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‘पोस्‍ट पेड’ और ‘प्री पेड’ के बाद मीडिया का ‘वसूली दौर’

 

आप अब मीडिया से संबंधित नई खबरों और चर्चाओं को देख-सुनकर चकित तक नहीं हो सकते! ये चमत्कारी खबरें अखबारों और टीवी में आई हैं. खबरें बताती हैं कि किस तरह एक चैनल के दो वरिष्ठ पत्रकार एक कॉरपोरेट घराने से, खबर के बदले वसूली का सौदा करते ‘काउंटर स्टिंग’ में आ गए और नंगे हो गए! अब तक ‘पोस्ट-पेड’ और ‘प्री-पेड’ न्यूज की शिकायतें होती थीं. अब मीडिया का ‘वसूली दौर’ सबके सामने है. पेड न्यूज से आगे न्यूज ‘देने’ या ‘न देने’ के लिए वसूली चाहने, ब्लैकमेल करने के किस्से सामने आ रहे हैं. सारी कहानी एकदम फिल्मी सीनों की तरह पब्लिक डोमेन में दृश्यमान हो रही है. यह ‘तथाकथित’ होते हुए भी, कई अकथित कहानियों का उद्घाटन करती है. कहानी के कई सिरे हैं. इसके पटकथाकार कई हैं और इसके आशय भी कई तरह के हैं.

 

आप अब मीडिया से संबंधित नई खबरों और चर्चाओं को देख-सुनकर चकित तक नहीं हो सकते! ये चमत्कारी खबरें अखबारों और टीवी में आई हैं. खबरें बताती हैं कि किस तरह एक चैनल के दो वरिष्ठ पत्रकार एक कॉरपोरेट घराने से, खबर के बदले वसूली का सौदा करते ‘काउंटर स्टिंग’ में आ गए और नंगे हो गए! अब तक ‘पोस्ट-पेड’ और ‘प्री-पेड’ न्यूज की शिकायतें होती थीं. अब मीडिया का ‘वसूली दौर’ सबके सामने है. पेड न्यूज से आगे न्यूज ‘देने’ या ‘न देने’ के लिए वसूली चाहने, ब्लैकमेल करने के किस्से सामने आ रहे हैं. सारी कहानी एकदम फिल्मी सीनों की तरह पब्लिक डोमेन में दृश्यमान हो रही है. यह ‘तथाकथित’ होते हुए भी, कई अकथित कहानियों का उद्घाटन करती है. कहानी के कई सिरे हैं. इसके पटकथाकार कई हैं और इसके आशय भी कई तरह के हैं.
 
कहानी बताती है कि इन दिनों बड़े मीडिया घराने, उनके वरिष्ठ अधिकारी-पत्रकार किस-किस तरह से औद्योगिक घरानों के साथ कितने बेबाक तरीके से वसूली और ब्लैकमेल में लिप्त होने लगे हैं. यह तो एक कहानी है जो सामने है. कितनी कहानियां बन रही हैं, कौन जाने? कहानी इतना आस्त करती है कि मीडिया की आवारगी पूंजी की आवारगी से जुड़कर जिस परम आजादी की बात करने लगी है वह दावा अब एक संदिग्ध मूल्य है. इस तरह के अपराध पर सत्ता उसे कभी भी नांध सकती है. ‘दोस्त’ (क्रोनी) पूंजीवादी समय में मीडिया बिजनेस के एक ‘दोस्त’ की भूमिका में काम करता है. इसलिए खबरें ‘खबरेतर दोस्ती’ से तय होती हैं. मीडिया, मीडियेतर दोस्ती से तय हो रहा है. कॉरपोरेट का काम ‘कॉरपोरेटेतर दोस्ती’ से चल रहा है. यह दल्ला-दोस्ती या ‘क्रोनीपन’ कुछ नया है. मीडिया ‘क्रोनी’ दौर में आ गया है!
 
मीडिया के समकालीन ‘पोल-खोल-पुराण’ में हर दिन उद्घाटन उत्कटता बनती रहती है. हम उत्तेजित होकर किसी बड़े बंदे की पोल खुलते देख छिपे सच के प्रकट होने का अचरज भरा सुख महसूस करते हैं और एक ऐसी नैतिक दुनिया की कल्पना करते हैं जो एक असंभावना ही होती है. हम पोल का सुख लेते हुए पोले होते जाते हैं. यह नित्य होता नैतिक क्षरण है जो मीडिया ने संभव किया है. ‘आज मीडिया बड़े-बड़ों के गरेबां में हाथ डालकर अब तक की ‘वर्जित सीमा’ का उल्लंघन करके समाज सेवा कर रहा है’; यह सोचकर हम अपने तक पहुंच रहे ‘नैतिक क्षरण’ का अनुभव तक नहीं करते.
 
