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सुख-दुख...

बीस बरस की सपा और प्रधानमंत्री पद की बेचैनी

 

बीस वर्ष की उम्र युवक/युवतियों में तरूणाई लेकर आती है। पूरी दुनिया रंगीन लगती है। सपने देखने और उन्हें पूरा करने की ललक चेहरे पर दिखती है तो गजब का आत्मविश्वास होता है, लेकिन किसी राजनैतिक दल के लिए बीस वर्ष का सफर कोई खास मायने नहीं रखते हैं। राजनीति के मैदान में यह छोटा सा पीरियड होता है। मगर समाजवादी पार्टी जैसे दलों के लिए यह बात नहीं कही जा सकती है जिसने 04 अक्टूबर को अपने बीस वर्ष पूरे कर लिये। ऐसा इस लिए कहा जा रहा है क्योंकि समाजवादी पार्टी हो या फिर बहुजन समाज पार्टी अथवा इनके जैसे देश-प्रदेश में फैले तमाम राजनैतिक दल जो किसी विचार धारा की बजाए एक व्यक्ति विशेष(नेता) पर निर्भर रहते हैं। 

 

बीस वर्ष की उम्र युवक/युवतियों में तरूणाई लेकर आती है। पूरी दुनिया रंगीन लगती है। सपने देखने और उन्हें पूरा करने की ललक चेहरे पर दिखती है तो गजब का आत्मविश्वास होता है, लेकिन किसी राजनैतिक दल के लिए बीस वर्ष का सफर कोई खास मायने नहीं रखते हैं। राजनीति के मैदान में यह छोटा सा पीरियड होता है। मगर समाजवादी पार्टी जैसे दलों के लिए यह बात नहीं कही जा सकती है जिसने 04 अक्टूबर को अपने बीस वर्ष पूरे कर लिये। ऐसा इस लिए कहा जा रहा है क्योंकि समाजवादी पार्टी हो या फिर बहुजन समाज पार्टी अथवा इनके जैसे देश-प्रदेश में फैले तमाम राजनैतिक दल जो किसी विचार धारा की बजाए एक व्यक्ति विशेष(नेता) पर निर्भर रहते हैं। 
 
इन दलों की राजनीति का पूरा तानाबाना इसी शख्स की सोच पर ही निर्भर करता है। ऐसे शख्सों को कहीं ‘सुप्रीमो’ तो कहीं पार्टी प्रमुख या मुखिया, नेताजी आदि तमाम नामों से बुलाया जाता है। ऐसी पार्टियों में सभी फैसले लोकतांत्रिक तरीके से किये जाने का नाटक भी होता है और छोटे-बड़े फैसले लेने के लिए बैठकें तथा कार्यकारिणी बुलाई जाती है, परंतु इसके कोई खास मायने नहीं होते। यह बात राजनीति की जरा भी जानकारी रखने वालों को अच्छी तरह से पता है। पार्टी का नेतृत्व ऐसे नेताओं और बाद में उनके पुत्रों अथवा परिवार के सदस्यों के हाथों में ही रहता है। व्यक्ति विशेष की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए बने इन दलो में भले ही दिग्गज और काबिल नेताओं की कतार लगी हो लेकिन उनको पार्टी के नेतृत्व और उसके फैसलों को चुनौती देने का अधिकार नहीं होता। फिर भी अगर कोई चुनौती देने की हिमाकत कर लेता है तो उसे मिनटों में बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। चाहें उसकी पार्टी में जिनती भी हैसियत क्यों न हो। ऐसा सपा-बसपा जैसे तमाम दलों में समय-समय पर देखा जाता रहा है।
 
