़ रफ्तार की गाड़ी चलाने से दुर्घटना होती है, इस तर्कवाक्य की यह परिणति नहीं हो सकती कि मोटर-चलित वाहनों को बंद कर दिया जाए। परमाणु तकनीकि का इस्तेमाल ऊर्जा पैदा करने में होता है। यह ऊर्जा बिजली के रूप में विकास के लिए इस्तेमाल की जा सकती है और विस्फोट के लिए भी। सिब्बल का अंतर्राष्ट्रीय इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों को बुलाकर धमकाना, दुर्घटना की वजह से सड़क पर मोटर-चलित वाहनों को बंद करने जैसा है।

संभ्रान्तवर्गीय चरित्र की यह विशेषता है कि वह अपने बारे में सकारात्मक बातें ही सुनना पसंद करता है। नकारात्मक बातों से उसे व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह, प्रजातंत्र के खिलाफ साजिश व संपूर्ण मानवजाति के खिलाफ अपराध नज़र आने लगता है। ब्रिटेन में सन 1275 में स्कैंडलम-मैग्नेटम क़ानून पास किया गया था जो कि आज के मानहानि क़ानून का समूचे विश्व में उद्गम स्त्रोत रहा है। उस समय भी इसके पक्ष में दो तर्क दिए गए। पहला, संसद राष्ट्र के बेहतरीन आदमियों को अपमान से बचाना चाहता है और दूसरा कि अनियंत्रित आलोचना के डर से अच्छे लोग जनसेवा के कार्यों में नहीं आएंगे। पर हक़ीकत यह थी कि उस समय ब्रितानी क्राउन यानि सरकार कत्तई नहीं चाहती थी कि प्रजातंत्र के नाम पर ‘घटिया’ आम जनता राजा के सम्मान में गुस्ताखी करे। तब से लेकर आज तक मानहानि या अवमानना अपने विभिन्न स्वरूपों में दुनिया के तमाम देशों में काबिज़ है। कपिल सिब्बल का गुस्सा उनके संभ्रान्तवर्गीय चरित्र को बताता है।

भारत में मानहानि का क़ानून दफा 499 में आपराधिक श्रेणी में आता है। हालांकि दुनिया के तमाम देशों ने मानहानि को अपराध की श्रेणी से हटा लिया है लेकिन भारत में आज भी यह दीवानी व फौज़दारी दोनों श्रेणियों में रखा गया है। यह सही है कि कई बार जनअभिव्यक्ति समसामयिक सामुदायिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती और तब लगता है इसे नियंत्रित करने की ज़रूरत है लेकिन नियंत्रण की वकालत करने वाले एक मूल अवधारणा को भूल जाते हैं। इस तरह के फोरम उपलब्ध करा कर आप एक ओर समाज में तर्कशक्ति को बेहतर करते हैं और दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग को भी छुई-मुई की संकीर्ण मानसिकता से बचाते हैं। कपिल सिब्बल को याद रखना होगा न्यूयॉर्क टाइम वर्सेज सुलीवन में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का क्रांतिकारी फैसला, और साथ ही भारत में भी मशहूर नकीरन व ऑटोशंकर केस में सुप्रीमकोर्ट के फैसले। इन फैसलों में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जननेता को मानहानि के कानून की सुरक्षा कम मिलती है क्योंकि उसे यह मानकर चलना चाहिए कि सामान्य मानहानि के आरोपों को झेलने की क्षमता ही उसे जनता के बीच लायी है और साथ ही उसे अपनी बात कहने के लिए जनसंचार के माध्यम सहज उपलब्ध हैं। 

अमेरिका जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अगुआ माना जाता है, इस स्वतंत्रता के पीछे तीन मुख्य अवधारणाओं की मदद ली गयी है। पहला, खुला संवाद विचारों का एक मार्केट प्लेस तैयार करता है। एक ऐसा मार्केट प्लेस जो प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं के मंथन के बाद सत्य तक पहुंचता है। दूसरा, जनता को मुद्दों पर जितनी ही ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतना ही हम तार्किक स्वशासन की तरफ बढ़ेंगे। तीसरा, निर्बाध अभिव्यक्ति से जनता में एक आत्मतोष आता है जो कि प्रजातंत्र के प्रति विश्वास को बढ़ाता है। यही वजह है कि यूनिवर्सल डिक्लेयरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स के आर्टिकल 19 की व्याख्या करते हुए कार्यकारी निदेशक एन्ड्र्यू ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कोयले की खदान वाली उस चिड़िया की संज्ञा दी है जो कि खदान में ज़हरीले गैस की पूर्व सूचना देती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को उनमुक्त छोड़ना समाज के उस ज़हर को बाहर निकालने का काम करता है।