चालाकियां दंग करती हुई हमें दीक्षित करती रहती हैं. हमारी आलोचना एक खिसियाहट पैदा कर कहती है कि वह इतना बना गया और हम वहीं के वहीं रह गए! यही अनुभव हमें नैतिक बनाने की जगह अवसरानुकूल रहने वाला बनाता है. क्रोनीपन की वैधता एक सामाजिक मूल्य बन जाती है. क्रोनी खबरें और चर्चाएं इसी तरह के संस्कार बनाती रहती हैं. अचानक कोई कहानी हर चैनल पर उत्कट बहस बनती है. कोई निशाना बनने लगता है और फिर अचानक वह कहानी बजनी बंद हो जाती है और उसकी जगह नई कहानी आने लगती है! सत्ता, कॉरपोरेट और मीडिया एक-दूसरे के सगे-सहोदर लगते हैं. अगर तकरार होती भी है तो शाम की पार्टी में जाम पर हुई तकरार की तरह होती है, जो सुबह तक भुला दी जाती है. इन दिनों ‘सच’ के एक से एक विकट दावे हैं, लेकिन ‘सच’ आज जितना संदिग्ध है पहले कभी नहीं था. सच को रोज बनाया जाता है.
 
पोल खोल के खेल में पहले क्षण से आखिरी क्षण तक स्पष्ट नहीं होता कि जो खोजी खबर छाप एक्सपोजर बताया जा रहा है वह किन हाथों से चला, किनके मुख से किनके कान में कू हुआ और फिर ब्रेकिंग उद्घाटन हुआ. जो पहले दिन प्रकटत: सच का दावा करने वाला था, अगले दिन वही विवादित हुआ और तीसरे दिन उसका प्रतिपक्ष आने लगा. प्रतिवादी स्वर आने लगे कि अचानक संपादक के कान में किसी ने फूंक मार दी और सब शांत हो गया. आप हर शाम एक के ‘सच’ को जिद ठान कर दूसरे के ‘सच’ पर झपटते देखते हैं. सच इतना दुष्ट कभी नहीं दिखा. मीडिया इतना छलिया कभी नहीं दिखा. निंदा-प्रतिनिंदा इतनी लोकप्रिय कभी न हुई. इतना संशयवाद कभी नहीं बना.
 
मीडिया की वसूली और ब्लैकमेल का उक्त किस्सा, एक मीडिया घराने के कुछ पत्रकारों के ‘साहस’ की दास्तान है. सीन एकदम फिल्मी हैं. काउंटर-स्टिंग से बनाई गई चौदह मिनट की एक सीडी बजती है. इसे एक उद्योगपति ने तैयार कराया है. उसका कहना है कि एक टीवी चैनल उसके कोलगेट संबंधी समाचार को दबाने हेतु अपने पत्रकारों के जरिए वसूली की कोशिशें करा रहा था. पत्रकार एक होटल में गुप्त कैमरे में बोलते नजर आते हैं कि अगर उद्योगपति सौ करोड़ रुपयों का इंतजाम कर ले, अपने विज्ञापन चैनल को देने के एक एग्रीमेंट के कागजों पर दस्तखत कर दे तो उसके खिलाफ उस चैनल में चल रही ‘कोलगेट’ कहानी धीरे-धीरे उसके पक्ष में मोड़ दी जाएगी. पत्रकार यह भी कहते हैं कि इससे बेहतर ऑफर नहीं हो सकता!
 
स्वयं को ब्लैकमेल किया जाता देख उद्योगपति के बंदों ने पत्रकारों का ‘काउंटर स्टिंग आपरेशन’ कर डाला और सारा फुटेज पत्रकार बिरादरी को दिखाया. उद्योगपति ने पुलिस से इस हरकत की शिकायत की है. प्रेस कांउसिल को लिखा है और उक्त चैनल के खिलाफ एक क्रिमिनल केस भी दायर करने जा रहे हैं. उधर उन स्टिंगित पत्रकारों का कहना है कि वह कॉरपोरेट हाउस उनको ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा था. वे स्वयं उस पर स्टिंग करने गए थे.
इस कहानी का अंत जो हो, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस ‘क्रोनीकाल’ में आरोपित पत्रकार अंतत: फिर कहीं पत्रकार बन जाएंगे. हमारे जैसे कलम घसीट, पूंजी और पत्रकार के बन रहे नए क्रोनीपन पर विचार करते रह जाएंगे और क्रोनीपन अपना चेहरा बदलकर फिर किसी नए रूप में काम कर रहा होगा! फिर कोई पोल-खोल सीन होगा, फिर बहसें होंगी, फिर कुछ मूर्ख पत्रकार पकड़े जाएंगे; लौटकर वे फिर पत्रकार बन जाएंगे!
 
लेखक सुधीश पचौरी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख समय लाइव से साभार लिया गया है. 
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