समाजवादी पार्टी इस बात का जीता जागता प्रमाण है। ताउम्र नेताजी के नाम से प्रसिद्ध मुलायम सिंह यादव सपा का नेतृत्व करते रहे और इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़कर उनका बगलगीर उनका कुनबा ही बना रहा। कुनबे के अलावा पार्टी में सिर्फ ऐसे लोगों को ही लम्बे समय तक रखा गया जो किसी कौंम का वोट बैंक हासिल करने की कुबत रखते हों। सपा को मुस्लिम वोटों के लिए आजम खॉ की जरूरत पड़ती है तो वैश्य वोटरों को खुश करने के लिए उनके पास नरेश अग्रवाल जैसे नेता मौजूद हैं। इसी प्रकार ठाकुरों पर डोरे डालने के लिए निर्दल विधायक और अखिलेश सरकार में मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया जैसे कुछ नेताओं को सपा अपने करीब बनाए रखती है, लेकिन जब मुलायम का मन दिल्ली की कुर्सी पर आ जाता है तो वह अपना उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही चुनते हैं यह जानते हुए भी कि पार्टी में उससे ज्यादा काबिल नेता मौजूद हैं। इस फैसले के खिलाफ पार्टी के दिग्गज नेताओं को बोलना चाहिए लेकिन वह ऐसे नहीं करते। शायद उन्हें राजनीति की ‘क्रूरता’ का अहसास है। 
 
समाजवादी पार्टी ने बीस वर्षों में काफी नाम कमाया। यूपी की राजनीति उसके इर्दगिर्द नाचती रही तो केन्द्र की राजनीति को भी सपा अपने हिसाब से आगे बढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ती। इन बीस वर्षों में अगर कोई बड़ा बदलाव देखने को मिला तो यही था कि सपा में अखिलेश की हैसियत नंबर दो की हो गई और वह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री भी बन गए। ऐसा अखिलेश की योग्यता की वजह से हुआ हो यह बात समाजवादियों के अलावा शायद ही किसी और के मुंह से सुनाई दे। अगर वह मुलायम के पुत्र न होते तो यह कुर्सी शायद ही उनको जीवन में कभी इतनी आसानी से नसीब हो पाती। बीस बरस की समाजवादी पार्टी हुई तो सपाईयों को खुशी मनाने का मौका मिल गया वहीं विपक्षी दलों ने उसके गुण-दोषों की चर्चा शुरू कर दी। भारतीय जनता पार्टी तो साफ कहती है कि मुलायम ने अपने पूरे राजनैतिक जीवन में कभी भी विकास की राजनीति नहीं की। वह हमेशा जातिवाद की राजनीति में गोते लगाते रहे।
 
सपा ने भले ही बीस बरस का सफर पूरा लिया हो परंतु उसके मुखिया मुलायम सिंह यादव का राजनैतिक सफर कहीं लम्बा है। 1967 में वह पहली बार उन्होंने संसोपा के टिकट पर विधान सभा चुनाव जीत का राजनीति में पहला कदम मजबूती के साथ रखा था। इसके बाद वह 1974 में भारतीय क्रांति दल से 1977 में जनता पार्टी से, 1985 में लोकदल से, 1989 में जनता दल से, 1993 में मध्यावधि चुनाव में शिकोहाबाद से, 1996 के मध्यावधि चुनाव मे सहसवान निर्वाचन क्षेत्र से, 24 जनवरी 2004 को सम्पन्न उपचुनाव में गुन्नौर से तथा 2007 के विस चुनाव में दो सीटों भरथना और गुन्नौर से चुनाव जीते। कुल दस बार मुलायम ने विधान सभा में अपनी आमद दर्ज कराई तो लोकसभा चुनावों में मार्च 1996 में मैनपुरी से, फरवरी-मार्च 1998 में संभल से, अक्टूबर 1999 में कन्नौज तथा संभल संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। 2004 के लोकसभा चुनाव में वह मैनपुरी से चौथी बार सांसद चुने गए किन्तु मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सांसदी छोड़ दी और विधायक बन गए। 
 