कई बार मुद्दों पर उठे विवाद की सामयिकता देखी जाती है। कपिल सिब्बल की नाराज़गी से यह ध्वनि निकलती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनाक्रोश, जिसे न केवल इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया बल्कि सोशल मीडिया ने भी पूरी तरह उभारा, एक आक्रोश का कारण है। सरकार को पहले भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से इस मुद्दे को लेकर भारी नाराज़गी थी अब सोशल मीडिया भी इनके गुस्से का शिकार बन रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस मुद्दे को इस समय उठाना सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। इन्दिरा गांधी ने भी इमरजेंसी लगाने के एक दिन पहले जनता को कहा था- चूंकि वह ग़रीबों के लिए काम कर रही हैं इसलिए अभिजात्य वर्ग नाराज़ है लिहाज़ा आपातकाल लगाना मजबूरी हो गयी है। आज कपिल सिब्बल भी उसी भाव में आते हुए यह बता रहे हैं कि सोशल मीडिया में इस तरह की उन्मुक्त अभिव्यक्ति से साम्प्रदायिक सौहार्द पर खतरा हो सकता है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

मीडिया की नीयत पर बेजा सवाल

जब ब्रिटेन में हाउस ऑफ लॉर्डस ने दुनिया भर में उपलब्ध मशहूर किताब “स्पाईकैचर” के लेखक पीटर राइट को विश्वासघाती (ट्रेटर) करार दिया तब तत्कालीन संपादकों ने इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं प्रेस की आज़ादी के खिलाफ बताया। “मिरर” ने “यू फूल्स” शीर्षक एक बैनर हेडलाइन दी।

चूंकि हाउस ऑफ लॉर्डस का यह फैसला उसकी तत्कालीन न्यायिक शक्ति के तहत हुआ था, लिहाज़ा कुछ लोगों ने इसे खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाना चाहा, लेकिन ब्रिटेन की अदालतों ने इस टिप्पणी पर कोई भी कार्रवाई यह कह कर नहीं की कि यह अवमानना नहीं है, हां अगर अख़बार ने “यू क्रुकेड”(चालबाज़) कहा होता तब यह अवमानना की श्रेणी में आता, क्योंकि तब अखबार ने संस्था की नीयत, न कि बुद्धिमत्ता पर शक किया होता। 

मीडिया की नीयत पर सीधे आरोप लगाए जा रहे हैं और वह भी गणमान्य संस्थाओं व उनके प्रतिनिधियों द्वारा। ज़रूरत यह है कि एक अनौपचारिक लेकिन सशक्त संस्था के रूप में मीडिया और सतर्कता बरते और जनता के प्रति अपनी उपादेयता को और सार्थक बनाए। अनौपचारिक प्रजातांत्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाना सत्ता का शगल है पर इन संस्थाओं का अस्तित्व एक ही वजह से अक्षुण्ण रहेगा और वह है जनता के प्रति अपनी उपादेयता सिद्ध करना।

बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय की एक सम्मानित महिला जज ने अपनी संपत्ति व देनदारी (एसेट्स एण्ड लाइबिलिटीज़) कॉलम में देनदारी के रूप में दो बेटियों का विवाह करना लिखा। एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने प्रथम पेज पर यह खबर छापी जिसका शीर्षक था “उच्च न्यायालय की जज का कहना है कि उनकी दो बेटियां देनदारी हैं”। आरोप यह लगाया गया कि इस अख़बार ने सेन्सेशन पैदा करने की गलत नीयत से तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश किया। यह भी कहा गया कि जज महोदया को ऐसा लिखने की कोई ज़रूरत नहीं थी क्योंकि देनदारी सिर्फ कानूनी देनदारी होती है, लेकिन ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा यह थी कि उनको बेटियों की शादी में धन खर्च करना पड़ेगा।

