सवालों में ज़ी न्यूज़ की साख….जी और ज़िंदल की जंग में कौन जीतेगा.. ये तो आने वाला वक्त बताएगा पर इतना तो तय है कि दाल में कुछ काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है… एक तरफ ज़िदल ग्रुप है जिस पर कोयला घोटाले में गंभीर आरोप है…. तो दूसरी तरफ जी न्यूज है जिस पर इस घटना के पहले कभी सवाल नहीं उठे…. ज़ी ने स्टिंग आपरेशन किया तो फिर दिखाया क्यों नहीं…. ज़िंदल ने काउंटर स्टिंग आपरेशन करके दिखा दिया… पलड़ा ज़िंदल ग्रुप का हावी है….
प्रथम द्रष्टया दोषी मानते हुए बीईए ने कोषाध्यक्ष पद से सुधीर चौधरी को हटा दिया… चौधरी जी का इतिहास भी उन्हें दोषी सिद्ध करता है… तो क्या एक मैनेजिंग इडिटर को बिजनेस हेड बनाने की वजह से ऐसा हुआ…. क्या पत्रकार को व्यापारी बनाने के कारण ऐसा हुआ…. जी ग्रुप के मालिक अपने एडिटर कम बिजनेस हेड के साथ खड़े हैं….. तो क्या माना जाए सुभाष चंद्रा की सहमति से सुधीर और समीर ने ये कदम उठाया…
ज़ी न्यूज के संपादकों की वजह से अच्छा माने जाने वाले इस चैनल की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग गया… जिंदल ग्रुप भी पाक साफ नहीं है लेकिन ज़ी ग्रुप को तो अपना दामन साफ रखना चाहिए… आखिर मीडिया और कारपोरेट में कुछ तो अंतर होना चाहिए… नवीन ज़िंदल की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया के दूसरे चैनलों में ये खबर आई… अन्यथा पीटीआई में खबर आने के बाद भी कुछ अखबारों ने ज़ी और ज़िंदल की खबरें छापी, ऑन लाइन मीडिया में भी ये खबर हाईलाईट हुई लेकिन न्यूज चैनल्स खामोश बने रहे.. ये खामोशी तब टूटी जब नवीन ज़िंदल की पीसी हुई… तो क्या माना जाए कि न्यूज चैनल्स अपने ही फील्ड की खबर को नहीं दिखाना चाहते…. मारुति मानेसर प्लांट में मजदूर निकाले जाते हैं तो खबर दिखाई जाती है लेकिन वीओआई, सीएनईबी, महुआ यूपी के बंद होने से सैकड़ों पत्रकार धरना प्रदर्शन करते हैं या लेबर कोर्ट में जाते हैं तो किसी भी चैनल में ये खबर नहीं बनती… खबरों के लेकर ये दोहरा मापदंड बताता है कि मीडिया में दिया तले अंधेरा वाली कहावत कितनी सटीक बैठती है…
एडिटर को बिजनेस हेड बनाने की नई परंपरा की शुरुआत ज़ी न्यूज को भारी पड़ रही है…. ज़िंदल बनाम जी न्यूज की कंट्रोवर्सी के कारण ज़ी न्यूज में काम करने वाले पुण्य प्रसून बाजपेई और अल्का सक्सेना जैसे गंभीर पत्रकारों की प्रतिष्ठा पर भी प्रश्न चिन्ह लगे हैं… पेड न्यूज पर नकेल कसने के लिए मीडिया संगठन कितनी भी बातें करते हों लेकिन हकीकत ये है कि बड़े बिजनेस घरानों और मीडिया चैनलों या अखबारों में चोली दामन का साथ पर्दे के पीछे रहा है… बहरहाल ज़ी और ज़िंदल का ये मामला पुलिस के पास है.. अब देखना होगा कि पुलिस इस मामले की तह तक जाकर सच्चाई का पर्दाफाश करती है या फिर मामले को रफा दफा करने की कोशिश होती है…. ज़िंदल और ज़ी की जंग का अंजाम कुछ भी हो लेकिन ज़ी न्यूज़ की साख पर जो बट्टा लगा है…. उससे चैनल की छवि पर लगे दाग और धब्बे को अच्छा तो कतई नहीं कहा जा सकता… क्या ज़ी ग्रुप अपने दामन को पाक साफ साबित कर पाएगा…. ये बड़ा सवाल है…
लेखक अरुणेश कुमार द्विवेदी मंगलायतन यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर हैं.
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