प्रदेश का तीन बार नेतृत्व संभालने वाले और केन्द्र में मंत्री रह चुके मुलायम का अनुभव पार्टी से काफी ज्यादा है। उन्हें धरती पुत्र की उपाधि मिली हुई है। डा. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव, बनारसी दास सहित तमाम हस्तियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल चुके मुलायम ने कई नेताओं को अपना गुरु बनाया तो मौका पड़ने पर उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकलने से भी नहीं हिचकिचाए। कुछ समय पूर्व तक तो मुलायम के बारे में यहां तक कहा जाता था कि वह अपनी बात के पक्के हैं, लेकिन इधर कुछ वर्षों में यह गुण उनसे दूर चला गया लगता है। मुलायम ने कई मुकान हासिल किए तो उनके जिंदगी में अमर सिंह जैसे लोग भी आए जिन्होंने एक समय मुलायम को अपने आभामंडल से ढंक लिया था। वह धरती पुत्र से फाइव स्टार कल्चर के नेता इसी दौर में बन गये थे। ताउम्र भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध करने वाले मुलायम ने अमर सिंह के कहने से ही उन कल्याण सिंह के काफी करीब आ गए जिन्हें मुसलमान बाबरी मस्जिद विध्वंस का जिम्मेदार मानते थे। यह और बात थी कि बाद में इसके लिए उन्होंने माफी भी मांगी थी।
 
बहरहाल, समाजवादी पार्टी चार अक्टूबर को बीस साल की हो गई। समाजवादी पार्टी ने इन बीस वर्षो में जो भी उतार-चढ़ाव देखे उसके लिए निश्चित ही एक ही इंसान को सारा श्रेय जाता है और वह नाम वन एंड ओनली मुलायम सिंह ही है। इन दो दशकों में समाजवादियों ने मुलायम के नेतृत्व में सड़क से संसद तक संघर्ष का लंबा सफर तय किया। उत्तर प्रदेश में उसने अपने दम पर चार बार सरकार ही नहीं बनाई, बल्कि केंद्र की यूपीए सरकार का बड़ा सहारा भी बनी। यह और बात थी कि इसकी कीमत भी सपा ने खूब वसूली। समाजवादी पार्टी की स्थापना 4 अक्टूबर 1992 को हुई थी। यही वो दिन था जब मुलायम ने देश के कई बड़े नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बाद एकला चलों की राह पकड़ थी। उनका यह फैसला सपा और उनकी राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन करने के पश्चात अगले वर्ष यानी 1993 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बसपा से गठबंधन किया औेर 109 सीटों पर धमाकेदार तरीके से जीत दर्ज की। समाजवादी पार्टी की पहली और इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद मुलायम के सितारे राजनीति में तेजी से चमकने लगे। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन सरकार का मुखिया बनने का सौभाग्य मुलायम सिंह यादव को मिला। मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव की यह दूसरी पारी थी, इससे पूर्व वे 1989 में बनी जनता दल सरकार का नेतृत्व कर चुके थे। सपा और बसपा ने 1993 में जब मिलकर सरकार बनाई तो राजनैतिक हल्कों में हलचल मच गई। लोगों को लगने लगा कि सपा-बसपा गठजोड़ अगर जारी रहा तो यह अन्य दलों की छुटटी कर देगा, लेकिन यह गठजोड़ लगभग डेढ़ वर्ष तक ही चल पाया और लखनऊ के बहुचर्चित स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा और सपा एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए।
 
उत्तर प्रदेश में अपने दम पर भाजपा, कांग्रेस ओर बसपा सरीखी पार्टियों के सशक्त विकल्प के रूप में उभरी समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपने नेतृत्व  में प्रदेश में चार बार (अखिलेश सरकार को मिला कर) सरकार बनाई तो 1996 में संयुक्त मोर्चा की केंद्र सरकार में उसके मुखिया मुलायम सिंह यादव को तत्कालीन प्रधामनंत्री देवगौड़ा और इन्द्रकुमार गुजराल के नेतृत्व में बनी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होने का अवसर मिला। संयुक्त मोर्चा सरकार में मुलायम सहित पार्टी के अन्य कई बड़े नेताओं को भी केंद्र में मंत्री बनने का मौका मिला था। यह समाजवादी पार्टी की केन्द्र में बड़ी पहचान बनी थी। दो दशकों में समाजवादी पार्टी को सरकार और विपक्ष दोनों का नेतृत्व करने का मौका मिला।1985-87 में मुलायम विधान परिषद के सदस्य तथा नेता विरोधी दल भी रहे। बीस वर्ष का समाजवादी सफर कई खट्टे-मीठे अनुभव अपने अंदर समेटे है। इस दौरान सपा के कई दोस्त दुश्मन बन गए तो कई बेगाने अपने हो गए। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, रशीद मसूद जैसे तमाम नेताओं ने साथ छोड़ दिया तो नरेश अग्रवाल और आजम खॉ जैसे नेता आते-जाते रहे।
 
