आजकल "सोच" शब्द को मित्रों ने स्त्रीलिंग कर दिया है, भले ही पुराने जानकार उसे अब भी पुल्लिंग लिखते हैं। ऐसे ही "सामर्थ्य" भी जाने-अनजाने (अनजाने की सम्भावना ही ज़्यादा दिखाई देती है!) स्त्रीलिंग हो गया है। मेरी सोच! उसकी सामर्थ्य!…पढ़कर बेचैनी होती है। मैं शुद्धिवादी नहीं हूँ। आत्मा को स्त्रीलिंग लिखता हूँ, भले ही वह अपने संस्कृत मूल में पुल्लिंग है। संस्कृत के चर्चा शब्द को उर्दू वाले अपने यहाँ पुल्लिंग करके ले गए, उनकी मरजी।
अरबी का क़लम हिंदी में आकर स्त्रीलिंग हो गया। अनजाने ही अगर चलन में शब्दों के लिंग बदल जाते हों, या घिस कर शब्द दूसरा रूप ले लें, तो उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। पर मेरा सोच इस मामले यह है कि यथासंभव सही प्रयोग करने की सजग कोशिश भी बनी रहनी चाहिए। भाषा हमारा सबसे जानदार माध्यम है। वही हमारी अभिव्यक्ति का आधार है, हमारी ताकत है। इसलिए भाषा हमसे शायद जिम्मेवारी के बरताव की भी अपेक्षा रखती है। हाँ, आंचलिक प्रयोग अलग चीज़ हैं। अंचल में जो चलन में है, सब सही है। वह भाषा का स्थानीय, मान्य रूप है।
पश्चिमी राजस्थान में कुछ जगह साड़ी को साड़ा कहा जाता है। पंजाब में साइकिल खड़ा होता है और ट्रक खड़ी होती है। बिहार ऐसे प्रयोगों का स्वर्ग है। बिहार में आंचलिक छाप वाली हिंदी सुनकर अच्छा लगता है और कभी सुधार की ज़रूरत अनुभव नहीं होती। मगर जब भाषा के साधु या मानक रूप की बात आए, उसमें एक अनुशासन बनाए रखना ज़रूरी लगता है, जो बिखराव को थोड़ा रोक सके। लेखक या जानकार जहाँ जानते-बूझते भाषा से खेलते हैं, वह और बात होती है। पर जानकारी के अभाव में निपट लापरवाही में प्रयोग बिगड़ते चले जाएँ तो भाषा अपना ओज और सोज़ दोनों खो देगी। नहीं?
ओम थानवी के फेसबुक वाल से साभार.