अब अगर इस खबर को हम सकारात्मक रूप से लें तो इसका यह भी मतलब निकलता है कि अखबार की मंशा यह बताने की थी कि शादियों में खर्च एक सामाजिक कुरीति है औऱ यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की माननीया जज भी इससे त्रस्त हैं। इस खबर का इस कुरीति के खिलाफ एक अच्छा सामाजिक संदेश भी जाता है। यह भी कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किसी भी बम-विस्फोट की घटना के तत्काल बाद आए किसी ई-मेल, जिसमें कि दावा किया गया है कि जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने घटना की ज़िम्मेदारी ली है, को तत्काल दिखाना शुरू कर देती है और नतीज़ा यह होता है कि भारत के एक सम्प्रदाय के सभी लोगों को आतंकवादी बना दिया जाता है। इस वाक्य में तार्किक दोष है। जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर का मतलब किसी सम्प्रदाय विशेष के सारे लोगों से नहीं होता, उसी तरह जिस तरह गाय जानवर होती है लेकिन हर जानवर गाय नहीं होता। दूसरा, चैनल यह नहीं कहता जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने यह किया है बल्कि वह यह कहता है कि उसे एक ई-मेल प्राप्त हुआ है जिसमें यह दावा किया गया है।

एक अन्य आरोप लगा कि जिस देश में 80 प्रतिशत गरीबी व अभाव में जी रहा है उस देश में मीडिया एक फिल्म अभिनेता की पत्नी को एक बच्चा होगा या जुड़वा होंगे यह दिखा रहा है, लैक्मे फैशन शो दिखा रहा है जबकि विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। पहला यह कि भारतीय मीडिया अगर गरीबी को न दिखा रही होती तो शायद समाज के सुविधाभोगी और शक्तिसंपन्न वर्ग को शायद इसका पता भी न चलता। दूसरा, मीडिया ने इस तरह की खबरें दिखाईं तो कितनी बार अवमानना की शक्ति से सम्पन्न न्यायपालिका में बैठे लोगों ने अपनी तरफ से (सुओ मोटो) उसका संज्ञान लिया और कितनी बार कार्यपालिका ने उसे तरजीह दी? विश्व का कोई अन्य प्रजातांत्रिक देश नहीं है जिसमें कि मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन से 12 सांसद निकाल दिए जाएं। टूजी स्पेक्ट्रम की खबर जब 2007 में कुछ मीडिया संस्थाओं ने दी तब इसका संज्ञान नहीं लिया गया लेकिन जब एक विश्वसनीय सी.ए.जी ने इस राज से परदा उठाया तब मीडिया का स्वर ऊंचा हुआ और अन्य संस्थाओं ने संज्ञान लेना शुरू किया।   

मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की बात फिर जोर-शोर से उठी है। पत्र-सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर आज भी दो हफ्ते पहले हुआ मंत्रिमण्डल का फैसला देखा जा सकता है। इस फैसले के तहत अगर किसी चैनल ने प्रोग्राम संहिता का पांच बार से ज़्यादा का उल्लंघन किया तो दस साल के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस का पुनर्नवीनीकरण नहीं होगा। अब ज़रा कैबिनेट के इस फैसले का व्यावहारिक पक्ष देखें। अगर कोई चैनल पहले ही साल पांच बार इस संहिता का उल्लंघन करे तब भी अगले नौ साल तक यह फैसला उसे उल्लंघन करने की इजाज़त देता रहेगा। दूसरा, अगर मान लीजिए कि उसने चार बार उल्लंघन किया तो क्या यह डर नहीं है कि पांचवे उल्लंघन की धमकी देकर सरकार उससे जो चाहे करवाए खास करके अगर उसका दसवां साल चुनाव का वर्ष है। तीसरा, अगर तथाकथित संहिता के उल्लंघन के तहत सरकारी अमले ने उसका लाइसेंस दोबारा जारी नहीं किया लेकिन अगले दो साल में वह कोर्ट से बरी हो जाता है तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?

फिर, क्या पहले से बनाए गए दर्जनों कानून सक्षम नहीं हैं? संविधान के अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आठ प्रतिबंध लगाए गए हैं। उन प्रतिबंधों के तहत सरकार को कानून बनाने के अधिकार है। यह प्रतिबंध हैं – भारत की संप्रभुता व अखण्डता के हित में, राज्य की सुरक्षा के हित में, किसी मित्र देश के साथ मैत्रिक संबंध के हित में, जन व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता, अदालत की अवमानना के संबंध में, मानहानि एवं अपराध के लिए उकसाने के संदर्भ में।

संविधान निर्माताओं ने इस बात को सुनिश्चित किया कि इन आठों में कोई भी प्रतिबंध जनहित को लेकर न हो। यानि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सरकार जनहित के नाम पर बाधित न कर सके। इसकी स्पष्ट पुष्टि इसी अनुच्छेद के 19(6) में होती है जहां व्यवसाय के अधिकार संबंधी प्रतिबंधों को लेकर सरकार को जनहित में फैसला करने का अधिकार है। इसका स्पष्ट मतलब यह है कि संविधान निर्माताओं ने सरकार को मीडिया के विषय-वस्तु को जनहित में नियंत्रित करने का अधिकार नहीं दिया है।

