: खूबसूरत ढलानों पर : क्या मनुष्य होना कोई अपराध है? संवेदनशील और सहज होना पाप है? स्वार्थ से परे या परोक्ष और सूक्ष्म आत्मीय, अतीन्द्रीय स्वार्थ के साथ किसी के दुख में, किसी की पीड़ा में उसके साथ हो जाना या उसे साथ ले लेना कोई कपट है, कोई छल है? कभी-कभी बहुत अटपटे सवाल मन में उठते हैं और उनके जवाब नहीं मिलते। यद्यपि इन सवालों की आज की इस तथाकथित सभ्य दुनिया में कोई गुंजाइश नहीं रह गयी है लेकिन उस मन का क्या करें, जो मेरा है, उन लोगों का क्या करें, जिनके पास मेरे जैसा ही मन है।
जिस समाज में धनिकों, वणिकों को गोष्ठियों, सभाओं की सदारत के लिए बुलाया जाता हो, जिस समाज में अनपढ़ और अराजक किस्म के मंत्रियों से कला प्रदर्शनियों का शुभारम्भ कराया जाता हो, जिस समाज में विचार और रचना को धनपशुओं की कृपा का मोहताज होना पड़ रहा हो, वहां इस तरह के निरर्थक प्रश्नों का क्या मतलब लेकिन उस चैतन्यलोक का क्या करू, जो थोड़ा भी अंधेरा बर्दाश्त नहीं कर पाता है, उन लोगों का क्या करूं, जिनके पास मेरी ही तरह की चेतनता है।
यह बड़ी विचित्र सी दुनिया है, अपने चमचमाते अंधेरे के साथ चारों ओर पसरती हुई, अपनी महकती गंदगी से सबको सराबोर करती हुई, अपनी लक-दक छलाकर्षी मदहोशी को सजग, सचेष्ट पेशेवर अंदाज की तरह व्याख्यायित करती हुई, जीवन के सरस सहज स्रोत को सुखाती, खरीदती और लूटती हुई, अर्थ और स्वार्थ की बेसुध व्यर्थता लुटाती हुई। क्या यही नयी और आधुनिक कही जाने वाली दुनिया है, जहां सब कुछ बिकाऊ है, सब कुछ पेशेवराना है, जहां हर हँसी के पीछे घड़ियाली प्रपंच है, जहां हर पुकार के पीछे ठगी का दांव है, जहां हर पीड़ा के पीछे आक्टोपसी छल है, जहां सब कुछ जो दिखता है, वह वैसा ही नहीं है। हम कहां आ गये, किधर, किस रास्ते पर। कहां जायेगा ये रास्ता। यहां तो ज्यादातर लोग अकेले हैं, अजनबी हैं| यहां तो एक मां के दो बच्चे एक दूसरे को पहचानने से इनकार कर रहे हैं। यहां तो जिसके पास जितनी ईंट है, जितनी मिट्टी है, वह उतना ही बड़ा आदमी है। यहां तो जिसके कपड़े जितने महंगे और साफ हैं, वह उतना ही मानिंद है। यहां जो जितना बड़ा झूठ बोल कर जितनी आसानी से उसे सच साबित कर सकता है, वह उतना ही स्तुत्य है। यहां तो मंदिर-मसजिद भी नशे और यौवनाकुल भटकाव की शरणस्थलियां हैं। यहां तो बिना शिक्षा-दीक्षा दिये द्रोण एकलव्यों के हाथ काट लेना चाहता है। यहां भूख से बिलबिलाते बच्चों, निरुपायता में आत्महंता की नियति चुनते गरीबों, किसानों के जीवन से मजाक करने वाले आलीशान गाड़ियों में घूमते हैं। यहां अपनी प्रलापी वाकपटुता और पाखंडी वाचालता के बूते पर्णकुटियों से शानदार स्वर्णकुटियों तक पहुंचने वाले संतों का आरामचरित देखकर भी लोग उनकी लीलाओं का हिस्सा बनने में संकोच नहीं करते। यहां आदर्श, नैतिकता और धर्म के प्रवचन-प्रपंच के पीछे भावाकुल भक्तों की जेब काटने, उन्हें अपंग बना देने का उपक्रम बेरोक-टोक चलता रहता है।
यह बड़ी अजीब दुनिया है। यहां सभी प्रोफेशनल्स हैं, सब कुछ स्पांसर्ड है। यह बहुत सुंदर है पर बहुत खतरनाक है, बड़ा लुभावना पर उतना ही डरावना भी। बिल्कुल लाक्षागृह की तरह। शायद हम सभी उसके भीतर हैं। लोग गहरी नींद में हैं। सौंदर्य जितना गहरा होता है, उतना ही मारक भी होता है। आम आदमी की क्या बिसात, वह तो हिटलर और मुसोलिनी जैसे क्रूर, निर्दय और दुस्साहसी व्यक्तियों की चेतना को भी बड़े शून्य की तरह, वैक्यूम की तरह सोख लेता है, निष्चेष्ट, निष्पंद और जड़ बना देता है।
जो लोग इस मादक, मोहक और तिलस्मी सौंदर्य की सुखद उलझन में फँसे हुए हैं, वे उससे बाहर निकल पायेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। वे खतरों भरी सच्चाई से पूरी तरह नावाकिफ हैं। जिनकी समझ में सच्चाई आ चुकी है, वे बेचैन हैं, छटपटा रहे हैं, लोगों को आगाह कर रहे हैं, डुगडुगी पीट रहे हैं लेकिन पता नहीं वे आवाजें लोगों तक पहुंच पा रही हैं या नहीं। शायद यहीं कहीं मेरे सवाल का जवाब है। मैं खुद एक चीखती हुई संवेदना के अलावा कुछ और नहीं हूं। कोई सुन रहा हो तो ठीक, नहीं सुन रहा हो तो ठीक। मुझे या उन्हें भी, जो मेरी ही तरह हैं, कम से कम इस बात का दुख तो नहीं होगा कि अपने कर्तव्य से च्युत हो गये, जो करना था, नहीं किया। इस नयी दुनिया में हम कुछ पुराने किस्म के लोग हैं, जो अपने सार्थक नयेपन के बावजूद नये नहीं दिखते, नये नहीं लगते। शायद उन अर्थों में हम नये नहीं हैं, जिन अर्थों को यह बदलती दुनिया नया होना बताती है। इस लाक्षागृह को तो किसी न किसी दिन कोई लपट घेरेगी ही, वस चिंता है तो उन लोगों की, जो रास्ता भूल गये, जो पथ भटक गये, जो मोहग्रस्त हो गये, जिन्हें लालच ने जकड़ लिया, जिन्होंने अपनी स्मृति खो दी और इस नाते अपनी सहज मानवीयता से वंचित हो गये। जो अपनी जड़ों से
कट कर किसी लोभ या प्रवंचना में ऊपर चढ़े और ऊंचे पहाड़ों की नर्म, मखमली और खूबसूरत ढलानों पर अटक गये हैं, उन्हें बचाना भी तो हैं। आखिर हैं तो वे अपने ही।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 08853002001 के जरिए किया जा सकता है.






