90 फीसदी मूर्खों को सुधारना है तो सरकारी बंगला और लाल बत्‍ती छोड़नी होगी

: “तुझे हम वली समझते  जो ना बादा- ख्वार होता” : हमारे देश में जजों को न्यायमूर्ति कहा जाता है. हम सब जानते हैं कि मूर्ति भगवान की होती है इन्सान की नहीं. लिहाज़ा जजों को एक तरह से ठीक भगवान के नीचे का दर्ज़ा दिया गया है. यहाँ तक कि अवकाश प्राप्ति के बाद भी जजों के नाम के आगे यह महिमा-मंडन जारी रहता है. मंत्री हो या प्रधानमंत्री, कैबिनेट सचिव हो या संवैधानिक पड़ पर रहा सीएजी या विधायिका या कार्यपालिका के किसी बड़े से बड़े ओहदेदार को भी यह सम्मान हासिल नहीं है. ना तो वह मूर्ति होता है ना हीं उसके नाम के साथ पूर्व पदनाम जुड़ा होता है.

सत्ता वर्ग की छुई-मुई मानसिकता और सोशल मीडिया

पिछले जनवरी से जून महीने तक भारत ने गूगल से 358 विषय-सामग्रियां हटाने की “अपील” की। इनमें से 255 यानि 75 प्रतिशत ऐसी सामग्री थी जिनमें सरकार की आलोचना की गयी थी। भारत के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन अन्य देश हैं जिन्होंने इस तरह की अपील गूगल से की थी। जरा सोचें प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी अगर कोई सरकार अपनी आलोचना के प्रति इतनी असहनशील हो तो उस प्रजातंत्र की गुणवत्ता कैसी होगी।

मीडिया की नीयत पर बेजा सवाल

जब ब्रिटेन में हाउस ऑफ लॉर्डस ने दुनिया भर में उपलब्ध मशहूर किताब “स्पाईकैचर” के लेखक पीटर राइट को विश्वासघाती (ट्रेटर) करार दिया तब तत्कालीन संपादकों ने इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं प्रेस की आज़ादी के खिलाफ बताया। “मिरर” ने “यू फूल्स” शीर्षक एक बैनर हेडलाइन दी।

मीडिया की भूमिका और बदलते चश्मे

समुन्नत प्रजातंत्र में संस्थाएं एक-दूसरे पर दबाव डालती हैं। इसका लाभ यह होता है कि हर संस्था में एक स्वसुधारात्मक प्रक्रिया स्वत: जन्म लेती है। लेकिन कई बार इस दबाव में संस्थाओं को इतना नीचा दिखाना शुरू किया जाता है जिससे उसके अस्तित्व व उपादेयता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। जटिल सामाजिक व्यवस्था में संस्थाओं में निरंतर पुनर्परिभाषित करने की एक होड़ होती है।