स्पष्ट है कि अन्य सभी आठ प्रतिबंधों पर पहले से ही कानून बने हुए हैं और वह सारे कानून इन प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति या मीडिया को दंडित कर सकते हैं, लिहाज़ा कोई औचित्य नहीं बनता कि सरकार मीडिया की विषय-वस्तु से कोई छेड़छाड़ करे और कोई नया कानून बनाए। संस्थाओं को विकसित होने में समय लगता है लेकिन दो साल में जो उपलब्धि हासिल की है उससे स्पष्ट है कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने वाले समय में विश्व के लिए एक उदाहरण पेश कर सकती है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हो चुका है.

मीडिया की भूमिका और बदलते चश्मे

समुन्नत प्रजातंत्र में संस्थाएं एक-दूसरे पर दबाव डालती हैं। इसका लाभ यह होता है कि हर संस्था में एक स्वसुधारात्मक प्रक्रिया स्वत: जन्म लेती है। लेकिन कई बार इस दबाव में संस्थाओं को इतना नीचा दिखाना शुरू किया जाता है जिससे उसके अस्तित्व व उपादेयता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। जटिल सामाजिक व्यवस्था में संस्थाओं में निरंतर पुनर्परिभाषित करने की एक होड़ होती है।

जैसे-जैसे समाज में शिक्षाजनित तर्कशक्ति बेहतर होती है वैसे-वैसे इन संस्थाओं को अपनी भूमिका बदलनी पड़ती है ताकि नई अपेक्षाओं के अनुरूप अपने को ढाला जा सके। मीडिया पर फिर से इस तरह के दबाव पड़ रहे हैं जिनमें कुछ सार्थक व तार्किक हैं जबकि कुछ में कुतर्क का सहारा लिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया था कि मीडिया स्वयं ही आरोपकर्ता, जांचकर्ता व जज बन जाती है जबकि एक आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक अदालत उसे सजा न दे दे। भट्टा पारसौल में पुलिस-ग्रामीण झड़प के दौरान पी.ए.सी के जवानों ने गांव की महिलाओं से बलात्कार किया, यह आरोप कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लगाया। कुछ दिन बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार की टीम ने कहा कि यह आरोप ग़लत है। उसके कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रीय महिला आयोग का दल गया, उसने ऐलान किया कि बलात्कार हुआ है। इस बीच प्रदेश सरकार लगातार कहती रही कि कोई बलात्कार नहीं हुआ है, जबकि केंद्र सरकार की मंत्री अंबिका सोनी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार की रिपोर्ट पर संदेह जताते हुए कहा कि महज एक रिपोर्ट के आधार पर सभी आरोप खारिज नहीं किए जा सकते। “वहां जाकर हालात का जायज़ा लेने वाली अन्य एजेंसियों ने पुष्टि की है कि महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार किया गया है। हम सब इसके ख़िलाफ हैं, देखना होगा कि इसके विपरीत रिपोर्ट कहां से आयी है”।

इस पूरे प्रकरण में शुरू के दो दिन छोंड़ दें तो किसी भी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस ख़बर को लेकर पूरा संयम बरता क्योंकि महिलाओं के सम्मान का सवाल था। अभी पिछले हफ्ते इस मामले में अदालत के सख्त आदेश के बाद 16 पी.ए.सी जवानों, जिसमें एक कमाण्डर भी है, के से ख़िलाफ मुकदमा दायर हुआ है और वह भी तब जबकि राज्य सरकार को हाईकोर्ट तक कोई राहत नहीं मिली। मीडिया अगर प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री की सलाह माने तब न तो यह ख़बर देनी चाहिए, न ही टूजी घोटाले में फंसे ए.राजा की खबर। और अगर जाती भी तो सिर्फ वह यह कि (अ) केंद्र के एक मंत्री पर टूजी स्पेक्ट्रम के तथाकथित घोटाले में शामिल होने का आरोप है; (ब) कि तथाकथित घोटाले के आरोप में एक मंत्री जेल में है और (स) कि एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री की बेटी जो कि सांसद भी है वह भी जेल में है। उसी तरह भट्टा पारसौल के बलात्कार के मामले में अगर राहुल गांधी और उनके तत्काल बाद उनकी सरकार की मंत्री अंबिका सोनी या फिर महिला आयोग की बात मानी जाए तब ख़बर यह बनती है कि बलात्कार हुआ। लेकिन तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को नज़रअंदाज करना पड़ेगा।