तमाम उतार-चढ़ावों के साथ सपा का 1992 में शुरू हुआ सियासी सफर जारी हैं। 2012 के विधान सभा चुनाव में मुलायम सिंह ने अपने दम पर 224 का बहुमत जुटा कर उन लोगों के मुंह पर ताला लगा दिया जो कहा करते थे कि मुलायम अब दगा पटाखे जैसे रह गए हैं। अब सपा की मंशा मुलायम के नेतृत्व में 2014 के होने वाले लोकसभा चुनाव में अपना जौहर दिखाने की है। सपा यूपी से 60 सीटें जीत कर अपने नेता मुलायम सिंह यादव की प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी पक्की करनी चाहती है। अगर वह ऐसा कर पाई तो सपा के इतिहास में यह बात सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी लेकिन सपा की अतीत की राजनीति को देखा जाए तो ऐसा होना आसान नहीं लगता है। सपा को 2004 के लोस चुनाव में सर्वाधिक 35 सीटें हासिल हुई थी। बात सपा के गठन से आज तक की कि जाए तो 1992 में अपनी स्थापना के बाद हुए 1996 के पहले लोकसभा चुनाव में सपा को पहली बार 16 सीटें मिली थी। उसके बाद 1998  के लोकसभा चुनाव में 20 व 1999 में 26 और पिछले लोकसभा चुनाव में 23 सीटें हासिल हुईं। इतनी सीटें मिलने के बाद सपा केंद्र में यूपीए गठबंधन सरकार में भले शामिल न हुई हो लेकिन सहयेागी दल के रूप में बड़ी ताकत के रूप में उसके साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़ी रही। 
 
बसपा के सामने तो सपा की ज्यादा नहीं चलती है दोनों के बीच शह-मात का खेल वर्षों से जारी है लेकिन प्रदेश में भाजपा औेर कांग्रेस को रोकने का काम सपा बखूबी कर रही है। उत्तर प्रदेश के दो दशकों के इतिहास में सपा ऐसी तीसरी पार्टी है जिसे पहली बार पूर्ण बहुमत मिला हैं । इससे पूर्व 1991 में भाजपा को 211, फिर 2007 में बसपा को 206 सीटें मिलने के साथ बहुमत हासिल हुआ था लेकिन 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इन सारे दलों के रिकार्ड को तोड़ दिया और बहुमत की संख्या से काफी आगे निकल गई। हालांकि इन दो दशकों में एक दौर ऐसा भी आया सपा को सौ से कम सीटों पर सब्र करना पड़ा। यह और बात थी कि इसके बाद भी वह विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी बनी रही। 1996 के विधानसभा चुनाव सपा को 110, 2002 के चुनाव में 143 ओैर 2007 के चुनाव में 98 सीटें मिलीं। 2012 में सपा का अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मिशन तो पूरा हो चुका 

है देखना यह है कि क्या वह मुलायम के नेतृत्व के बहाने लक्ष्य 2014 को भी पूरा कर पाती है। तमाम जीते हासिल करने के बीस वर्षो के बाद भी समाजवादी पार्टी में मुलायम को प्रधानमंत्री बनते देखने की बेचैनी बरकरार है, देखना यह है कि सपा की यह बेचैनी कैसे दूर होती है। क्योंकि मुलायम के लिए भी 2014 में प्रधानमंत्री बनने का आखिरी मौका होगा, यह हम नहीं उनकी उम्र कह रही है।
 
 लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.
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