डिक्शनरी और साहित्य में अंतर होता है। डिक्शनरी ज़्यादा सत्य होती है। साहित्य में सत्य का अंश कम विवेचना का अंश ज़्यादा होता है लेकिन डिक्शनरी पाठ्यक्रम में नहीं होती, साहित्य होता है। मीडिया अगर प्रेस नोट पर आधारित खबर होती तो दूरदर्शन या आकाशवाणी से अधिक कुछ न होती। अब मान लीजिए कि मुकदमा क़ायम हो जाता है लेकिन निचली अदालत साक्ष्य के अभाव में या कमज़ोर प्रॉशिक्यूशन के कारण अभियुक्तों को बरी कर देती है तब राहुल गांधी और मंत्री महोदया क्या कहेंगी? और अगर मान लीजिए कि ऊपरी अदालत ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए मुकदमा सही पाया और सज़ा दी तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग क्या कहेगा?

यह भी कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किसी भी बम-विस्फोट की घटना के तत्काल बाद आए किसी ई-मेल, जिसमें कि दावा किया गया है कि जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने घटना की ज़िम्मेदारी ली है, को तत्काल दिखाना शुरू कर देती है और नतीज़ा यह होता है कि भारत के एक सम्प्रदाय के सभी लोगों को आतंकवादी बना दिया जाता है। इस वाक्य में तार्किक दोष है। जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर का मतलब किसी सम्प्रदाय विशेष के सारे लोगों से नहीं होता, उसी तरह जिस तरह गाय जानवर होती है लेकिन हर जानवर गाय नहीं होता। दूसरा, चैनल यह नहीं कहता जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने यह किया है बल्कि वह यह कहता है कि उसे एक ई-मेल प्राप्त हुआ है जिसमें यह दावा किया गया है।

एक अन्य आरोप लगा कि जिस देश में 80 प्रतिशत गरीबी व अभाव में जी रहा है उस देश में मीडिया एक फिल्म अभिनेता की पत्नी को एक बच्चा होगा या जुड़वा होंगे यह दिखा रहा है, लैक्मे फैशन शो दिखा रहा है जबकि विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। पहला यह कि भारतीय मीडिया अगर गरीबी को न दिखा रही होती तो शायद समाज के सुविधाभोगी और शक्तिसंपन्न वर्ग को शायद इसका पता भी न चलता। दूसरा, मीडिया ने इस तरह की खबरें दिखाईं तो कितनी बार अवमानना की शक्ति से सम्पन्न न्यायपालिका में बैठे लोगों ने अपनी तरफ से (सुओ मोटो) उसका संज्ञान लिया और कितनी बार कार्यपालिका ने उसे तरजीह दी? विश्व का कोई अन्य प्रजातांत्रिक देश नहीं है जिसमें कि मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन से 12 सांसद निकाल दिए जाएं। टूजी स्पेक्ट्रम की खबर जब 2007 में कुछ मीडिया संस्थाओं ने दी तब इसका संज्ञान नहीं लिया गया लेकिन जब एक विश्वसनीय सी.ए.जी ने इस राज से परदा उठाया तब मीडिया का स्वर ऊंचा हुआ और अन्य संस्थाओं ने संज्ञान लेना शुरू किया।  

मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की बात फिर जोर-शोर से उठी है। पत्र-सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर आज भी दो हफ्ते पहले हुआ मंत्रिमण्डल का फैसला देखा जा सकता है। इस फैसले के तहत अगर किसी चैनल ने प्रोग्राम संहिता का पांच बार से ज़्यादा का उल्लंघन किया तो दस साल के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस का पुनर्नवीनीकरण नहीं होगा। अब ज़रा कैबिनेट के इस फैसले का व्यावहारिक पक्ष देखें। अगर कोई चैनल पहले ही साल पांच बार इस संहिता का उल्लंघन करे तब भी अगले नौ साल तक यह फैसला उसे उल्लंघन करने की इजाज़त देता रहेगा। दूसरा, अगर मान लीजिए कि उसने चार बार उल्लंघन किया तो क्या यह डर नहीं है कि पांचवे उल्लंघन की धमकी देकर सरकार उससे जो चाहे करवाए खास करके अगर उसका दसवां साल चुनाव का वर्ष है। तीसरा, अगर तथाकथित संहिता के उल्लंघन के तहत सरकारी अमले ने उसका लाइसेंस दोबारा जारी नहीं किया लेकिन अगले दो साल में वह कोर्ट से बरी हो जाता है तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.